वन आग पर निबंध | जंगल की आग पर निबंध | Essay on Forest Fires in Hindi

वन आग पर निबंध

वन आग पर निबंध | जंगल की आग पर निबंध | Essay on Forest Fires in Hindi |दावानल का दंश अथवा धधकते जंगल 

सब जले जाते हैं बौने हों कि कद्दावर हों

आग जंगल की कोई पेड़ कहां छोड़ती है। 

प्रख्यात शायर पं. बुद्धिसेन शर्मा के उक्त शेर से जंगल की आग की भयावहता को समझा जा सकता है। सचमुच जंगल की आग बहत भयावह होती है। यह सिर्फ पेड़ों पर ही कहर बन कर नहीं बरसती है, बल्कि जंगलों से जीवन को भी मिटा देती है। वनाग्नि की लंबी अग्नि-रेखा अपने क्रूर एवं कराल रूप में आगे बढ़ती चली जाती है और इसके पीछे सिर्फ राख का ढेर रह जाता है। 

भारत के जंगल आग से सुरक्षित नहीं हैं, फिर चाहे वे उत्तराखण्ड के जंगल हों, असम के जंगल हों, जम्मू-कश्मीर के जंगल हों, झारखण्ड के जंगल हों, छत्तीसगढ़ के जंगल हों, मध्य प्रदेश के जंगल हों या हिमाचल प्रदेश के जंगल हों। कहने का आशय यह कि जहां जंगल हैं, वहां दावानल का दंश भी है। जिन जंगलों को पनपने में कई वर्ष लग जाते हैं, वे कुछ देर में जलकर खाक हो जाते हैं। साथ ही इन जंगलों की कोख में पलने वाली जैव विविधता भी नष्ट हो जाती है। भारत के अनेक प्रांतों में प्रायः प्रतिवर्ष आग जंगलों को अपनी चपेट में लेती है। जंगल स्वाहा हो जाते हैं। केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार जनवरी, 2019 से मार्च, 2019 के मध्य वनों में आग लगने की 14107 घटनाएं हुईं। इससे स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है। वनों के लिए मार्च से लेकर जून के अंतिम सप्ताह तक का समय अत्यंत संवेदनशील होता है। इसे वनाग्नि काल’ के रूप में अभिहित किया जाता है। कभी-कभी तो जगल की आग इतनी उग्र हो जाती है, कि स्थानीय स्तर पर आग पर काबू पाना संभव नहीं होता। इसके लिए सेना और ‘राष्ट्रीय पाकतिक आपदा राहत बल’ (NDRF) की मदद लेनी पड़ती है। टेलीकॉप्टरों से पानी की बौछार डालनी पड़ती है। वर्ष 2019 में उत्तराखण्ड के जंगलों में लगी भीषण आग को शांत करने में यह सब करना पडा, फिर भी हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र को आग ने निगल लिया। विडंबना यह भी है कि आग से वनों की रक्षा करने में नाकाम इंतजामिया एवं सरकारों द्वारा जंगलों में लगी आग की असलियत छिपाने के प्रयास किए जाते हैं। नतीजतन क्षति का सही आंकड़ा भी सामने नहीं आ पाता है। उपग्रह के आंकड़े कुछ और बताते हैं, तो वन विभाग के कुछ और। इसी से पता चलता है कि आग से वनों की रक्षा के मामले में वन विभाग की मंशा साफ नहीं है। 

“जंगल की आग बहुत भयावह होती है। यह सिर्फ पेड़ों पर ही कहर बन कर नहीं बरसती है, बल्कि जंगलों से जीवन को भी मिटा देती है। वनाग्नि की लंबी अग्नि-रेखा अपने क्रूर एवं कराल रूप में आगे बढ़ती चली जाती है और इसके पीछे सिर्फ राख का ढेर रह जाता है।” 

जंगलों में आग कई कारणों से लगती है। कभी ये कारण प्राकृतिक होते हैं, तो कभी मानव जनित। कभी-कभी किसी विशेष एवं जटिल मौसम तंत्र के कारण भी जंगल की आग को बढ़ावा मिलता है। मसलन, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के अनुसार वर्ष 2015 में एलनीनो (EL Nino) के परिणामस्वरूप बारिश में आई कमी, मौसम में गर्मी और सुखेपन ने जंगलों की आग को बढ़ावा दिया। नासा के मुताबिक वर्ष 2015 में एलनीनो का प्रभाव अपने चरम पर था। इससे मौसमी दशाओं में काफी उलटफेर हुआ, जिससे दक्षिण एशियाई देश सर्वाधिक प्रभावित हुए। इस दौरान गर्म मौसम और शीतकालीन वर्षा की कमी के कारण उत्पन्न होने वाले नमी के अभाव के चलते ‘वाष्प दाब अंतराल’ (Vapour Pressure Deficit-VPD) भी काफी बढ़ गया, जिससे आग लगने की घटनाएं बढ़ीं। 

