ऑनर किलिंग पर निबंध | Essay on honor killing

ऑनर किलिंग पर निबंध

ऑनर किलिंग पर निबंध |Essay on honor killing अथवा कैसे रुक सकती हैं मान रक्षा हत्याएं 

सीने पर क्यों रख दिया प्रेमी के पिस्तौल

पंचों जलती आग में मत डालो पेट्रोल। 

जाने-माने कवि बुद्धिसेन शर्मा का यह दोहा बढ़ रही ‘मान हत्याओं पर बहुत प्रासंगिक है। 

कभी प्रेम विवाह करने वालों, तो कभी एक गोत्र में विवाह करने वालों को मौत की सजा सुनाकर देश की खाप पंचायतों ने खासा तूफान खड़ा कर दिया है। इज्जत और झूठी आन-बान का हवाला देकर की जा रही इस तरह की हत्याओं को ‘ऑनर किलिंग’ कहा जाता रहा है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थिति अत्यंत भयावह है। खाप पंचायतों का मनोबल इस कदर बढ़ा है कि वे अपने रवैये में बदलाव लाने के बजाय उल्टा सरकार पर यह दबाव बना रही हैं कि वह हिन्दू मैरिज एक्ट में संशोधन करे और सगोत्र विवाहों को वर्जित करे, दूसरी तरफ प्रगतिशील विचारधारा वाले सरकार पर यह दबाव बना रहे हैं कि इस तरह की घटनाओं की रोकथाम के लिए नया कानून बनाया जाय तथा कानूनी शिकंजा कसकर ऐसा बर्बर न्याय करने वाले असंवैधानिक संगठनों और उनके नुमाइन्दों को सबक सिखाया जाए। 

भारत का प्रगतिशील तबका इस तरह की घटनाओं को फतवों से भी ज्यादा खतरनाक मान रहा है। वह ऑनर किलिंग को ‘हिन्दू फंडामेंटिलिज्म’ से जोड़कर देख रहा है तथा खाप पंचायतों पर कड़ी निगरानी की बातें कर रहा है। वहीं अपने दबदबे व मजबूत राजनीतिक पकड़ के लिए जानी जाने वाली खाप पंचायतें अपने ‘खुद मुख्तार’ आचरण में बदलाव नहीं लाना चाह रही हैं। सजा-ए-मौत का फतवा 

जारी करने के अलावा सार्वजनिक पिटाई, नंगा घुमाना, गांव से निकाल देना, राशन-पानी रोकना तथा समाज से बहिष्कृत कर देने जैसे निर्णय सुनाने में खाप पंचायतें गुरेज नहीं करतीं। खाप पंचायतें अपने निर्णयों से समाज का जमकर अहित कर रही हैं। ऑनर किलिंग इन्हीं खाप पंचायतों की देन हैं। विडंबना यह है कि खाप पंचायतें आज भी अपनी मध्ययुगीन मानसिकता में बदलाव नहीं लाना चाहती हैं। 

“कभी प्रेम विवाह करने वालों, तो कभी एक गोत्र में विवाह करने वालों को मौत की सजा सुनाकर देश की खाप पंचायतों ने खासा तूफान खड़ा कर दिया है।” 

खाप पंचायतें एक ही गोत्र में होने वाले विवाह यानी सगोत्री शादी का विरोध करती हैं। वे इसे एक तरह का ‘पारिवारिक व्यभिचार’ मानती हैं, जबकि कानून सगोत्र विवाह को वैध मानता है। हिन्दू मैरिज एक्ट में अंतर्जातीय विवाहों को न सिर्फ मान्यता दी गई, बल्कि धारा 29 के तहत यह व्यवस्था भी दी गई कि पहले हो चुके अंतर्जातीय विवाह भी वैध माने जाएं। 

