हरित क्रांति पर निबंध | Essay on Green Revolution in Hindi | भारत में हरित क्रांतियां 

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हरित क्रांति पर निबंध | Essay on Green Revolution in Hindi

हरित क्रांति ने भारतीय कृषि को नये आयाम दिये। क्रांतिकारी प्रयासों द्वारा पैदावार को बढ़ाना ही हरित क्रांति कहलाता है। इसे स्पष्ट करते हुए जे. जार्ज हरार कहते हैं- “हरित क्रांति शब्द का प्रयोग पिछले दशकों में कुछ देशों जैसे—भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका व फिलीपींस आदि में खाद्यान्नों के उत्पादन में होने वाली अप्रत्याशित वृद्धि के लिए किया जाता है। इस क्रांति का मुख्य आधार नवीन व अधिक उपज देने वाले बीजों का प्रयोग है, जिनसे किसान तीन-से चार गुना अधिक पैदावार कर सका है।” भारत में न सिर्फ हरित क्रांतियां सफल रहीं, बल्कि इन्होंने भारतीय कृषि को प्रगति का एक नया आधार भी दिया। 

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जहां कृषि वैज्ञानिक प्रो. नॉरमन बोरलॉग (नोबेल विजेता) ने हरित क्रांति का सूत्रपात किया था, वहीं भारत में इसका जनक कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन को माना जाता है। वैसे, इसके प्रेरणा स्रोत थे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री, जिन्होंने ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा देकर यह संदेश दिया था कि देश की सुरक्षा हमारे जवान (सैनिक) सुनिश्चित करें और खाद्यान्न सुरक्षा देश के किसान सुनिश्चित करें। ऐसा होने पर ही देश-शक्तिशाली और आत्मनिर्भर बन सकेगा। इस प्रकार हम स्व. लाल बहादुर शास्त्री को देश में हरित क्रांति का प्रणेता कह सकते हैं। उन्होंने देश की आत्मा को पहचान कर इस क्रांति का आह्वान किया था, जिसके सूत्रधार बने भारतीय कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन। 

भारत में हरित क्रांति का आगाज वर्ष 1966-67 के दौरान हुआ। उस समय भारतीय कृषि से जुड़ी तत्कालीन परिस्थितियां यह मांग कर रही थीं, कि भारतीय कृषि को प्रोत्साहित कर उसमें नवीन संचार लाया जाए। यह एक मुश्किलों भरा समय था, जिसमें खाद्यान्न संकट और निर्धनता की पदचापें साफ सुनाई दे रही थीं। किसान अपनी बदहाली से नहीं उबर पा रहा था, तो कृषि के तौर-तरीके भी निहायत परम्परागत थे। भारत में भुखमरी की समस्या भी सिर उठा रही थी। इन हालात को बदलने के लिए एक क्रांति की तो आवश्यकता थी ही, जो कि हरित क्रांति के रूप में सामने आई तथा जिसने कृषि क्षेत्र को एक नया संस्पर्श देकर देश के सूरत-ए-हाल को बदलने का काम किया। इसीलिए इसे कृषि जगत की एक महत्त्वपूर्ण घटना माना गया है। 

हरित क्रांति का मुख्य उद्देश्य था, कृषि उत्पादकता को बढ़ाना। साथ ही इसके तहत ऐसे उपाय भी सुनिश्चित किए गये, जिससे परम्परागत उत्पादन तकनीक में संरचनात्मक बदलाव लाया जा सके। उपज बढ़ाने के लिए सर्वप्रथम बीजों के उन उन्नत प्रजातियों का प्रयोग किया गया, जो अधिक उपज देने में सक्षम होती हैं, विशेष रूप से गेहूं, धान, बाजरा, मक्का और ज्वार की अधिक पैदावार के लिए उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग किया गया और इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए। हरित क्रांति के तहत सुधरे हुए बीजों की आपूर्ति पर भी ध्यान दिया गया और यह जिम्मेदारी ‘राष्ट्रीय बीज निगम’, ‘राज्य बीज निगमों’ व ‘भारतीय राज्य फार्म निगम’ ने निभाई। न सिर्फ प्रमाणित बीजों के उत्पादन पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया, बल्कि इनके वितरण को भी प्रोत्साहित किया गया। इसी क्रम में जहां उपज बढ़ाने के लिए रासायनिक खादों और उर्वरकों के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया, वहीं मिट्टी का परीक्षण करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रयोगशालाएं स्थापित की गईं। इसके भी माकूल नतीजे सामने आए क्योंकि इससे यह सुनिश्चित हुआ कि किस मिट्टी में कितनी व किस प्रकार की खादों और बीजों का प्रयोग किया जाए। 

