वर्तमान युग में गांधीवाद की प्रासंगिकता पर निबंध |21वीं सदी में गांधी जी | Essay on Gandhism in Hindi

वर्तमान युग में गांधीवाद की प्रासंगिकता पर निबंध

21वीं सदी में गांधी अथवा वर्तमान में गांधीवाद की प्रासंगिकता (यू.पी. पीसीएस मुख्य परीक्षा, 2016) 

गांधीजी वास्तव में दार्शनिक नहीं थे। वे एक कर्मठ और व्यावहारिक व्यक्ति थे और किसी अन्य को मार्ग सुझाने से पूर्व वे स्वयं उस मार्ग पर चलना आवश्यक समझते थे। जहाँ तक गांधीवाद शब्द का सम्बंध है यह उनके द्वारा रचा गया शब्द नहीं बल्कि उनक विचारों, सिद्धांतों के समग्र रूप का पर्याय है। गांधीजी ने राष्ट्रीय आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया। यह वास्तव में उस काल की आवश्यकता थी। इसी माध्यम से उन्होंने देशवासियों को शोषक साम्राज्य से मुक्ति दिलाई। नेतृत्व की इस प्रक्रिया के दौरान गांधीजी के जो विचार और सिद्धांत जनमानस के सामने आये उन्हें ही बाद में गांधीवाद कहा गया। 

21वीं सदी में गांधीजी की प्रासंगिकता पर चर्चा करने के साथ साथ हमें उनके विचारों-सिद्धांतों पर भी वर्तमान स्थितियों को ध्यान में रखते हुए चर्चा करनी होगी 

गांधीजी का रामराज्य-गांधीजी देश का विकास गांवों से चाहते थे। उनके अनुसार देश के विकास का पहला सूर्य गांव है। रामराज्य के संबंध में गांधी जी ने एक स्थान पर स्वयं लिखा कि धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से इसे पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य कहा जा सकता है। राजनैतिक दृष्टि से यह एक ऐसा लोकतांत्रिक शासन होगा जिसमें सम्पत्ति के होने या न होने का और रंग, जाति, धर्म, लिंग के भेदों पर आश्रित समस्त विषमताओं का अंत हो जायेगा। रामराज में गांधीजी नैतिक अनुशासन पर आधारित एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहां किसी पर कोई रोक नहीं होगी। किन्तु हर व्यक्ति आत्मानुशासन से बंधा होगा। गांधीजी इसे सुराज भी कहते थे।

गांधीजी का सत्ता के विकेन्द्रीकरण का सिद्धांत भी इसी सुराज में निहित था। वे ग्राम पंचायतों को अपने गांवों का प्रबन्ध और प्रशासन का अधिकार सौंप देने की वकालत करते थे। राष्ट्रीय अथवा प्रांतीय सरकारों के ग्राम स्तर पर हस्तक्षेप की वे खिलाफत करते थे। सभी गाँव आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी तथा राजनीतिक दृष्टि से स्वशासन के पूर्ण अधिकार से युक्त हों। ग्राम्य स्वराज के संबंध में अपनी परिकल्पना को उन्होंने इस प्रकार व्यक्त किया है, ‘मेरे ग्राम स्वराज का आदर्श यह है कि प्रत्येक गाँव एक पूर्ण गणराज्य हो। अपनी आवश्यक वस्तुओं के लिए वह पड़ोसियों पर निर्भर न रहे। प्रत्येक गाँव के लिए पहला काम होगा खाने के लिए अन्न और कपड़ों के लिए कपास की फसल उत्पन्न करना। पशुओं के लिए गोचर भूमि तथा लोगों के खेल कूद एवं मनोरंजन के लिए खेल के मैदान की व्यवस्था करना भी ग्राम पंचायत का कार्य होगा। गाँव का प्रत्येक कार्य यथा सम्भव सहकारिता के आधार पर किया जायेगा।’ 

गांधीजी वैयक्तिक स्वामित्व का विरोध करते थे। उनका मानना था कि सभी सम्पत्ति ईश्वर की है और मनुष्य तो मात्र उसका न्यासधारी है। जिस प्रकार प्रत्येक मानव के लिए सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य एवं अस्तेय (चोरी न करना) आवश्यक व्रत हैं उसी प्रकार अपरिग्रह भी एक आवश्यक व्रत है। अपरिग्रह शब्द का अर्थ किसी वस्तु का संग्रह न करना है। गांधीजी के अनुसार वितरण का प्राकृतिक सिद्धांत यही है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी तात्कालिक आवश्यकता भर को ले, संग्रह के चक्कर में न पड़े। गांधीजी चाहते थे कि धनी लोग स्वेच्छा से अपनी सम्पत्ति सर्वसाधारण के हित में लगाएं। 

