गोस्वामी तुलसीदास पर निबंध |Essay on Goswami Tulsidas in Hindi

गोस्वामी तुलसीदास पर निबंध

गोस्वामी तुलसीदास पर निबंध |Essay on Goswami Tulsidas in Hindi

सच मानो तुलसी न होते तो हिंदी कहीं पड़ी होती,

उसके माथे पे रामायण की बिंदी नहीं जड़ी होती।

हिंदी-वांग्मय के ललाट पर ‘रामचरित मानस’ की कालजयी चमचमाती बिंदी जड़ने वाले महाकवि तुलसीदास से भला कौन अपरिचित है ? ग्रियर्सन ने बुद्ध के बाद इन्हें ही सबसे बड़ा लोकनायक माना है। लेकिन तुलसीदास जी हिंदी भाषी क्षेत्रों में बुद्ध से भी बढ़कर लोकनायक हैं। इतिहासकार स्मिथ ने इन्हें अकबर के समान महान बताया है। लेकिन अकबर की स्मृतियां कुछ भवनों और किलों के साथ जाती रहेंगी, परंतु तुलसीदास अपनी कालजयी कृतियों के कारण जन-जन के बीच हमेशा श्रद्धापूर्वक याद किए जाते रहेंगे। 

ऐसे महान संत लोकनायक तुलसीदास का जन्म संवत् 1588 की भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम तथा माता का नाम हुलसी था। इनका परिचय रहीम के इस दोहे से मिलता है –

सुरतिय नरतिय नागतिय यह जानत सब कोय। 

गोद लिए हुलसी फिरे तुलसी से सुत होय॥

बचपन में ही माता-पिता की छत्रछाया हट जाने से तुलसीदास अनाथ हो गए। इन्होंने स्वयं अपने बारे में लिखा है, “मांगकर खाना और मंदिर में सोना मेरी दिनचर्या थी।” बड़े होकर इन्होंने नरहरिदास से दीक्षा ली और रामभक्त बन गए। काशी में रहकर इन्होंने संस्कृत साहित्य का गहन अध्ययन किया। पत्नी रत्नावली की फटकार के बाद ये संन्यासी बन गए और विभिन्न तीर्थों का भ्रमण करने लगे। इसी क्रम में अनेक संतों से समागम भी हुए। ये श्रीराम के इतने बड़े भक्त हो गए कि सृष्टि के कण-कण में इन्हें वे दिखाई पड़ते थे 

सियाराममय सब जग जानी। 

करहुं प्रनाम जोरि जुग पानी॥

गोस्वामी तुलसीदास एक सिद्ध संत थे। इनकी सिद्धि की कहानियां आज भी अयोध्या, काशी और चित्रकूट की गलियों में सुनने को मिलती हैं। जीवन के अंतिम क्षण इन्होंने काशी के असी घाट पर बिताए और मोक्ष प्राप्त किया। इनके मोक्ष के संबंध में यह दोहा प्रचलित है 

संवत् सोलह सौ असी, असी गंग के तीर। 

सावन शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर॥

तुलसीदास की लेखनी से अनेक कालजयी रचनाएं निःसृत हुई हैं। इनकी कुछ प्रसिद्ध रचनाएं हैं- ‘रामचरित मानस’, ‘विनय पत्रिका’, ‘कवितावली’, ‘दोहावली’, ‘पार्वती मंगल’, ‘जानकी मंगल’, ‘श्रीकृष्ण गीतावली’, ‘बरवैया रामायण’, ‘रामाज्ञा प्रश्न’, ‘हनुमान चालीसा’, ‘हनुमान बाहुक’, ‘रामलालन छहू’ इत्यादि। इनकी रचनाओं में भाषा बड़ी सरल, सहज और सरस है। इनका शब्द भंडार विशाल है। अपनी रचनाओं में इन्होंने संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू और क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों का भरपूर प्रयोग किया है। इनकी चौपाइयां, दोहे एवं सोरठे आदि गेय और काव्य की कसौटी पर पूर्णतः खरे उतरे हैं। 

तुलसीदास की कृतियों में सबसे अधिक लोकप्रियता ‘रामचरित मानस’ को मिली। इस ग्रंथ में ज्ञान, भक्ति और कर्म–तीनों का सफल समन्वय हुआ है। यह हिंदुओं के हर घर में पांचवें वेद की भांति पूजित है। इनकी दूसरी प्रमुख रचना ‘विनय पत्रिका’ है। इसमें भक्त द्वारा भगवान को प्रेम पत्र लिखा गया है। इसमें 279 दोहे में भक्ति की शीतल सरिता उमड़ पड़ी है। इनकी अन्य रचनाएं भी चिरस्थायी हैं। ‘हनुमान चालीसा’ की चौपाइयां तो हर हिंदू की जिह्वा पर रहती हैं। महाकवि हरिऔध ने ठीक ही कहा है- 

कविता करके तुलसी न लसे, 

कविता लसी पा तुलसी की कलम।

तुलसीदास का आविर्भाव ऐसे समय में हुआ था, जब परतंत्र भारत में हिंदू संस्कृति लुप्त होती जा रही थी। धर्म, जाति एवं संप्रदाय के नाम पर भारतीय समाज खंडित था। लोग हिंदू कहलाने से डरते थे। ऐसे समय में तुलसीदास ने अपनी रचनाओं से लोक चेतना जगाई। समन्वय का विराट रूप प्रस्तुत करके इन्होंने खंडित समाज को एकताबद्ध करने का स्तुत्य प्रयास किया। अपने नायक श्रीराम को अछूत शबरी के जूठे बेर खिलाकर और केवट से गले मिलाकर इन्होंने छुआछूत के लौह दुर्ग पर वज्र प्रहार किया। ‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा’ का शंखनाद करके इन्होंने मरणासन्न हिंदुओं को महामृत्युंजय मंत्र दिया। आज भी तुलसीदास की रचनाएं समाज की विश्रृंखलित कड़ियों को जोड़ने का कार्य कर रही हैं। अतः तुलसीदास सर्वकालीन लोक कवि हैं। 

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