गौतम बुद्ध पर निबंध

गौतम बुद्ध पर निबंध

गौतम बुद्ध पर निबंध | Essay on Gautama Buddha in hindi

ईसा पूर्व छठी शताब्दी के आस-पास भारत में सर्वत्र हिंसा का बोलबाला था। यहां तक कि धार्मिक यज्ञों में देवी-देवताओं की वेदी पर भी नरबलि एवं पशुबलि देने की प्रथा थी। कमजोर जीवों में त्राहि-त्राहि मची हुई थी। ऐसी ही विषम परिस्थितियों में जनमानस के बीच अहिंसा, शांति, प्रेम, करुणा और दया का पाठ पढ़ाने के लिए महामना तथागत गौतम बुद्ध का आविर्भाव हुआ। लोगों ने इन्हें भगवान का नौवां अवतार माना है। 

आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व नेपाल की तराई में कपिलवस्तु के लुंबिनी राज्य में राजा शुद्धोदन की पत्नी रानी महामाया देवी के गर्भ से गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। बालक सिद्धार्थ को जन्म देने के सातवें दिन ही महामाया जी चल बसीं। फलतः इनका लालन-पालन राजा शुद्धोदन की दूसरी पत्नी नंदजननी महाप्रजावती द्वारा किया गया। 

सिद्धार्थ को शस्त्र और शास्त्र-दोनों की शिक्षा देने की व्यवस्था की गई, लेकिन उनका झुकाव शास्त्र की ओर था। बचपन से ही इनकी प्रवृत्ति राग रहित और त्यागमयी थी। इनकी वीतरागी प्रवृत्ति से राजा शुद्धोदन बड़े चिंतित हुए। सिद्धार्थ का मन संसार में रमाने के लिए उन्होंने इनके भोग-विलास का पूरा प्रबंध किया। इनके मनोरंजन हेतु नाटक में काम करने वाली 40 हजार सुंदर युवतियों को लगाया गया। इनका विवाह अनिंद्य सुंदरी राजकुमारी यशोधरा के साथ हुआ। इनके आस-पास हमेशा नूतन वस्तुओं को ही लाया जाता, ताकि इन्हें जीवन की नश्वरता का बोध न हो। कुछ समय बाद सिद्धार्थ को एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम राहुल रखा गया। इनका मन संसार में नहीं रमा। एक दिन भ्रमण के दौरान जर्जर वृद्ध, रोगी, मृतक तथा संन्यासी को देखकर वे सोचने लगे, ‘क्या मेरी सुंदर पत्नी यशोधरा भी एक दिन जरा को प्राप्त हो जाएगी?’ 

इन घटनाओं से सिद्धार्थ के हृदय का वैराग्य प्रबल हो उठा। फलस्वरूप माया के सारे बंधनों को तोड़कर उन्होंने वन की ओर प्रस्थान किया। सच्चे ज्ञान एवं मानसिक शांति की खोज हेतु वे महात्माओं से सत्संग करते-करते वैशाली और राजगीर होते हुए गया पहुंचे। वहां निरंजना नदी के पूर्वी तट पर इन्होंने कठोर तप किया। फिर भी इन्हें सत्य का साक्षात्कार नहीं हो सका। अतः इस मार्ग को छोड़कर इन्होंने मध्यम मार्ग अपनाना उचित समझा। 

 इस धारणा के पक्ष में गौतम ने कहा था, “वीणा के तार को इतना मत खींचो कि वह टूट जाए और न इतना ढील दो कि उससे कोई आवाज ही न निकल सके।” फिर गौतम ‘गया’ में ही वट वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ हुए, जहां इन्हें आत्म साक्षात्कार हुआ। इसके बाद गौतम ‘भगवान बुद्ध’ कहलाने लगे। इनका पहला उपदेश अपने भूले-भटके पांच साथियों के मध्य सारनाथ में हुआ। इनके उपदेशों का सारांश होता था, “यह संसार दुखों का घर है।” इनसे मुक्ति पाने हेतु वे कहते, “भोग से बचो। भोग रोग का कारण है। रोग से ही शोक उत्पन्न होता है और शोक की परिणति दुख ही है।” 

महात्मा बुद्ध ने मुख्यतः चार आर्य सत्य को प्रचारित किया

संसार की सारी चीजें क्षणभंगुर हैं।

सांसारिक चीजों को पाने की तृष्णा से दुख की उत्पत्ति होती है।

तृष्णा के नष्ट होने से दुख नहीं ठहरता।

अहं, वैर, प्रीति और मोह का नाश होने पर मोक्ष प्राप्त होता है। 

इसके अलावा महात्मा बुद्ध द्वारा प्रतिपादित साधना के आठ अंग प्रत्येक बौद्ध भिक्षुक की सफलता के आठ सोपान हैं, जो निम्नवत हैं 

 सत्य पर आस्था रखना।

 सद्वृत्ति अपनाना।

सदाचार पूर्ण व्यवहार करना।

 सद्ध्यान पर ध्यान देना।

 कटु वचन का परित्याग करना।

 जीवन का लक्ष्य ऊंचा रखना।

 अपनी बुद्धि का उपयोग अच्छे कार्यों में करना। 

सदैव सद्गुण अपनाना। 

इस महामानव ने समाज में सत्य, अहिंसा और करुणा को स्थापित करके अपने अवतरण के मूल उद्देश्य को पूर्ण किया तथा सन 535 में गोरखपुर के समीप कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त किया। 

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