भयावह है स्थिति : पश्चिम उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली आदि में खाप पंचायतों के आतंक और इनके निर्णयों ने स्थिति को बहुत भयावह बना दिया है। आलम यह है कि हरियाणा में प्रतिवर्ष तकरीबन सौ युवकों को सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया जाता है, क्योंकि वे खाप पंचायतों से मुखालफत कर एक गोत्र में विवाह करते हैं या गांव की किसी लड़की से प्रेम करने की भूल कर बैठते हैं। यह आंकड़ा कम चौंकाने वाला नहीं है कि हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ में रोजाना करीब 150 ऐसे प्रार्थनापत्र पुलिस को मिलते हैं, जिनमें जोड़े सुरक्षा और संरक्षण की मांग करते हैं। निर्दोष लोगों की हत्याओं का तो सिलसिला जारी ही है, प्रताड़ना के दायरे में वे भी आते हैं, जो इन निर्दोषों की मदद करते हैं। अथवा इनसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में संबंध और संपर्क बनाए रखते हैं। खाप पंचायतें एक असंवैधानिक स्थिति को जन्म दे रही हैं तथा जनतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रही हैं। 

भुगतने होंगे परिणाम : खाप पंचायतों के असंवैधानिक व अलोकतांत्रिक आचरण पर यदि लगाम न कसी गई तो आने वाले दिनों में हमें इसके दरगामी परिणाम भगतने होंगे। तमाम उन दरगामी परिणामों से अभी तक हम बेपरवाह हैं, जो आने वाले दिनों में हमारी सामाजिक संरचना को बेतरह प्रभावित करेंगे। सामाजिक ढांचा चरमरा जाएगा। शायद इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। जिन राज्यों में ऑनर किलिंग की घटनाएं बढ़ रही हैं वहां समाज में विकृतियां पैदा होनी शुरू हो गई हैं। लिंग के अनुपात में असंतुलन बढ़ गया है। लड़कियों की तादाद घट रही है। नतीजतन सजातीय वधुएं मिलने में मुश्किल हो रही है। लड़कों के लिए दूसरे प्रांतों से बहुएं खोज कर लाई जा रही हैं। लिंग अनुपात बुरी तरह गिर रहा है। हजार पुरुषों पर आठ सौ से भी कम महिलाएं हैं। 

जिन इलाकों में खाप पंचायतों का वर्चस्व है, वहां अनेक प्रकार की सामाजिक विद्रूपताएं और विसंगतियां अस्तित्व में आने लगी हैं। अनब्याहे युवकों की संख्या बढ़ रही है। ये युवक तेजी से कुंठाओं के शिकार हो रहे हैं। समय से वैवाहिक संस्कार न हो पाने के कारण युवक अवसाद के शिकार होकर नशे के लती हो रहे हैं। खाप प्रभावित क्षेत्रों में जहां ड्रग्स और शराब का चलन युवा वर्ग में तेजी से बढ़ा है, वहीं यौन अपराधों में भी इजाफा हुआ है। यह अकारण नहीं है कि इन क्षेत्रों में कमसिन लड़कियों और छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं बढ़ी हैं। बढ़ते यौन अपराधों के कारण खाप प्रभावित क्षेत्रों में असुरक्षा का माहौल बढ़ा है जिसे लेकर प्रबुद्ध और शिष्ट समाज चिंतित है। ये बातें समाज को पतनशील बना रही हैं। 

“खाप पंचायतों द्वारा आए दिन जिस तरह से सजा-ए-मौत के फरमान सुनाए जा रहे हैं, उससे पुलिस व अदालतों पर भी काम का अनावश्यक बोझ बढ़ रहा है।” 

खापों की जकड़बंदियों से उकताए युवा अब गांवों में रहना नहीं चाहते। स्वच्छंद और बंधनमुक्त जीवन जीने की इच्छा को लेकर वे शहरों में बसना पसंद कर रहे हैं। युवक शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। इससे जहां एक तरफ गांवों का सामाजिक संतुलन बिगड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ शहरों का बोझ बढ़ रहा है। युवा गांव की शक्ति होते हैं। उनके पलायन से गांवों की शक्ति क्षीण हो रही है। परंपरागत कुटीर उद्योगों पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। ग्राम्य समाज की संरचना बिगड़ रही है। 

