मानव-वन्यजीव संघर्ष पर निबंध | Essay on Human-Wildlife Conflict

मानव-वन्यजीव संघर्ष पर निबंध 

मानव-वन्यजीव संघर्ष पर निबंध | Essay on Human-Wildlife Conflict  अथवा मानव-वन्यजीव संघर्ष (Man-Animal Conflict) 

यहां जंगल थे आबादी से पहले 

सुना है मैंने लोगों की जुबानी।

नासिर काजमी का यह शेर घटते जंगलों की उस कहानी को बयां कर रहा है, जिसमें वन्य जीवों के उजड़ते ठौर-ठिकानों का दर्द भी शामिल है। घटते जंगलों के कारण ही इंसान और जानवर के बीच टकराव और संघर्ष बढ़ा है। वस्तुतः यह क्षेत्र के विस्तार का संघर्ष है, जिसमें मानव जीत तो रहा है, मगर शिकस्त खाए हिंसक वन्य जीव भी पलटवार करने से बाज नहीं आते। आएं भी कैसे, यह उनके अस्तित्व से जुड़ा मामला जो है। वे अपने घर पर मानव का आधिपत्य कैसे स्वीकार करें। पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रमों पर गौर करने से यह साफ पता चलता है कि मानव पर वन्य जीवों के हमले बढ़े हैं। हर उस आबादी में ये हमले तेज हुए हैं, जो वनों के समीपस्थ हैं। हमलावर जानवरों में बाघ, तेंदुए, हाथी एवं भालू प्रमुख हैं। हाथी फसलों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। 

आकड़ों से पता चलता है कि भारत में अवैध शिकार की वजह स उतने वन्यजीवों की मौत नहीं होती है, जितने कि मानव-वन्यजीव संघष एवं निरंतर घटते वनावरण के कारण मारे जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक 80 हाथी एवं 50 बाघ प्रतयेक वर्ष मानव वन्यजीव संघर्ष में अपनी जान गवां देते हैं। 

मानव एवं वन्यजीव संघर्ष किस कदर बढ़ रहा है और इसके क्या दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं, उसका अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि भारत के अनेक अंचलों में जंगलों के पास खेती करने वाले किसान या तो नई किस्म की फसलें बो रहे हैं या खेती करना ही छोड़ रहे हैं। इसकी वजह कृषि बाजार नहीं, बल्कि उनकी खेती पर जंगली जानवरों द्वारा किये जा रहे हमले हैं।

खेती के वन के मुहाने तक पहुंचने से स्थिति और बिगड़ी है। वन्य-जीवन (संरक्षण) अधिनियम ने व्यक्तियों को उनके जानवरों के लिए चारा लाने या फल, जड़ी-बूटियों एवं जलाई लकड़ी इकट्ठा करना प्रतिबंधित कर दिया है। इस रोक के परिणामस्वरूप व्यक्ति वन उत्पादों से महरूम हो गये और उन्हें कृषि की ओर अधिक ध्यान देना पड़ा। इसके लिए ज्यादा भूमि साफ करना पड़ी और खेती वन के मुहाने तक पहुंच गयी। 

मानव-वन्यजीव संघर्ष में नुकसान दोनों पक्षों का हो रहा है। जहा इंसानों की जान-माल का संकट बढ़ा है, वहीं जानवर भी मारे जा रहे हैं, जिससे उनकी संख्या कम हो रही है। इससे नैसर्गिक असतुलन भी बढ़ रहा है। जानवर जब इंसानों की बस्ती में आने की भूल करता है, तो इसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ता है। पहले से ही भरे बैठे इंसान उसे बेरहमी से मार डालते हैं। ऐसी घटनाएं होने पर वन विभाग वाले न तो समय से गांवों में पहुंच पाते हैं और यदि पहुंच भी गये तो उपकरणों और कौशल के अभाव में इंसानी बस्ती में घुसपैठ करने वाले जानवर को पकड़ कर वापस वनों के हवाले नहीं कर पाते हैं। उत्तराखंड में एक दशक में एक सौ साठ से भी ज्यादा हाथी मारे जा चुके हैं। जिम कार्बेट नेशनल पार्क में भी हाथियों की संख्या घटी है। जितने भी नेशनल पार्क एवं वन प्रभाग हैं, उनमें हाथियों की संख्या बढ़ने के बजाय घटी है। यह दुखद है। 

“घटते जंगलों के कारण ही इंसान और जानवर के बीच टकराव और संघर्ष बढ़ा है।” 

वस्तुतः मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ाने के लिए मानव ही अधिक कुसूरवार है। मानव ने स्वार्थ में अंधे होकर हमेशा प्रकृति का शोषण किया है और पर्यावरण संतुलन की परवाह किए बगैर । प्रकृति से लिया तो बहुत कुछ, उसे दिया कुछ भी नहीं। मानवीय हस्तक्षेप और दोहन के कारण न सिर्फ वन क्षेत्र सिकुड़े हैं, बल्कि वन्य जीवों के शांत जीवन में मानवीय खलल भी बढ़ा है। घास के मैदान कम होने से वे जीव भी कम हुए हैं, जो मांसाहारी जंगली जानवरों का भोजन होते हैं। भोजन की अनुपलब्धता उन्हें इंसानी बस्तियों में खींच लाती है और वे आदमखोर हो जाते हैं। 

