भूजल संरक्षण पर निबंध | वर्षा जल संरक्षण पर निबंध | जल संरक्षण पर निबंध

भूजल संरक्षण पर निबंध

भूजल संरक्षण पर निबंध | वर्षा जल संरक्षण पर निबंध | जल संरक्षण पर निबंध Essay on Ground Water Conservation

जल, जीवन से जुड़ा है। यानी जल है तो जीवन है। जल की महत्ता सिर्फ मानव जीवन में नहीं है, बल्कि यह पशु-पक्षियों और वनस्पतियों तक के लिए आवश्यक है। जल का कोई विकल्प भी नहीं है, यानी इसका काम हम किसी और चीज से नहीं कर सकते और न ही जल का उत्पादन ही किया जा सकता है। वह कुदरत की वह अनमोल सौगात है, जो हम सब के अस्तित्व के लिए जरूरी है। तभी तो अथर्ववद में जल की महत्ता को इस प्रकार रेखांकित किया गया है 

वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृता। 

सानो दधातु भद्रया प्रिये धामनि-धामनि।।

अर्थात् भूमि की समरसता के लिए जल का संतुलन आवश्यक है। इससे पृथ्वी पर हरितिमा छायी रहती है, वातावरण में उत्साह बना रहता है तथा सभी प्राणियों का जीवन सुखमय और आनंदमय बना रहता है। 

जिस देश में जल को जीवन मानने का दर्शन रहा हो, वहाँ आज जल संकट एक प्रमुख समस्या बन चुका है। भारत में जल संकट की आहट साफ सुनाई दे रही है। एक तरफ जनसंख्या में वृद्धि के कारण पानी की मांग बढ़ी है तो दूसरी तरफ वर्षा और भूजल का समुचित संरक्षण न हो पाने से भी स्थिति बिगड़ी है। जल की कमी के कारण देश में आए दिन घटने वाली अशांति और असंतोष की घटनाएँ हमारा ध्यान खींचती रहती हैं। हाल ही में शिमला में भीषण जल संकट देखने को मिला। विडंबनीय है कि आज देश में लगभग 60 करोड़ लोग पानी की गंभीर किल्लत से जूझ रहे हैं, तो लगभग दो लाख लोग स्वच्छ जल न मिलने के कारण प्रतिवर्ष मौत का ग्रास बन जाते हैं। 

भारत में भविष्य में जल संकट और गहराएगा, यदि इसके प्रबंधन और संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। जून, 2019 में चेन्नई में आया जल संकट इस बात की पुष्टि करता है। ‘नीति आयोग द्वारा जारी ‘समग्र जल प्रबंधन सूचकांक’ से यह पता चलता है कि वर्ष 2030 तक भारत में पानी की मांग उपलब्ध जल वितरण के मुकाबले दो गुनी हो जाएगी। यानी पानी की समस्या विकराल और भयावह होने से चुनौतियाँ बढ़ेगी और इसका प्रभाव हमारे जी डी पी में कमी के रूप में भी सामने आएगा। भारत में जल संकट कैसे कैसे परवान चढ़ा और भविष्य में यह कितना गहराएगा, इसका पता इस आंकड़े से चलता है कि आजादी के समय देश में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता सात हजार क्यूबिक मीटर थी, जो कि वर्ष 2001 में कम होकर 2000 क्यूबिक मीटर ही रह गई। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 2025-26 तक यह उपलब्धता घट कर 1,200 क्यबिक मीटर ही रह जाएगी। विश्व बैंक का आकलन यह कहता है कि भारत के 48% अंचलों में जल का गंभीर संकट है, जिसमें 24% का पानी जहरीला हो चुका है। पानी का जहरीला होना कोढ़ में खाज जैसा है। ‘वाटर एड’ की शोध रिपोर्ट से पता चलता है कि देश के साढ़े चार सौ से ज्यादा जिलों में भूजल बेहद प्रदूषित हो चुका है। इन जिलों में भू जल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन, सीसा, सोडियम और क्रोमियम जैसे घातक रसायन खतरनाक हद तक बढ़े हुए हैं। ये संकेत डरावने हैं। हम यदि अब भी सचेत नहीं हुए तो दक्षिण अफ्रीकी शहर केपटाउन की तरह भारत को भी पानी की राशनिंग करनी पड़ सकती है और अपने हिस्से का पानी पाने के लिए लोगों को रोज घंटों कतार में खड़ा रहना पड़ सकता है। 

