यदि मैं थानेदार बन जाऊँ पर निबंध|Essay on if i become a sho

यदि मैं थानेदार बन जाऊँ पर निबंध|

यदि मैं थानेदार बन जाऊँ पर निबंध|Essay on if i become a sho

विषय प्रवेश-यदि मैं थानेदार बन जाऊँ तो ऐसा थानेदार बनना चाहूँगा जिसे लोगों का प्यार मिले ऐसा थानेदार बनना चाहूँगा जो स्वयं तो कानून का शब्दशः पालन करे ही, साथ ही लोगों से भी कानून का अनुपालन कराए. यदि मैं थानेदार बन जाऊँ तो ऐसा थानेदार बनूँगा जिसके पास उसके थानान्तर्गत आने वाला हर व्यक्ति बिना किसी भय, संशय या हिचक के अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है. 

नियुक्ति के साथ ही मैं अपने क्षेत्र का व्यापक सर्वेक्षण करूँगा और देखूगा कि ऐसे कौनसे व्यक्ति हैं जिनसे क्षेत्र में शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने में सहायता ली जा सकती है. साथ ही ऐसे व्यक्तियों के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करूँगा जो वैध स्रोतों से प्राप्त आय से अधिक खर्च करते हैं, किसी प्रकार का अवैध व्यापार, तस्करी आदि करते हैं अथवा माफिया गिरोहों से सम्बद्ध हैं. उनको समझाकर राह पर लाने का प्रयत्न करूँगा. सफलता न मिलने पर उनकी गतिविधियों को रोकने का प्रयत्न करूगा.. 

यदि मैं थानेदार बन जाऊँ तो मैं किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबावों के आगे झुककर नियम विरुद्ध कोई काम नहीं करूँगा. ‘सक्षम न्यायालय के आदेश के अतिरिक्त अन्य किसी भी व्यक्ति के परोक्ष या प्रत्यक्ष संकेत, आदेश या दबाव में आरोपित व्यक्ति को नहीं छोडूंगा. भले ही, इसके लिए ऊपर से कितना भी दबाव क्यों न पड़े? मैं सक्षम न्यायालय के आदेशों में छिपी मूल भावना का सम्मान करूँगा. 

यदि मैं थानेदार बन जाऊँ तो बिना किसी पक्षपात के अपने कर्तव्यों का पालन करूँगा. प्रायः यह देखा गया है कि पुलिस-प्रशासन से जुड़े लोग भी जाति, धर्म, पंथ, सम्प्रदाय आदि की संकीर्ण भावनाओं के वशीभूत होकर पक्षपात पूर्ण कार्य करने लगते हैं. स्वस्थ लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में ऐसा नहीं होना चाहिए, परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा हो रहा है. विवादास्पद राम जन्मभूमि-बावरी मस्जिद के विध्वंस के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस के जवानों द्वारा अपने कर्तव्यों का अनुपालन कर डयूटी करने की बजाय रामलला के दर्शन करना उन पुलिसकर्मियों की निष्पक्षता पर प्रश्न-चिह्न लगाता है. फिर मुम्बई पुलिस द्वारा मुम्बई के दंगों के दौरान एक खास समुदाय के लोगों को चुन-चुन कर गोली से उड़ा देना तथा उसी समुदाय के हजारों बेकसूर नौजवानों को ‘टाडा’ (Terrorists & Disruptive Activities (Prevention) Act, TADA) और रासुका (National Security Act, NSA) के तहत गिरफ्तार करना पुलिस कर्मियों के क्षुद्र और संकीर्ण भावनाओं से ग्रसित होने का परिचायक है. यदि मैं थानेदार बन जाऊँ तो न तो मैं स्वयं जाति, धर्म पंथ और सम्प्रदाय की भावना से ग्रसित होकर कोई भी भेदभावपूर्ण या पक्षपात युक्त कृत्य करूँगा और न अपने साथी पुलिस कर्मियों को ऐसा करने दूंगा. मैं हमेशा पक्षपात से परे रहकर एक सच्चे और निष्पक्ष पुलिसकर्मी के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करूँगा. मेरे लिए सभी जाति, धर्म, पंथ सम्प्रदाय के लोग बराबर होंगे. 

