आदर्श शिक्षक पर निबंध |Essay on ideal teacher

Essay on ideal teacher

आदर्श शिक्षक पर निबंध

मानव-जीवन में शिक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। शिक्षा के बिना मानव पशुतुल्य होता है। बोलचाल की भाषा में शिक्षा देने वाले व्यक्ति को ही ‘शिक्षक’ कहा जाता है। शिक्षक को ‘अध्यापक’ भी कहते हैं। प्राचीन काल में शिक्षकों को ‘गुरु’ कहा जाता था। गुरु की अवधारणा में ज्ञान देने वाले लोग आते हैं। सूक्ष्म अंतर ढूंढने वालों को शिक्षक और गुरु में भेद मालूम पड़ सकता है। शिक्षा देने वाले और ज्ञान देने वाले में मौलिक अंतर यह है कि शिक्षक शिक्षितों को ही शिक्षा देता है, मगर गुरु अशिक्षितों और अनपढ़ों को भी ज्ञान देता है। जिसे अक्षर ज्ञान नहीं है, उसे भी वह ज्ञानी बना देता है। ‘गुरु’ शब्द की महिमा शिक्षकों में हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती। जो शिक्षक गुरु की महिमा से मंडित होता है, वही ‘आदर्श शिक्षक’ कहलाता है। 

गुरु वह है, जो शिष्य को अज्ञान या अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। मानव-जीवन में आदर्श गुरु की महिमा दर्शाने के लिए कहा गया है 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। 

गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

चरित्र मानव-जीवन की पूंजी होती है, अतएव एक आदर्श शिक्षक को चरित्रवान होना चाहिए। विद्यार्थी शिक्षक से केवल पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं सीखता, बल्कि उसके चरित्र का भी अनुकरण करता है। महात्मा गांधी ने कहा है, “यदि अध्यापक चरित्रवान है, तो वह अपने तेज से दूरस्थ छात्रों को भी प्रभावित किए बिना नहीं रहेगा। लंका में बैठा शिक्षक अपने चरित्र बल से भारतीय छात्रों की आत्मा को हिला सकता है।” इसी प्रकार आदर्श शिक्षक का जीवन सादा और विचार उच्च होने चाहिए। 

एक आदर्श शिक्षक को अपने विषय का ज्ञाता तो होना ही चाहिए, साथ ही उसके पढ़ाने की शैली भी अच्छी होनी चाहिए, ताकि वह कठिन से कठिन प्रश्नों को भी सहजता से विद्यार्थियों को समझा सके। अनुशासन मानव-जीवन के लिए आवश्यक है। अतः एक आदर्श शिक्षक को स्वयं अनुशासित रहकर छात्रों को भी अनुशासन में रखना चाहिए। विद्यार्थी को दंड देते समय ऊपर से कठोर तथा अंदर से पुत्रवत् भाव रखना चाहिए। जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी का घड़ा बनाते समय उसकी खामियों को दूर करने के लिए अंदर से हाथ का सहारा देकर उसे ऊपर से पीटता है, उसी प्रकार गुरु अपने शिष्य को सुधारने के लिए उसे दंड देता है। यही एक आदर्श शिक्षक के तत्व हैं। 

 आदर्श शिक्षक को समदर्शी होना चाहिए। शिक्षक के लिए न कोई छात्र अमीर है, न कोई गरीब, न कोई हिंदू है और न कोई मुसलमान। उसके लिए तो सूतपुत्र कर्ण, अंत्यज एकलव्य और राजपुत्र युधिष्ठिर-सभी एक समान हैं। 

ऐसे आदर्श शिक्षक ही छात्रों के बीच, अभिभावकों के बीच एवं समाज के बीच आदर की दृष्टि से देखे जाते हैं। वे राष्ट्र-निर्माता होते हैं। महर्षि अरविंद ने ठीक ही कहा है, “अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कार की जड़ों में खाद देते हैं और परिश्रम से उन्हें सींच-सींचकर महान शक्तियों के रूप में परिवर्तित करते हैं।” 

ऐसे शिक्षक की महत्ता ईश्वर से भी बढ़कर आंकी गई है, लेकिन आज हमारे समाज में ऐसे शिक्षकों का अभाव है। आज के शिक्षक शिक्षण कार्य को एक व्यवसाय मानते हैं। जो शिक्षक केवल पेट पालने के लिए विद्या पढ़ाते हैं; वे पंडित नहीं, ज्ञान बेचने वाले बनियां हैं। ऐसे शिक्षक विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण के बजाय अपनी जेब गर्म करने पर ज्यादा ध्यान देते हैं। इस प्रकार के शिक्षकों को समाज आदर नहीं देता। वस्तुतः समाज ऐसे शिक्षकों द्वारा उपकृत है, जिनके शिक्षण से समाज को चरित्रवान और सुयोग्य नागरिक मिले हैं। गुरु वसिष्ठ, द्रोणाचार्य, परशुराम आदि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

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