ग्राम न्यायालय पर निबंध | ग्राम न्यायालय | न्याय को गरीब तक पहुंचना ही चाहिए

ग्राम न्यायालय पर निबंध | ग्राम न्यायालय अथवा न्याय को गरीब तक पहुंचना ही चाहिए (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2005) अथवा मौजूदा दौर में ‘न्याय आपके द्वार’ अवधारणा की प्रासंगिकता 

भारत में प्राचीनकाल से न्याय के उच्च प्रतिमान रहे हैं, ताकि समाज में ‘मत्स्य न्याय’ की स्थिति न रहे। सच तो यह है कि भारत में न्याय व्यवस्था उतनी ही पुरानी है, जितनी की मानवता। भारत एक कृषि प्रधान देश है और हमेशा से कृषि प्रधान देश होने के कारण यहां की अर्थव्यवस्था कृषि से ही जुड़ी रही। कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था और कृषि प्रधान देश होने के कारण हमारी प्राचीन न्याय व्यवस्था भी ग्रामों से जुड़ी रही। पंचायत के स्तर पर मामलों का निस्तारण हो जाता था और पक्षकारों को इसमें पूर्ण संतुष्टि प्राप्त होती थी। विरले मामले ही राजा-महाराजाओं की अदालतों तक जाते थे। पंच को परमेश्वर के रूप में देखा जाता था। 

ग्राम अदालत रूपी पंचायतों की प्राचीनता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि ऋग्वेद जैसे प्राचीन ग्रंथ में हमें इन पंचायतों का उल्लेख मिलता है। खाप जैसी पंचायतें, जो आजकल न्याय के सिवा कतिपय दूसरे कारणों से चर्चा में रहती हैं, का उल्लेख ऋग्वेद में है। तत्कालीन भारतीय समाज में इन खाप पंचायतों ने न्याय के ऊंचे प्रतिमान स्थापित किए और उच्च कोटि के न्यायिक मूल्यों का परिचय दिया। तब न्याय को सत्य के प्रतिरूप के रूप में देखा जाता था, उस सत्य के प्रतिरूप के रूप में, जिसे शिव से भी सुंदर बताया गया है। 

प्राचीन भारत की न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी विशिष्टता यह थी कि इसके साथ यह अवधारणा जुड़ी थी कि ‘न्याय को गरीब तक पहुंचना ही चाहिए’ (Justice must reach the poor)। तब न्याय पाने के लिए आर्थिक पक्ष सबल होना जरूरी नहीं था। बिना किसी भेद-भाव के सभी को न्याय दिया जाता था। हमारी पंचायतें ऐसा करते हुए न्याय आपके द्वार’ की अवधारणा को साकार करती थीं। इसके लिए पक्षकारों को कोई खर्च वहन नहीं करना पड़ता था और न ही आज की तरह कोर्ट-कचेहरियों व वकीलों के चक्कर लगाने पड़ते थे। न्याय सर्वसुलभ था और गरीब की पहुंच में था। न्याय का। यही स्वरूप भी होना चाहिए कि वह सभी तक पहुंचे और आर्थिक कारण न्याय में बाधक न बनें। सुलभ और सहज न्याय का यह स्वरूप हमारे देश में मध्यकाल तक कायम रहा। तब धन, दूरी, अशिक्षा आदि बातें न्याय के मार्ग में बाधक नहीं बनती थीं तब पंचायतें आज की तरह से मुकदमों के बोझ में दबी नहीं रहती थीं। एक-दो पंचायतों में ही गंभीर से गंभीर मामलों का निपटारा हो जाता था। यह एक तरह की उच्च कोटि की सामाजिक न्याय व्यवस्था थी, जिसमें पंचों को कोई मानदेय नहीं दिया जाता था। उनका निर्णय सहर्ष स्वीकार कर लिया जाता था। 

“ग्राम अदालत रूपी पंचायतों की प्राचीनता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि ऋग्वेद जैसे प्राचीन ग्रंथ में हमें इन पंचायतों का उल्लेख मिलता है। खाप जैसी पंचायतें, जो आजकल न्याय के सिवा कतिपय दूसरे कारणों से चर्चा में रहती हैं, का उल्लेख ऋग्वेद में है।” 

