भारत में विदेशी व्यापार पर निबंध |Essay on Foreign Trade in India

भारत में विदेशी व्यापार पर निबंध

भारत में विदेशी व्यापार पर निबंध |Essay on Foreign Trade in India

जब मानव ने पहिये का अविष्कार किया, तब उसने व्यापार के क्षेत्र में अपना पहला कदम सफलता पूर्वक रखा क्योंकि इससे पहले वह जानवरों, विशेषकर घोड़ों में अपना सामान लेकर जाते और उसे बेचते तथा अपनी जरूरतों का सामान लादकर लाते। अर्थात् पहिये के प्रचलन ने किसी स्थान विशेष की वस्तुओं को शीघ्रता से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहंचाना शरू कर दिया। यह साहसिक कार्य व्यापारियों द्वारा संभव हो पाया। यह व्यापार ही, एक माध्मय था जिसने भौगोलिक एवं औद्योगिक सीमाओं को तोड़कर वस्तुओं का आदान प्रदान शुरू किया। व्यापारिक संबंधों ने देश की राजनीति, कला, संस्कृति, भाषा, खान-पान, पहनावे को भी प्रभावित किया क्योंकि जब कोई व्यापारी दूसरे देशों या राज्यों में अपनी वस्तुएं लेकर जाते तो वहां की भाषा, संस्कृति एवं पहनावे को सीखता और अपनी चीजे सिखाता। कई व्यापारी भिन्न देशों में जा कर बसे, इस प्रकार एक साझा संस्कृति के विकास में व्यापार ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। 

साधारण शब्दों में विदेशी व्यापार का अर्थ, किसी देश का विश्व के अन्य देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध (आयात एवं निर्यात) स्थापित करने से है। अर्थात किसी देश का विदेशी व्यापार अर्थव्यवस्था में व्याप्त आर्थिक क्रियाओं के स्तर तथा स्वरूप का परिचायक होता है जैसे यदि कोई राष्ट्र कच्चे माल, खाद्यानों एवं खनिज पदार्थों का निर्यात करता है तो यह सुनिश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि वह राष्ट्र की विकास की आरम्भिक चरणों में है एवं यदि कोई राष्ट्र मशीनरी संयत्रों, विनिर्मित वस्तुओं और प्रौद्योगिकी का निर्यात कर रहा हो तब वह राष्ट्र विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में होगा। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था मे विदेशी व्यापार के माध्यम से एक देश का व्यापारिक तथा आर्थिक सम्बन्ध दूसरे देशों से जुड़ता है। विकसित देशों के यांत्रिक कौशल व औजारों तथा आयातित मशीन की सहायता से देश में उपलब्ध स्त्रोतों का बेहतर उपयोग विदेशी व्यापार द्वारा होता है। आयात और निर्यात बहुधा वस्तु के अस्थिर कीमतों में जो कमी या आधिक्य के रूप में होता है, कमी लाता है। विदेशी व्यापार न केवल देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करता है बल्कि जिस देश का जितना अधिक व्यापारिक सम्बन्ध विश्व के अन्य देशों से होता है। उस देश की वैश्विक स्थिति उतनी ही मजबूत मानी जाती है। विदेशी व्यापार विकासशील देशों को विदेश विनिमय के मामले में शक्तिशाली बनाता है। विदेशी व्यापार विदेशी मुद्रा अर्जित करने महत्वपूर्ण स्त्रोत है। मन्दी, मुद्रास्फीति एवं विदेश 

निवेश जैसी स्थिति में व्यापारिक सम्बन्ध महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। अन्त में यह कहा जा सकता है कि ‘व्यापार’ एक माध्यम है विश्व के अन्य देशों के साथ आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक,सामरिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध स्थापित करने का। भारत के आर्थिक विकास में विदेश व्यापार का अहम योगदान रहा है। इसके विकास क्रम को तीन समयावधियों में बाँटकर समझा जा सकता है। ब्रिटिश काल में भारत का विदेशी व्यापार, स्वतंत्रता के उपरान्त भारत का विदेशी व्यापार तथा वर्तमान में भारत का विदेशी व्यापार।

ब्रिटिश काल में भारत का विदेशी व्यापार : वर्ष 1947 पूर्व भारत का ब्रिटिश शासन का एक उपनिवेश था और उसके विदेश व्यापार का ढांचा एक प्रकार से औपनिवेशिक ढांचा ही था। भारत औद्योगिक देशों, विशेषकर इंग्लैण्ड को खाद्य पदार्थों और कच्चे माल का निर्यात करता था और उनसे निर्मित वस्तुओं का आयात करता था। निर्मित वस्तुओं के लिए विदेशों पर निर्भर होने के कारण देश औद्योगिक प्रगति न कर सका, बल्कि ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं द्वारा भारतीय माल से घोर प्रतिस्पर्धा के कारण देशी हस्तशिल्पों को भी भारी धक्का लगा। स्वतंत्रता के उपरान्त भारत का विदेशी व्यापार : स्वतंत्रता के उपरान्त भारत के विदेशी व्यापार में उत्तरोतर वृद्धि हुई है। यह वृद्धि व्यापार की मात्रा एवं मूल्य दोनों में ही हुई है। नियोजन काल के शुरू होने से नई औद्योगिक नीतियों का दौर प्रारम्भ हुआ जिसनें भारत के विदेशी व्यापार के स्वरूप में बदलाव ला दिया। उस समयावधि में भारत के मुख्य निर्यात चार भागों में बांटे जाते थे :- प्रथम भाग में कृषि और सहयोगी उत्पाद जिसमें चाय, काफी, तेल, कोको, तम्बाकू, नकदी फसल, मसाले, चीनी, कच्चा कपास, चावल, मछली, मांस, वनस्पति तेल, फल इत्यादि को शामिल किया जाता था। द्वितीय अयस्क और खनिज जिसमें लौह अयस्क एवं मैग्नीज आदि शामिल थे। तृतीय भाग में तैयार माल जिसमें बनी बनाई पोषाक, जूट उत्पाद, चमड़ा व चमड़े का सामान, हथकरघा, मोतियों तथा कीमती पत्थरों के जेवर को शामिल किया जाता था एवं चतुर्थ भाग में खनिज तेल ल्यूब्रिकेन्ट (स्नेहक)। 

उसी समयावधि में भारत के मुख्य आयात में- कल पूर्जे, परिवहन साधान, वनस्पति व खनिज तेल, खाद्यान्न (दाल व गेहूँ), उर्वरक, पेट्रोलियम तेल व ल्युब्रिकेन्ट, रसायन, मोती तथा कीमती पत्थर, कागज तथा लौह व इस्पात निर्मित धातु छोड़कर अन्य धातुओं का आयात किया जाता था। 

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