मानवाधिकार पर निबंध | Essay on Human Rights

Essay on Human Rights

मानवाधिकार पर निबंध | Essay on Human Rights in Hindi

10 दिसंबर, 1948 को संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा ने मानवाधिकारों की विश्व घोषणा की। इसके पक्ष में 48 मत पड़े, विरोध में कोई देश नहीं था। निम्नवत आठ राष्ट्रों ने मतदान में भाग नहीं लिया–बामलोरशियन, सोवियत समाजवादी गणतंत्र, चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड, सऊदी अरब, उक्रेनियन, संयुक्त समाजवादी गणतंत्र, दक्षिणी अफ्रीकी संघ और यूगोस्लाविया। देखा जाए, तो यह घोषणा कोई कानून नहीं है और उसकी कुछ धाराएं वर्तमान तथा सामान्य रूप से मानी जाने वाली अवधारणाओं के प्रतिकूल हैं। फिर भी उसकी कुछ धाराएं कानून के सामान्य नियम हैं या मानवता की सामान्य धारणाएं हैं। इस घोषणा का अप्रत्यक्ष रूप से कानूनी प्रभाव है और साधारण सभा तथा कानून के कुछ ज्ञाताओं के मत से यह संयुक्त राष्ट्र का कानून है। 

मानवाधिकार क्या है ? संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा के अनुसार सभी मानव स्वतंत्र रूप से पैदा हुए हैं तथा सम्मान और अधिकारों की दृष्टि से समान हैं। उनमें बुद्धि और विवेक है, अतएव उन्हें भ्रातृ भाव से रहना चाहिए। बिना किसी भेदभाव-जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य धारणा के प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्रता एवं अधिकार प्राप्त करने का पात्र है। इसके साथ ही किसी भी व्यक्ति के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा-चाहे वह किसी भी राजनीतिक, क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति वाले देश का नागरिक हो अथवा वह स्वतंत्र निगम के अधीन परतंत्र या किसी अन्य शासन प्रणाली के अधीन हो। 

इस घोषणा में कुल मिलाकर 30 धाराएं हैं, जिनमें जीवन, स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी दी गई है। इसके द्वारा गुलामी, अमानवीय व्यवहार अथवा दंड पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीयता, विवाह का अधिकार, व्यावसायिक संगठनों में भाग लेने का अधिकार, सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार इत्यादि को मान्यता प्रदान की गई है। 

इसके विभिन्न देशों तथा उनमें निवास करने वाले मनुष्यों का संपर्क बढ़ जाने के कारण अंतर्राष्ट्रीय कानून तथा संस्थाएं मानो मनुष्य की प्रगति, समृद्धि और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के दो चरण हैं। इस बारे में डॉक्टर राधाकृष्णन ने ठीक ही कहा है, “यदि हम एक विश्व, समाज तथा मानव संघ की स्थापना करना चाहते हैं, तो हमें इस बात की आवश्यकता है कि हम एक केंद्रीय सत्ता के पक्ष में अपनी कुछ आजादी समर्पित कर दें और इस बात का भरसक प्रयत्न करें कि उपनिवेशवाद के नाम पर हो रहे अन्याय तथा जातीय अलगाववाद, आर्थिक शोषण एवं धार्मिक असहिष्णुता आदि को दूर करें।” 

भगवान बुद्ध ने अपने उपदेश में व्यर्थ ही नहीं कहा था, “संघं शरणम् गच्छामि।” अर्थात शांति के शरण स्थल संघ की सदस्यता ग्रहण करो। मानव जाति के सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आज संसार में संयुक्त राष्ट्र के अलावा कोई अन्य संस्था नहीं है। देखा जाए, तो यह सर्वगुण संपन्न संस्था नहीं है, परंतु उसकी अपूर्णता का कारण उसके सदस्य राष्ट्रों की कमजोरियां हैं। 

भारतीय संविधान में धारा 14 से 35 तक समानता, स्वतंत्रता, शोषण से मुक्ति, धर्म-संस्कृति तथा शिक्षा का अधिकार एवं व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार प्रदान किए गए हैं। इसके पश्चात कुछ नीति-निर्देशक सिद्धांत दिए गए हैं, जिनमें जनता के कल्याण संबंधी चर्चा है। इनमें कहा गया है कि शासन काम के अधिकार, शिक्षा, बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी तथा अस्पृश्यता के निवारण हेतु प्रभावी कार्य करेगा। हमारे यहां मानव अधिकार निगम भी है। 

एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल 151 देशों में मानव अधिकारों के मामलों का अध्ययन करती है। सन 1993 की उसकी रिपोर्ट में 63 देशों का नाम गिनाया गया, जहां मानव अधिकारों की मांग करने वालों को जेल में ढूंस दिया जाता है। 61 देशों में राजनीतिक हत्या की सजा निरुद्ध है। इस संस्था ने भारत में सिक्ख विरोध तथा कश्मीरी अलगाववादियों पर हुई कार्रवाई की भी आलोचना की। भारतीय प्रशासन ने ऐसी विकृत टिप्पणी का विरोध किया। 

मानव अधिकारों की घोषणा का केवल अप्रत्यक्ष कानूनी प्रभाव है। इसे कानून की संज्ञा नहीं दी जा सकती। मनु की उक्ति में कानूनी अधिकार के विषय में स्पष्ट कहा गया है, “उसके पालन के साथ दंड का भी प्रावधान हो, केवल नैतिक सिद्धांत से जीवन के आदर्श की स्थापना नहीं की जा सकती-

सर्वोदंडजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।

दण्डस्य हि भयात् सर्वं जगत् योगाय कल्पते ।

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