संचार माध्यमों की स्वतन्त्रता पर निबंध |Essay on freedom of media in hindi

संचार माध्यमों की स्वतन्त्रता पर निबंध

संचार माध्यमों की स्वतन्त्रता पर निबंध |Essay on freedom of media in hindi

सामान्य परिचय 

संचार माध्यमों को हम मूलतः तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं :

(1) अखबार, पत्र-पत्रिकाएं (प्रिंट मीडिया)

(2) रेडियो (ध्वनि प्रसारण)

(3) टेलीविजन (दृश्य-श्रव्य माध्यम) 

समाचार-पत्र कई दशकों से आम व खास लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बना हुआ है, सुबह की चाय के साथ यदि अखबार न हो तो चाय का जायका बिगड़ा हुआ लगता है. वर्तमान में समाचार-पत्र पूर्णरूपेण स्वतन्त्र हैं, लेकिन अधिकांश समाचार-पत्रों ने अपने लिए कोई लक्ष्मण-रेखा नहीं खींची है. यहाँ तक कि वे प्रेस परिषद् द्वारा निर्धारित आचार संहिता का पालन भी नहीं करते और कई बार इसके लिए निन्दित तथा दण्डित भी हुए 

संचार माध्यमों की स्वतंत्रता के फलस्वरूप एक ओर अमरीका के वाटर गेट का रहस्य खुला तथा भारत में अनेक घोटाले सामने आए. दूसरी ओर राजकुमारी डायना एवं उनके प्रेमी की मृत्यु हो गई, क्योंकि प्रेस की स्वतन्त्रता ने उच्छृखलता का रूप धारण कर लिया था. 

चूँकि छपा हुआ अधिक विश्वसनीय व टिकाऊ होता है अतः समाचार-पत्रों को दंगों में या किसी दुर्घटना में मारे गए लोगों के आँकड़े बढ़ा-चढ़ाकर देने से पहले उन खबरों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न दहशत, आक्रोश व प्रतिशोध के बारे में विचार करना चाहिए. कई बार शीर्ष समाचारों में गलत आँकड़े देने के बाद अगले किसी दिन छोटा सा खण्डन आता है, लेकिन इस बीच शरारतपूर्ण समाचार अपना प्रभाव दिखा चुका होता है. 

दूसरा महत्वपूर्ण संचार माध्यम है, रेडियो, रेडियो अथवा ट्रांजिस्टर उन सुदूर क्षेत्रों में सूचना एवं मनोरंजन के सशक्त माध्यम है जहाँ टेलीविजन ने अपनी जडें नहीं जमाई तथा समाचार-पत्र सुलभ नहीं होते, रेडियो चूँकि सरकारी नियंत्रण में है अतः इस पर होने वाले क्षेत्रीय व राष्ट्रीय प्रसारणों पर सरकार के दिशा निर्देशों की छाप स्वाभाविक है. भारत में आज भी लघु व मध्यम तरंगदैर्यों की ध्वनि तरंगें रेडियो व ट्रांजिस्टर के माध्यम से करोड़ों श्रोताओं को एक साथ सूचना व मनोरंजन से लाभान्वित करती हैं. 

जहाँ रेडियो/ट्रांजिस्टर दूरदराज के अविकसित ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उपयोगी हैं वहीं वर्तमान युग में शहरी, अर्द्धशहरी तथा कई ग्रामीण क्षेत्रों में भी संचार का एक सशक्त माध्यम है ‘आकाशवाणी’ की भाँति ‘दूरदर्शन’ जो कि सरकारी नियंत्रण में प्रसारण कर रहा है. 

