हिमालय पर निबंध-Essay on Himalaya in Hindi

हिमालय पर निबंध

पर्वतराज हिमालय पर निबंध-Essay on Himalaya in Hindi

जिस प्रकार मस्तक पर मुकुट प्रतिष्ठा का प्रतीक है, उसी प्रकार पर्वतराज हिमालय भारत के मस्तक पर रजत मुकुट की भांति प्रतिष्ठित है। हमारी संस्कृति में हिमालय को ‘देवभूमि’ माना गया है। कालिदास ने ‘कुमार संभव’ में कहा है- देव यदि प्रार्थय से वृषा श्रमः पितुः प्रदेशास्तव देवभूमयः। 

हिमालय चिरकाल से ही हमारी संस्कृति का रक्षक है। आज भी इसकी गुफाओं में असंख्य रोगी एवं महात्मा समाधिस्थ हैं। संपूर्ण भारतीय वांग्मय हिमालय से प्रभावित है। आदिकवि वाल्मीकि, वेदव्यास और कालिदास से लेकर आधुनिक युग के प्रसाद, पंत, निराला, दिनकर आदि कवियों ने इसकी महिमा और अप्रतिम सौंदर्य का भरपूर गुणगान किया है। वाल्मीकि ने तो इसे तपस्वियों का देश माना है, जिसमें कामी, क्रोधी और लोभी लोग प्रविष्ट नहीं हो सकते। महाकवि दिनकर जी हिमालय का यशोगान करते हुए लिखते हैं 

मेरे नगपति! मेरे विशाल!!

साकार दिव्य गौरव विराट।

पौरुष का पूंजीभूत ज्वाल,

मेरी जननी के हिमकिरीट।

मेरे भारत के दिव्य भाल, 

मेरे नगपति! मेरे विशाल!!

प्रसाद जी को हिमालय की गौरीशंकर, धौलागिरि, कंचनजंघा, केदारनाथ आदि तुषार मंडित ऊंची चोटियों से उद्बोधन करने के लिए बाध्य होना पड़ा, जिसे सुनकर भारत पुत्रों में एक नई चेतना एवं स्फुरण जागृत हुआ 

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, 

स्वयंप्रभा समुच्च बल्य, स्वतंत्रता पुकारती।

इसी तरह एक अन्य कवि ने तो यहां तक कहा है- 

दुनिया में जितने भी गिरि हैं,

सब झुक करते इसको प्रणाम। 

नगराज यही गिरिराज यही, 

जननी का गौरव गर्वधाम।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण के साथ-साथ लौकिक दृष्टिकोण से भी हिमालय हमारे लिए अत्यंत उपयोगी है। हमारी समग्र उत्तरी सीमा पर यह दुर्लंघ्य एवं सशक्त प्रहरी के समान खड़ा है। यह उत्तर में साइबेरिया की ओर से आने वाली बर्फीली हवाओं के भारत में प्रवेश पर रोक लगाता है। अगर ऐसा नहीं होता, तो हमारा देश भी अन्य ठंडे मुल्कों की भांति बर्फ से ढका रहता और हम समशीतोष्ण जलवायु का आनंद कभी नहीं ले पाते। 

वस्तुतः हिमालय दक्षिण-पश्चिम में उठने वाली मानसूनी हवाओं को रोककर भारत में वर्षा करवाता है, जिससे हमारी भूमि शस्य श्यामला बन जाती है। हिमालय से निकलने वाली गंगा, ब्रह्मपुत्र, गंडक, सरयू, कावेरी, सतलुज, गोदावरी, झेलम, व्यास आदि नदियां हमारे लिए अमृत सदृश कल्याणकारी हैं। इसकी तराई में देवदार, चिनार, सागवान, सखुआ आदि कीमती लकड़ियां पाई जाती हैं। इसके अलावा यहां अनमोल जड़ी-बूटियां भी उत्पन्न होती हैं । लक्ष्मण को प्राण देने वाली संजीवनी बूटी इसके एक शिखर धौलागिरि की उपज है। 

इस प्रकार हिमालय से होने वाले आध्यात्मिक एवं लौकिक लाभों की गिनती नहीं की जा सकती। संक्षेप में, हिमालय हमारे लिए श्री शिव की भांति कल्याणकारी है। पर्वतराज की इन विशेषताओं को देखकर ही भगवान श्रीकृष्ण ने ‘श्रीमद्भगवद् गीता’ में कहा है- स्थावराणां हिमालयः। 

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