खाप पंचायतों द्वारा आए दिन जिस तरह से सजा-ए-मौत के फरमान सुनाए जा रहे हैं, उससे पुलिस व अदालतों पर भी काम का अनावश्यक बोझ बढ़ रहा है। बड़ी संख्या में प्रताड़ित युगल अदालतों की शरण ले रहे हैं। पुलिस के पास सुरक्षा और संरक्षण की गुहार लगाने वाले जोड़ों की संख्या बराबर बढ़ती जा रही है। यदि खाप पंचायतें सामाजिक समरसता पर ध्यान दें तथा समय के अनुकूल अपने व्यवहार में परिवर्तन लाएं तो पुलिस और अदालतें काम के अनावश्यक दबाव से बच सकेंगी और इसका लाभ समाज को भी मिलेगा। 

नये कानून की दरकार : खाप पंचायतों के बढ़ते खौफ को देखते हुए नये कानून की दरकार बढ़ गई है। समाज का प्रगतिशील तबका भी लगातार सरकार पर इस बात का दबाव बना रहा है कि खाप पंचायतों की मनमानी रोकने के लिए नया कानून बनाया जाये। सरकार भी इस दिशा में गंभीर है और रोकथाम के लिए प्रस्तावित कानून पर मंथन कर रही है। अभी तक इस तरह की घटनाओं को पुलिस आईपीसी की धारा 302(हत्या) या 307 (हत्या के प्रयास) में दर्ज करती है। इस बाबत व्यवहार चिकित्सकों तथा मनोवैज्ञानिकों की भी राय है कि कानून बनाने से फर्क पड़ेगा। इस तरह के अपराध कम होंगे। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार नया कानून बनाने से ‘बॉर्डर लाइन’ के केस रुकेंगे। वे लोग इस प्रकार के अपराध नहीं करेंगे, जो अपराध करना तो चाहते हैं, मगर परिणामों से भी सुविज्ञ हैं। कठोर दंड और कानून के हाथों से डरकर वे अपराध नहीं करेंगे। इसके अलावा ‘उत्प्रेरक’ की भूमिका निभाने वाले भी पीछे हटेंगे। इस तरह की घटनाओं को हवा देने में उकसाने वालों की भूमिका अग्रणी होती है।

विश्वास जब व्यवहार में बदल जाता है, तो ऐसे व्यवहार को बदल पाना बड़ा मुश्किल होता है। कुछ ऐसा ही खाप पंचायतों के साथ हो रहा है। खाप पंचायतों के नुमाइंदे पुराने विश्वास को व्यवहार में बदल चुके हैं। यह उनके आचरण से ध्वनित हो रहा है। मुश्किल यह है कि व्यवहार को तो बदला जा सकता है, मगर विश्वास को नहीं। प्रेम विवाह न करना तथा एक ही गोत्र में विवाह न करना एक तरह का विश्वास है, जो अब व्यवहार की शक्ल अख्तियार कर चुका है। इस व्यवहार में तर्क की गुंजाइश घटती जा रही है। संवेदनाओं का भी स्थान नहीं रह गया है। इस सूरत को बदलना होगा। जरूरत इस बात की है कि खाप पंचायतों के सदस्यों के ‘माइंड सेट’ में बदलाव लाया जाए। यह बदलाव तभी संभव है, जब सरकारें, स्वयंसेवी संगठन, बुद्धिजीवी और समाज को दिशा-बोध कराने वाले चिंतक और मनीषी मिल-जुलकर प्रयास करे। सम्मिलित प्रयासों से खाप पंचायतों को समया बनाया जा सकता है। 

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