स्वतंत्रता की आवश्यकता 

दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में की गई काँटछाँट, गुम हुई आवाज यह आभास करा देती है कि दूरदर्शन पर एक अघोषित सेंसर लागू है. कुछ दूरदर्शन के अधिकारियों की स्वामीभक्ति भी, पक्षपात-पूर्ण समाचार, सूचना या विवरण के लिए उत्तरदायी हो सकती है. इस तरह असीमित सम्भावनाओं भरा दूरदर्शन अब तक सीमित उत्तरदायित्वों का निर्वाह ही कर पा रहा है. 

ऐसे में एकरसता तथा अधकचरे कार्यक्रमों से ऊबे दर्शकों का विदेशी चैनलों की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक ही है. आज विदेशी चैनले निश्चय ही दूरदर्शन से अधिक त्वरित तथा नवीनतम जानकारी देकर दर्शकों की मानसिक क्षुधा को शान्त करती हैं. यदि भारतीय संचार माध्यम स्वायत्त हो उच्चस्तरीय तथा निष्पक्ष प्रसारण करने लगें तो निश्चय ही लोग पुनः दूरदर्शन तथा आकाशवाणी की ओर लौटेंगे. प्रसार भारती का गठन 

15 सितम्बर, 1997 से प्रसार भारती लागू कर दिया गया है. इसके तहत आकाशवाणी एवं दूरदर्शन स्वायत्त अभिकरण बन जाएंगे. हालांकि प्रसार भारती अभी केवल कागजों पर लागू हुआ है, अभी प्रसार भारती के बोर्ड का गठन होना शेष है. प्रसार भारती चिरप्रतीक्षित विधेयक है जिसे 29 जून, 1989 को श्री पी. उपेन्द्र द्वारा संसद में प्रस्तुत किया गया था, जुलाई 1990 में इसे संसद द्वारा पारित कर दिया गया और सितम्बर 1990 में राष्ट्रपति की स्वीकृति भी मिल गई, संयुक्त मोर्चा सरकार के उत्साही सूचना एवं प्रसारण मंत्री के सक्रिय प्रयासों से यह विधेयक लागू हुआ.

प्रसार भारती का उद्देश्य 

प्रसार भारती की स्थापना का उद्देश्य सार्वजनिक हित के सभी राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में लोगों के निष्पक्ष एवं सूचना प्राप्त करने के अधिकार को सुनिश्चित करना है. प्रसार भारती के अनुच्छेद 1 (3) के अनुसार प्रसार भारती एक निगमित निकाय की भाँति कार्य करेगा. इसका अध्यक्ष एवं पन्द्रह सदस्यीय प्रशासक मण्डल होगा. इसके सदस्यों में उपराष्ट्रपति, प्रेस कौसिल के अध्यक्ष, आकाशवाणी व दूरदर्शन के निदेशक पदेन सदस्य होंगे. आकाशवाणी तथा दूरदर्शन के कर्मचारियों का एक-एक प्रतिनिधि भी इसके सदस्यों में सम्मिलित होगा. इस बोर्ड में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer) के चयन को लेकर अभी भी गतिरोध बना हुआ है, इस सम्बन्ध में आवश्यक सुझावों की संस्तुति के लिए तथा प्रसार भारती की विस्तृत समीक्षा के मंत्रालय ने 22 नवम्बर, 1999 को एक समिति का गठन किया है जिसकी रिपोर्ट फरवरी 2000 तक प्रस्तुत किए जाने की आवश्यक है, 

