बाढ़ पर निबंध-ESSAY ON FLOOD IN HINDI

बाढ़ पर निबंध

बाढ़ पर निबंध-ESSAY ON FLOOD IN HINDI

बाढ़ एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है, जिसने सभ्यताओं को निगलने का काम किया है। यह जल प्रलय के रूप में आती है और व्यापक तबाही मचाती है। बाढ़ की स्थिति तब निर्मित होती है, जब अतिवृष्टि के कारण धरती की जल सोखने की क्षमता खत्म हो जाता है और नदियों का जल स्तर बढ़ने लगता है, फलतः निचले इलाक जलमग्न हो जाते हैं। कभी बांधों से पानी छोड़े जाने, तो कभी बादला के फटने से भी बाढ़ आती है और व्यापक तबाही मचाती है। यह एक ऐसी आपदा है, जो प्रायः हर वर्ष भारत में आती है और जान माल का व्यापक नुकसान करती है। बढ़ती जनसंख्या और उससे सम्बद्ध सामाजिक-आर्थिक कारणों से भूमि पर बढ़ते दबाव को देखते हुए बाढ़ का दुष्प्रभाव पहले की तुलना में अब अधिक दिखायी देता है। बाढ़ सर्वाधिक आवृत्ति और सबसे अधिक व्यापक नुकसान पहुंचाने वाली प्राकृतिक आपदा है। इसकी परिणति मृत्यु, विनाश, विकृति और विस्थापन के रूप में होती है। आपदा प्रबंधन के स्तर पर हम बाढ़ से बचने का कोई स्थायी समाधान नहीं खोज पाए हैं। 

भारत में वैसे तो बाढ़ के अनेक कारण हैं, किंतु बार-बार आने वाली बाढ़ों के पीछे एक बड़ा कारण है प्रकृति के साथ मानव की बढी छेड़छाड़, जिसने जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या को जन्म दिया है। हरे-भरे पेड़ों का विनाश, अवैध खनन, नदियों को प्रदूषित करना. वातावरण में जहरीली गैसों का बढ़ना, तापमान में वृद्धि, ग्लेशियरों का पिघलना आदि कारणों से जहां जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ा है, वहीं बाढ़ की विभीषिका भी बढ़ी है। इसके अलावा भी कुछ और बातें बाढ़ की तबाही लाने का कारण बनती हैं। यहां इन कारणों पर गौर कर लेना समीचीन होगा। 

भूमि की जल सोखने की क्षमता कम होने तथा जल निकासी की पर्याप्त व्यवस्था न होने से बाढ़ आ जाती है। दूसरा कारण यह है कि नदी के मार्ग में प्राकृतिक या कृत्रिम रुकावट आने से उसकी जल बहाव क्षमता कम हो जाती है और बाढ़ की स्थिति बन जाती है। भारी वर्षा या ऊपरी या धारा-प्रतिकूल संभरों में तेजी से बर्फ पिघलने से व्यापक बाढ़ आ सकती है। तटवर्ती क्षेत्रों में तटवर्ती भूमि समुद्र के जलस्तर के करीब होती है, इसलिए वहां बाढ़ की आशंका हमेशा रहती है। चक्रवात या तूफान से इन क्षेत्रों में पानी भर जाता है। ऐसे क्षेत्रों में ज्वार-भाटे से भी बाढ़ आ सकती है या बाढ़ की स्थिति गंभीर हो सकती है। छोटे जल ग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण अकस्मात् बाढ़ आ जाती है। ऐसी बाढ़ रेगिस्तानी क्षेत्रों में अक्सर आती है। क्योंकि खश्क धाराओं और नालों में भारी वर्षा के कारण मिनटों में पानी भर सकता है। कभी-कभी ऐसी बाढ़ आती है जिसके बारे में सोचा भी नहीं जाता, जैसे किसी बांध या जलागार के टूटने या अन्य नियामक प्रणालियों के विफल होने से आनेवाली बाढ़। नदियों के किनारे या नदियों के पाट पर मानव गतिविधियाँ, सामाजिक और आर्थिक क्रियाकलाप भी बाढ़ के लिए जिम्मेदार होते हैं।

भारत एक ऐसा देश है, जहां प्रकृति प्रकोप के रूप में बाढ़ प्रायः हमेशा कहर ढाती है। भारत में बाढ़ प्रभावित होने वाले कुल क्षेत्र का आधे से अधिक हिस्सा तीन राज्यों—बिहार, उत्तर प्रदेश व पश्चिम बंगाल में आता है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा बाढ़ प्रभावित क्षेत्र है। यहां लगभग 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि ऐसी है जिस पर सदैव बाढ़ आने की आशंका बनी रहती है। फिर भी भारत में बाढ़ का प्रभाव एक समान नहीं रहता है। देश के कई राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशों में, जैसे असम, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश और प. बंगाल में बाढ़ का असर सबसे अधिक पड़ता है। आंध्र प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में भी बाढ़ का प्रकोप होता रहता है। लेकिन एक ही वर्ष में इन सभी राज्यों में एक साथ बाढ़ नहीं आती। एक नदी प्रणाली से, दूसरी नदी प्रणाली की बाढ़ की समस्या भिन्न है। 