भू-वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 2025-26 तक यह उपलब्धता घट कर 1,200 क्यूबिक मीटर ही रह जाएगी। विश्व बैंक का आकलन यह कहता है कि भारत के 48% अंचलों में जल का गंभीर संकट है, जिसमें 24% का पानी जहरीला हो चुका है। 

भारत में जल संकट को बढ़ाने वाले अनेक कारण हैं। मानसून अनियमित है। जब वर्षा अच्छी होती भी है, तो वर्षा जल बहकर बर्बाद हो जाता है, क्योंकि हम इसे संरक्षित नहीं कर पाते। हमारे परम्परागत जल स्रोतों में से अधिकांश दम तोड़ चुके हैं या प्रदूषित हो चुके हैं। अत्यधिक और मनमाने दोहन के कारण भूजल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 वर्षों में भूजल स्तर 65% तक गिर गया है। भूजल दोहन के मामले में भारत दुनिया में पहले पायदान पर है। अब तो देश की आबादी भी सवा सौ करोड़ से अधिक है। इससे भी जल संकट गहराया है, तो घरेलू, कृषि और औद्योगिक कार्यों में जल की खपत बढ़ी है। भारत में सालाना मीठे पानी की जितनी खपत है, उतना जल संचय नहीं हो पा रहा है। सिकुड़ती हरित पट्टी ने भी जल संकट को बढ़ाया है। पेड़ों की व्यापक मौजूदगी की वजह से जहाँ पर्याप्त मात्रा में वर्षा हासिल होती है, वहीं यही पेड़ भूमिगत जल का स्तर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन द्रुत गति से होने वाले विकास कार्यों ने हमारी हरित पट्टी की तेजी में बलि ले ली है। इसी का नतीजा है कि न सिर्फ भूमिगत जल का स्तर नीचे गया है, बल्कि वर्षा जल में भी लगातार कमी आई है। पानी की समस्या गहराने का एक प्रमुख कारण पानी का प्रदूषित और जहरीला होना भी पानी के अपव्यय और कुप्रबंधन ने भी पानी की किल्लत को बढ़ाया है। 

जल संकट की समस्या से उबरने और भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए जल संरक्षण की पहले आवश्यक हो गई हैं, क्योंकि जल संरक्षण ही उस जल को बचाना है, जो जीवन है। हमें जल संरक्षण का व्यापक अभियान चलाना होगा। जल संरक्षण अब समय की माँग है। हमें न सिर्फ जल को सहेजना होगा, बल्कि इसे प्रदूषण से भी बचाना होगा। पानी के दुरुपयोग को रोककर इसकी एक-एक बूंद को बचाकर ‘हम जल है तो कल है’ की अवधारणा को मूर्त रूप दे सकते हैं। यह काम हम वर्षा और भूजल संरक्षण के जरिए भली भाँति कर सकते हैं। 