पुलिस बिरादरी में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो महिलाओं को ‘भोग की वस्तु’ और लड़कियों को ‘माल’ समझते हैं. अवसर मिलते ही वे छेड़खानी (Molestation) और बलात्कार (Rape) पर उतर आते हैं. थाने में छेड़खानी या बलात्कार की फरियाद लेकर जब कोई महिला या लड़की पहुँचती है तो पुलिसकर्मी उस पीड़ित के चरित्र को शक की निगाह से देखते हैं. बलात्कार की शिकार कोई औरत या लड़की जब अपनी फरियाद लेकर रपट लिखाने थाने पहुँचती है, तो पुलिसकर्मियों के भीतर छिपा शैतान जाग उठता है और उस लड़की या महिला को थाने के अन्दर बलात्कार का शिकार होना पड़ता है. कई बार ऐसा भी हुआ कि पुलिसकर्मी किसी परिवार के लोगों को पकड़ कर थाने ले आते हैं और उस परिवार की महिला के साथ उनके परिजनों के समक्ष ही बलात्कार करते हैं. ऐसे ही लोगों ने समूची पुलिस बिरादरी को बदनाम कर रखा है. इसका परिणाम यह हुआ है कि अधिकतर महिलाएं अपनी शिकायतें लेकर पुलिसकर्मियों के पास जाती ही नहीं हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि पुलिसकर्मी उनके साथ कैसा सलूक कर सकते हैं. यदि मैं थानेदार बन जाऊँ तो मैं सुनिश्चित करूँगा कि हमारे थाने में ऐसा घिनौना, अनैतिक और गैरकानूनी कृत्य न हो. मैं थाने का वातावरण ऐसा बनाऊँगा जहाँ महिलाएं अपनी शिकायतें बिना किसी परेशानी के दर्ज करा सकें और वहाँ उनके साथ अच्छा सलूक किया जाए. मैं यह सुनिश्चित करूँगा कि महिलाओं की समस्याओं के प्रति हमारे सहकर्मी संवेदनशील रहें और महिलाओं के प्रति किसी प्रकार का दुर्व्यवहार न होने पाए 

प्रायः देखा गया है कि पुलिसकर्मी अपराधियों को गिरफ्तार कर लेते हैं और फिर उन्हें ‘फर्जी मुठभेड़’ (Encounter) में मार देते हैं. पंजाब पुलिस व मुम्बई पुलिस ऐसे मामले में काफी बदनाम हो चुकी है. यदि में थानेदार बन जाऊँ तो यह सुनिश्चित करूँगा कि मेरे सहयोगी पुलिसकर्मी फर्जी मुठभेड़ों की घटनाओं को अंजाम देंगे. 

विचाराधीन कैदियों और रिमांड पर लिए गए आरोपितों के साथ अमानवीय व्यवहार करना पुलिस कर्मियों की ‘आदत में शुमार हो चुका है. आरोपितों के मानवाधिकारों की धज्जियाँ उड़ाना पुलिसकर्मियों का ‘शगल’ बनता जा रहा है, परन्तु यदि मैं थानेदार बन जाऊँ तो न तो मैं स्वयं ऐसा करूँगा और न अपने साथी और अधीनस्थ पुलिसकर्मियों को ऐसा करने का लिखित या अलिखित आदेश दूंगा. यदि मैं थानेदार बन जाऊँ तो मैं यह सुनिश्चित करूँगा कि हमारे थाने के अन्दर पूछताछ की प्रक्रिया के दौरान रिमांड पर लिए गए अपराधियों या आरोपितों के साथ पाशविक और अमानवीय बर्ताव न हो और ‘थर्ड डिग्री’ साधनों का इस्तेमाल तो कतई न हो. 