उपज में वृद्धि तथा कृषि क्षेत्र में संरचनात्मक सुधारों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से जहां अनुसंधान शालाओं का बंदोबस्त किया गया वहीं नये कृषि विश्वविद्यालय भी खोले गये। शोध कार्यों को दिशा देने में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी क्रम में सिंचाई योजनाओं को विस्तार दिया गया। ऐसे प्रयास तेज किए गये, जिनसे अच्छी सिंचाई व्यवस्था का संजाल स्थापित हो सके। सिंचाई को ध्यान में रखकर जहां बड़े-बड़े बांध बनाए गये, वहीं छोटी-बड़ी नहरों को काटकर पानी उपलब्ध करवाने के प्रयास किये गये। कुओं तथा तालाबों के विस्तार को बढ़ाया गया। इस बात की तरफ विशेष ध्यान दिया गया कि सिंचाई का लाभ छोटे किसानों को मिल सके। सिंचाई की सुविधाएं बढ़ाने की दृष्टि से ही जल संरक्षण कार्यक्रमों में तेजी लायी गयी। 

उपज को बढ़ाने की दृष्टि से हरित क्रांति के तहत वर्ष 1967 68 में बहुफसली योजनाएं शुरू की गईं। इसका उद्देश्य था, एक वर्ष में दो-तीन फसलें उगाना। यानी कम समय में पकने वाली फसलों को उगाकर उपज बढ़ाई गई। पौध संरक्षित रहे इसे ध्यान में रखकर दवाओं के छिड़काव आदि की तरफ तो विशेष ध्यान दिया ही गया, कीटों के विनाश के लिए कीटनाशकों के प्रयोग को बढ़ाया गया। जहां बीजों को सुरक्षित रखने की विधियां विकसित की गईं, वहीं फसलों को क्षति पहुंचाने वाले टिड्डी दलों के खिलाफ भी अभियान छेड़ा गया। खरपतवारों को नष्ट करने की वैज्ञानिक विधियां विकसित की गईं। इतना ही नहीं, भूमि संरक्षण की दिशा में भी विशेष ध्यान दिया गया, ताकि उन कारकों को प्रभावहीन किया जा सके, जो कि भूमि की उर्वरा शक्ति को क्षति पहुंचाते हैं। भूमि संरक्षण कार्यक्रमों के तहत उन जमीनों की ओर भी ध्यान केन्द्रित किया गया, जो कि अनुपजाऊ या बंजर हैं। इन्हें कृषि योग्य भूमि में परिवर्तित करने के प्रयास किये गये। 

हरित क्रांति के तहत परम्परागत खेती में संरचनात्मक बदलाव लाने के उद्देश्य से उन्नतशील कृषि उपकरणों के प्रयोग को वरीयता दी गई। नई मशीनों व उपकरणों के इस्तेमाल पर जोर दिया गया, ताकि उत्पादकता में वृद्धि लाई जा सके। उपकरणों के इस्तेमाल से जहां समय की बचत हुई, वहीं उपज भी बढ़ी। मड़ाई-कटाई जैसे कामों में सहूलियत भी रही। कृषि कार्यों में थ्रेशर, ट्रैक्टर, क्रेनक्रैशर, हारवेस्टर तथा पंपिंग सेटों को प्रोत्साहित किया गया, जिससे जहां कृषि के परम्परागत संरचनात्मक ढांचे में बदलाव आया, वहीं उपज भी बढ़ी। कृषि को वैज्ञानिक व मशीनी संस्पर्श मिला। इस क्रम में तकनीक को भी प्रोत्साहित किया गया और तकनीकी व्यक्तियों में व्यावसायिक कौशल को विकसित करने के उद्देश्य से कृषि सेवा केंद्र स्थापित करने की योजना लागू की गई। अच्छी कृषि के लिए लोगों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाने लगा।

हरित क्रांति के तहत किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने की तरफ विशेष ध्यान दिया गया। यह तभी संभव था, जब किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले। इस बात को ध्यान में रखकर कृषकों को उचित मूल्य की गारंटी प्रदान की गई। इसके लिए ‘कृषि लागत एवं कीमत आयोग’ की स्थापना की गई और उसे यह जिम्मेदारी सौंपी गई। उपज की सही कीमत किसानों को दिलवाने के लिए सरकारी खरीद मूल्य तय किये जाने लगे। किसानों को वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाने लगी, ताकि वे अच्छे किस्म के बीजों, उर्वरकों, कीटनाशक दवाओं, मशीनों व उपकरणों आदि का बंदोबस्त कर सकें। इसी के साथ किसानों को न सिर्फ विपणन व भंडारण की समुचित सुविधाएं उपलब्ध करवाई गईं, बल्कि परिवहन की सुविधाओं को ध्यान में रखकर गांवों को सड़कों के द्वारा शहरों से जोड़ा गया, ताकि माल समय से मंडी तक पहुंच सके। कृषि क्षेत्र के लिए ऊर्जा की जरूरतों को ध्यान में रखकर गांवों में विद्युतीकरण के कार्यक्रमों को गति प्रदान की गई। किसानों को किफायती दरों पर बिजली उपलब्ध करवाने के प्रयास किए गये। इन बातों के सकारात्मक परिणाम सामने आए और जहां उपज में वृद्धि हुई, वहीं देश की परम्परागत कृषि में बदलाव भी देखने को मिले। 

