गांधीवादी मूल्य और आज का भारत पर निबंध |Essay on Gandhian values ​​and today’s India

गांधीवादी मूल्य और आज का भारत पर निबंध

गांधीवादी मूल्य और आज का भारत पर निबंध |Essay on Gandhian values ​​and today’s India

गांधीजी आधुनिक युग में लोकनायक एवं युग-निर्माता के रूप में स्मरण किये जाते हैं. उन्होंने भारतमाता की सेवा में, विशेषकर विदेशी दासता की बेड़ियों से भारत को स्वतन्त्र कराने में अभूतपूर्व आत्मिक शक्ति का परिचय दिया. इस कारण उन्हें राष्ट्र निर्माता, राष्ट्रपिता आदि कहा जाता है. वे भारतवासियों के पूज्य बापू हैं. 

अपने आदर्शवादी एवं धार्मिक चिन्तन के कारण वह महात्मा गांधी कहे गये. उन्होंने राजनीति में नैतिकता का समावेश करके एक अद्भुत आदर्श प्रस्तुत किया. उनकी राजनीति में सत्य एवं अहिंसा की प्रमुख भूमिका रही. सत्य एवं अहिंसा पर निर्मित गांधीजी का जीवन दर्शन ‘गांधीवाद’ कहा जाता है, 

स्वराज्य विषयक उनकी परिकल्पना ‘रामराज्य’ सदृश लोकहितकारी राज्य पर आधारित थी. उनकी स्वराज्य सम्बन्धी मान्यता इस प्रकार है- “मुझे आशा है कि स्वराज्य कुछ व्यक्तियों के सत्ता पर अधिकार प्राप्त करने से प्राप्त नहीं होगा, वरन् स्वराज्य उस समय होगा जब सभी व्यक्तियों में इतनी शक्ति आ जाये कि वे सत्ता का दुरूपयोग होने पर सत्ताधारियों का विरोध कर सकें. दूसरे शब्दों में, स्वराज्य की प्राप्ति उस समय होगी, जब जनता को इतना शिक्षित कर दिया जाये कि वे सत्ता का सदुपयोग, सन्तुलन एवं नियन्त्रण कर सकें.”

गांधीजी भारत की सर्वतोन्मुखी उन्नति चाहते थे. राजनीतिक स्वतन्त्रता तो उनके निकट एक सोपान अथवा साधन मात्र थी. भारत में श्रेष्ठ एवं सुखी समाज की स्थापना के लिए उन्होंने सर्वोदय आन्दोलन का प्रवर्तन किया. सादगी, अहिंसा, श्रम की पवित्रता, मानवीय मूल्य तथा ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त उनके जीवन दर्शन एवं उनकी कल्पना की आर्थिक व्यवस्था के प्रमख अंग हैं. गांधीजी ने भौतिक शक्ति के ऊपर आत्मबल की प्रधानता में आस्था प्रकट की. उन्होंने सत्य और अहिंसा सम्बन्धी प्रयोग करके मनुष्य का आचरण बदलने का प्रयास किया. 

गांधीवाद के प्रमुख सिद्धान्त एवं उसकी मान्यताएँ 

गांधीवाद एक गतिशील एवं विकासवादी जीवन-दर्शन है. उसको किसी निश्चित सिद्धान्त की सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता है. लुई फिशर के शब्दों में, “गांधीजी एक स्वच्छन्द एवं निर्बाध चिन्तनधारा वाले व्यक्ति हैं.” यद्यपि ‘गांधीवाद’ किसी ‘वाद’ विशेष के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है, तथापि उसमें वे समस्त विशेषताएँ हैं जो एक ‘वाद’ के लिए आवश्यक हैं. यह एक सुनिश्चित जीवन-दर्शन है. सत्य और अहिंसा इस जीवन दर्शन के सार अथवा मूल तत्त्व हैं, जीवमात्र में एक ही आत्मा व्याप्त है, यह ‘सत्य’ है. इसका व्यावहारिक रूप ‘प्रेम’ या ‘विश्व बन्धुत्व’ है जो अहिंसामूलक है. सिद्धान्त रूप में जो सत्य है, व्यवहार रूप में वह अहिंसा है. सत्य निर्गुण रूप है और अहिंसा सगुण रूप है. दोनों एक ही परम तत्व के दो पक्ष हैं. अहिंसा का मार्ग प्रेम का मार्ग है जो प्रेम पात्र से किसी प्रकार का प्रतिदान नहीं चाहता है. अहिंसा का पुजारी केवल बलिदान एवं त्याग करना जानता है. अनेक बाधाओं के बावजूद वह अपने मार्ग पर अविचल भाव से अग्रसर रहता है. इसी कारण वह सत्याग्रही है. सत्याग्रही की कभी हार नहीं होती है, क्योंकि उसमें स्वार्थ सिद्धि का दुराग्रह लेशमात्र भी नहीं होता है. वह तो केवल सत्यानुभूति के आग्रह द्वारा अनुप्राणित रहता है और प्रेम के मार्ग पर अग्रसर होता रहता है. 

