मानवाधिकार पर निबंध | Essay on Human Rights in Hindi

मानवाधिकार पर निबंध

मानवाधिकार : एक विश्लेषण (Human Rights : An Analysis) 

नवजात शिशु सर्वथा स्वतन्त्र होता है. वह किसी की आज्ञा मानने को विवश नहीं होता है. वह यदि रोने लगता है, तो उसके सुहृदजन का कर्तव्य होता है कि वे उसके मन की बात करें और उसको चुप होने का अवसर उपलब्ध करें, परन्तु वह जैसे-जैसे बड़ा होता है, वैसे वैसे परिवार, समाज और देश के नियमों का पालन करने के लिए बाध्य होता जाता है, अर्थात् वह परतंत्र होता जाता है. मानव की इसी विवशता को लक्ष्य करके फ्रांस के प्रसिद्ध विचारक विद्वान रूसो ने यह कथन किया है कि “Man is born free, but everywhere in chains” अर्थात “जन जगमत युक्त है, पै हैं जंजीर जहान, मनुष्य स्वतन्त्र प्राणी के रूप में जन्म लेता है, परन्तु जीवन में वह प्रत्येक पग पर जंजीरों में आबद्ध रहता है—परतंत्र रहता है.” परन्तु प्रश्न यह है कि उससे परतंत्र कौन बनाता है ? उसको बाँधने वाली जंजीरें कौन कहाँ से लाता है ? इस प्रश्न का उत्तर कवि जयशंकर प्रसाद के इस कथन में निहित है— “प्रश्न स्वयं किसी के सामने नहीं आते……… मनुष्य उन्हें जीवन के लिए उपयोगी समझता है. मकड़ी की तरह लटकने के लिए अपने आप ही वह जाल बुनता है.”

स्वतन्त्रता : मानव का जन्म सिद्ध अधिकार 

मनुष्य अपने ही लिए नहीं, अन्य व्यक्तियों के लिए भी बन्धन के हेतु बनता है. दास प्रथा, उपनिवेशवाद आदि उसकी इसी मानसिकता के अभिशाप हैं, अपने आप आरोपित बंधनों से मुक्ति दर्शन का विषय है और वह चिन्तकों एवं दार्शनिकों की साधना क्षेत्र की वस्तु है, परन्तु सामान्य सामाजिक दृष्टि से मनुष्य दासता से मुक्ति प्राप्त करने के लिए संघर्ष करता है. इतना ही नहीं, प्रकृति के प्रकोपों के विरुद्ध संघर्ष करके वह प्रकृति पर विजय प्राप्त करना चाहता है. प्रकृति की विजय को ही हम विज्ञान कहते हैं. ज्ञान-विज्ञान के विकास की कहानी मानव सभ्यता और संस्कृति की कहानी है. 

यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि मानव स्वतन्त्र प्राणी के रूप में जन्म लेता है, परन्तु स्वतन्त्रता हेतु उसे आजन्म संघर्ष करना पड़ता है. ऐसा वह अनादिकाल से करता चला आया है. इस संघर्ष में ही वस्तुतः मानव सभ्यता एवं मानव के विकास का इतिहास अंकित है. प्रकृति की परम्परा, राजकीय कानून, धर्म के नाम पर प्रचलित विधि-निषेध, सामाजिक मर्यादाएँ आदि ऐसे बन्धन हैं, जिनकी सृष्टि मानव स्वयं करता है और वही उनके विरुद्ध संघर्ष करता है. अनुशासन की प्रक्रिया द्वारा मानव अपने बन्धनों का उदात्तीकरण करता है, क्योंकि स्वतन्त्रता को मानव का मौलिक अधिकार माना गया है.

मानवाधिकार का विधान 

सिद्धान्त रूप से अधिकार और कर्त्तव्य का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है; परन्तु व्यावहारिक रूप में अधिकार और कर्तव्य का समीकरण सर्वथा भिन्न रूप में दिखाई देता है. अधिकारों पर सबलों का एकाधिकार दिखाई देता है और निर्बल वर्ग के व्यक्ति कर्तव्य पालन के उपदेश सुनते हुए दिखाई देते हैं, कर्तव्य पालन मात्र निर्बल वर्ग की सम्पत्ति है. अधिकारों की दुनिया के मालिक वे हैं, जिनके पास शक्ति है. कार्ल मार्क्स के वर्ग विग्रह का सिद्धान्त इसी मान्यता पर आधारित है कि समाज दो वर्गों में विभक्त है—पूँजीपति और सर्वहारा. मार्क्स के इस कथन को हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि समाज मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त है—वे व्यक्ति जिनके भाग्य में अधिकारों का भोग है तथा वे व्यक्ति जिनकी नियति कर्तव्यों का पालनमात्र है. 