वह पश्चिमी देशों के पूंजीवादी लोकतंत्र को पसंद नहीं करते थे जहाँ शोषण, उत्पीड़न, सम्पत्ति का केन्द्रीकरण और असमानता जैसी बुराई अपने चरम पर थी। 

गांधीजी ने सदैव साधनों की पवित्रता पर विशेष बल दिया और अच्छे परिणामों के लिए साधन की पवित्रता को आवश्यक माना। उनका मानना था कि यदि साधन दूषित है तो उसका फल भी दूषित होगा। इसीलिए वे अहिंसा पर बल देते थे। उनका मानना था कि अहिंसा के प्रयोग से ही समाज की उन्नति, आर्थिक विषमता से मुक्त समाज की स्थापना संभव है। गांधीजी साम्यवाद का विरोध भी इसी आधार पर करते थे। सत्याग्रह और अहिंसा गांधीजी के सर्वश्रेष्ठ साधनों में से एक थे। सत्य को वे ईश्वर के सर्वाधिक निकट मानते थे। 

गांधीजी ने सदैव सामाजिक न्याय की पैरोकारी की और सामाजिक समानता पर बल देते हुए अस्पृश्यता को प्रोत्साहित किया। सामाजिक समानता की उनकी यह अवधारणा आज भी प्रासंगिक है। 

भारत विश्व के उन गिने चुने देशों में है जहाँ अध्यात्मवाद को प्रारंभ से ही प्रश्रय मिलता रहा है। भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, भगवान श्रीराम, गुरु नानक जैसे अनेक महापुरुषों के विचारों से प्रेरित महात्मा गांधी सत्य को भगवान का रूप मानते थे। किसी विशेष धर्म अथवा जाति की ओर उनका झुकाव न होकर वे सत्य के पुजारी थे और आध्यात्मिक शक्ति में पूरा विश्वास करते थे। वे भौतिक उन्नति को नाश का कारण मानते थे। भौतिक उन्नति के चक्कर में लोग अध्यात्मवाद से विलग होते हैं। महात्मा गांधी का मानना था कि ऐसे समाज को विकास का अभिशाप भोगना पड़ता है। अध्यात्म के विकास के लिए सभी प्रकार की बुराइयों से एकजुट होकर लड़ना चाहिए। स्वतंत्रता, अध्यात्मवाद के विकास के लिए आवश्यक है और इस स्वतंत्रता को पाने के लिए राजनीति के क्षेत्र में भी उतरना चाहिए। राजनीतिक बुराइयां-पराधीनता और इससे उत्पन्न दुष्परिणाम आत्मा के विकास में बाधक होते हैं। अतः आत्मा के विकास के लिए स्वतन्त्रता प्राप्त करना और संघर्ष करना अनिवार्य है। इसी प्रकार धर्म और राजनीति का गहरा संबंध है। जो देश के प्रति अपने कर्तव्यों से अपरिचित है, वह धर्म का अर्थ नहीं जानता। उनका कहना था, ‘कि आध्यात्मिक एवं धार्मिक नियम एक विशेष क्षेत्र में ही कार्य करते हों यह आवश्यक नहीं, यह जीवन के सभी क्षेत्रों में अभिव्यक्त होता है, यह आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में अपना प्रभाव डालता है। गांधीजी राजनीति को धर्म मूलक, धर्म प्राण तथा सत्य और अहिंसा के धार्मिक सिद्धांतों से ओत-प्रोत और संचालित किया जाने वाला मानते थे, वे राजनीति को धार्मिक क्षेत्र की भाँति आध्यात्मिक और पवित्र मानते थे। 

गांधीजी के चिंतन में मानवीयता एवं लोक कल्याणकारी प्रवृत्तियों की प्राधानता थी। वे भारतीयों की राजनीतिक पराधीनता तथा आर्थिक पराधीनता दोनों के लिए चिंतित रहा करते थे। आर्थिक पराधीनता से मुक्ति के लिए ही उन्होंने स्वदेशी आंदोलन का प्रसार किया। स्वदेशी आंदोलन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था, ‘स्वदेशी हमारे अन्तराल की वह भावना है जो कि हमको सुदूर की अपेक्षा हमारे निकटतम पर्यावरण के प्रयोग एवं सेवा के लिए प्रेरित करती हैं। वे प्रत्येक गाँव को उत्पादकता से जोड़ना चाहते थे। उनकी धारणा थी कि प्रत्येक गाँव की अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्वयं उत्पादन करना चाहिए। इसी संदर्भ में वे आर्थिक विकेन्द्रीकरण का भी पक्ष लिया करते थे। मशीनों द्वारा किए जाने वाले उत्पादनों की अपेक्षा वे लघु कुटीर उद्योग पर बल देते थे। आर्थिक क्षेत्र में उनके अनुसार यही स्वदेशी है। राजनीतिक एवं धार्मिक क्षेत्र में भी वे स्वदेशी के पक्षधर थे। अपने देश की राजनीतिक संस्थाओं को अपनाना और उनके विकास में सहयोग देना वे प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य समझते थे। 