ब्रिटिश हुकूमत के प्रादुर्भाव के साथ हमारे देश में संवैधानिक न्याय व्यवस्था ने कदम रखे। भारत की प्राचीन न्याय व्यवस्था से इतर यह एक अलग किस्म की न्याय व्यवस्था थी, जिसमें कोर्ट थे, जज थे, हाकिम थे और थे बैरिस्टर। बस यहीं से भारत की प्राचीन न्याय व्यवस्था का स्वरूप बिगडा और धन दरी व अशिक्षा जैसी बातें न्याय के मार्ग में बाधक बनने लगीं। कोर्ट-कचेहरियों के चक्कर बढ़ने लगे तथा तारीखों का सिलसिला बढ़ने लगा। जो परम् तत्व न्याय को वास्तव में न्याय बनाते थे, वे उससे दूर हो चले। कहने का आशय यह कि न्याय न तो त्वरित रहा और न ही गरीब की पहुंच में। न्याय को गरीब तक पहुंचना ही चाहिए’ (Justice Must Reach the | Poor) की अवधारणा खंडित हो गई। अनुभवी लोग कोर्ट-कचेहरी को तबाही के अड्डे बताकर इनका चक्कर लगाने से बचने की सलाह देने लगे। 

आजादी के बाद यह सोचा गया था कि हम प्राचीन भारतीय न्यायिक मूल्यों को ध्यान में रखकर नये सिरे से भारतीय न्याय व्यवस्था को व्यवस्थित करेंगे और यहां के ग्रामीण परिवेश को ध्यान में रखकर ऐसा बंदोबस्त करेंगे कि धन, दूरी व अशिक्षा जैसी बातें न्याय के मार्ग में बाधक न बनें। न्याय त्वरित हो और गरीब व अशिक्षित की भी पहंच में हो। इसे दर्भाग्य व देश के कर्णधारों की | अदूरदर्शिता ही कहेंगे कि आज की न्याय व्यवस्था को प्राचीन भारत की न्याय व्यवस्था का संस्पर्श नहीं मिल पाया। स्वतंत्रता के बाद भी हमने वादों के निपटाने का वही ढांचा अपना लिया, जो औपनिवेशिक काल में था। 

“खैर…। देर से ही सही, अब इस दिशा में न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों का ध्यान गया है। उन्हें ग्राम अदालतों की प्रासंगिकता समझ में आने लगी है।” 

इस औपनिवेशिक काल की न्याय व्यवस्था कोह-ब-हू अपनाने के कारण जहां न्याय की प्राचीन स्रोत रहीं पंचायतें इस संदर्भ में प्रभावहीन हो गईं, वहीं धनहीनता और अशिक्षा जैसी बातें न्याय मार्ग में बाधक बनने लगीं। पंचायत रूपी ग्राम अदालतें प्रायः अप्रासंगिक हो चलीं और न्याय के मंदिरों का स्वरूप बड़ा ही भयावह होता चला गया। उलझाऊ जिरहों और झूठी गवाहियों ने जहां समूची न्याय प्रणाली को दूषित बना डाला, वहीं न्याय की कोई समय-सीमा न रही। न्याय के नाम पर तारीखें मिलने लगीं। वाद दायर करने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल बना दी गई। इतनी जटिल कि बिना वकील का सहयोग लिए पढ़ा-लिखा भी वाद दायर न कर पाए, अशिक्षित की तो बात छोड़िये। चूंकि वकीलों पर निर्भरता बढ़ी, तो उन्होंने बेहिसाब फीस मुवक्किलों से वसूलनी शुरू कर दी।