अधिकारों और कर्तव्यों का यह असन्तुलन न तो स्वाभाविक है और न किसी भी समाज की स्थायी व्यवस्था का अंग ही बन सकता है. इसी कारण व्यक्तिगत और संस्थागत स्तरों पर मानवाधिकार की माँग और व्यवस्था की जाती रही है. 

संयुक्त राष्ट्र भी मानव अधिकारों की रक्षा पर सदैव पैनी दृष्टि रखता है. उसने अनेक राज्यों को विशेषकर अफ्रीकी राज्यों को उपनिवेशवाद से मुक्ति प्रदान कराने में सहायता प्रदान की है और इस प्रकार यह प्रमाणित किया है कि मानवाधिकारों की गारण्टी कानून के राज्य की पहचान है. मानवाधिकार की उपेक्षा करने वाला राज्य जंगल का राज (Rule of the jungle) ही कहा जाएगा.

मानवाधिकार के संघर्ष की परम्परा 

आज विश्व-मानव के समक्ष मानव-अधिकार एक समस्या के रूप में उपस्थित है. मानव अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए विश्व स्तर पर प्रयत्नशील हैं, भाँति-भाँति से संघर्षरत हैं, श्रीलंका की तमिल-सिंहली समस्या, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति, कुर्द समस्या, झारखण्ड आन्दोलन आदि सब मानव-अधिकार के लिए किए जाने वाले संघर्ष के विविध रूप हैं. मानव अधिकार के लिए संघर्ष का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है. उसकी एक सुदीर्घ परम्परा रही है. सन् 1215 का मैग्नाकार्टा, सन् 1679 का बंदी प्रत्यक्षीकरण अधिनियम, सन् 1689 के बिल ऑफ राइट्स, सन् 1776 में अमरीका की स्वतन्त्रता की घोषणा, सन् 1789 में मानव अधिकार सम्बन्धी फ्रांस की घोषणा तथा सन् 1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकारों की घोषणा इस परम्परा के महत्त्वपूर्ण बिन्दु है.

मानवाधिकार के सम्बन्ध में दो अवधारणाएँ

मानवाधिकार के सम्बन्ध में सामान्यतः दो अवधारणाएँ प्रचलित हैं, यथा 

(1) उदारवादी अवधारणा- इसे हम लोकतांत्रिक अवधारणा भी कह सकते हैं. इस वर्ग के प्रतिनिधि देश हैं इंगलैण्ड, अमरीका, भारत और स्विट्जरलैण्ड. इनकी मान्यता के अनुसार मनुष्य के मूलभूत अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा होनी चाहिए, जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपने विकास की दिशा में पूर्ण सामर्थ्य के साथ अग्रसर हो सके और आत्म-सम्मान का जीवन जी सके. 

(2) मार्क्सवादी अवधारणा-इस विचारधारा के अनुसार विश्व के संविधान में नागरिकों के अधिकारों की व्याख्या कोई विशेष महत्त्व नहीं रखती है, बल्कि महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उन अधिकारों का प्रयोग किस प्रकार किया जाता है. सोवियत संघ के पूर्व तानाशाह स्टालिन के शब्दों में, “एक भूखे एवं बेरोजगार के लिए व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का कोई विशेष महत्त्व नहीं है. सच्ची स्वतन्त्रता वहीं है, जहाँ शोषण, बेरोजगारी, भिक्षावृत्ति या कल के लिए चिन्ता की समस्या नहीं है.”

सार्वभौमिक मानव अधिकारों की घोषणा (Declaration of Universal Human Rights) 

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 10 दिसम्बर, 1948 को सार्वभौमिक मानव अधिकारों की घोषणा की गई. इसको संयुक्त राष्ट्र संघ की एक महान उपलब्धि ही कहा जाएगा. घोषणा में 

महासभा ने सभी व्यक्तियों तथा सभी राष्ट्रों के लिए समान स्तर की उपलब्धि कहा तथा सभी राष्ट्रों के सभी अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं को प्रभावी ढंग से लागू करने का आग्रह किया. सन् 1950 में महासभा ने निर्णय किया कि 10 दिसम्बर को ‘मानव अधिकार दिवस’ के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाए. 