दूसरी हरित क्रांति

यह सच है कि पहली हरित क्रांति के अनेक सकारात्मक परिणाम सामने आये। मसलन, देश में पैदावार बढ़ी, जिससे खाद्यान्न के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर बने। भारतीय कृषि के परंपरागत ढांचे में बदलाव आया तथा उसे आधुनिक व वैज्ञानिक संस्पर्श मिला। जहां रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई, वहीं कृषि बचतों में वृद्धि से खेती किसानी में किसानों का भरोसा जागा। इसके बावजूद कुछ ऐसी खामियां रह गईं, जिनकी वजह से देश में दूसरी हरित क्रांति की आवश्यकता महसूस की गई। इन खामियों में पहली खामी यह थी कि प्रथम हरित क्रांति में खुश्क भूमि खेती (Dryland Farming) को कोई लाभ नहीं पहुंचा। इसकी दूसरी बड़ी खामी यह थी, कि यह क्रांति ‘आकार तटस्थ’ (Scale Neutral) नहीं थी। इस कमी की वजह से पहली हरित क्रांति का लाभ केवल बड़े किसानों और फार्मों तक ही पहुंचा। छोटे और सीमांत किसान इससे वंचित रह गये। आंकड़ों से पता चलता है कि 62 प्रतिशत सीमांत जोतें, जिनके अंतर्गत संकार्य क्षेत्रफल का 17% था और 31% छोटी जोतों, जिनके अंतर्गत 55% संकार्य क्षेत्र (Operational Area) था, को पहली हरित क्रांति का कोई लाभ नहीं पहुंचा। इसे हम इस तरह से भी देख सकते हैं। उपज तो बढ़ी, किंतु ग्रामीण निर्धनता नहीं घटी। ये बातें पहली हरित क्रांति की बड़ी विफलताओं के रूप में सामने आयीं, जिन्हें दूर करने के उद्देश्य से वर्ष 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने एक ऐसी दूसरी हरित क्रांति का आह्वान किया, जिसमें जहां खुश्क भूमि खेती को लाभ पहुंचाने पर जोर दिया गया है, वहीं यह कोशिश की गई है कि छोटी व सीमांत जोतों को इसके दायरे में लाकर छोटे व सीमांत किसानों को लाभ पहुंचाया जाए। 

