नये राज्यों का निर्माण कितना जरूरी पर निबंध

नये राज्यों का निर्माण कितना जरूरी?

नये राज्यों का निर्माण कितना जरूरी? (Creating Newer States: How Desirable?) 

समय-समय पर नये-नये राज्यों के निर्माण की उठती मांग को देखकर लगता है कि भारत राज्य का पुनर्निर्माण तथा पुनर्विन्यासीकरण सदा चलता रहेगा। सन् 2000 में अंतिम बार नये राज्य के गठन के बाद लगता था कि एक अलग राज्य के निर्माण पर केंद्रित कोई राजनीतिक माँग नहीं उठेगी। उस समय तीन नये राज्यों का गठन हुआ था छत्तीसगढ़, झारखंड तथा उत्तरांचल परंतु भारतीय संघ का नवीनतम राज्य तेलंगाना है। यह तेलंगाना राष्ट्र समिति की राज्य दर्जे की माँग का फल था।

 हाल के समय में देश में ऐसी कई मांगें उठी हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास ऐसी नौ मांगें विचाराधीन हैं। इनमें बिहार में अलग मिथिलांचल, गुजरात में सौराष्ट्र, कर्नाटक में कूर्ग, उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश, पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों को मिलाकर बुंदेलखंड की मांग, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार तथा छत्तीसगढ़ के इलाकों से काटकर भोजपुर राज्य की मांग। 

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा जैसे राजनीतिक संगठन ने स्वतंत्र गोरखा राज्य की मांग की है। कुछ समय से गृह मंत्रालय के पास बुंदेलखंड बनाने की मांग भी लंबित है, जिसमें उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के बांदा, चित्रकूट, झांसी, ललिपुर तथा सागर जिलों को मिलाकर राज्य बनाने की बात है। 

भारत के समृद्धतम राज्यों में एक गुजरात में से एक नया राज्य सौराष्ट्र बनाने की मांग कई वर्षों से लंबित पड़ी है। केंद्र को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों को मिलाकर एक हरित प्रदेश या किसान प्रदेश बनाने का मांग पत्र भी केंद्र को प्राप्त हुआ है। केंद्र के पास ये विधिवित मांगें भी विचाराधीन हैं – बिहार में कुछ जिलों को मिलाकर मिथिलांचल या मिथिला राज्य की मांग; पश्चिमी बंगाल तथा आसाम के कुछ हिस्सों को लेकर वृहत्तर कूच बिहार की मांग, महाराष्ट्र में विदर्भ की मांग, कर्नाटक के कूर्ग क्षेत्र में एक राज्य की मांग। ये सारी मांगे अलग-अलग राजनीतिक तथा गैर-राजनीतिक संस्थाओं द्वारा प्रस्तुत की गई हैं।

इन मांगों पर विचार करने के भी पहले या इन्हें मान लेते हुए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मुगल साम्राज्य के पतन तथा विखंडन के कारण भारत कैसे खंड-खंड हो गया था। मुगल सूबों के प्रधान यानी सूबेदार अलग-अलग अपनी स्वतंत्रता घोषित कर चुके थे। अठारहवीं सदी के मध्य तक पूरे उप-महादेश में 600 सूबों के राजाओं तथा नवाबों के समूह मौजूद थे। इसी भारत को रॉबर्ट क्लाइव ने 1757 के ऐतिहासिक प्लासी की लड़ाई के पश्चात् पराजित तथा अधीन किया। इसी ने भारत में ब्रिटिश राज की नींव रखी जो लगभग 200 वर्षों तक बना रहा। 

इस पूरे प्रकरण में जो गौर करने की बात थी वो यह कि रॉबर्ट क्लाइव की विजय में नवाब सिराजुद्दौला की सेना के एक गुट की सहायता की भी भूमिका थी। ये fifth columnists जो कि राष्ट्रीयता की किसी भावना से बंधे नहीं थे, यह नहीं सोचते थे कि उनका नवाब की सेना को छोड़ना गद्दारी कहलाएगा। यही चीज सौ साल बाद फिर 1857 में दोहराई गई जब अंग्रेजों ने अपने शासन को भारतीय सैनिकों से मिली चुनौती से निबटने के लिए अपनी ‘फूट डालो और राज करो’ की बदनाम नीति द्वारा सेना के विभिन्न गुटों को आपस में लड़ा कर, उसका सामना किया। 

जो सैनिक गुट अंग्रेजों के साथ थे, वे एक विदेशी शासन का पक्षधर होने में जरा भी संकोच नहीं किये। उनमें भारतीय राष्ट्रवाद की भावना नदारद थी। सैनिक थे मराठे, सिक्ख, मुसलमान, राजपूत, बिहारी या जाट। ये भारतीय नहीं थे, भारतीयता की इनमें कोई भावना नहीं थी। विख्यात आर्यावर्त या हिंदुस्तान बस एक भौगोलिक अवधारणा भर था। आज का भारत वस्तुतः ब्रिटिश राज के गर्भ से निकला है। वास्तव में, राज का एक  एकीकरण जो विकसित हो वर्तमान भारतीयता का रूप ले सका। हालांकि ‘भारत’ की अवधारणा सदैव वर्तमान रही जैसा कि कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ कहता है। 

