प्रेस की स्वतंत्रता पर निबन्ध | Essay on Freedom of the Press in Hindi

प्रेस की स्वतंत्रता पर निबन्ध

प्रेस की स्वतंत्रता पर निबन्ध |Essay on Freedom of the Press in Hindi

प्रेस या समाचार-पत्र प्रजातंत्र शासन प्रणाली की आधार शिला है। 18वीं शताब्दी के अंत में इंग्लैंड के महान प्रवक्ता एडमंड बर्क ने समाचार-पत्रों को ‘फोर्थ स्टेट’ की संज्ञा दी थी। उनके अनुसार शासन को संचालित करने वाली शक्तियों में ‘किंग’, पार्लियामेंट’ तथा ‘चर्च’ के बाद प्रेस’ का ही स्थान है। 

प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली में संसद, कार्य पालिका तथा न्याय पालिका के बाद समाचार-पत्रों को शासन-संचालन की प्रमुख शक्तियों के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। वस्तुतः समाचार-पत्र जनता जनार्दन के अधिकारों के सजग प्रहरी होते हैं। जनता के अधिकारों को हड़प लिए जाने पर प्रजातंत्र तानाशाह बनकर रह जाता है। समाचार-पत्र जनता के समस्त अधिकारों को दिलाने के लिए आवाज उठाते रहते हैं, जनमत बनाते हैं और अंततः शासन को विवश करते हैं कि वह जनमत की उपेक्षा न करे। 

प्रजातंत्र प्रणाली में समाचार-पत्र तभी अपनी वास्तविक भूमिका निभा सकते हैं, जब उन्हें समाचार प्रकाशन की पूर्ण स्वतंत्रता हो। यदि ऐसा न हो, तो वे सरकार के किसी गलत कदम की आलोचना नहीं कर सकेंगे और न ही जनता के हितों की रक्षा करने में सफल होंगे। 

इसके अलावा समाचार-पत्र अपने गंभीर दायित्व को पूरा करने में भी असमर्थ रहेंगे। क्योंकि जब उन्हें वरण की स्वतंत्रता नहीं होगी, तब किसी भी प्रकार का दायित्व उन पर कैसे थोपा जा सकेगा। स्वतंत्रता का अपहरण न्याय पालिका को आहत करता है और कार्य पालिका की निरंकुशता बढ़ाता है। 

प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली में समाचार-पत्र चौथा स्तंभ है। किंतु उस पर शेष तीनों स्तंभों को चुस्त-दुरुस्त और ईमानदार रखने का गुरुतर दायित्व है। प्रजातंत्र का पहला शक्ति स्तंभ संसद है। संसद में जनता के प्रतिनिधि चुनकर आते हैं। चुनाव में योग्य सांसद चुनकर आएं, इसमें प्रेस की बड़ी भूमिका होती है। प्रेस ही देशभक्त, निःस्वार्थ एवं ईमानदार प्रत्याशी के विषय में सही-सही जानकारी देकर जनता का मार्गदर्शन कर सकता है तथा देश को भ्रष्ट और धन लोलुपों के शिकंजे से बचा सकता है। यही नहीं, संसद में होने वाले निर्णयों को भी प्रेस प्रभावित करने में समर्थ होता है। 

यदि प्रेस देशहित को सर्वोपरि स्थान दे, तो वह संसद को देशहित में कार्य करने और कानून बनाने में मदद कर सकता है। इसी प्रकार प्रेस कार्य पालिका को भ्रष्ट होने से बचा सकता है। यदि मंत्रिपरिषद का कोई मंत्री भ्रष्ट हो, तो प्रेस खोजी पत्रकारिता का सहारा लेकर उसके देश विरोधी या काले कारनामों को उजागर कर सकता है। उदाहरणार्थ-पैसे लेकर संसद में प्रश्न पूछने वाले कई मंत्रियों की पहचान करने में प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 

 यह सब तभी हो सकता है, जब प्रेस को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो। किंतु यह स्मरण रखना होगा कि प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ उसका पूर्णतः उच्छृखल हो जाना नहीं है। अनियंत्रित प्रेस किसी भी प्रजातंत्र के लिए घातक हो सकता है। वैसे तो प्रेस किसी उद्योगपति के हाथ में होता है या सरकार के। यदि प्रेस का स्वामी कोई उद्योगपति है, तो वह पहले उद्योगपतियों के हितों की रक्षा करेगा तथा उद्योगपतियों पर किसी भी प्रकार की आंच आने वाले समाचारों को नहीं छापेगा। यदि समाचार-पत्र सरकार का है, तो उसमें सरकारी उपलब्धियां अधिक होंगी। उसमें सरकार की कमियों तथा गलतियों को उजागर नहीं किया जाएगा। ऐसी स्थिति में हम प्रेस की स्वतंत्रता का डंका पीटते रहें, परंतु प्रेस स्वतंत्र नहीं होगा। ‘स्वतंत्रता की रक्षा’ प्रेस तभी कर सकता है, जब वह व्यक्ति-हित अथवा किसी राजनीतिक दल विशेष या किसी वर्ग विशेष के हितों को तिलांजलि देकर जनहित में कार्य करने का संकल्प ले। 

प्रेस की स्वतंत्रता का आशय संपादक की स्वतंत्रता से है। यदि संपादक को लगता है कि सच्चाई के उद्घाटन से उसकी नौकरी जा सकती है, तो वह उस सच्चाई की छिपा सकता है। यद्यपि ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है कि संपादकों ने केवल अपनी आजीविका की चिंता नहीं की, प्रत्युत देश और लोकहित में अपने प्राणों तक की बलि चढ़ा दी। पंजाब केसरी’ समाचार-पत्र के संपादक लाला जगत नारायण राय आतंकवादियों की गोलियों का निशाना बन गए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अनेक देशभक्त पत्रकारों ने अंग्रेजों के अत्याचार सहकर भी अपने धर्म को नहीं छोड़ा। स्वर्गीय गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम ऐसे ही पत्रकारों में लिया जा सकता है। 

प्रेस पर लगाया गया प्रतिबंध केवल जनता के लिए ही हानिकर सिद्ध नहीं होता, बल्कि स्वयं सरकार के लिए भी होता है। यदि सरकार तक प्रजा के कष्ट, दुख तथा असंतोष की खबर न पहुंचे, तो एक दिन जनता का आक्रोश भयंकर रूप से विस्फोटित होकर सरकार को अपदस्थ कर सकता है। 1975-76 के आपातकाल में इंदिरा सरकार ने प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया था। प्रेस ने जनता के असंतोष और आक्रोश की वास्तविक खबरें छापना बंद कर दिया, जिससे सरकार अनभिज्ञ रही। फलत: 1977 के आम चुनावों में कांग्रेस सरकार को अभूतपूर्व असफलता का मुंह देखना पड़ा। 

प्रेस जनमत की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। जनतंत्र जनमत पर निर्भर करता है। इस दृष्टि से प्रेस का दायित्व बहुत बढ़ जाता है। वैसे भी प्रजातंत्र में भाषण, लेख तथा अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है। ऐसा होना भी चाहिए, किंतु वह विध्वंसात्मक न होकर रचनात्मक होना चाहिए। यदि प्रेस भी किन्हीं स्वार्थों के वशीभूत होकर कार्य करने लगे, तो वह अपनी स्वतंत्रता खो बैठेगा। सत्ता को चाहिए कि वह सदैव रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाए। तभी उसकी स्वतंत्रता जनहित में और अंततः राष्ट्रहित में हो सकती है।

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