गुरू नानक देव पर निबंध

गुरू नानक देव पर निबंध

गुरू नानक देव पर निबंध | Essay on Guru Nanak Dev

हिंदू कहों तो मारिहौ, मुसलमान हूं नाहिं। 

पांच तत्त्व का पूतरा, नानक मेरा नाऊँ।

अर्थात अगर मैं स्वयं को हिंदू कहूं, तो लोग मुझे मारेंगे और मैं मुसलमान भी नहीं हूं। मैं तो पांच तत्वों से बना हुआ मनुष्य मात्र हूं और मेरा नाम नानक है। ऐसा कहने वाले गुरु नानक सब मनुष्यों को समान समझते थे। उनके प्रकट होने से समूचे भारत में ठीक वैसा ही प्रकाश फैल गया था, जैसे उनके आविर्भाव से दो हजार वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध के अवतीर्ण होने पर फैला था। 

प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान पर्व मनाया जाता है, परंतु संवत् 1526 की कार्तिक मास की पूर्णिमा का विशेष महत्व है, क्योंकि इस दिन कालूराम पटवारी के घर तृप्ता की कोख से पंजाब के तलवंडी नामक ग्राम में गुरु नानक ने जन्म लिया था। आजकल तलवंडी को ‘ननकाना साहब’ कहा जाता है। यह स्थान पाकिस्तान में लाहौर से लगभग 40 मील दूर स्थित है। उनके जन्म पर माता-पिता को अपार हर्ष हुआ। माता-पिता ने उन्हें शिक्षा-दीक्षा के लिए पंडित गोपाल की पाठशाला में भेजा। जब वे पंडित जी से मिले, तो उनसे पूछ बैठे, “गुरु जी, आप मुझे क्या-क्या पढ़ाएंगे?” पंडित जी बोले, “गणित और हिंदी।” नानक ने कहा, “गुरु जी, मुझे तो करतार का नाम पढ़ाइए, इनमें मेरी रुचि नहीं है।” इस प्रकार बाल्यकाल से ही गुरु नानक का भक्ति तथा वैराग्य की ओर झुकाव था। इससे उनके पिता चिंतित रहते थे। एक बार नानक जी को पशु चराने का काम सौंपा गया, जो उनके लिए अति उत्तम था, क्योंकि जंगल का एकांत वास ईश्वर-भजन के लिए लाभप्रद होता है। 

एक बार नानक के पिता ने उन्हें कुछ धन देकर कार्य-व्यापार करने के लिए शहर भेजा, परंतु उन्होंने सारा धन रास्ते में साधुओं की एक टोली को भोजन कराने में खर्च कर दिया और घर आकर कह दिया कि वे ‘सच्चा सौदा’ कर आए। उनकी दृष्टि में भूखों को भोजन कराना ही सच्चा सौदा था। उसके पश्चात नानक के पिता ने उन्हें नानकी के पास नौकरी के लिए भेज दिया। उनके बहनोई ने उन्हें नवाब दौलत खां के मोदीखाने में नौकर रखवा दिया। वहां भी उन्होंने अपनी आदत नहीं छोड़ी और सरकारी अनाज साधुओं तथा दीन-दुखियों में बांटते रहे। 

एक बार शिकायत करने पर उनके माल की जांच की गई, तो गोदाम का माल पूरा उतरा। तब से वहां के लोग उन्हें श्रद्धापूर्वक देखने लगे। 

गुरु नानक देव के माता-पिता ने उनको गृहस्थी के जाल में बांधने के लिए उनका विवाह कर दिया। उनके दो पुत्र श्रीचंद्र तथा लक्ष्मीचंद्र हुए। फिर भी उनका मन गृहस्थ जीवन में नहीं लगा। वे घर-बार छोड़कर प्रभु भक्ति तथा धर्म-प्रचार के लिए बाहर चले गए। उन्होंने ‘बाला’ और ‘मरदाना’ नामक शिष्यों के साथ सारे भारत का भ्रमण किया। स्थान-स्थान पर साधु-संतों से ज्ञान की चर्चा की और जन साधारण को अमृत वाणी का संदेश दिया। उनके उपदेशों में समस्त धर्मों का सार था। उन्होंने अति सरल पदों और भजनों द्वारा एकता तथा उदारता का उपदेश दिया, जो ‘गुरुग्रंथ साहब’ में संकलित है। अपनी धार्मिक रचनाओं के कारण वे हिंदी के संत कवियों में भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। 

सबसे पहले गुरु नानक ने पंजाब का भ्रमण किया। वे उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों दिशाओं में घूमते रहे। उनकी ये यात्राएं चार उदासियों के नाम से प्रसिद्ध हैं। पंजाब की यात्रा के बाद वे हरिद्वार गए। वहां उन्होंने अंधविश्वासों का खंडन किया, जिनसे भारतीय जनता काफी परेशान थी। इससे दिनो-दिन उनकी प्रतिष्ठा बढ़ने लगी तथा उनके शिष्यों की संख्या में वृद्धि हुई। उत्तर भारत के समस्त नगरों की यात्रा करके वे रामेश्वरम और सिंहल द्वीप तक पहुंचे। वे भारत के अलावा सिक्किम, भूटान, तिब्बत, मक्का और मदीना भी गए। 

जीवन भर भ्रमण करते एवं विभिन्न धर्मानुयायियों के संसर्ग में रहते हुए गुरु नानक ने यह जान लिया कि बाहर से अलग दिखाई देने वाले सभी धर्म वास्तव में एक हैं, जो समाज सेवा, सच्चरित्रता और भगवत भक्ति की शिक्षा देते हैं तथा मिथ्याचार, आडंबर, असत्य एवं संकीर्णता का विरोध करते हैं। उनके अनुसार सच्चे इस्लाम धर्म का हिंदू धर्म से कोई विरोध नहीं है। वे कहते थे कि पाखंड छोड़ो, आडंबर में मन मत लगाओ तथा भगवान से सच्ची लौ लगाओ; तभी शांति मिलेगी। उन्होंने भारतीयों को सच्ची मानवता का उपदेश दिया था। 

गुरु नानक भ्रमण करते हुए बगदाद से अपने देश पहुंचे और पंजाब में करतारपुर नामक गांव बसाया। सन 1538 में 70 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हुआ। उन्होंने अपना शरीर त्यागने की सूचना पहले ही शिष्यों को दे दी थी। सिक्ख धर्म हमें आज भी गुरु नानक देव का पुनीत स्मरण कराता है। गुरु नानक देव तत्वज्ञानी संत थे। उन्होंने पथभ्रष्ट मानवता को दिव्य मार्ग दिखाया। 

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