गांधीवाद में अहिंसा, साधन और साध्य दोनों ही हैं. अहिंसा के मार्ग में पवित्र साध्य के लिए पवित्र साधन अपेक्षित हैं. साध्य की प्राप्ति साधनों की उपयुक्तता को सिद्ध नहीं करती है. एक बार गांधीजी ने कह दिया था कि “हिंसा द्वारा प्राप्त स्वराज्य मुझे ग्राह्य नहीं होगा.” 

सत्य और अहिंसा पर आधारित उन्होंने आदर्श राज्य ‘रामराज्य’ की परिकल्पना की थी. वह राज्य वस्तुतः मानवतावादी शासन व्यवस्था होगी, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति इतना संयमशील एवं आत्मानुशासित होगा कि राज्य को कानून की आवश्यकता ही न रह जायेगी. उनकी मान्यता थी कि वह राज्य सर्वश्रेष्ठ है जो कम से कम राज (शासन) करे— ‘That govern ment is the best which governs the least.” 

गांधीजी ने आदर्श समाज के निर्माण के लिए विकेन्द्रीकरण की नीति का प्रतिपादन किया. शासन के क्षेत्र में ग्राम पंचायत व्यवस्था तथा अर्थ के क्षेत्र में कुटीर उद्योग उन्हें मान्य थे. चर्खा उनकी विकेन्द्रीकृत आर्थिक व्यवस्था का प्रतीक है. इतना ही नहीं गांधीजी हिन्दू समाज की वर्ग-व्यवस्था के अनुरूप वंशानुगत उद्यम के पक्ष में थे. उनका मत था कि इस सिद्धान्त का पालन करने से आर्थिक जीवन में प्रतिस्पर्धा का भाव नष्ट होता है तथा समाज में स्थिरता आती है. इस व्यवस्था का एक अतिरिक्त लाभ यह होता है कि बच्चों को अपने उद्यम का स्वाभाविक प्रशिक्षण प्राप्त होता है और तकनीकी प्रगति होती है. 

समाज में शोषण समाप्त करने के लिए गांधीजी अस्तेय एवं ट्रस्टीशिप के सिद्धान्तों की आवश्यकता पर बल देते हैं. उनकी मान्यता थी कि सच्ची सभ्यता जान-बूझकर आवश्यकताओं को घटाने में है, उन्हें बढ़ाने में नहीं. उनकी यह भी धारणा थी कि हृदय परिवर्तन की नीति अपनाकर हम पूँजीपतियों को इस बात के लिए राजी कर सकते हैं कि वे अपनी सम्पत्ति को समाजोपयोगी कार्यों में लगायें. सच्चा समाजवाद समाजधर्मी हो सकता है. समाज-वितरण की प्रक्रिया ट्रस्टीशिप के सिद्धान्त द्वारा ही सम्भव है. 

गांधीजी टॉलस्टॉय के ‘रोटी के लिए श्रम’ वाले सिद्धान्त के बहुत प्रबल समर्थक थे. इस सिद्धान्त का अर्थ यह है कि प्रत्येक स्वस्थ मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए शारीरिक श्रम करना चाहिए. यह नियम बुद्धिजीवियों पर भी लागू होता है. ‘रोटी के लिए’ श्रम का सिद्धान्त जनता को आत्मनिर्भर और निर्भीक बनायेगा तथा उसमें सत्ता के दुरुपयोग का विरोध करने की शक्ति उत्पन्न करेगा. सारांश रूप में हम कह सकते हैं कि गांधीवाद के प्रमुख तत्त्व हैं—विकेन्द्रीकरण, आर्थिक वर्ण व्यवस्था, अस्तेय, ट्रस्टीशिप, रोटी के लिए श्रम सिद्धान्त तथा राज्यहीन समाज. इन सिद्धान्तों का पालन गांधीजी के अहिंसात्मक राज्य को एक आध्यात्मिक लोकतन्त्र का स्वरूप प्रदान करेंगे जिसमें व्यक्ति को सर्वोच्च स्थान प्राप्त होगा.

