गंगा-जमुनी संस्कृति पर निबंध | Essay on Ganga-Jamuni Culture in Hindi

गंगा-जमुनी संस्कृति पर निबंध

गंगा-जमुनी संस्कृति पर निबंध | Essay on Ganga-Jamuni Culture in Hindi

यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तू (Aristotle) का कथन है “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।” वह जिस समाज में रहता है उसके खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार, कला-साहित्य आदि सब वहाँ की संस्कृति के अन्तर्गत आते हैं। संस्कृति के माध्यम से उक्त समाज के ज्ञान, चिंतन, रीति-रिवाज तथा परंपराओं के बारे में ज्ञान होता है। भारतीय संस्कृति की बात करें तो यह हमेशा से उदार रही है तथा इसी भावना से सबको अपने भीतर समाहित कर लेती है। शकों, कुषाणों से होता हुआ यह सफर मुस्लिम तथा ब्रिटिश संस्कृति तक पहुँचा। इसी बात की ओर इशारा करते हुए राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने एक बार कहा था कि “मेरा दृढ़ मत है कि जो बहुमूल्य रत्न हमारी संस्कृति के पास है, वह किसी अन्य संस्कृति के पास नहीं 

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के बारे में बात करें तो इस दौरान एक विडंबना यह पनपी कि एक ओर तो भारत की मूलभूत एकता पर जोर देकर उपनिवेशवाद के विरुद्ध सारे देश की ऊर्जा को समन्वित किया जा रहा था। तो दूसरी ओर भारत में जाति और धर्म के नाम पर लघुतर इकाइयां भी संगठित हो रही थीं, विशेष रूप से हिंदू और मुस्लिम अस्मिता पर जोर देते हुए सांप्रदायिकता का विस्तार हो रहा था। सांप्रदायिक राजनीति के काट के रूप में गंगा और जमुना के संगम के रूपक को गढ़ा गया। इसे विशेष कर ‘इलाहाबाद स्कूल ऑफ हिस्ट्री’ और जवाहर लाल नेहरू जैसे इतिहासकार-राजनेता ने प्रोन्नत किया। विख्यात इतिहासकार ताराचंद ने Influence of Islam on Indian Culture नामक अपने शोध ग्रंथ में उजागर किया कि भारत में इस्लाम ने ऐसे प्रभाव छोड़े हैं जो पूरी तरह समन्वित हो गए हैं। राधा कुमुद मुखर्जी ने Fundamental Unity of India में भारत की समन्वयवादी संस्कृति की वकालत की। 

‘इलाहाबाद स्कूल ऑफ हिस्ट्री’ और जवाहर लाल नेहरू जैसे इतिहासकार-राजनेता ने प्रोन्नत किया। विख्यात इतिहासकार ताराचंद ने Influence of Is lam on Indian Culture नामक अपने शोध ग्रंथ में उजागर किया कि भारत में इस्लाम ने ऐसे प्रभाव छोड़े हैं जो पूरी तरह समन्वित हो गए हैं। राधा कुमुद मुखर्जी ने Fundamental Unity of India में भारत की समन्वयवादी संस्कृति की वकालत की। 

इस तरह गंगा-जमुनी संस्कृति के तर्क द्वारा सांप्रदायिक विघटन की काट प्रस्तुत की गई। इसमें यह तर्क-प्रणाली विकसित की गई कि मुसलमान भारत में आई अन्य जातियों-आर्य, ग्रीक, हूण, शक, कुषाण आदि से भिन्न थे, उनके धर्म में एकान्तिकता थी 

ला इलाही इल्ल्लला/मुहम्मदन रसूलल्लाह। 

(दुनिया में एक ही खुदा है अल्लाह और मुहम्मद उसका रसूल या पैगंबर है।) शुरू के दौर में तेज टकराहटें हुईं, मंदिर ध्वस्त किए गए। जबरदस्ती धर्म परिवर्तन भी हुए आदि। परंतु धीरे-धीरे एक ही हवा-पानी में जीते-जीते समन्वय बढ़ता गया। भारत में खान-पान, आचार-व्यवहार, साहित्य-कला, भाषा-संस्कृति में समन्वय का जोर बढ़ता गया। भारत की विविध कलाओं-स्थापत्य, चित्रकला, संगीत आदि में व्यापक रूप से भारतीय शैली विकसित हुई जिसमें भारत की पारंपरिक कलाओं और नवागत इस्लामी कलाओं का समन्वय हुआ। 