वर्षा जल संरक्षण और संचयन कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए सर्वप्रथम हमें रेन वाटर हार्वेस्टिंग (Rain Water Har vesting) यानी वर्षा जल भण्डारण पर ध्यान केन्द्रित करना होगा, जो कि हमारी सदियों पुरानी परम्परा भी है। इसमें सतह के रिसाव से भूजल का स्तर प्राकृतिक रूप से रिचार्ज होता रहता है। रेन वाटर हार्वेस्टिंग के तहत हम कृत्रिम तरीकों से बारिश के पानी को धरती के अंदर पहुँचाते हैं, जिससे हमारा भूजल भंडार ऊपर उठता है और इस प्रकार हम वर्षा जल को बर्बाद होने से भी बचा लेते हैं। वर्षा जल का इस्तेमाल घरेलू काम जैसे घर की सफाई, खाना पकाने और कपड़े धाने में भी किया जा सकता है। औद्योगिक उपयोग की कछ प्रक्रिया में भी वर्षा जल का प्रयोग किया जा सकता है। गर्मियों में वाष्पीकरण के कारण होने वाली पानी की किल्लत को हम ‘पूरक जल स्रोत’ के माध्यम से कम कर सकते हैं। वर्षा जल को संचित कर इसका इस्तमाल हम भवन निर्माण, शौचालयों तथा सिंचाई में भी कर सकते 

छत प्रणाली के जरिए भी हम वर्षा जल को संरक्षित कर सकते हैं। इस प्रणाली में छतों पर गिरने वाले वर्षा जल को ऊँचाई पर बनाए गए कंटेनरों या टैंकरों में निर्देशित किया जाता है और यथा सुविधा इस संचित जल का इस्तेमाल किया जा सकता है। वर्षा जल संचयन बांध बनाकर भी किया जाता है। व्यक्तिगत तौर पर यह विधि भले ही सस्ती और सुलभ नहीं है, किन्तु सरकारें इसमें महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। सरकारी तौर पर बांध परियोजनाओं का सफल निर्माण वर्षा जल को संग्रहीत करने में काफी मददगार साबित हो सकता है। बांध जैसे प्रकल्पों में जलराशि को लंबे समय तक बांध कर इसका इस्तेमाल नहरों के माध्यम से सिंचाई के लिए किया जा सकता है। इसके लिए सरकार को बांध निर्माण परियोजनाओं को प्रोत्साहन देना होगा। इसी क्रम में टैंक प्रणाली के तहत छत पर गिरने वाले जल को पाइप के माध्यम से भूमि पर बनाए गए टैंक में संग्रहीत किया जा सकता है। वर्षा जल के संरक्षण के लिए हमें जहाँ जलाशयों का जलस्तर बढ़ाना होगा, वहीं बंद एवं बेकार पड़े कुओं को पुनर्जीवित कर, पुनर्भरण खाई, पुनर्भरण पिट तथा पुनर्भरण शॉफ्ट आदि तरीकों से भी हम वर्षा जल का संचय कर सकते हैं। भूजल को संरक्षित करने के सम्बन्ध में भूजल की उपलब्धता का आकलन और उसके समुचित उपयोग की सावधानी भी आवश्यक है। देश के राजस्थान जैसे शुष्क प्रदेशों में कंई, कंडी, टांका एवं होड़ आदि के माध्यम से वर्षा जल की एक-एक बंद सहेजने की परम्परा रही है। यहाँ के रेगिस्तानी इलाकों में पारम्परिक रूप से घर के अंदर भूमिगत टैंक बनाकर जल संग्रह का चलन है। इस परम्परा को अन्य राज्यों में लागू कर हम जल संकट की विकरालता को कम कर सकते हैं। 

वर्षा जल संरक्षण और संचयन कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए सर्वप्रथम हमें रेन वाटर हार्वेस्टिंग (Rain Water Harvesting) यानी वर्षा जल भण्डारण पर ध्यान केन्द्रित करना होगा, जो कि हमारी सदियों पुरानी परम्परा भी है। इसमें सतह के रिसाव से भूजल का स्तर प्राकृतिक रूप से रिचार्ज होता रहता है। 