गांधीवादी विचारधारा की व्यावहारिक उपयोगिता और भारत 

आज गांधीजी के सिद्धान्तों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है, परन्तु इसके साथ यह भी एक तथ्य है कि कुछ लोग उनके सिद्धान्तों के प्रति शंकालु और संदेहशील होकर यहाँ तक कह बैठते हैं कि गांधीवादी विचारधारा अब सन्दर्भ के बाहर की वस्तु हो गई है. उसके द्वारा हमारे समाज के हित साधन की कोई सम्भावना नहीं है, उसे तो कहीं किसी गहरे गड्ढे में दफना दिया जाना चाहिए. इसी मनोवृत्ति को लक्ष्य करते हुए यह लोकोक्ति चल पड़ी है कि “मजबूरी का नाम महात्मा गांधी.” हमारी धारणा यह है कि गांधीवाद को ठीक तरह एवं गम्भीरतापूर्वक समझने का प्रयत्न बहुत कम लोगों ने किया है. हम विदेशों की बात न करके भारत के सन्दर्भ में यह कह सकते हैं कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त गांधीवादी विचारधारा के प्रति बहुत कुछ उपेक्षा का वातावरण बन गया था और उसको व्यवहार में लाने का बहुत कम प्रयत्न किया गया है. गांधीवाद हमें जीवन के कुछ मूल्य ही नहीं देता है, बल्कि व्यावहारिक जीवन का तर्कपूर्ण एवं न्यायसंगत मार्ग भी बताता है. 

गांधीवाद सत्यानुभव पर आधारित है और जीवमात्र में वह शुद्ध बुद्ध आत्मा का दर्शन करता है तथा जीवन में आध्यात्मिकता एवं नैतिकता को प्रमुख स्थान देता है. प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी सत्य है और उसको जीवन में ढालना उसका धर्म है. आत्मानुभूत सत्य के अनुसार आचरण करना मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है. इस प्रकार गांधीवाद हमें निर्भय होकर धर्माचरण का सन्देश देता है. आत्मविकास के लिए मानव सदा से भय से मुक्ति और स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए संघर्ष करता आया है. हम यदि समझते हैं कि जीवन में प्रेम, विश्व-मैत्री, अपरिग्रह, निर्भयता, मानवता, स्वतन्त्रता आदिक उदात्त गुण हैं तो हम सहज ही स्वीकार करते हैं कि विश्व को विशेषकर भारत को गांधीवाद की आवश्यकता है. 

युद्ध संकुलित इस युग में प्रत्येक देश विश्व शान्ति का स्वप्न देखता है. इस स्वप्न को साकार करने का एक ही रास्ता है कि हम गांधीवादी अहिंसा को अपनाएँ तथा सब प्रकार के भय और अविश्वास से अपने आपको मुक्त करें. अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही हम न्यूक्लियर अस्त्रों तथा उनके द्वारा जनित आतंक से मुक्त हो सकते हैं. वर्तमान काल में प्रत्येक राष्ट्र निरस्त्रीकरण की बात तो करता है, परन्तु उसके पीछे राजनीतिक दाँव-पेंच रखता है. राजनीति की भाषा न बोलकर यदि हमारे कर्णधार प्रेम के मार्ग पर चलें तो हमारी अनेक समस्याएँ सहज ही सुलझ सकती हैं. 

गांधीजी द्वारा प्रतिपादित सत्य व अहिंसा के मार्ग पर चलकर नीग्रो गांधी मार्टिन लूथर किंग नीग्रो समाज को अपने मौलिक अधिकार दिलाने में सफल हुए. नेल्सन मण्डेला 26 वर्षों तक जेल में रहने के उपरान्त दक्षिण अफ्रीका में लोकतन्त्रीय सरकार बनाने में सफल हुए हैं. स्पष्ट है कि गांधीवाद द्वारा लोकतन्त्र सुरक्षित रखा जा सकता है. व्यक्ति को महत्त्व प्रदान करके ही लोकतन्त्र का नाम लेने के अधिकारी बन सकते हैं, सत्य और अहिंसा से रहित लोकतन्त्र का भविष्य सर्वथा अरक्षित ही समझना चाहिए. 

आज का मात्र भौतिक एवं ऐहिक आवश्यकतापूर्ति के जीवन को देखकर हम समझ बैठे हैं कि भौतिक उन्नति ही हमारे जीवन का सर्वस्व है, परन्तु हमें यह भी स्मरण कर लेना चाहिए कि भौतिक दृष्टि से सर्वाधिक उन्नत एवं समृद्ध देशों के निवासी जीवन में घुटन और बेचैनी अनुभव करने लगे हैं. साम्यवाद और पूँजीवाद सदृश भौतिकवादी जीवन-पद्धतियों से ऊबकर वहाँ बौद्धिक व्यक्तियों ने ‘विश्व संस्कृति सम्मेलन’ की स्थापना की. वे ऐसी संस्कृति की खोज में हैं जो भौतिकवाद से उत्पन्न समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सके. बीटल्स, वीटनिक्स, हिप्पी, क्रोधित युवा पीढ़ी हरे राम हरे कृष्ण आदिक आन्दोलन भौतिकवादी संस्कृति के प्रति विद्रोह एवं असन्तोष प्रकट करते हुए जिस आत्मिक सुख-शान्ति को खोजते हैं, उसे गांधीवादी चिन्तन सहज रूप में प्रदान करता है. हमारे विचार से गांधीवाद की जितनी आवश्यकता आज के भौतिकता प्रधान युग में है, वैसी आवश्यकता पहले कभी नहीं थी. भारत यदि गांधीवादी अर्थनीति को अपना ले, तो उसका आर्थिक संकट सहज ही दूर हो सकता है. 

