मेरा प्रिय खेल फुटबॉल पर निबंध |Essay on Football my Favorite Sport

मेरा प्रिय खेल फुटबॉल पर निबंध

मेरा प्रिय खेल फुटबॉल पर निबंध |Essay on Football my Favorite Sport

 पता नहीं, आज क्या बात है कि विद्यालय के अहाते की ओर अपार भीड़ उमड़ती चली जा रही है। यह स्वैरिणी भीड़, सावनी घटाओं की बारात-सी भीड़ किसी बड़े जेल को तोड़कर भागे हए बंदियों के समूह-सी भीड़; पता नहीं, किस महोत्सव के शुभ अवसर पर इकट्ठी हो चली है। मेरे मन के थाले में जिज्ञासाओं के बिरवे उग आए। इसी बीच हमारे एक मित्र ने हमें टोका, “यार ! किस विचार में बट्रेंड रसेल की तरह खोए हए हो? जानते नहीं, आज अपने विद्यालय के मैदान में आरा और छपरा के बीच बड़ा अच्छा फुटबॉल मैच होनेवाला है।” 

फुटबॉल ! क्रीड़ा-कंदुक। कृष्ण-कन्हैया का प्यारा खेल गेंद खेलना। मेरा मन स्मृतियों के सुदूर लोक में पहुँच जाता है। कालिंदी-कूल पर जब श्रीकृष्ण गोपबालाओं के साथ कंदुक-क्रीड़ा करते थे, तब उनके बीच आनंद की जो रसधार उमड़ती थी, उसका क्या कहना। सुना है, एक बार कन्हैया का गेंद यमुना की मँझधार में चला गया। जब उसका पानी कालियनाग के विष से विषाक्त हो गया, तब उन्होंने न केवल गेंद ही निकाली, वरन् उस विषधर भुजंग के फण पर चढ़कर बाँसुरी भी बजाई थी। आज मेरा मन कहता है, ओ आततायियो ! तुम अपना फण फैलाओ, मैं भयत्रस्त नहीं होता. मैं भी तुम्हारे फण पर चढ़कर बाँसुरी बजाना चाहता हूँ-“तान-तान फण व्याल कि तुझपर मैं बाँसुरी बजाऊँ !” 

कल्पना की डोर टूटते ही मेरे पाँव भी विद्यालय की ओर बढ़ने लग जाते हैं। विशाल मैदान आगंतुकों के अबाध प्रवाह को सिकता-पारावार की भाँति सोखता चला जा रहा है। मैंने भीड़ को ठेलते हुए एक कोने में थोड़ी जगह बना ली। मुझे बचपन से गेंद का खेल बड़ा भाता रहा है। कबड्डी में कौन हड्डी-पसली एक कराए, क्रिकेट में कौन कई दिनों तक हार-जीत का फैसला न होने के कारण अनिश्चय के झले में झूलता रहे, हॉकी में कौन बड़ा खर्च करके उसके डंडे से अपनी खोपड़ी गंजी कराए? इसीलिए, इस खेल के शौकीन होने के नाते मैंने भी सोचा कि गतिशीलता और उत्सुकता बनाए रखनेवाले इस खेल में क्यों नहीं डेढ़ घंटे बिताए जाएँ। 

सामने आयताकार मैदान। घास की हरी मखमली कालीन बिछी थी, बिलकुल मनोमोहक, जैसे वह अभी-अभी करघे से उतारी गई हो। मैदान के चारों ओर उजली रेखा खिंची थी। उजली रेखा की यह किनारी मैदान की खूबसूरती में चार चाँद लगा रही थी। गोल पोस्ट के खंभे बिलकुल उजले थे, जैसे उनपर अभी-अभी सफेद वार्निस फेरा गया हो। गोल पोस्ट के लहराते हुह जाल खेल की निर्णयात्मक घड़ियों की प्रतीक्षा बड़ी ही विकलता से करते दीख रहे थे। मैदान के चारों कोने पर रेशमी झंडियाँ सावनी बयार के हौले-हौले झोकों का दुलार पाकर लहरा रही थीं, मानो वे दोनों दलों के खिलाड़ियों को मैदान में आ जाने का न्योता भेज रही हों। 

