भारत का भविष्य पर निबंध |Essay on future of India

भारत का भविष्य पर निबंध |Essay on future of india

भारत का भविष्य पर निबंध |Essay on future of india

देश में चेतना आई है. नवजीवन का संचार हुआ है और अपने अतीत के संरक्षण और भविष्य को उज्ज्वल बनाने की आकांक्षाएं पल्लवित हुई हैं. हम सार्वभौम विकास की धारा के साथ देश को जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं. भारत अब अपने को संकुचित भौगोलिक सीमाओं में बाँधकर कुआँ का मेढक नहीं बना रहना चाहता है, बल्कि उसकी चेतना विश्वव्यापी हुई है. 

अमरीका में एक आर्थिकी विशेषज्ञ लेंडन एच लोराम ने भारत के भविष्य पर कम्प्यूटर के आधार पर सही और सार्थक भविष्यवाणी की है. उनका कहना है कि भारत अन्यान्य साधनों की दृष्टि से समृद्ध है ही, अपितु अपने प्रखर प्रतिभाशाली युवा बुद्धजीवियों के कारण भी वह सांस्कृतिक, आर्थिक और भौतिक आदि सभी क्षेत्रों में ‘सुपर पावर’ बनकर रहेगा. लेखक ने अपने कम्प्यूटर द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों में 1995 से 2005 तक, के दस वर्ष के मध्य अनेक राजनीतिक उथल-पुथलों का संकेत करते हुए कहा है कि “अगले कुछ वर्षों में राजनीतिक उथल-पुथल के बाद आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न, तेजस्वी एशिया और फिर सारे विश्व में महाशक्तियों का अगुआ बनकर भारत मार्गदर्शन करेगा.” 

बीसवीं शताब्दी के बाद भारत पर दृष्टि डालने की पृष्ठभूमि में यह कथन सर्वथा समीचीन है, क्योंकि वर्तमान में देश की जो दशा है उसके अनुसार देश में आध्यात्मिक शक्तियों का समन्वय हो रहा है. और वे शक्तियाँ संगठित होकर भारत के सर्वांगीण विकास की दिशा में सक्रिय हो रही हैं. यह चिन्तन एक पक्षीय, एक मजहब या एक पंथ मात्र का न होगा, अपितु समूचा विश्व एक परिवार के रूप में विकसित होगा. मात भावना जन-जन को आन्दोलित करेगी और धर्म का सच्चा स्वरूप प्रतिष्ठित होगा. 

विचारकों के अनुसार बीज अंकुरित होकर ही धीरे-धीरे वृक्ष की संज्ञा पाता है. वर्तमान में देश जिन परिस्थितियों से गुजर रहा है और जो विचार अंकुरित हो रहे हैं, उनसे स्पष्ट है कि भारत के जीवन में दूरदर्शी, विवेकशीलता, उचित-अनुचित निर्धारण करने की समझ, आदर्शों की पक्षधारिता तथा संवेदना का अंकुरण होने लगा है. हमारा विश्वास है कि भ्रष्टाचार, शोषण, पारस्परिक दुराव, जातिपाँति, धर्म व भाषा क्षेत्र की दूरियाँ कम होंगी. और इस शताब्दी के पश्चात् आने वाली शताब्दी नई किरण एक नया सवेरा लाकर भारत में समाज को स्वस्थ और सन्तुलित परिवेश देने में समर्थ होगी. 

‘टाइम्स’ पत्रिका में ‘सुपर इण्डिया द नैक्स्ट मिलैटरी पावर’ शीर्षक से प्रकाशित लेख में बताया गया है- कि “पिछले कुछ वर्षों में भारतवर्ष इतनी तेजी से एक महाशक्ति के रूप में उभरकर आया है कि अब रूस, चीन, अमरीका, फ्रांस जैसी शक्तियाँ उसकी उपेक्षा नहीं कर सकतीं.” 

यह कथन देश की सुरक्षा का संकेत देता है. हम जानते हैं कि भारत तभी जीवित रह सकेगा, जब उसकी संस्कृति जीवित रहेगी. हमारे देश की भूमि, जन एवं संस्कृति तीनों मिलकर ही राष्ट्र और राष्ट्रीयता का निर्माण करते हैं. इसलिए यह आवश्यक है कि हम जन-जन में राष्ट्रीय भावना जाग्रत करें, भारत के लोकतंत्र की व्यवस्था में जल, थल एवं नभ, तीनों प्रकार की सेनाएं पूर्ण रूप में अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्र आयुधों से सुसज्जित हैं|

भारत की कृषि और हमारी संस्कृति दोनों ही का आधार सहकारिता है. पश्चिमी देशों में पूँजीपतियों की पूँजी पर नियंत्रण रखने और जन-सामान्य का शोषण करके उन्होंने जो धन अर्जित किया है उसे फिर जन-सामान्य के उपयोग में लाने के लिए बैंक खोले गए हैं. भारत में भी बैंकों का विस्तार तेजी से हुआ है, किन्तु आगामी शताब्दी में भारत की कृषि और उद्योगों का विकास सहकारिता के आधार पर होगा. 

