मानव तस्करी पर निबंध | Essay on Human Trafficking

मानव तस्करी पर निबंध |

मानव तस्करी पर निबंध | Essay on Human Trafficking  or मानव तस्करी और भारत (Human Trafficking and India) 

भारत में मानव तस्करी की समस्या विकराल और भयावह है। एशियाई देशों में भारत मानव तस्करी का गढ़ बन चुका है। मानव जीवन का, तस्करी या अवैध व्यापार का शिकार होना किसी त्रासदी से कम नहीं है। इससे मानवता कलंकित होती है और सभ्य समाज को शर्मिन्दा होना पड़ता है। यह कहना असंगत न होगा कि मानव तस्करी मानवता के विरुद्ध ऐसा भयावह कृत्य है, जो मनुष्य के स्वतंत्रता जैसे मूलभूत अधिकार को ही छीन लेता है। भारत में मानव तस्करी की विकरालता को देखते हुए ही अलग से इसकी रोकथाम के लिए एक व्यापक कानून की आवश्यकता महसूस की गई, जिसके अनुसरण में ‘मानव तस्करी (निवारण, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक, 2018 तैयार किया गया, जो कि 26 जुलाई, 2018 को ध्वनिमत से पारित भी हो चुका है। 

मादक पदार्थों की तस्करी और हथियारों के अवैध कारोबार के बाद मानव तस्करी को दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध माना जाता है। इस अपराध को संयुक्त राष्ट्र ने इस प्रकार परिभाषित किया है-“किसी व्यक्ति को डराकर, बल प्रयोग कर या दोषपूर्ण तरीके से भर्ती, परिवहन या शरण में रखने की गतिविधि तस्करी की श्रेणी में आती है।” सामान्य शब्दों में हम यह भी कह सकत ह कि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध, उसकी किसी मजबूरी या कमजोरी का फायदा उठाते हुए किसी भी तरह के अवैध कायम भागीदार बनाने के लिए किसी व्यक्ति, महिला या बच्चे को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना और उनसे गलत काम करवाना मानव तस्करी है। यह आज के नए दौर की ‘आधुनिक गुलामी’ है। 

भारत में मानव तस्करी को बढ़ाने वाले कारणों पर दृष्टिपात करने से पहले इससे जुड़े आंकड़ों पर नजर डाल लेना उचित रहेगा। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार मानव तस्करी | भारत में दूसरा सबसे बड़ा अपराध है, जो पिछले एक दशक में 14 गुना बढ़ा है। वर्ष 2009 से लेकर 2014 के बीच मानव तस्करी के मामलों में 92% की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई, जो कि हैरत में डालने वाली है। एक आँकड़ा यह भी है कि देश में औसतन हर आठवें मिनट में एक बच्चा लापता होता है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 में भारत में कुल तकरीबन 20,000 बच्चों और महिलाओं की तस्करी हुई, जिनमें 9,000 से ज्यादा बच्चे थे और यह आँकड़ा वर्ष 2015 की तुलना में 25% अधिक था। 

वैसे तो देश के प्रत्येक राज्य में मानव तस्करों का संजाल (Network) फैला है, किंतु कुछ राज्यों में यह ज्यादा ही बना और मजबूत है। यानी ये राज्य मानव तस्करी अपराध बाहुल्य राज्य हैं। भारत के जिन राज्यों में व्यापक पैमाने पर इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं, वे हैं-तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़। ये राज्य मानव तस्करी के गढ़ बन गए हैं, जिनमें जिस्मफरोशी के लिए लड़कियों की खरीद-फरोख ज्यादा होती है। मानव तस्करी के दर्ज होने वाले 70% से अधिक मामले इन्हीं राज्यों के होते हैं। 

सामाजिक असमानता, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, सामाजिक शोषण, क्षेत्रीय असंतुलन, भ्रष्टाचार, युद्ध जैसे अनेकानेक कारण मानव तस्करी जैसे संगठित अपराध को बढ़ा रहे हैं। इनके अतिरिक्त मानव तस्करी को बढ़ाने वाला एक कारण पर्यटन भी है। विकसित देशों के अनेक धनवान मात्र यौन संतुष्टि के लिए पर्यटन करते हैं, जिसे ‘सेक्स टुरिज्म’ (Sex Tourism) के नाम से जाना जाता है। यौन कार्यों के लिए विश्व स्तर पर महिलाओं और बच्चों की अत्यधिक मांग भी इस धंधे को फलने-फूलने में मदद कर रही है। मानव तस्करी मुख्यतः देह व्यापार के लिए की जाती है। 

इसके अलावा बलात श्रम, घरेलू नौकर, मानव अंग व्यापार, बच्चों का अवैध दत्तक ग्रहण, बाल विवाह, भिक्षावृत्ति, अमानवीय खेल (यथा बुल फाइटिंग, ऊँट दौड़ आदि) वे कार्य हैं, जिनके लिए महिलाओं और बच्चों की तस्करी की जाती है और इन्हें दूसरे देशों तक भी भेजा जाता है। भारत जहाँ मानव तस्करी का एक बड़ा केन्द्र है, वहीं मानव तस्करी का रास्ता भी है। बांग्लादेश, नेपाल, यूक्रेन, रूस, बेलारूस आदि देशों से तस्करी किए गए बच्चों और महिलाओं को भारत के रास्ते अन्य देशों को भेजा जाता है। 