थोड़ी देर बाद दोनों टीमों के खिलाड़ी मैदान के लगभग बीच में आ गए। वे ऐसे लग रहे थे, जैसे बारात की द्वार-लगाई के समय घोड़े जम रहे हों। दोनों टीमों के दस-दस खिलाड़ियों की जर्सियों के रंग भी अलग-अलग थे, दोनों गोलकियों की गंजियों के रंग भी अलग-अलग थे, इसीलिए दोनों टीमों के खिलाड़ियों को पहचानने में कठिनाई नहीं थी। इन सबके बीच रेफरी सरदार की तरह कुछ क्षणों के लिए गंभीर मुद्रा में खड़ा रहा, फिर उसने चमकता हुआ एक सिक्का उछाला। ‘टॉस’ के अनुसार दोनों दल दो ओर गए। रेफरी ने ज्योंही सीटी बजाई। खेल का रोमांचकारी दृश्य आरंभ हो गया। इधर कोलाहलपूर्ण भीड़ प्रायः निःशब्द हो गई। सारी आँखें गेंद की गति की ओर थीं। थोड़ी देर बाद खेल में और भी वेग आ गया। छपरा की टीम के स्टॉपर ने शॉट लेकर अपने राइट-हाफ को पास दिया। राइट हाफ ने राइट आउट को पास दिया, जिसने झंडे के पास जाकर गेंद को गोलपोस्ट की ओर उछाल दिया। सेंटर फॉरवर्ड ने बड़े ही नाटकीय ढंग से हेड किया, जिसे आरा का गोलकीपर बचाने में असमर्थ रहा और गेंद जाल में जा गिरी। गोल हो गया। यह जादू कुछ सेकेंड में. ही हो गया। दर्शकों को पता ही नहीं चला कि कब कैरम की गोटी पिल गई। यह गोल श्रीराम द्वारा धनुर्भंग से कम विस्मयकारी नहीं था। 

अड़हुल के फूल की तरह लाल गंजीवाला आरा का गोलकीपर, जो कभी गेंद को हाथ से छूने के विशेषाधिकार के कारण अकड़ रहा था, प्रसन्नवदन नहीं दिखाई पड़ रहा था। अपने दल को पराजय से नहीं उबार सकने के कारण निराशा में डूबा हुआ था। पराजित गोलकीपर के मुखमंडल पर अमावस की संध्या घिर आई थी। ग्रहण लगे चंद्रमा की भाँति उसका म्लान मुख उसके प्रशंसकों को कष्टकर प्रतीत हो रहा था। किंतु, छपरावालों में आनंद की चाँदनी छिटक उठी थी। किसी ने किसी को कंधे पर उठाया, तो किसी को छाती पर जोर से भींच लिया। दर्शकों में भी कुछ छपरा के थे। वे मैदान की उजली लक्ष्मण-रेखा को लाँघ गए—कुछ यूँ ही उछलने लगे, कुछ रूमाल फेंकने लगे, कुछ चप्पल ही उछालने लगे। 

हर्ष और विषाद के ज्वार-भाटे अभी शांत भी नहीं हुए थे कि रेफरी ने सीटी बजाई। खेल फिर शुरू हो गया। यद्यपि विजयी दल के लिए एक गोल का अग्रणीत्व उन्मादकारी आरंभ था, किंतु यह अंतिम विजय का ध्रुवतारक नहीं था। इसीलिए, विजयी दल के खिलाड़ी भी फिर उत्साह से खेलने लग गए। पराजित दल के खिलाड़ी भी जानते थे कि किस्मत का पाशा बदलते देर नहीं लगती। वे यह भी जानते थे कि चुनौतियों की चोट खाकर दिलेरों का उत्साह और बढ़ता है। इसलिए, पराजित दल के खिलाडी प्रारंभिक आकस्मिक पराजय से उत्पन्न उत्साहहीनता का अला हए पनः परी निष्पा के साथ खेल में जट गए। ठीक ही कहा है और बढ़ती है, पड़ते पग में जब छाले हैं।” 