गांधीजी ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध नीति-नैतिकता समन्वित अहिंसा की नीति को आधार बनाकर आन्दोलन चलाया, उन्होंने अंग्रेजी शासन का विरोध किया और अंग्रेजों के प्रति मैत्रीपूर्ण व्यवहार किया. विशेषता यह रही कि सद्भाव की नीति पर चलते हुए उन्होंने सफलता प्राप्त की तथा भारत को स्वतन्त्रता दिला दी. यह एक ऐसा प्रयोग था जिसे देखकर विश्व चकित रह गया है. विश्व-कल्याण के प्रति जागरूक विचारक यह अनुभव करते हैं कि 

गांधीवादी सिद्धान्तों को अपनाकर ही हम समस्त अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को सुलझा सकते हैं. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने विश्व शान्ति के लिए जिस ‘पंचशील’ सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था, वह गांधीवादी चिन्तन का ही पूर्व रूप है, जो हमें बुद्ध और महावीर की विचार परम्परा से प्राप्त हुआ है. इस सिद्धान्त को क्या हम राष्ट्रीय स्तर पर प्रयोग में नहीं ला सकते हैं ? 

गांधीजी की परिकल्पना का ‘रामराज्य’ आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) का आदर्श रूप प्रस्तुत करता है. उनका सर्वोदय आन्दोलन सर्वतोन्मुखी उन्नति का सन्देश देता है. वह सप्तपर्णी उन्नति का अग्रदूत है— स्वास्थ्य, सम्पत्ति, साहित्य, सभ्यता, संस्कृति, सद्बुद्धि और सद्भावना. ऐसा कौनसा देश अथवा काल होगा जहाँ सर्वोदयी सुख समृद्धि को स्पृद्धा की दृष्टि से नहीं देखा जायेगा ? 

गांधीजी का कहना था कि हमारे उद्योग मानव प्रधान होने चाहिए न कि मशीन प्रधान, वह मानव को ‘Commercial Unit’ (व्यावसायिक इकाई) न मानकर आध्यात्मिक प्राणी (Spiritual animal) मानते थे. उनका स्पष्ट मत था कि मशीनों के कारण उत्पादन की मात्रा तो बढ़ती है, परन्तु मानव के श्रम का महत्व कम होता है. औद्योगिक विकेन्द्रीकरण को लक्ष्य करके गांधीजी ने ग्रामोत्थान का आन्दोलन चलाया और कुटीर उद्योग-धन्धों वाली अर्थनीति पर बल दिया. यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार उत्पादन करे तो आर्थिक शोषण एवं बेकारी की समस्याओं का अन्त स्वयमेव हो जाये. जापान का उदाहरण हमारे सामने है. वहाँ प्रत्येक व्यक्ति उत्पादन करता है. परिणामतः वह समस्त औद्योगिक जगत् पर छा गया है और एक समृद्ध देश बन गया है. यदि हमारा प्रत्येक गाँव आर्थिक दृष्टि से एक स्वतन्त्र इकाई हो तथा हमारी ग्राम पंचायतें शक्तिशाली हों, तो हमारा देश वर्ग-संघर्ष, तालाबन्दी, हड़ताल आदिक अनेक अभिशापों से सहज ही छुटकारा पा जाए. श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा प्रवर्तित बीस सूत्रीय कार्यक्रम की जड़ें, गांधीवादी चिन्तनधारा से ही रस ग्रहण करती हैं. 

गांधीवाद जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हृदय परिवर्तन द्वारा स्थायी विकास का मार्ग दिखाता है और मानवीय मूल्य के आधार पर प्रत्येक समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है. गांधीवाद नवीन व्यक्ति और नवीन समाज के निर्माण का जीवन दर्शन है. मार्क्सवादी खूनी क्रान्ति का विकल्प हमें गांधीवादी विकासशील क्रान्ति के मार्ग में उपलब्ध होता है. मानव की एकता एवं समानता का सन्देश प्रदान करने वाली गांधीवादी जीवन-पद्धति हमारा कल्याण कर सकती है. गांधीवादी सिद्धान्तों एवं आदर्शों पर चलकर ही विश्व शांति का स्वप्न साकार किया जा सकता है.

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