भारत में मानव तस्करी का अपराध दंड के दायरे में आता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 में मानव तस्करी और बलात श्रम को दंडनीय घोषित किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 24 में 14 वर्ष से कम उम्र के बालकों को फैक्टरी, खदानों तथा अन्य खतरनाक उद्यमों में नियोजित करने को संविधान विरुद्ध घोषित किया गया है। संविधान के मौलिक अधिकारों में भी अनेक ऐसे प्रावधान हैं, जो मानव तस्करी को अपराध घोषित करते हैं। भारतीय दंड संहिता की लगभग 20 धाराएँ ऐसी हैं, जो मानव तस्करी से संबंधित अपराधों के लिए दण्ड का प्रावधान करती हैं। राज्य सरकारों द्वारा भी इस दिशा में पहल करते हुए कानूनों का प्रणयन किया गया है। इन सबके बावजूद भारत में इस अपराध पर अंकुश न लग पाने के कारण अलग से कड़े कानून की आवश्यकता महसूस की गई, तदनुसार ‘मानव तस्करी (निवारण, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक, 2018 तैयार किया गया, जो 26 जुलाई, 2018 को लोकसभा में ध्वनिमत से पारित भी हो गया। 

‘मानव तस्करी (निवारण, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक, 2018′ एक व्यापक एवं सुचिंतित विधेयक है, जिसके कानून के रूप में प्रभावी होने के बाद मानव तस्करी पर अंकुश लगने की । संभावना है। खास बात यह है कि इस विधेयक में राहत और पुनर्वास की बात भी कही गई है। यानी यह विधेयक रोकथाम, बचाव तथा पुनर्वास की दृष्टि से तस्करी समस्या का समाधान प्रदान करता है। इसके तहत पुनर्वास कोष का प्रावधान है, जिसका उपयोग पीड़ित की शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक देखभाल के लिए होगा। इसमें उसकी शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य देखभाल, मनोवैज्ञानिक समर्थन, कानूनी सहायता और सुरक्षित निवास आदि शामिल हैं। पीड़ित का पुनर्वास अभियुक्त के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई शुरू होने या मुकदमे के फैसले पर निर्भर नहीं करेगा। मुकदमों की तीव्र सुनवाई हेतु जहाँ प्रत्येक जिले में विशेष अदालतें गठित की जानी हैं, वहीं समयबद्ध अदालती सुनवाई की व्यवस्था की गई है। 

इस विधेयक के तहत दोषसिद्ध होने पर न्यूनतम 10 वर्ष सश्रम कारावास से आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है तथा अर्थदंड एक लाख रुपये से कम नहीं होगा। इसमें पीड़ितों, गवाहों और शिकायतकर्ताओं की पहचान को गोपनीय रखने का प्रावधान भी है। यह विधेयक जिला, राज्य तथा केंद्र स्तर पर समर्पित संस्थागत ढाँचा बनाता है। यह तस्करी की रोकथाम, सुरक्षा, जाँच और पुनर्वास जैसे कार्यों के लिए उत्तरदायी होगा। इस विधेयक के अंतर्गत राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संगठित गठजोड़ को तोड़ने के लिए संपत्ति की कुर्की, जब्ती तथा अपराध से प्राप्त धन को जब्त करने का प्रावधान है। यह विधेयक अपराध के पारदेशीय स्वभाव से भी व्यापक रूप से निपटता है। राष्ट्रीय तस्करी विरोधी ब्यूरो विदेशी देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठन के अधिकारियों के साथ अंतर्राष्ट्रीय तालमेल करेगा तथा जाँच में अंतर्राष्ट्रीय सहायता देगा। साथ ही न्यायिक कार्यवाहियों में अंतर्राज्यीय एवं अंतर्राष्ट्रीय वीडियो कांफ्रेंसिंग में सहायता भी देगा। 

इसमें कोई दो राय नहीं है कि मानव तस्करी एक वैश्विक चिंता है, जिससे अनेक दक्षिण एशियाई देश भी ग्रस्त हैं। इन देशों में भारत । में मानव तस्करी की रोकथाम के लिए व्यापक विधेयक तैयार करने वाला अग्रणी देश है। अब भारत मानव तस्करी के विरुद्ध दक्षिण एशियाई देशों का नेतृत्वकर्ता बनकर उभरेगा। इस विधेयक के कानून के रूप में प्रभावी होने के बाद भारत में मानव तस्करी पर अंकुश लगना तय है। इस घृणित अपराध की रोकथाम के लिए कुछ और प्रयास भी होने चाहिए। पहली आवश्यकता तो यह है कि इस अपराध से अधिक प्रभावित क्षेत्रों और राज्यों में व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जाए तथा गरीबी उन्मूलन के अभियान चलाए जाएँ। आदिवासी एवं पिछडे इलाकों में बुनियादी सुविधाए उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया जाए। 

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