मैं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission, NHRC), राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission For Women, NCW) और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (United Nations Human Rights Commission, UNHRC) की विभिन्न रिपोर्टों और सिफारिशों से अवगत रहूँगा और उनके द्वारा जारी दिशा निर्देशों पर अमल करने का हरसम्भव प्रयास करूँगा. 

अपराधियों के मानवाधिकारों के प्रति सम्मान का अर्थ यह कतई नहीं है कि घोषित अपराधियों के लिए मेरे दिल में कोई ‘नरम कोना’ (Soft Corner) होगा. मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि घोषित अपराधियों के प्रति मेरा रवैया हमेशा सख्त होगा. सजायाफ्ता मुजरिमों पर मैं हमेशा पैनी नजर रखूगा. अपराधी-राजनेता गठजोड़ को तोड़ने का हर सम्भव प्रयास करूँगा. इसके लिए आम जनता को भी जागरूक करूँगा 

यदि मैं थानेदार बन जाऊँ तो पुलिसिया ‘रौब-दाब’ से काम नहीं लूँगा. ‘वर्दी वाला गुण्डा’ नहीं बनूँगा. अपनी छवि ‘लाइसेंस प्राप्त सरकारी गुण्डे’ की तरह की नहीं बनने दूंगा. न तो स्वयं ‘डाली’ लूँगा और न वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को ‘डाली’ पहुँचाऊँगा. इसके कारण मिलने वाले दण्ड को सहर्ष स्वीकार करूँगा. 

अभी क्या हो रहा है? पुलिसकर्मी रेस्टोरेंट में बैठकर मुफ्त की दावतें उड़ाते हैं, सब्जी वाले से मुफ्त की सब्जी लेते हैं. खोमचे और रेहड़ी वालों से पैसे वसूलते हैं. दुकानदारों द्वारा सामान का दाम माँगे जाने पर उन्हें मुकदमे में फँसा देने की धमकी देते हैं. मैं ऐसा कतई नहीं करूँगा. मुफ्तखोरी की जो संस्कृति पुलिसकर्मियों में लम्बे अर्से से विद्यमान है उसे जड़ से मिटाना होगा और उनमें ईमानदारी की रोटी खाने की आदत डालनी होगी.

आम जनता के प्रति मेरा रवैया मित्रवत्, प्रेमपूर्ण और सहयोग का रहेगा. मेरा ‘नरम कोना’ अपराधियों और राजनीतिक आकाओं के प्रति न होकर आम जनता के प्रति होगा. आम जनता की शिकायतों के निवारण के लिए एक थानेदार के रूप में वह सब कुछ करूँगा जितना करने का मुझे कानूनी, सामाजिक, नैतिक और मानवीय अधिकार प्राप्त है. मैं अपनी सारी शक्ति आम जनता की भलाई में लगा दूंगा. आम जनता के लिए हमेशा आसानी से उपलब्ध रहूँगा. 

जब भी पुलिस के किसी वरिष्ठ अधिकारी से आप व्यक्तिगत रूप से मिलने या फोन पर सम्पर्क करने का प्रयास करते हैं, तो उनका चपरासी आपको सपाट लहजे में रटे रटाए तोते की तरह यही बताएगा- ‘साहब, अभी टॉयलेट में हैं। मैं ऐसा कतई नहीं होने दूंगा. आम जनता की सेवा करने और उनकी समस्याओं का निदान करने के लिए ही हम पुलिसकर्मियों की नियुक्ति की जाती है. इस कसौटी पर खरा उतरने का पूरा प्रयास करूँगा. 

