ग्राम पंचायत पर निबंध- Essay on Gram Panchayat in Hindi

Essay on Gram Panchayat in Hindi

ग्राम पंचायत पर निबंध- Essay on Gram Panchayat in Hindi Language

पंचायत पंचों की एक समिति है, जिसमें प्रायः पांच पंच होते हैं। प्राचीन काल से ही हमारे यहां गांवों के झगड़े-फसाद एवं गांव के विकास संबंधी महत्वपूर्ण निर्णय इसी समिति के द्वारा लिए जाते हैं। ‘पंचायत’ शब्द उतना ही पुराना है, जितनी पुरानी हमारी आर्य संस्कृति है। उदाहरण स्वरूप श्रीराम को राजगद्दी देने से पूर्व राजा दशरथ ने पंचायत बुलाई थी 

जो पंचहि मत लागो नीका। 

करहुं हरषि हिय रामहिं टीका॥

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ग्राम पंचायतों के बड़े समर्थक थे, इसीलिए आजादी के बाद हमारे देश में कानून बनाकर ग्राम पंचायतों की स्थापना की गई। प्रत्येक गांव में, जिनकी आबादी चार हजार से ज्यादा होती है, वहां एक के बदले दो या आवश्यकतानुसार इससे भी अधिक पंचायतों की स्थापना का प्रावधान है। ग्राम पंचायत के मुख्यतः दो विभाग हैं-एक, कार्यपालिका और दूसरा, न्यायपालिका। 

कार्यपालिका का प्रधान मुखिया होता है और इसके अधीनस्थ कार्यकारिणी के सोलह सदस्य होते हैं। गांव में शांति बनाए रखना तथा बिजली, पेयजल, हाट-मेला, सिंचाई और चिकित्सा आदि का प्रबंध करना मुखिया एवं इसकी कार्यकारिणी के प्रमुख कार्य हैं। ग्राम पंचायत की न्यायपालिका को ही ‘ग्राम कचहरी’ कहा जाता है। इसका प्रधान सरपंच होता है। ग्राम कचहरी में सरपंच के अतिरिक्त अन्य पंच भी होते हैं। सरपंच एवं पंचों का कार्य गांव के छोटे छोटे झगड़ों का निबटारा करना होता है। मुखिया और सरपंच का चुनाव पांच वर्षों के लिए किया जाता है। इसके लिए गुप्त मतदान होता है। 

ग्राम पंचायतों के न होने से गांव के छोटे-छोटे झगड़े भी सरकारी न्यायालयों में चले जाते हैं। सरकारी न्यायालयों द्वारा फैसला लेने में समय एवं धन-दोनों की बर्बादी होती है। सरकारी न्यायालयों के बारे में कहा जाता है कि इनमें जो जीतता है, वह हारता है और जो हारता है, वह मर ही जाता है। अतः पंचायती व्यवस्था में पंचायत स्थल पर ही शीघ्र फैसला करने का जो प्रावधान है, उससे ग्रामीणों का समय और धन दोनों बच जाता है। पहले गांव के विकास हेतु प्राप्त सरकारी राशि को सरकारी पदाधिकारी एवं कर्मचारी मिलकर बंदर-बांट कर लेते थे, लेकिन आज ऐसी बात नहीं है। वर्तमान समय में प्राप्त सरकारी राशि मुखिया एवं ग्रामीणों के माध्यम से ही गांव के विकास कार्यों में खर्च की जाती है। यही नहीं, अब तो निकट भविष्य में ग्राम पंचायत के वित्तीय, प्रशासनिक एवं न्यायिक अधिकारों में काफी वृद्धि की जा रही है। 

लेकिन खेद है कि जिन उद्देश्यों के लिए ग्राम पंचायतों की स्थापना हुई थी, आज उनकी प्राप्ति नहीं हो पा रही है। सरपंच एवं मुखिया के चुनाव में गलत हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। इन चुनावों में आपराधिक कृत्य होना आम बात है। अभी जो हालात हैं, उसमें यह कहना अनुचित नहीं होगा कि दबंग लोग जीत के हकदार हो रहे हैं और कर्मठ तथा ईमानदार लोग हार रहे हैं। गांव का सबसे अधिक प्रपंची व्यक्ति विभिन्न हथकंडे अपनाकर सरपंच हो जाता है। इसीलिए पंचायत के फैसले अब बिकाऊ हो गए हैं। 

पहले पंचों के हृदय में परमात्मा का वास माना जाता था। पंच की वाणी परमेश्वर की वाणी कही जाती थी। पंचों में अब अलगू चौधरी और जुम्मन शेख नहीं होते। उनमें डाकू मुखिया होने लगे हैं और लड़ाकू उनकी कार्यकारिणी के सदस्य। परिणाम स्वरूप गांव के विकास हेतु प्राप्त सरकारी राशि मुखिया एवं उसकी कार्यकारिणी के लोग हड़प जाते हैं और विकास कार्य नहीं हो पाते। अब जनता हलाल हो रही है और मुखिया मालामाल। ऐसे में कवि जानकी वल्लभ शास्त्री का कथन पूर्णत: चरितार्थ हो रहा है 

ऊपर-ऊपर पी जाते हैं, जो पीने वाले हैं, 

कहते, ऐसे ही जीते हैं, जो जीने वाले हैं।

अतः ग्राम पंचायत का पावन उद्देश्य ‘राम-राज्य’ तभी संभव होगा, जब मुखिया, सरपंच व कार्यकारिणी के सदस्य ईमानदार, सदाचारी और न्यायप्रिय हों। मुखिया के गुणों का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है 

मुखिया मुख सौ चाहिए, खान-पान को एक। 

पालें-पोसें सकल अंग, तुलसी सहित विवेक॥

तुलसीदास जी ने मुखिया की जो अवधारणा की है, वस्तुतः मुखिया को वैसा ही होना चाहिए। लेकिन अब ऐसे मुखिया दुर्लभ हैं।

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