अनियंत्रित एवं अराजक विकास ने भी स्थितियों को बिगाड़ने का काम किया है। पर्यावरण एवं वन्य जीवन की परवाह किए बगैर हम वन एवं कृषि भूमि पर उद्योग, विद्युत एवं सीमेंट संयंत्र आदि लगाने में पीछे नहीं रहते हैं। इससे वनों का रकबा तो घटता ही है, वन क्षेत्र अशांत भी हो जाते हैं। इससे जानवरों का कुपित होना स्वाभाविक है। हम उनके घर के विस्तार को तो आघात पहुंचाते ही हैं, उनकी शांति भी भंग करते हैं। नतीजतन वे उग्र और आक्रामक हो जाते हैं। 

मानव अपने आनंद और सुख के लिए किस हद तक वन्य | जीवों को आहत कर रहा है, यह बताने के लिए केंद्रीय पर्यटन | मंत्रालय की यह रिपोर्ट काफी है। केन्द्रीय पर्यटन मंत्रालय ने हाल ही  में कार्बेट राष्ट्रीय पार्क का सर्वेक्षण कराया था। सर्वेक्षण की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। इसमें कहा गया है कि पार्क के आसपास जिस तेजी से रिसार्ट और होटल बने हैं उससे न सिर्फ पार्क का पर्यावरण | गड़बड़ाया है, बल्कि वन्य जीवों के लिए भी यह परेशानी का सबब बनता जा रहा है। सर्वेक्षण से इस बात का पता चला है कि यहां क्षमता से ज्यादा लोग आ रहे हैं। इससे जंगल की व्यवस्था चरमरा जाती है। सर्वेक्षण के मुताबिक जंगल के आसपास करीब सतहत्तर रिसार्ट हैं। डेस्कोथेक से लेकर शादी-ब्याह के मौके पर पार्टियों का आयोजन भी होता है। तेज संगीत और रंग-बिरंगे प्रकाश की वजह से जंगल की शांति रात में भंग होती है। इसके अलावा इन होटलों का अधिकांश कचरा भी आसपास फेंका जाता है जिससे इलाके का पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। इतना ही नहीं, इनमें से अधिकांश रिसार्ट कायदे-कानून को ताक पर रख कर बनाए गए हैं। काश्तकारी की जमीन पर बनी इन इमारतों के लिए आसपास के पेड़ों को बेतरह काटा गया और फिर निर्माण में उन चीजों का इस्तेमाल किया गया जो पर्यावरण के नजरिए से ठीक नहीं हैं। 

मानव-वन्यजीव संघर्ष के कुछ और भी कारण हैं। लकड़ी की तस्करी, जंगली उत्पादों की चोरी और पेड़ों की अवैध कटाई के कारण भी जंगली जानवरों के हमले बढ़े हैं। अवैध तरीके से जंगल में लकड़ियां काटने और वन उत्पादों के लालच में लोग घने जंगलों में चले जाते हैं और जानवरों के शिकार बन जाते हैं। काननों एवं आदेशों की अवहेलना किए जाने के कारण भी मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा है। इसे असम राज्य के तेलाग्राम में स्थित नुमालीगढ़ के उदाहरण से समझा जा सकता है। ध्यातव्य है कि तेलाग्राम क्षेत्र (जहां नुमालीगढ़ रिफाइनरी स्थित है) हाथियों के पर्यावास के लिए विख्यात है। नुमालीगढ़ द्वारा वर्ष 2011 में देवपहाड़ फॉरेस्ट रिजर्व एवं काजीरंगा नेशनल पार्क के समीप अवस्थित हाथी गलियारा (Elephant Corridor) में एक दीवार का निर्माण करवाया गया था, जिसकी वजह से जहां हाथियों का आवागमन बाधित हुआ, वहीं वे दीवार में फंस कर चुटहिल भी होने लगे। इस मामले ने तूल पकड़ा, जब वर्ष 2015 में दीवार से घायल होकर हाथी के एक बच्चे की मौत हो गई। इसके बाद असम राज्य सरकार द्वारा इस दीवार को तोड़े जाने के आदेश दिए गए। यहां गौरतलब है कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी एक अधिसूचना के तहत 5 जुलाई, 1996 को काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के आस-पास के क्षेत्र को ‘गैर-विकास जोन’ (No Development Zone) घोषित किया गया था। प्रश्न यह उठता है कि इस अधिसूचना के बावजूद रिफाइनरी द्वारा वहां दीवार का निर्माण कैसे करवाया गया। समग्र रूप से देखें तो ऐसे कई मामले सामने आएंगे, जिनमें नियम-कायदों की अनदेखी कर वन्यजीवों के पर्यावास को नष्ट किया जाता है। यहां यह रेखांकित किया जाना समीचीन रहेगा कि वर्ष 1994 में दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देश पर गठित एक उच्च स्तरीय समिति द्वारा गैर-विकास जोन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए यह सिफारिश की गई थी कि किसी भी राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्य की 5 किमी. त्रिज्या में चारों ओर किसी भी प्रकार के उद्योग एवं कारखाने लगाने की अनुमति नहीं होगी। इस सिफारिश को स्वीकारते हुए केंद्र सरकार द्वारा इसको अमली जामा पहनाया गया था। इसी क्रम में मानव की गतिविधियों के दुष्प्रभावों से संरक्षित क्षेत्रों को बचाने के लिए वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट की पहल पर ‘ईको सेंसिटव जोन’ सृजित करने की शुरुआत हुई। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा ईको सेंसिटिव जोन अधिसूचित कर वन्यजीव अभयारण्यों की 10 किमी. सीमा को इसके दायरे में लाया जाना प्रारंभ किया। 