प्राकृतिक कारणों में जहां जंगलों की आग में आकाशीय बिजली का बड़ा योगदान रहता है, वहीं उत्तराखण्ड के जंगलों में आग लगने का एक प्रमुख कारण यहां चीड़ के वृक्षों की अधिकता भी है, जिनसे गिरने वाला ‘पिरुल’ (नुकीली गुच्छेदार पत्तियां) जंगलों की आग को बढ़ावा देता है। चूंकि चीड़ के जंगलों में मिश्रित वनों की तुलना में बहुत कम नमी होती है, इसलिए भी इन जंगलों में आग बहुत तेजी से फैलती है। 

नए कृषि क्षेत्रों का निर्माण (जंगलों में आग लगाकर), पेड़ काट कर उसका निशान मिटाने का मकसद, तथा तेंदूपत्ता एवं महुआ बीनने के चक्कर में जंगलों में आग लगाना आदि वे मानवजनित कारण हैं, जिससे जंगल में आग की घटनाएं बढ़ती हैं। वन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार भी वनों की आग का एक प्रमुख कारण है। प्रायः यह देखने को मिलता है कि उन्हीं वन क्षेत्रों में आग की घटनाएं ज्यादा होती हैं, जिन्हें हाल-फिलहाल वन विभाग द्वारा वनीकरण वाले क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया हो। वस्तुतः यह वनीकरण सिर्फ कागजों पर होता है और साक्ष्य मिटाने के लिए ऐसे क्षेत्रों में जानबूझ कर आग लगाई जाती है। 

जंगल की आग के अनेक दुष्परिणाम सामने आते हैं। हरे-भरे | पेड़ खाक हो जाते हैं, तो औषधीय महत्व के पौधे, जड़ी-बूटियां एवं वनस्पतियां नष्ट हो जाती हैं। जैवविविधता का हास होता है, क्योंकि कीट-पतंगों से लेकर स्तनपायी जीवों तक की हजारों प्रजातियों के करोड़ों जीव एवं उनके अंडे-बच्चे तक जलभुन कर नष्ट हो जाते हैं। | आग के कारण ब्लैक कार्बन हिमनदों तक पहुंच जाता है, जो अधिक | गर्मी को सोखता है। फलस्वरूप तापमान बढ़ने से हिमनदों का पिघलाव बढ़ जाता है। इससे नदियों की जलापूर्ति प्रभावित होती है। समूचा जल-चक्र प्रभावित होने लगता है। जंगलों की आग के कारण जहां तापमान में बढ़ोत्तरी होने से गर्मी बढ़ती है, वहीं प्रदूषण भी बढ़ता है। प्रदूषण बढ़ने से स्वास्थ्य संबंधी तकलीफें बढ़ती हैं, विशेष रूप से सांस के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। जंगल की आग जंगलों को तो तबाह करती ही है, भूजल के स्तर को भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है। आग के कारण जहां जमीन की दरारें बंद हो जाती हैं, वहीं बारिश के पानी को सोखने की क्षमतावाली वनस्पतियों एवं घास से जलकर नष्ट हो जाने के कारण पानी जमीन के अंदर नहीं जा पाता। फलतः भूजल का स्तर प्रभावित होता है। 

जंगलों की आग के भयानक दुष्परिणामों के बावजूद आज तक सरकारें एवं संबंधित विभाग इसे रोक पाने में विफल रही हैं। हम न तो आग की रोकथाम के ही सटीक उपाय सुनिश्चित कर पाए हैं और न ही आग लगने के बाद आग बुझाने के किसी ठोस बन्दोबस्त तक पहुंच पाए हैं। देश के 92% से अधिक वन क्षेत्र सरकार के नियंत्रण में हैं, किंतु सरकार इन वन क्षेत्रों को आग से सुरक्षित रख पाने के मोर्चे पर विफल सिद्ध हुई है। यदि जंगल की आग इसी तरह अपना विनाशलीला दिखाती रही, तो जंगलों के साथ जैवविविधता भी घटेगी। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत पहले से ही वन क्षत्र की कमी से जूझ रहा है। 