खेल अब अपनी जवानी पर था। दोनों दलों के खिलाड़ियों ने विजयश्री अपनाने लिए जा-जान की बाजी लगा दी थी। पराजित दल के प्रशंसक तो मन-ही-मन बजरंगबली को लड कबल रहे थे कि कब उनके दल की ओर से एक गाल कर दिया जाए। विजयी दल के प्रशंसक भोला बाबा से कह रहे थे कि उनकी अर्जित प्रतिष्ठा मिटने न पाए। सभी दर्शक बकध्यान लगाए हुए थे। महफिल रंग पर आ गई थी, किंतु इस समय किसी को चौंकने की जरूरत नहीं थी। खेल में काफी गर्मी आ गई थी, किंतु इसी बीच रेफरी ने सीटी बजाई। पैंतीस मिनट खेल हो चुका था। यह मध्यांतर था, दस मिनट के लिए। कोई खिलाड़ी मैदान में लेट गया था, कोई बर्फ का टुकड़ा मुँह में डाल रहा था, कोई नींबू की फाँक चूस रहा था, कोई अपने बूट ठीक कर रहा था तथा कोई अपना पसीना पोंछ रहा था। दर्शकों की भीड़ टिड्डीदल की तरह खेल के मैदान की ओर बढ़ रही थी। इनमें कोई चीनियाबादाम खा रहा था, कोई आइसक्रीम चूस रहा था, कोई फेंटा और थम्स अप की बोतलें उछाल रहा था। आनन-फानन में दस मिनट बीत गए और द्वितीयार्द्ध का खेल आरंभ हुआ। की तरह रखता था तथा कोई 

खिलाड़ी जीतने की नई-नई तरकीबें ध्यान में रखकर गेंद आगे-पीछे कर रहे थे। दर्शकों में से कोई कह रहा था— “बढ़े चलो, आरा !” कोई कह रहा था-“बढ़े चलो, छपरा !” “बहादुर ! मारो जोरदार शॉट ! उछालो गेंद बैलून की तरह। दाग दो बॉल का ऐसा बुलेट कि गोलकीपर को छेदता हुआ गोल पोस्ट में चला जाए।”. 

समय तेजी से भागा जा रहा था । बहुतों का ध्यान कभी घड़ी की सुइयों की ओर होता, तो कभी खिलाड़ियों की ओर । ज्यों-ज्यों समय बीतता था, दर्शकों के मन का तनाव बढ़ता जाता था। एक कहता-“अरे! छपरा मार ले गया। यह कोई मामली जिला नहीं है।” दूसरा कहता-“यार ! घबराओ नहीं, आरा भी कोई ऐसा-वैसा जिला नहीं है, बाबू कुँअरसिंह का जिला है। वृद्ध कुँअरसिंह जब अँगरेजों के छक्के छुड़ा सकते थे, तो ये तो जवान खिलाड़ी हैं।” 

जब खेल समाप्त होने में करीब पाँच मिनट बचे थे, तभी आरा के लेफ्ट हाफ ने अपने लेफ्ट आउट को पास दिया, जिसने छपरा गोलकीपर की ओर एक करारा शॉट लिया। परंतु छपरा के स्टॉपर ने उसे हेड द्वारा बचा लिया। दुर्भाग्यवश गेंद आरा के सेंटर फॉरवर्ड की ओर उछलती हुई आ रही थी, जिसपर उसने एक जोरदार किक गोल पोस्ट में दी। गोल बचाने के लिए छपरा के स्टॉपर ने घबराहट में हाथ से उसे रोक लिया। इसपर रेफरी ने छपरा की ओर पेनाल्टी दे दी। पीली गंजीवाला गोलकीपर गोल पोस्ट के आगे बड़ी ही सावधानी से खड़ा था। लगता था कि आज किसी प्रह्लाद की परीक्षा ली जा रही है। गलती किससे हुई और कठघरे में कौन हाजिर किया गया। इस समय मुझे गोस्वामी तुलसीदास का दोहा याद हो आया 

औरु करै अपराधु कोउ, औरु पाव फल भोगु। 

अति बिचित्र भगवंत गति, को जग जानै जागु॥

लेकिन, अब करना क्या था। आरा के एक खिलाड़ी ने बड़ी कुशलतापूर्वक अर्जुन की तरह निशाना साधकर गेंद को गोल पोस्ट के दाएँ कोने में मारकर गोल कर दिया। जो छपरावाले खेल के आरंभ में अपनी जीत से फूले नहीं समाते थे, अब बिलकुल उदास दीख रहे थे। उनके उत्साह पर पानी फिर गया था। उनकी स्थिति वैसी ही थी, परसत तुहिन तामरस जैसे। 

दोनों दलों के खिलाड़ी इस नवीन विजय-पराजय के सुख-दुख के हिंडोले पर झूल ही रहे थे कि रेफरी ने खेल के अंत होने की सीटी बजा दी। दर्शक तेजी से मैदान छोड़ने लगे। कोई इस दल, कोई उस दल की प्रशंसा करता जा रहा था। मैं विचारों में डूब गया था। मुझे लगता था, हमारी जिंदगी भी एक मैच ही है। हम जीत गए या हार गए, इसका निर्णय तो जिंदगी के खेल की समाप्ति पर ही हो सकता है। 

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