आज आम जनता की नजरों में पुलिसकर्मियों की छवि काफी खराब हो चुकी है. अधिकतर लोग पुलिसवालों पर विश्वास नहीं करते हैं. प्रायः लोग कहते रहते हैं-पुलिस वालों की न दोस्ती अच्छी और न दुश्मनी अच्छी, पुलिसकर्मियों की छवि ‘सरकारी गुण्डे’ की हो गई है. कई बार ऐसा भी देखा गया है कि पुलिसकर्मी, डाके, राहजनी, जबरन वसूली आदि में भागीदार रहते हैं. इस ध्वस्त छवि को ठीक करने की महती आवश्यकता है. इस छवि को न सिर्फ सुधारने बल्कि उसे सँवारने की जरूरत है ताकि लोग पुलिसकर्मियों पर भरोसा करें, इसके लिए पुलिसकर्मियों को अपना रवैया बदलना होगा और अपनी छवि स्वच्छ बनाने का प्रयास करना होगा. मैं इस दिशा में पहल करूँगा. 

परन्तु यहाँ भी एक समस्या आती है. अपना रिकार्ड साफ-सुथरा रखने के चक्कर में पुलिसकर्मी ‘प्रथम सूचना रिपोर्ट’ (First Information Report, FIR) लिखने में आनाकानी करते हैं. ‘गंभीर अपराध’ को हल्के-फुल्के अपराध के रूप में दर्ज करते हैं. निर्दोष व्यक्ति को पकड़कर उसे अपराधी के रूप में न्यायालय में पेश कर अपनी जान छुड़ाते हैं. भारतीय दण्ड संहिता (Indian Penal Code, IPC) की विभिन्न धाराओं के साथ मनमाना खिलवाड़ करते हैं, मैं ऐसा नहीं करूँगा. 

प्रायः ऐसा देखा गया है कि थानेदार अपने कनिष्ठ पुलिसकर्मियों, मातहतों के साथ नौकर जैसा सलूक करते हैं. यदि मैं थानेदार बन जाऊँ तो ऐसा कतई नहीं करूँगा. मैं अपने साथी पुलिसकर्मियों से मित्रवत् व्यवहार रखूगा ओर हम लोग एक टीम के रूम में अपने सारे कार्य सम्पादित करेंगे, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं अपने सहकर्मियों की गलतियों को छुपाने का प्रयास करूँगा या अपने सहकर्मियों के गलत काम को नजरअंदाज कर दूंगा. 

उपसंहार-यदि मैं थानेदार बन जाऊँ तो अपने निर्धारित कर्त्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करूँगा और अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा निष्ठावान् रहूँगा. कभी भी कोई गैर 

जिम्मेदाराना हरकत नहीं करूँगा. आम जनता की शिकायतों के निवारण का हर सम्भव प्रयास करूँगा. आम जनता के प्रति हमेशा सकारात्मक और सहयोगपूर्ण रवैया अपनाऊँगा. महिलाओं की समस्याओं के प्रति हमेशा संवेदनशील रहूँगा और फरियादी माताओं एवं बहनों के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार रखूगा. मैं स्वयं तो यह सब करूँगा ही, साथ ही अपने सहकर्मियों, अधीनस्थों और मातहतों को भी ऐसा करने को निर्देशित करूँगा. उन्हें भी अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि मानने हेतु प्रेरित करूँगा, मैं हमेशा लोगों की सेवा करने को तत्पर रहूँगा और अपने साथी पुलिसकर्मियों, अधीनस्थों और मातहतों को भी ऐसा करने को प्रेरित करूँगा. उनमें ‘सेवा भावना’ जाग्रत करूँगा.

 मैं ऐसा थानेदार बनना चाहूँगा जिसे देखते ही लोग कह उठे-“पहली बार ऐसा थानेदार आया, इतना हिम्मतवाला जिस पर हमको प्यार आया”, परन्तु ऐसा थानेदार नहीं कि मेरी पत्नी खुलेआम ऐलान करती रहे-“सैंया भए कोतवाल (थानेदार), अब डर काहे का 

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