जल संरक्षण के लिए जहाँ हमें जल संरक्षण की संस्कति को लोगों के मन-मस्तिष्क में बैठाना होगा, वहीं पानी के इस्तेमाल में हमें मितव्ययी बनना होगा। छोटे-छोटे उपाय कर जल की बड़ी बचत की जा सकती है। मसलन, हम दैनिक जीवन में पानी की बर्बादी कतई न करें और एक-एक बूंद पानी की बचत करें। बागवानी जैसे कार्यों में भी जल के दुरुपयोग को रोकें। कृषि क्षेत्र में भी सिंचाई की ऐसी अभिनव तकनीकें विकसित करनी होंगी, जिनमें पानी की खपत कम हो और पानी की बर्बादी की गुंजाइश न रहे। उद्योग और व्यवसाय में भी पानी की खपत में कमी लानी होगी और पानी की बर्बादी को रोकना होगा। जहाँ पानी के कुशल उपयोग पर ध्यान केन्द्रित करना होगा, वहीं जल प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना होगा, जिसकी हमारे देश में कभी समृद्ध परम्परा थी। 

भारत में जलसंकट को ध्यान में रखकर सरकारें चौकन्नी हो गई हैं। जल संरक्षण के उपाय सरकारों की तरफ से सुनिश्चित किए जा रहे हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 6 अप्रैल, 2011 को राष्ट्रीय जल अभियान (National Water Mission) को मंजूरी प्रदान की गई, जिसके उद्देश्यों में से एक उद्देश्य आम जनता और राज्यों को जल संरक्षण के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करना है। हमारी नई राष्ट्रीय जल नीति, 2012 में भी जल संरक्षण को वरीयता प्रदान की गई। एक हालिया पहल ‘अटल भूजल योजना’ के रूप में की गई है, जिसे विश्व बैंक ने 6,000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता देने की घोषणा की है। देश के बड़े भाग में भूजल संसाधनों की गंभीर कमी को दूर करने के लिए जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय द्वारा ‘अटल भूजल योजना’ तैयार की गई है। इस योजना का प्रमुख उद्देश्य देश के प्राथमिक क्षेत्रों में सामुदायिक भागीदारी से भूजल प्रबंधन की स्थिति में सुधार करना है। इसमें सम्मिलित किए गए राज्य हैं-गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश। यही वे राज्य हैं जो भारत में भूजल के मामले में अत्यधिक शोषित, संकटमय एवं अर्धसंकटमय खण्डों का लगभग 25% निरूपित करते हैं। योजना के अंतर्गत भूजल संचालन हेतु जिम्मेदार संस्थानों को बेहतर बनाने एवं भूजल प्रबंधन में पानी के प्रभावी उपयोग एवं संरक्षण को बढ़ावा देने वाला व्यवहारगत परिवर्तन लाने के लिए सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहन देने के लिए धनराशि प्रदान की जाएगी। यह योजना पहचान किए गए प्राथमिक क्षेत्रों में योजनाओं के कार्यान्वयन को प्रोत्साहन देकर प्रदेशों में जारी मौजदा सरकारी योजनाओं के सम्मिलन की सविधा भी प्रदान करेगी। योजना के क्रियान्वयन से इसमें सम्मिलित राज्यों के 78 जिलों की लगभग 8350 ग्राम पंचायतें लाभान्वित होंगी। 

जल संकट की समस्या से उबरने के लिए जलसंरक्षण ही एकमात्र उपाय है। सरकारें इस दिशा में प्रयत्नशील दिख रही हैं, लेकिन हमारा यह दायित्व बनता है कि हम सरकारी तंत्र पर ही आश्रित न बने रहें। हमें निजी स्तर से भी प्रयास करने होंगे और इनके तहत हमें जल संरक्षण की अपनी परम्परागत विधियों की ओर लौटना होगा, साथ ही जल के इस्तेमाल में भी मितव्ययी बनना होगा। पानी के प्रति हमें अपनी सोच बदलनी होगी। पानी को प्रकृति का प्रचुरता में उपलब्ध निःशुल्क उपहार मानने के बजाय अपनी जरूरत की सीमित वस्तु के रूप में देखना होगा। ऋग्वेद में जल को अमृत के समतुल्य बताते हुए कहा गया है- 

अप्सु अंतः अमृतं 

अप्सु भेषजं।

हमें हर हाल में इस अमृत रूपी जल को संरक्षित करना होगा। इसी में हमारी भावी पीढ़ियों का भला भी है। 

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