दूसरी हरित क्रांति को अमलीजामा पहनाने के उद्देश्य से वर्ष 2004 में किसानों पर राष्ट्रीय आयोग (National Commission on Farmers) का गठन किया गया और इसकी अध्यक्षता प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमएस. स्वामीनाथन को सौंपी गई। इस आयोग द्वारा कुछ ऐसी सिफारिशें व पहलें की गई हैं, जिससे भारतीय किसानों की कायापलट सकती है। हर वर्ग और कोटि के किसान लाभान्वित हो सकें, इसे ध्यान में रखकर किसान की परिभाषा को व्यापकता प्रदान करते हुए इसमें शामिल किये गये हैं-छोटे, सीमांत व उपसीमांत कृषक, भूमिहीन कृषि मजदूर, फसल सहभाजक, मुजोर, बड़ी जोतों वाले किसान, मछली पकड़ने वाले पुरुष और महिलाएं, डेयरी, मुर्गीपालन और पशुपालन का काम करने वाले, पशुचारी तथा खेती से संबंधित वे ग्रामीण एवं जनजातीय व्यक्ति, जो रेशम उत्पादन, कीट-पालन, जैव उर्वरकों और जैव कीटनाशकों के उत्पादन और कृषि परिसाधन (Agricultural Processing) व्यवसायों में लगे हैं। इसमें छोटे किसानों को संस्थानात्मक सहायता (Institutional Support) पर विशेष बल दिया गया है, ताकि उनकी स्थिति में सुधार आए। चूंकि छोटे कृषकों में जोखिम तथा अनिश्चितता सहन करने की क्षमता अधिक नहीं होती है, अतएव न सिर्फ उन्हें संबल प्रदान किया गया है, बल्कि उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के भी प्रयास किये गये हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि पहली हरित क्रांति में ऋण सुविधाओं के अभाव, निविष्टियों की अप्राप्यता, अज्ञानता, अशिक्षा व अपर्याप्त संसाधन आदि कारणों से छोटे व सीमांत किसान इस क्रांति के लाभों से वंचित रह गये थे। दूसरी हरित क्रांति में उन्हें लाभ के दायरे में लाने का प्रयास किया गया है, ताकि समावेशी विकास की अवधारणा भी साकार हो सके। कोई भी विकास या प्रगति सार्थक तभी साबित होती है, जब उसका रिसाव निचले स्तर तक हो। यह बात देश की हरित क्रांतियों पर भी लागू होती है। दूसरी हरित क्रांति में जहां फार्म उत्पादिता और लाभदायकता बढ़ाने पर बल दिया गया है, वहीं भूमि की संभाव्य उत्पादिता को भी बढ़ाने का प्रयास वैज्ञानिक शोधों के जरिये किया गया है। दूसरी हरित क्रांति में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि बीजों में सुधार के लिए विज्ञान और जैव टेक्नोलॉजी के प्रयोग के साथ ही जड़ी-बूटियों व अन्य पौधों का प्रयोग भी किया जाए। दूसरी हरित क्रांति में इस बात पर भी विशेष बल दिया गया कि पशुधन और मुर्गियों की उत्पादिता में वृद्धि हेतु पशुपालन के क्षेत्र में विज्ञान का प्रयोग बढ़-चढ़ कर किया जाए। इस दूसरी हरित क्रांति की सबसे बड़ी विशिष्टता यह है कि इसमें पारिस्थितिकी नुकसान (Ecological Harm) को वरीयता दी गई है। यानी कृषि क्षेत्र में उत्पादकता व लाभदायकता को बढ़ाया तो जाए, किंतु यह काम इस तरह से किया जाए कि हमारी पारिस्थितिकी को क्षति न पहुंचे। दूसरी हरित क्रांति के मुख्य अवयव हैं-खुश्क भूमि खेती व छोटे व सीमांत किसानों को लाभ पहुंचाना, भूमि स्वास्थ्य में सुधार लाना, जल संरक्षण तथा पानी का पोषणीय एवं समतावादी प्रयोग, क्षमतानुसार उधार तक पहुंच तथा फसल एवं बीमा सुधार, उचित तकनीकों का विकास व प्रसारण तथा उन्नत अवसर, कृषि उत्पादन के विपणन के लिए उचित अधोसंरचना का निर्माण व विनियमन। वस्तुत; दूसरी हरित क्रांति, कृषि क्षेत्र से जुड़ी वह नई व्यूह रचना है, जो कि भारतीय कृषि की काया पलट सकती है। 

भारत का किसान आज भी बदहाल है। वह ऋण से ग्रस्त है। आत्महत्याएं करने को विवश है। ये बातें पहली हरित क्रांति को विफल व प्रभावहीन करती हैं। ग्रामीण गरीबी भी बढ़ी है और इसके चलते ग्रामीणों में खीझ और असंतोष बढ़ा है। देश का किसान यदि आत्महत्याएं कर रहा है, तो यह बात पहली हरित क्रांति को यकीनन संदिग्ध बनाती है। भारतीय किसानों की इससे बदतर स्थिति और क्या होगी, कि अनेक भारतीय किसान खेती को घाटे का सौदा मानने लगे हैं और अपनी जमीनें बेचकर कृषि कार्यों से विमुख हो रहे हैं। यह स्थिति अत्यंत गंभीर है, जो न सिर्फ पहली हरित क्रांति को प्रश्नगत करती है, बल्कि दूसरी हरित क्रांति की अब तक की प्रगति को भी सवालों के घेरे में ला रही है।

ऐसे में हमारे समक्ष एक बड़ी चुनौती यह है कि हम इन क्रांतियों की सार्थकता पर ध्यान दें। सार्थकता इसी में है कि उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ किसानों के चेहरे भी हंसते-मुस्कराते नजर आएं। वे ऋण ग्रस्तता के अभिशाप से उबर कर एक खुशहाल किसान कहलाएं। यह अच्छी बात है कि दूसरी हरित क्रांति में विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों की समस्याओं की तरफ ध्यान दिया गया है। यह उल्लेखनीय है कि भारत की 93% जोतें, छोटी तथा सीमांत जोतों की श्रेणी में आती हैं, जब इनका उद्धार होगा यानी हमारे छोटे व सीमांत किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी, तभी देश की हरित क्रांतियां मंजिल-ए-मकसद तक पहंच सकेंगी और भारतीय कृषि के दुखद अध्यायों का पटाक्षेप होगा। 

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