भारतीयता की यही भावना स्वतंत्रता संग्राम को गति प्रदान करती थी जिससे एक अखिल भारतीय राष्ट्र की रचना हुई। यही भारतीयता है जिसे जवाहरलाल नेहरू ने खोजा था, जिसे महात्मा गांधी ने देखा-भाला था, जिसे सरदार पटेल ने मजबूती दी थी। हमारे पूर्वजों ने हमें जो राष्ट्र सौंपा है वह एक स्वतंत्र तथा सार्वभौम भारतीय राज्य है जिसे ही हम भारतीय संजोते रहे हैं, जिसका पालन-पोषण करते रहे हैं, जिसका रसास्वादन करते रहे हैं।

अब हमें सोचना है कि क्या हम इस मेहनत से हासिल एकता तथा राष्ट्रीयता को बरबाद या टुकड़े-टुकड़े होते देख सकते हैं क्योंकि जातीय, सांस्कृतिक या भाषायी आधार पर छोटे-छोटे नये राज्यों के संकीर्णमना मांगों से खतरा पैदा हो गया है। एक सुचिंतित सोच यह भी है कि नये राज्य बना देने से भविष्य में ऐसी ही और मांगें न उठेगी, यह कहा नहीं जा सकता। वास्तव में, नये राज्यों के गठन को विखंडनपरस्त ताकतों को बुलंद करने का ही प्रोत्साहन माना जा रहा है। ये ताकतें बस अपनी मांग मनवाने के लिये ऐसा करती हैं। 

छत्तीसगढ़, झारखंड तथा उत्तरांचल के गठन के बाद अब इन राज्यों को आगे और तोड़ने क उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश या बिहार में मिथिलांचल की मांग। एक बार अगर गुजरात में से अलग कर सौराष्ट्र बना रंटी नहीं कि कच्छ के लोग अपना अलग राज्य नहीं मांगने लगेंगे। वास्तव में, पूर्व कच्छ महाराजा ने इसकी पहल कर दी है। आंध्र प्रदेश में तेलंगाना राज्य बनने के बाद रायल सीमा क्षेत्र में अलग राज्य के लिए छटपटाहट देखी जा रही है। हैदराबाद इलाके के मुसलमान अपना एक अलग उर्दू प्रदेश मांगते हैं। यह एक अनंत कुचक्र सा बन गया है गौरवपूर्ण भारतीय राष्ट्र को निगल जा सकता है। 

कुछ पर्यवेक्षक विश्वास करते हैं कि कई ऐसी मांगें राजनीतिक हैं जो लोकलुभावन राजनीतिक हिस्सा भर हैं, वे वास्तव में जनता की मांगें नहीं हैं ऐसी मांग को वास्तविकता बनने के पूर्व वास्तविक जन इच्छा को प्रतिबिंबित करना चाहिए। साथ ही, इसे स्थानीय राज्य सरकार का समर्थन तथा अनुशंसा प्राप्त होनी चाहिए। ऐसी कोई अनुशंसा इन राज्य सरकारों से अब तक नहीं प्राप्त हुई है। इसके अभाव में ये मांगें बस ख्याली पुलाव भर हैं। लेकिन भारतीय संसद को संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत बाध्यकारी शक्ति है कि वह किसी राज्य के मौजूदा भौगोलिक क्षेत्र से काटकर राज्य सरकारों की इच्छा को अनदेखा (by pass) करते हुए एक नये राज्य का गठन कर दे। 

हालांकि कई लोग मानते हैं कि कुछ भारतीय राज्य अब भी काफी बड़े हैं और बिना क्षुद्र राजनीतिक कारणों से प्रभावित हुए उन्हें प्रभावी प्रशासन की दृष्टि से छोटे राज्यों में विभाजित किया जा सकता है। वे यह तर्क भी देते हैं कि एक द्वितीय राज्य पुनर्निर्माण आयोग के गठन की आवश्यकता आ पड़ी है जो देश में बेहतर शासन तथा त्वरित विकास के लिए ऐसे सभी मांगों पर निरपेक्ष भाव से विचार कर सक। नये राज्यों की जरूरतों पर फैसलाकून हुए बिना, हम महसूस करते हैं कि यदि किसी नये राज्य के लिए ऐसी मांग हो तो उसे लोकलुभावन राजनीति से उपजे बिना उस मांग की भौगोलिक, प्रशासनिक तथा आर्थिक व्यवहार्यता विचारण को ही उसकी मांग से जोड़कर देखा जाना चाहिए। 

केंद्र सरकार राज्य सरकारों से सलाह-मशविरा करके एक द्वितीय राज्य पुनर्गठन आयोग बना सकती है जो सारे लंबत मांगों पर विचार कर एक ही बार फैसला करे और अपूर्ण या कहें स्थगित राष्ट्र-निर्माण के काम को अंतिम रूप से पूरा कर ले। इससे बेहतर शासन में मदद मलेगी। साथ ही भारतीय राष्ट्रवाद को और मजबूत करने में भारतीय संघ की सहमति की भावना की भी पुष्टि होगी। अगर हम ऐसा कर सके, तो भारतीय लोकतंत्र और प्रकाशमान होगा। वह एक उदाहरण पेश करेगा कि कैसे उसने आपसी विश्वास तथा संवाद की भावना द्वारा अपने आंतरिक विसंगतियों को सफलतापूर्वक सुलझा लिया।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

twenty + 10 =