हमारे देश में लोकतंत्र है. लोकतंत्र की सफलता तभी सम्भव है, जब हमारे प्रशासन में लोक की अर्थात् समाज के अन्तिम व्यक्ति तक की भागीदारी सुनिश्चित हो. 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने कृषि एवं उद्योग क्षेत्रों में उल्लेखनीय उन्नति की है और हम विज्ञान के क्षेत्र में आत्म-निर्भर हो गए हैं. प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में भी हमने आशातीत उन्नति की है. विज्ञान के क्षेत्र में हमने आश्चर्यजनक प्रगति की है. परमाणु शक्ति, नाभिकीय ऊर्जा एवं अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्रों में भारत आज विश्व के देशों में अग्रणी पंक्ति में खड़ा है. 

हमने, अस्पृश्यता, जातिवाद आदि अनेक क्षेत्रों में करीतियों को समाप्त कर दिया है, परन्तु आरक्षण एवं वोट की राजनीति ने जातिवाद, क्षेत्रवाद व अलगाववाद को बढ़ावा दे दिया है. प्रसन्नता की बात है कि प्रबुद्ध जन इन बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाने लगे है. यह दुःख की बात है कि राष्ट्रभाषा हिन्दी को राजभाषा के पद पर बैठाने के लिए हमें अभी तक हिन्दी दिवस का आयोजन करना पड़ता है. 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विगत 52 वर्षों में हमने लोक को पीछे छोड़ दिया है और तंत्र लोक पर हावी हो गया है. भारत के निवासी अब अनुभव करने लगे हैं कि भारत की लोकतंत्रीय व्यवस्था में जब तक लोक की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी तब तक लोकतंत्र की सफलता और उसका लाभ देश के अन्तिम व्यक्ति तक पहुँचना सम्भव नहीं है. इसलिए हर गाँव में ग्राम सभाएं बनाई जा रही हैं और गाँव की व्यवस्था उन्हीं ग्राम सभाओं को सौंपी जा रही हैं. अब देश की जनता अपने वोट का मूल्य पहचानने लगी है. और ग्राम समितियाँ ग्राम स्वायत्तता के लिए कार्य करेगी और इस प्रकार राजनीतिक वर्तमान ढाँचा टूटेगा. और उसके द्वारा होने वाले शोषण का अन्त हो सकेगा. यहाँ आवश्यकता यह भी है कि पंचायतों के संगठित होने के बाद सत्ता में अनुभवी और ईमानदार लोग ही भेजे जा सकेंगे. राज्य में विधान मण्डलों के लिए सदस्यों का चुनाव गाँव व शहर की लोक समितियों के भी चुनाव सर्वसम्मति से होंगे और इस प्रकार राज्य की विधान सभा की बुनियाद मजबूत होगी. इस प्रकार बनी राष्ट्रीय सरकार स्थायी होगी. जनहित के कार्य करेगी और लोकतंत्र की नींव मजबूत होगी. 

व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के जीवन निर्माण का कार्य शिक्षा द्वारा ही सम्भव है. आज हमारे देश में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक क्रान्ति की आवश्यकता अनुभव की जा रही है उसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में भी क्रान्ति अपेक्षित है. आज की शिक्षा एकांगी और बौद्धिक व्यक्तित्व को बनाने का कार्य कर रही है, जिससे अखण्ड व्यक्तित्व का निर्माण नहीं हो पा रहा है. समग्र व्यक्तित्व के निर्माण के लिए शरीर-बल, मनोबल, बुद्धि-बल और भावनात्मक बल इन चारों की आवश्यकता है. आज की शिक्षा, किताबी शिक्षा देकर बालक की बुद्धि विकसित करने का कार्य कर रही है, किन्तु मानसिक और भावनात्मक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति का निर्माण नहीं हो पा रहा है. इसका प्रतिफल है कि हमारे हृदय संवेदन शून्य होते जा रहे हैं. बुद्धि से समस्याओं का हल खोजना चाहते हैं, किन्तु हमारी अन्तर-दृष्टि विकसित नहीं हो सकी है. इसलिए हम शिक्षा का ऐसा स्वरूप निर्धारित करें जो हमें श्रम के साथ जोडे, अर्थ की प्राप्ति कराए तथा हमें सद-सरकार देकर सभी के प्रति प्रेम सद्भाव विकसित करने में सफल हो. 

हम 21वीं शताब्दी में प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं. इसका अर्थ है कि 20वीं शताब्दी आखिरी साँस ले रही है और नई शताब्दी का शुभागमन होने वाला है. वस्तुतः यह समय सन्धि की बेला है, संस्कृति काल है. 

ऐसे समय में सृजन शिल्पियों को सजग रहना है. समाज में पुरुषार्थ को जगाना है. सामर्थ्य, दक्षता और प्रखरता का उपयोग करना है. श्रम के प्रति निष्ठा एवं पारस्परिक सहकारिता को प्रोत्साहन देना है. विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय करना, सेवा, साधना, ईमानदारी और उच्च मानसिकता आदि द्वारा अपने वर्तमान को बाँधे, उसमें परिष्कार करें और दो वर्ष बाद बीसवीं सदी का अन्त और नई शताब्दी का आगमन शुभ हो. इस भाव को साकार करने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो भारत को विश्व मंच पर एक सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित कर देंगे. 

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