खैर…। देर से ही सही, अब इस दिशा में न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों का ध्यान गया है। उन्हें ग्राम अदालतों की प्रासंगिकता समझ में आने लगी है। यह एक अच्छी बात है कि देश की शीर्ष अदालत यानी सर्वोच्च न्यायालय ने जहां त्वरित न्याय की दृष्टि से ‘न्याय आपके द्वार’ की अवधारणा को साकार करने की बात कही है, वहीं ऐसे उपायों पर भी ध्यान केंद्रित किया है, जिनसे धन, दूरी व अशिक्षा न्याय मार्ग में बाधक न बने। इसके लिए न सिर्फ ग्राम अदालतों की प्रासंगिकता को स्वीकार किया गया है, बल्कि इस दिशा में प्रेरक पहल भी की है। वस्तुतः ग्रामीण क्षेत्रों में न्यायिक व्यवस्था उपलब्ध करवाने तथा सामान्य न्यायालयों में कार्य बोझ कम करने के उद्देश्य से इन न्यायालयों की संकल्पना की गई और इसे मूर्त रूप देने के उद्देश्य से संसद द्वारा वर्ष 2008 में ‘ग्राम न्यायालय अधिनियम’ पारित किया गया, जो कि 2 अक्टूबर, 2009 से लागू हुआ। इन अदालतों का पीठासीन अधिकारी ‘न्यायाधिकारी’ होता है, जिसे प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्राप्त होती हैं। इनकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा संबंधित उच्च न्यायालय की सलाह पर की जाती है। ग्राम अदालतों को संपत्ति संबंधी सिविल वादों तथा दो वर्ष तक के कारावास के प्रावधान वाले आपराधिक मामलों की सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। इन अदालतों के निर्णयों के विरुद्ध आपराधिक मामलों में सेशन कोर्ट में तथा सिविल मामलों में डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में अपील की जा सकती है। 

हालांकि हमारे देश में इन अदालतों की स्थापना का कार्य अभी अपने शैशवकाल में है, तथापि ग्राम अदालतों की अधिकाधिक स्थापना से देश में ‘न्याय आपके द्वार’ जैसी अवधारणाएं साकार होंगी, वहीं न्याय की पहुंच भी गरीब तक बढ़ेगी। इससे देश की अदालतों में मुकदमों के बोझ में भी कमी लाने में सहायता मिलेगी। इस प्रकार ग्राम अदालतें हमारी संवैधानिक न्याय व्यवस्था का अंग भी बनेंगी। 

न्याय क्षेत्र की यह एक प्रशंसनीय व नेक पहल है, जिसमें संभवतः पहली बार देश की उस आत्मा का ध्यान रखा गया है, जो ग्रामों में बसती है। कालखंड का प्रभाव गांवों पर भी पड़ा है। अब वे निर्मल गांव नहीं रहे, जिनके लिए महात्मा गांधी उच्च कोटि के नैतिक दर्शन की बात किया करते थे। आज के गांव ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा व झगड़ों का पर्याय बन चुके हैं। छोटी-छोटी बातों पर कटुता और झगड़े इस हद तक बढ़ जाते हैं कि मामलों के अदालत तक पहुंचने में देर नहीं लगती है। आप कोर्ट-कचेहरियों में गौर करिये। भीड़ का एक बड़ा हिस्सा आपको ग्रामीण परिवेश का ही मिलेगा। अदालतों में न्याय के नाम पर ये किस कदर शोषण और उत्पीड़न का शिकार होते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। इन्हें मुकदमों की पैरवी के दौरान कितने शारीरिक, मानसिक व आर्थिक कष्ट उठाने पड़ते हैं, इसकी गणना आसानी से नहीं की जा सकती। बस कल्पना की जा सकती है। यदि ये बेचारे दलालों के चंगुल में फंस गये, तो बस पूछिये मत। तबाही कई गुना बढ़ जाती है। अब जबकि ग्राम अदालतों की प्रासंगिकता को स्वीकार किया जा चुका है और इनकी स्थापना की तरफ तत्परता से ध्यान दिया जा रहा है, तो तय समझिये कि न्याय व्यवस्था में सुधार होगा और इस तरह से हमारा न्यायिक तंत्र भी विकसित होगा। ग्रामीणों को व्यर्थ की भाग-दौड़ से निजात मिलेगी तथा उन्हें जल्द न्याय सुलभ होगा। 

यह एक सराहनीय पहल है, जिसकी उज्ज्वलता के प्रति हमें विशेष रूप से सतर्क रहने की जरूरत है। आवश्यकता इस बात की है कि इन ग्राम अदालतों में सक्षम व योग्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाए, जो न्याय के उच्च प्रतिमानों को कायम कर सकें। ऐसे निर्णय दें, जो नजीरें बन जाएं और जिन्हें ऊपर की अदालतें स्वीकार करें। कहने का आशय यह है कि हर हाल में न्याय की गुणवत्ता कायम रहनी चाहिए। न्याय की आत्मा नहीं मरनी चाहिए। ग्राम अदालतों की प्रासंगिकता और सार्थकता इसी में है कि वे दबाव रहित होकर निष्पक्ष न्याय करें। तभी यह रचनात्मक पहल रंग लाएगी। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

five × 5 =