घोषणा के प्रथम व द्वितीय अनुच्छेद में कहा गया है कि सभी व्यक्ति स्वतन्त्र पैदा होते हैं तथा गरिमा एवं अधिकारों में समान होते हैं. अतः सभी बिना भेदभाव के जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक एवं अन्य मत, राष्ट्रीय अथवा सामाजिक उत्पत्ति, सम्पत्ति, जन्म अथवा अन्य स्तर आदि के सभी अधिकारों एवं स्वतन्त्रताओं के हामी हैं. 

अनुच्छेद 3 से 21 तक सभी को नागरिक तथा राजनीतिक अधिकारों के सभी अधिकारी घोषित किया गया है. ये अधिकार हैं—जीवन, स्वतन्त्रता तथा सुरक्षा का अधिकार, दासता तथा भृत्य भाव से मुक्ति, दारुण वेदना, अमानुषिक अत्याचार, अमानवीय व्यवहार तथा दण्ड से मुक्ति, न्याय के समक्ष व्यक्ति के रूप में मान्यता, कानून से समान संरक्षण, प्रभावी न्यायिक उपचार, मनमाने ढंग से बंदी रखना अथवा निष्कासन, स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष न्यायालय द्वारा श्रेष्ठ सुनवाई तथा जब तक अपराध सिद्ध न हो जाये, निर्दोष समझना; व्यक्तिगत जीवन में परिवार, घर अथवा पत्राचार में मनमाने हस्तक्षेप से स्वतन्त्रता, आवागमन, शरण लेने तथा राष्ट्रीयता की स्वतन्त्रता; विवाह करने, परिवार बनाने तथा सम्पत्ति रखने का अधिकार, विचार, आत्मानुसार धर्म, मत-निर्माण करने तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, समुदाय बनाने तथा सभा करने का अधिकार, शासन में भाग लेने तथा सार्वजनिक सेवाओं में प्रवेश का अधिकार है. 

अनुच्छेद 22 से 27 में आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों के लिए सभी समान रूप से अधिकारी हैं. इसमें सामाजिक सुरक्षा कार्य करने, विश्राम एवं अपने समय का उपयोग, स्वास्थ्य तथा श्रेष्ठ जीवन के लिए जीवन स्तर, शिक्षा तथा अपने समुदाय के सांस्कृतिक जीवन में भाग लेने के अधिकार सम्मिलित हैं. 

अनुच्छेद 28 से 30 यह प्रदान करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति एक ऐसी सामाजिक व अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में रहने का अधिकारी है, जिसमें यह अधिकार तथा स्वतन्त्रताओं का पूर्णरूपेण उपयोग कर सके, साथ ही यह प्रत्येक व्यक्ति को अपने समुदाय के प्रति उत्तरदायित्व एवं कर्तव्यों के पालन पर भी बल देता है. 

मानव अधिकारों की समस्या से निपटने के लिए राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर कई उपाय किए गए हैं; यथा—मानव-अधिकार आयोग एवं एमनेस्टी इण्टरनेशनल की स्थापना, तथापि मानव अधिकारों की समस्या अभी तक बरकरार है. इस समस्या का सहज समाधान यह है कि 30 अनुच्छेदों वाले मानवाधिकार घोषणा-पत्र के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र आचरण करने का प्रयत्न करे. मानव अधिकार की सुरक्षा के लिए अवांछित तत्त्वों पर अंकुश लगाना आवश्यक है जिससे तमिल, सिंहली निकारागुआ, अफगानिस्तान आदि जैसी समस्याएँ उत्पन्न न हो सकें. राष्ट्र की प्रभुसत्ता के नाम पर मानव अधिकारों का हनन शासन-सत्ता द्वारा चाहे जब कर लिया जाता है. अतः यह आवश्यक है कि मानव को जो अधिकार दिए जाएँ, उन्हें समूचित न्यायिक संरक्षण प्राप्त हो. प्रत्येक अपराधी की सुनवाई खुली अदालत में होनी चाहिए, जिससे वह अपने बचाव के लिए वकील की सहायता प्राप्त कर सके. एमनेस्टी इण्टरनेशनल को कानूनी अधिकार प्राप्त होने चाहिए जिससे वह मानव अधिकारों के साथ खिलवाड़ करने वालों को दण्डित कर सके.

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