भारत में स्वतंत्रता कितनी मुक्त पर निबंध | Essay on freedom in india how free

भारत में स्वतंत्रता कितनी मुक्त पर निबंध

भारत में स्वतंत्रता कितनी मुक्त पर निबंध-How free is freedom in India

पी.वी. नरसिंह राव की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था का ‘उदारीकरण’ शुरू करने के पच्चीस वर्ष बीतने के बावजूद भारत अभी तक आर्थिक स्वतंत्रता से तारतम्य नहीं बैठा सका है। उस देश के लिए यह हताशा की बात है, जिसने विभिन्न देशों के राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाई थी। 

“राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता एक दूसरे से जुड़ी होती हैं। मैं आपसे आग्रह करूंगा कि आप जरा संविधान के अनुच्छेद 19 (जैसा कि मूल रूप में इसे रखा गया है) को अनुच्छेद 14 और 21 के साथ मिलाकर देखिये तो पता चलेगा कि ये तीनों मिलकर संविधान में निहित मौलिक अधिकारों को समग्रता देते हैं, जैसा कि इस रूप में हमने खुद को दिया है।” 

हम राजनीतिक लोकतंत्र को तो समझते हैं, लेकिन आर्थिक लोकतंत्र को नहीं समझ सके हैं। राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। मैं आपसे आग्रह करूंगा कि आप जरा संविधान के अनुच्छेद 19 (जैसा कि मूल रूप में इसे रखा गया है) को अनुच्छेद 14 और 21 के साथ मिलाकर देखिये तो पता चलेगा कि ये तीनों मिलकर संविधान में निहित मौलिक अधिकारों को समग्रता देते हैं, जैसा कि इस रूप में हमने खुद को दिया है। संविधान निर्माता विद्वान थे और उन्होंने राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों को बराबरी पर रखा। बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा (भाग ए) कारोबार, व्यापार और पेशागत स्वतंत्रता (भाग जी) के बराबर है। कोई संस्था बनाने की स्वतंत्रता (भाग सी) संपत्ति की स्वतंत्रता (भाग एफ) के बराबर है। वे जानते थे कि कैसे स्वतंत्रता का एक समूह दूसरे को मजबूत करता है और कैसे एक तरह की स्वतंत्रता के बिना दूसरे तरह की स्वतंत्रता अर्थहीन हो जाएगी। 

संविधान के जिन अनुच्छेदों के समूह के बारे में कम लोग जानते हैं, वह है अनुच्छेद 301 से 305 का समूह। यदि इसकी सही व्याख्या की जाए तो अनुच्छेद 301 ‘एक राष्ट्र, एक अर्थव्यवस्था के विचार को स्थापित करता है। इस अनुच्छेद के मुताबिक, ‘भारत के पूरे क्षेत्र में लेनदेन, व्यापार और समागम पूरी तरह से स्वतंत्र होगा।’ इस साहसिक विचार को व्याख्या के जरिये दबाया गया और अमल में निष्प्रभावी कर दिया गया। राज्य सरकारें और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर संपत्ति अर्जित करने वाले तब तक खुश थे, जब तक कि उनके मामले उच्च न्यायालयों तक नहीं पहुंच गए। 

सरकारें कई तरह से आर्थिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाती हैं। एक ऐसी भी सरकार थी, जिसकी दमनकारी नीतियों के कारण भारत के शासन के मॉडल को, बदनाम हो चुकी उपमा, ‘लाइसेंस-परमिट कोटा राज’ से, नवाजा गया था। कुछ बंदिशें वैधानिक आवश्यकताओं के कारण उचित हैं, जैसे किसी व्यापार का पंजीयन या फिर पर्यावरण की मंजूरी। ये वैधानिक आवश्यकताएं हैं, लेकिन मंजूरी में लगने वाले असीमित समय के कारण बेमानी हो जाती हैं। 

हर वर्ष विश्व बैंक ‘इज ऑफ डुइंग बिजनेस रिपोर्ट’ (कारोबार करने की सुगमता) नाम से एक अध्ययन प्रकाशित करता है। इसमें विभिन्न देशों को दस मापदंडों के आधार पर रैंकिंग दी जाती है। इन मापदंडों में कारोबार की शुरुआत, बिजली प्राप्ति, संपत्ति का पंजीयन, कर्ज की प्राप्ति, करों का भुगतान और अनुबंधों पर अमल आदि शामिल होते हैं। 2015 और 2016 के बीच इन दस मापदंडों में से सात पर भारत की रैंक या तो समान रही या फिर बदतर हुई है। उसकी रैकिंग सिर्फ तीन मानदंडों में सुधरी है और उसमें भी कोई बहुत खुश होने की वजह नहीं है। कारोबार की शुरुआत करने से संबंधित मापदंड में भारत की रैंक सुधर कर 164 से 155वें नंबर पर आ गई है। निर्माण संबंधी अनुमतियों के मामले में रैकिंग 184 से घटकर 183 हुई है, तो बिजली के मामले में 99 से 70 हो गई है। कर्ज लेने के मामले में 36 से 42, करों के भुगतान में भारत की रैंक 157 है और अनुबंधों पर अमल में उसकी रैंक 178 है। 2016 में भारत की रैंक 189 देशों में 130 है। गौरतलब है कि वर्ष 2018 में भारत ने इस सूची में उल्लेखनीय प्रगति करते हुए 77वां स्थान हासिल किया। 