इस प्रवाह को आवेग मिला अकबर की नीतियों से। उसके ‘सुलहे-कुल’ (Peace with All) के प्रयास ने भारत को एकताबद्ध किया। उस काल में जब यूरोप में धार्मिक युद्ध हो रहे थे भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता का बिगुल बज रहा था और फतेहपुर सीकरी के शाही महलों में ईद-बकरीद के साथ जन्माष्टमी और दीवाली के जश्न हो रहे थे। 

भारतीय संदर्भो में देखा जाय तो प्राचीन भारतीय धर्म अर्थात् सनातन धर्म एक तरह धर्म (पश्चिमी अर्थ में) न होकर एक जीवन प्रणाली था, या यूँ कहें कि जीवन दर्शन था। सहिष्णुता जीवन पद्धति का एक अनिवार्य अंग थी। 

इस्लाम को लेकर विध्वंस की स्मृतियों साथ समन्वय का यथार्थ टकराते रहते थे। इस पृष्ठभूमि में ही उननीसवीं सदी में राष्ट्रवाद के नवोन्मेष के दौरान नवोदित मध्य वर्ग ने नए-नए रूपक, उपमाएं और मुहावरे गढ़े। ‘गंगा-जमुनी’ मुहावरा उस नव-जागृति की ही उपज है। तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में जल्दी ही यह मुहावरा जड पकड़ने लगा और राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख मुहावरा बन गया। आज विघटनवादी प्रवृत्तियों के बढ़ते दौर में भी सांप्रदायिकता के विरुद्ध यही प्रमुख तर्क की तरह इस्तेमाल हो रहा है। 

भारतीय संदर्भो में देखा जाय तो प्राचीन भारतीय धर्म अर्थात् सनातन धर्म एक तरह धर्म (पश्चिमी अर्थ में) न होकर एक जीवन प्रणाली था, या यूँ कहें कि जीवन दर्शन था। सहिष्णुता जीवन पद्धति का एक अनिवार्य अंग थी। प्राचीन भारतीय ग्रंथ महाभारत में महाराज ययाति अपने ज्येष्ठ पुत्र पुरु को उपदेश देते हुए कहते हैं कि

नारुन्तुदः स्थान्न नृशंसवादी न हीनतः परमश्याद्दीन। 

यया स्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदेदुषती पापलोकयाम्॥

अर्थात् दूसरे के मर्म को चोट न करें, चुभने वाली बातें न बोलें। 

संस्कृतियाँ भी दो प्रकार की होती हैं एक लिखित संस्कृति दी अलिखित संस्कृति। पहली संस्कृति किताबों में मिल जाएगी। दी अलिखित संस्कृति कहीं नहीं मिलेगी। बहुत सी संस्कृतियाँ तो डोटी पक्षी की तरह विलुप्त होती जा रही हैं जैसे आदिवासियों की संस्कति उनके बोल-चाल, पहनावें आदि। बुरे तरीके से किसी को नियंत्रित न करें, दूसरे को उद्विग्न करने एवं ताप पहुँचाने वाली पापियों जैसे आचरण वाली भाषा न बोलें। 

इस श्लोक से साफ है कि प्राचीन काल से भारत में सहिष्णता की भावना विद्यमान रही है। हालांकि एक बात स्पष्ट है कि गंगा जमुनी संस्कृति की भावना राजनैतिक दृष्टि से भी देश के हित में है। कभी-कभी गंगा-जमुनी संस्कृति से केवल हिन्दू-मुस्लिम धर्मावलम्बियों के सहमिलन का अनुमान लगाया जाता है जो कि संकीर्ण अवधारणा है। भारत में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी आदि धर्मों के मतावलंबी प्रेम से रहते हैं। 

भारतीय संस्कृति का मौलिक आधार यहाँ विविध संस्कृतियों के बावजूद एकता की भावना में विद्यमान है। अर्थात् एकता के खंडित होने की दशा में संस्कृति खतरे में पड़ सकती है। भारतीय संस्कृति का सुनहरा काल रहा भक्तिकाल, जिसके नायक कबीर जैसे संत रहे हैं जो हिन्दू-मुस्लिम एकता के बड़े हिमायती थे। उल्लेखनीय है कि साझी संस्कृति के विरासत के वाहकों में अमीर खुसरो का नाम भी बड़े अदब के साथ लिया जाता है। उन्होंने ‘फारसी’ एवं ‘हिंदवी’ को मिलाकर खड़ी बोली को एक परिष्कृत रूप दिया। भारतीय संस्कृति हमेशा से प्रेम, सौहार्द्र एवं स्नेह की धरती रही है। इसी पर मशहूर शायर वसीम बरेलवी का एक शेर है 

वह मेरे चेहरे तक अपनी नफरतें लाया तो था,

मैंने उसके हाथ चूमे और बेबस कर दिया। 

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