गैर-विकास जोन एवं ईको सेंसिटिव जोन जैसे केंद्रीय प्रावधान बावजूद यदि भारत में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं थम हैं, तो इसका मुख्य कारण यह है कि राज्य सरकारों की तरफ से प्रायः नियमों की अनदेखी एवं उनका अतिचार किया जाता है। 

मानव और वन्य जीव, दोनों की बेहतरी एवं अस्तित्व की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि हम हर हाल में ऐसे उपाय सुनिश्चित करें, जिनसे इंसान और जानवर के बीच का संघर्ष थमे। इसके लिए पहली जरूरत तो यह है कि हम बजाय वनों को उजाड़ने के वन क्षेत्र को बढ़ाने की तरफ ध्यान दें, ताकि जंगली जानवरों के क्षेत्र का विस्तार हो। हमें पर्यावरण के साथ मित्रवत पेश आना होगा और विकास के नाम पर विनाश को रोकना होगा। उन गतिविधियों पर लगाम कसनी होगी, जिनसे न सिर्फ वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचता है, बल्कि वनों की अशांति भी बढ़ती है। वन या कृषि योग्य भूमि पर हमें उद्योग लगाने या विविध प्रकार के संयंत्र लगाने से बचना होगा। ऐसा करने से ही हम जंगली जानवरों के हिंसक कोप से बच सकेंगे और उन्हें संरक्षित भी रख सकेंगे। सरकार को ऐसे उपाय भी सुनिश्चित करने होंगे, जिनसे पर्यटन के चलते भी पर्यावरण को क्षति न पहुच और वन्यजीवों की शांति भंग न हो। 

“मानव-वन्यजीव संघर्ष के कुछ और भी कारण हैं। लकड़ी की तस्करी, जंगली उत्पादों का चोरी और पेड़ों की अवैध कटाई के कारण भा जंगली जानवरों के हमले बढ़े हैं।” 

मानव एवं वन्य जीव संघर्ष को कम करने के लिए हमें कम । अन्य उपाय भी करने होंगे। मसलन, वनों की कटाई और खनन को तो रोकना ही होगा। खेतों को बाड़ या दीवार से घेर कर भी सूरक्षा के उपाय किए जा सकते हैं। वनों में अवैध कायों के लिए मानवीय । घुसपैठ को कम करने के लिए हमें वन क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा का बंदोबस्त करना होगा। 

वन विभाग को अपनी क्षमता और संसाधनों को भी बढ़ाना होगा, ताकि जैसे ही किसी जानवर के इंसानी बस्ती में प्रवेश की सूचना मिले, वे वहां तत्परता से पहुंच जाएं और उस भटके हुए जानवर को काबू कर उसे दोबारा वनों के हवाले करें। इससे बेजुबान जानवर मानव क्रोध और हिंसा का शिकार होने से बचेंगे। 

वन्य जीवों का संरक्षण इंसानों के हक में भी है। पर्यावरण संतुलन के लिए जैव-विविधता जरूरी है। प्रकृति में जीव-जंतुओं का विशेष महत्व होता है। ये प्रकृति के संतुलन को भी बनाते हैं। अतः इनके हितों का मानव को ध्यान रखना होगा। मानव को सहृदयता से जमीन और जीव संरक्षण के अभियानों से जुड़ना होगा तथा प्रकृति से जुड़े अपने स्वार्थों को तिलांजलि देनी होगी। मानव को यह सोचना होगा कि अगर वन्यजीवों के रहने के स्थान पर अधिपत्य जमाया जाएगा, तो इससे वन सिकुड़ेंगे, जानवरो का भोजन की कमी भी होगी और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए व पलटवार करेंगे ही। हमारा यह दायित्व बनता है कि हम यह स्थित न पैदा होने दें और वन्य-जीवों को उग्र और कुपित होने का माका न दें। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

11 − 5 =