“सरकारें कई तरह से आर्थिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाती हैं। एक ऐसी भी सरकार थी, जिसकी दमनकारी नीतियों के कारण भारत के शासन के मॉडल को बदनाम हो चुकी उपमा ‘लाइसेंस-परमिट कोटा राज’ से नवाजा गया था। कुछ बंदिशें वैधानिक आवश्यकताओं के कारण उचित हैं, जैसे किसी व्यापार का पंजीयन या फिर पर्यावरण की मंजूरी। ये वैधानिक आवश्यकताएं हैं।”

1960 के दशक से हमने ‘स्वतंत्रता बनाम नियंत्रण के मुद्दे को गलत छोर से देखना शुरू किया। हमने शुरुआत नियंत्रण से की और फिर उसके बाद छूटों के बारे में एक-एक कर सोचना शुरू किया। जबकि सही नजरिया तो इसका ठीक उलटा है। हमें स्वतंत्रता से इसकी शुरुआत करनी चाहिए और फिर देखना चाहिए कि समान अवसर और कानूनों का पालन सुनिश्चित करने के लिए कौन से न्यूनतम नियंत्रण जरूरी हैं। इस बाद वाले नजरिये पर हमने पहली बार 1991-92 के दौरान तब गौर किया जब हमनें कुख्यात रेड बुक (जिसके जरिये आयात और निर्यात को नियंत्रित किया जाता था) को आग के हवाले कर दिया और सामान्य अंग्रेजी में सौ पेज की आयात-निर्यात नीति तैयार की। हमने इसी नजरिये का प्रत्यक्ष कर संहिता पर भी आजमाने की कोशिश की। इस संहिता के तीन तरह के प्रारूप उपलब्ध थे, लेकिन सरकार दुर्भाग्य से 55 वर्ष पुरान आयकर अधिनियम को बदलने को तैयार नहीं हुई। 

राज्य, गलत करने वालों को दंडित करने के अपने अधिकार का दुरुपयोग आर्थिक स्वतंत्रता में दखल देने में करते हैं। जबकि यदि राज्य हर तरह की गतिविधियों में ‘अवैध कार्यो’ और ऐसा करने वालों की शिनाख्त करने में जुट जाए तो यह समय, ऊर्जा और संसाधनों की बर्बादी है। जब कभी प्रशासनिक और कारोबारी फैसले होते हैं, तो उनमें चूक होती ही है और हर चूक ‘गलती नहीं होती, जिसकी जांच की जाए और दंड दिया जाए। अर्थव्यवस्था से संबंधित मामलों में राज्य को तभी दंड का प्रावधान करना चाहिए जब भारी पैमाने पर गलत कार्य किए गए हों और जिसके घातक नतीजे आए हों। 

2019 में द हेरिटेज फाउंडेशन और वाल स्ट्रीट जर्नल ‘आर्थिक स्वतंत्रता’ के दस कारकों के आधार पर ‘इंडेक्स ऑफ इकोनामिक फ्रीडम’ नाम से वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करते हैं। इसमें 186 देशों में भारत को 129वें नंबर पर ‘सर्वाधिक अनुदार’ श्रेणी में रखा गया है। विश्व आर्थिक मंच का ग्लोबल कांपिटिटिवनेस इंडेक्स (वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक सूचकांक) किसी अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मकता को आंकता है। लेकिन स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, श्रम बाजार की क्षमता और प्रौद्योगिकी को अपनाने का रुझान जैसे महत्वपूर्ण मानदंडों में भारत काफी नीचे पायदान पर है। आर्थिक स्वतंत्रता की कमी, न्यूनतम प्रतिस्पर्धात्मकता और कारोबार करने में आने वाली बाधाएं, निवेश, विकास, रोजगार सृजन, उपभोक्ताओं और इन सबसे ऊपर गरीबों और गरीब क्षेत्रों को नुकसान होगा।

1991 के सुधारों के बाद से, जिसकी अपनी शानदार कहानी है, राज्य का कड़ा हस्तक्षेप अब भी एक समस्या है। क्या करने की जरूरत है और क्या किया जा सकता है? 

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