आशंकाएं 

 प्रसार भारती की स्वायत्तता पर इसके गठन के साथ ही आशंका के बादल मँडरा रहे हैं, क्योंकि सरकार ने प्रसार भारती बोर्ड के गठन से लेकर उसके दैनिक संचालन तक में हस्तक्षेप करने के अधिकार अपने हाथ में रखे हुए हैं. प्रसार भारती अधिनियम की धारा 23 के तहत केन्द्र सरकार किसी विशेष प्रसारण को रोकने या करने का निर्देश दे सकती है जो सरकार की समझ में राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, सम्प्रभुता, राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक है. इसी प्रकार धारा 24 के अनुसार केन्द्र सरकार कोई भी सूचना या जानकारी निगम से माँग सकती है. धारा 25 के अन्तर्गत सरकार के निर्देशों का पालन न करने की स्थिति में केन्द्र सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति बोर्ड को छ: माह तक निलम्बित रखकर नए बोर्ड का गठन कर सकते हैं. इन सब धाराओं का मंतव्य तथा इनका गंतव्य स्पष्ट है कि सरकार अपने प्रचार, प्रसार के लिए प्रसारण माध्यमों को अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहती, हाँ वह इतना अवश्य चाहती है कि आकाशवाणी और दूरदर्शन, जोकि अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं, स्वायत्तता के नारों के बीच कुछ हद तक अपनी विश्वसनीयता पुनः प्राप्त करें

विदेशी चैनलों के दुष्प्रभाव 

संचार माध्यमों की स्वतन्त्रता का महत्व तो निर्विवाद है, लेकिन जब विदेशी चैनलें इस स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करके भारत के युवा वर्ग को नैतिक पतन की ओर धकेलने का प्रयत्न करें तो हमें सतर्क होना ही चाहिए. इन चैनलों का चूँकि भारत से कोई आत्मिक रिश्ता नहीं होता इसलिए ये बेहिचक व बिना झिझक हमारी आस्थाओं तथा मान्यताओं पर प्रहार करती हैं. इन चैनलों का मुख्य ध्येय है-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए उपभोक्ता तैयार करना. भारत विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्रों में एक है और मतभेद लोकतन्त्र की आत्मा है. ऐसे में मतभेदों को मनभेदों का रूप देकर, खोजी पत्रकारिता के नाम पर उन्हें उछालकर राजनीतिक मनोमालिन्य और गलतफहमियाँ बढ़ाना इन चैनलों की प्रथम रुचि है. 

स्वायत्तता की सीमाएं 

कहने का तात्पर्य यह है कि संचार माध्यमों को स्वायत्तता तो दी ही जानी चाहिए, लेकिन इस स्वायत्तता के परिणामों पर भी नजर रखनी चाहिए. यदि स्वायत्तता उच्च शृंखलता तथा उदंडता हो जाए, इसका दुरुपयोग यदि कार्यक्रमों को रंगीन तथा उत्तेजक बनाने में होने लगे, यदि स्वायत्तता का मतलब खबरें तैयार करने या सूचनाओं को मनमाना रूप देने का पर्याय हो जाए, तो ऐसी स्वायत्तता नियन्त्रित होनी ही चाहिए. इन्हीं आशंकाओं को ध्यान में रखकर सरकार ने 16 जुलाई, 1997 को DTH पर प्रतिबन्ध लगाया था. यह प्रतिबन्ध तब तक रहेगा जब तक ‘प्रसारण नियामक प्राधिकरण’ का गठन नहीं हो जाता. 

सकारात्मक स्वायत्तता चाहिए 

किसी भी नीति की सफलता नीयत के साफ रहने पर निर्भर करती है. विदेशी चैनलों पर होने वाले सारहीन कार्यक्रमों के दुष्प्रभावों पर तो सरकार ध्यान रखे ही, प्रसार भारती के लागू होने के बाद कहीं दूरदर्शन भी भौतिकतावादी होकर न रह जाए, यह भी ध्यान रखना है. दूरदर्शन का काम सिर्फ मनोरंजन करना या अर्थ लाभ एकत्र करना नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे देश की सांस्कृतिक विरासत का वाहक होना चाहिए. दूरदर्शन को चाहिए कि वह स्वायत्तता का सदुपयोग कार्यक्रमों की गुणवत्ता सुधारने में करे. कहने का तात्पर्य यह है कि स्वस्थ लोकतन्त्र के लिए संचार माध्यमों की अनुशासित स्वतंत्रता सर्वथा आवश्यक है. 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

3 × 1 =