हमारी राष्ट्रीय वन नीति में वनों की सुरक्षा पर विशेष बल दिया गया है, इसके बावजूद जंगलों की आग की रोकथाम के लिए जिस तरह के सुचिंतित उपायों की आवश्यकता है, उनकी हमारे देश में कमी है। आग से वनों की सुरक्षा के लिए सुचिंतित पहलें होनी चाहिए। पहली आवश्यकता तो यह है कि सरकार ‘वन आग प्रबंधन योजना’ शुरूकर वनों को आग से बचाने की ठोस पहल करे। वनों को आग से बचाने के लिए जहां अत्याधुनिक उपकरणों को लगाए जाने की आवश्यकता है, वहीं जंगलों में ऐसे प्रशिक्षित कर्मचारियों एवं वन रक्षकों (फारेस्ट गार्ड) की नियुक्तियां बढ़ाई जाएं जो विशेष रूप से आग बुझाने एवं जंगलों को आग से बचाने में पारंगत हों। आग की दृष्टि से संवेदनशील वन क्षेत्र के इर्दगिर्द ऐसे भारीभरकम वाटर टैंकों का निर्माण किया जाए, जिनकी क्षमता पचास हजार लीटर से कम न हो। हमें वनों में जहां अग्निशमन की एक मुकम्मल व्यवस्था विकसित करनी होगी, वहीं इसके लिए सैटेलाइट फोनों आदि का भी बन्दोबस्त करना पड़ेगा। वनों की सुरक्षा के लिए निवेश बढ़ाए जाने की भी आवश्यकता है, ताकि धन की कमी आड़े न आए। इसके अलावा वनों की सुरक्षा के लिए यह भी आवश्यक है कि वन प्रबंधन में आमजन की भागीदारी को बढ़ाया जाए। यानी सुरक्षा की पहलों से उन आदिवासियों को जोड़ा जाए, जिनका पूरा जीवन ही वनों पर निर्भर करता है तथा जिन्हें वनों से भावनात्मक लगाव भी होता है। ये आदिवासी वनों के लिए मर मिटने को तैयार रहते हैं। 

“जंगलों को बचाकर ही हम उस पर्यावरण और प्रकृति को बचा सकेंगे, जो जीवन के आधार हैं अर्थात जंगलों को बचाना, जीवन को बचाने के समतुल्य है।” 

वनों की आग से सुरक्षा के लिए जहां ‘वन संरक्षण अधिनियम 1980’ की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है, वहीं उन मानवजनित कारणों पर भी लगाम कसनी होगी, जिनसे वनों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसके लिए जहां झूमकृषि (नए कृषि क्षेत्रों के निर्माण के लिए जंगलों में लगाई जाने वाली आग को नियंत्रित करना होगा, वहीं वनों की निगरानी को बढ़ाकर उस आग की रोकथाम भी करनी होगी, जो वनोपज बटोरने के लिए लगाई जाती है। चूंकि जंगलों की आग का भ्रष्टाचार से भी करीबी रिश्ता है, अतएव भ्रष्टाचार पर भी अंकुश जरूरी है, ताकि भ्रष्ट कर्मियों को वनीकरण के उन क्षेत्रों को आग के हवाले करने का मौका न मिले, जहां वास्तव में वृक्षारोपण किया तो नहीं जाता है, बस वृक्षारोपण के फर्जी आंकड़े तैयार किए जाते हैं। इन पहलों के अलावा यह भी आवश्यक है कि हम विशेष रूप से जंगलों की आग की समस्या को ध्यान में रखकर एक ऐसा तंत्र विकसित करें, जिससे हवा की गति, घटते-बढ़ते तापमान एवं आर्द्रता की कमी के बारे में रोज की ताजातरीन जानकारियां मिल सकें और इन जानकारियों के आधार पर हम बचाव की रणनीति तैयार कर सकें और आवश्यक एहतियात बरत सकें। 

जंगल हमारी धरोहर जैसे हैं। ये हमें बहुत कुछ देते हैं, हमसे लेते कुछ नहीं हैं। हरे-भरे जंगलों को देखकर हमारा मन प्रफुल्लित होता है, हमारे अंदर नवचेतना का संचार होता है। इन्हीं जंगलों से हमें शुद्ध प्राणवायु मिलती है, तो यही जंगल वर्षा लाकर हमें अमृत रूपी जल प्रदान करते हैं। हमारी रोजमर्रा की अनेकानेक जरूरतें इन्हीं वनों से पूरी होती हैं। बाढ़ एवं भूस्खलन को रोकने में जहां वनों का योगदान महत्त्वपूर्ण होता है, वहीं ये जलवायु को संतुलित बनाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वनों ने जीव-जंतुओं को संरक्षण और पोषण देकर सिर्फ जैवविविधता को ही समृद्ध नहीं बनाया है, अपितु ये वन जनजातीय सांस्कृतिक विविधता के भी पोषक हैं। जिन वनों के हम पर इतने सारे उपकार हों, उन्हें आग में खाक होते हुए नहीं देखा जा सकता। हमें हर हाल में इन जंगलों को आग से बचाना होगा और यह काम सरकार और जनता को मिलकर करना होगा। इन जंगलो को बचाकर ही हम उस पर्यावरण और प्रकृति को बचा सकेंगे, जा जीवन के आधार हैं अर्थात जंगलों को बचाना, जीवन को बचान क समतुल्य है। 

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