गांधीजी के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आजीविका के लिए शारीरिक श्रम अवश्य करना चाहिए। वे बौद्धिक श्रम को महत्व नहीं देते थे। उनका मानना था कि शारीरिक श्रम से शरीर को ऊर्जा मिलती है साथ ही उससे उत्पादन भी होता है। श्रम की बचत करने वाले साधनों का उपयोग सीमित मात्रा में होना चाहिए। उनके अनुसार उत्पादन आवश्यकता की पूर्ति के लिए होना चाहिए, व्यापार या लाभ कमाने के लिए नहीं। इससे पूंजीवाद को बढ़ावा मिलता है जो अंततः शोषण को बढ़ावा देता है। 

सत्य और अहिंसा पर गांधीजी की अगाध श्रद्धा थी। उनकी नजर में सत्य पर दृढ़ रहना तथा अहिंसा के व्रत का पालन करना मानव जीवन का सबसे प्रमुख ध्येय है। हिंसा के मूल में स्वार्थ, क्रोध, द्वेष आदि तमाम बुराइयां होती हैं इसलिए ये त्याज्य हैं। अहिंसा का दृढ़ता से पालन करने वाला व्रती स्वार्थ और द्वेष का त्याग करके क्रोध पर विजय प्राप्त करता है। गांधीजी हिंसा को एक सीमा तक ही अनिवार्य मानते थे। स्वयं के शरीर के भरण पोषण के लिए, अपने आश्रितों की रक्षा के लिए तथा किसी के कष्ट के निवारण के लिए यदि हिंसा की जाती है तो यह स्वीकार्य है। इसके अतिरिक्त जीवन के हर व्यवहार में अहिंसा का पालन ही श्रेयस्कर है। गांधीजी के अनुसार अहिंसा के तीन प्रकार हैं—(क) कायर की अहिंसा, (ख) दुर्बल की अहिंसा (ग) वीर पुरुष की अहिंसा। गांधीजी इसमें तीसरे प्रकार की अहिंसा को सर्वश्रेष्ठ मानते थे। 

गांधीजी सत्य के लिए निछावर होने तक को तैयार रहते थे। समय-समय पर गांधीजी ने विकट राजनीतिक समस्याओं को सुलझाने के लिए सत्य का ही सहारा लिया। इसमें वे विजयी भी रहे। सत्य के लिए आग्रह अर्थात् सत्याग्रह गांधीजी का मुख्य अस्त्र था। दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी द्वारा शुरू किया गया आंदोलन, भारत में 1919 में रौलेट एक्ट के विरुद्ध चलाया गया असहयोग आंदोलन तथा 1930 में तथा बाद में उनके द्वारा चलाया गया सविनय अवज्ञा आंदोलन सभी में उनके सत्य के प्रति आग्रह का उद्बोध होता है। गांधीजी के सत्याग्रह के दो रूप हैं। (क) व्यक्तिगत (ख) सामूहिक। व्यक्तिगत सत्याग्रह व्यक्ति विशेष द्वारा अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है, जबकि सामूहिक सत्याग्रह किसी सार्वजनिक प्रश्न पर अनेक व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। 

वास्तव में गांधीजी ने विभिन्न समस्याओं से निपटने के लिए जिन उपायों अथवा साधनों का इस्तेमाल किया उनमें सत्याग्रह सबसे प्रमुख था। यह भी कहने में आज अतिश्योक्ति न होगी कि उनका यह विचार 21वीं सदी में भी पूरी तरह प्रासंगिक है। 1922 के आसपास जब सत्याग्रह से संबंधित उनका विचार पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था, उन्होंने कहा था- ‘मेरे पथ प्रदर्शन हेतु कोई सिद्धांत उपलब्ध नहीं है। सत्याग्रह की पूर्ण मीमांसा करने से मैं असमर्थ हूँ और अंधकार में टटोल कर चल रहा हूँ। यदि तुम्हें मेरे विचार रुचि कर लगें तो मेरे साथ चलो।’ 

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