मित्रता पर निबंध | Essay On Friendship In Hindi

मित्रता पर निबंध

मित्रता पर निबंध-Essay On Friendship In Hindi

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में अनेक संबंध स्थापित करके जीता है; यथा-माता-पिता, चाचा-चाची, भाई-बहन आदि। इन सारे संबंधियों से वह सभी प्रकार की बातें नहीं कर सकता, क्योंकि इन संबंधों की अपनी-अपनी सामाजिक मर्यादा निर्धारित है। ऐसी स्थिति में उसे एक ऐसे संबंध की आवश्यकता होती है, जिसके सामने वह अपने आपको नि:संकोच स्पष्ट कर सके, खुले दिल से बात कह सके और अपने सुख-दुख की चर्चा कर सके। ऐसा संबंध ही ‘मित्रता’ कहलाता है। कहा जाता है कि जो बात मां अथवा पत्नी नहीं जानती, वह मित्र जानता है। 

मित्रता ईश्वरीय देन है, जो दो समान विचारधारा वाले व्यक्तियों के बीच स्वतः स्थापित हो जाती है। जाति-धर्म, रूप-रंग एवं धन-संपदा मित्रता के मार्ग में कभी बाधक नहीं होते। अगर ऐसा होता, तो कृष्ण और सुदामा में मित्रता नहीं होती। मित्रता स्थापित होने के लिए दोनों के बीच खोटा स्वार्थ भी नहीं होना चाहिए। मित्रता तो दो हृदयों का निष्काम गठबंधन है। एक इजरायली ने कहा है, “मित्रता देवी है और मनुष्य के लिए बहुमूल्य वरदान।” 

प्रसिद्ध दार्शनिक सिसरो ने लिखा है, “इस संसार में मनुष्य के लिए मात्र मित्रता से अधिक कुछ नहीं है।” 

मित्रता की पहचान आपातकाल में होती है। जो मित्र दुख में तन, मन और धन से साथ दे, वही सच्चा मित्र है। गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं 

धीरज धर्म मित्र अरु नारी। 

आपत्काल परखिये चारी॥

एक सच्चा मित्र दूध में मिले पानी की तरह होता है, जो दूध के जलने से पहले खुद ही जलने लगता है। अंग्रेजी में एक प्रसिद्ध कहावत है- 

A friend in need, 

Is a friend indeed.

अर्थात जो मनुष्य आवश्यकता में खरा उतरे, वही सच्चा मित्र है। 

भारतीय इतिहास तो आदर्श मित्रों के उदाहरणों से भरा पड़ा है। कृष्ण सुदामा, कृष्ण-अर्जुन, कर्ण-दुर्योधन, राम-सुग्रीव और राम-विभीषण की मित्रता इतिहास प्रसिद्ध है। बालसखा सुदामा की दरिद्रता देखकर तीनों लोकों के स्वामी श्रीकृष्ण अपने आंसुओं से उनका पद-प्रक्षालन करते हैं और उन्हें अतुल संपदा प्रदान करते हैं। श्रीकृष्ण अपनी गरिमा भूल मित्र अर्जुन का सारथी बनकर रथ संचालन करते हैं। कर्ण की मित्रता का क्या कहना, जो मित्र दुर्योधन के लिए अपने भाइयों को भी मारने के लिए तैयार हो जाता है। सुग्रीव को कष्ट में देखकर भगवान श्रीराम उद्घोषणा करते हैं- 

जे न मित्र दुःख होंहि दुखारी। 

तिनहिं विलोकत पातक भारी॥

प्रभु श्रीराम बाली को मारकर मित्र सुग्रीव को उसका खोया राज दिलाते हैं और विभीषण की रक्षा में अपनी जान की बाजी लगा देते हैं 

तुरत विभीषण पाछे मेला। 

सन्मुख राम सहेउ सो सेला॥

मित्रता जितनी बहुमूल्य है, उसे बनाए रखना भी उतना ही कठिन है। मित्रता को स्थिर और सुदृढ़ रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है| 

उदारता और सहिष्णुता की। प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ कमी रहती है। पूर्ण निर्दोष और गुण संपन्न व्यक्ति कोई भी नहीं होता, अतः मित्र के अवगुणों पर ध्यान नहीं देना चाहिए, अन्यथा दोष दर्शन और एक-दूसरे पर छींटाकसी से मित्रता में दरार पैदा होने का भय बना रहता है। चाणक्य नीति’ के अनुसार मित्र से तर्क आदि करना, उधार लेना-देना और उसकी स्त्री से अकेले में बातचीत करना—ये तीनों बातें मित्रता में बिगाड़ पैदा कर देती हैं। 

आज भौतिकतावादी युग है। इस युग में सच्चा मित्र मिलना कठिन है। अधिकांशतः मित्र अपना उल्लू सीधा करने के लिए मित्रता का स्वांग रचते हैं और अपना काम बन जाने के बाद अंगूठा दिखाकर चले जाते हैं। ऐसे मित्र सामने तो प्रिय बोलते हैं, लेकिन पीठ पीछे विष-वमन करते हैं। अतः शास्त्रों का मत है कि जो मित्र सिर्फ मुख में अमृत वाला और संपूर्ण भाग विष से भरे घट वाला होता है, वह पूर्णतः त्याज्य है। गोस्वामी तुलसीदास इसी भाव से लिखते हैं 

आगे कह मृदु वचन बनाई, पीछे अनहित मन कुटिलाई।

जाकर चित अहि गति सम भाई, अस कुमित्र परिहरहिं भलाई।

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