देश में बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों को केंद्रीय जल आयोग ने चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया है-(i) ब्रह्मपुत्र नदी क्षेत्र, (ii) उत्तर पश्चिम नदी क्षेत्र, (iii) गंगा नदी क्षेत्र, (iv) दक्कन नदी क्षेत्र। 

केन्द्रीय जल आयोग द्वारा निर्धारित श्रेणियों पर क्षेत्रवार नजर डालने पर हम पाते हैं कि ब्रह्मपुत्र नदी क्षेत्र में बाढ़ मुख्य रूप से नदियों के तटबंधों के ऊपर से बहने, नालों में रुकावट, भूस्खलन या नदियों के मार्ग बदलने की वजह से आती है। वहीं असम, जहां बाढ़ का सबसे बुरा असर पड़ता है, में इसका मुख्य कारण ब्रह्मपुत्र, बराक और उसकी सहायक नदियों का तटबंधों से ऊपर बहना है। गंगा नदी क्षेत्र में गंगा के उत्तर में स्थित इलाकों में बार-बार बाढ़ आती है। राप्ती, शारदा, घाघरा और गंडक नदियों से उत्तर प्रदेश में और बूढ़ी गंडक, बागमती, कोसी और कुछ अन्य नदियों से बिहार में व्यापक क्षेत्र में बाढ़ आती है। प. बंगाल में महानंदा, भागीरथी, अजय और दामोदर से बाढ़ आती है क्योंकि नदी चैनेलों की क्षमता बहुत कम है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों, हरियाणा और दिल्ली में नालों में रुकावट अथवा नदियों में उफान की वजह से बाढ़ आती है। उत्तर-पश्चिम नदी क्षेत्र में बाढ़ आने का मुख्य कारण सतह जल की निकासी की पर्याप्त व्यवस्था न होना है जिससे विस्तृत भू-भाग में बाढ़ का पानी रहता है। जम्मू-कश्मीर की नदियों, जैसे झेलम, चिनाब और अन्य सहायक नदियों में समय-समय पर बाढ़ आती रहती है। मध्य भारत और दक्कन क्षेत्र में उड़ीसा को छोड़कर बाढ़ कहीं भी गंभीर समस्या नहीं है। उड़ीसा में महानदी, ब्राह्मणी और वैतरणी की वजह से बाढ़ आती है जिनका एक ही डेल्टा है। आंध्र प्रदेश में छोटी  नदियों में उफान से बाढ़ आती है। पश्चिम की ओर बहने वाली | ताप्ती और नर्मदा से गुजरात के तटवर्ती क्षेत्रों में बाढ़ आती है। | गोदावरी और कृष्णा नदी क्षेत्रों में निकासी की समस्याओं के कारण पूर्वी तट क्षेत्र में बाढ़ आती है। उक्त विश्लेषण से भारत में बाढ़ की | व्यापकता का अनुमान लगाया जा सकता है। 

बाढ़ एक तबाही है। यह एक त्रासदी है। यह प्रकृति का अभिशाप है। बाढ़ की पीड़ा को वही समझ सकता है, जिसने इसे झेला हो। बाढ़ बस्तियां उजाड़ देती है। गांव के गांव बहा ले जाती है। असंख्य लोग मौत का ग्रास बन जाते हैं, तो जो बाढ़ में फंस जाते हैं, उनकी पीड़ाएं अलग होती हैं। आम जन-जीवन ठप हो जाता है। संचार व परिवहन व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। राजस्व की भी भारी क्षति होती है। हर साल देश के विविध भागों में बाढ़ कहर ढाती है और जान-माल का भारी नुकसान होता है। यदि हम बाढ़ प्रबंधन की एक ठोस प्रणाली विकसित करें तथा आपदा प्रबंधन के ढांचे को मजबूत बनाएं तो हर साल होने वाले भारी नुकसान से बचा जा सकता है। 

बाढ़ प्रबंधन तीन स्तरों पर होना चाहिए। ये तीन स्तर हैं पूर्वानुमान, संरचनागत उपाय तथा गैर-संरचनागत उपाय। इन्हें अपनाकर बाढ़ की तबाही से काफी कुछ बचा जा सकता है। इस दिशा में प्रयास हो भी रहे हैं। बाढ़ प्रबंधन का सबसे प्रभावी उपाय बाढ़ का पूर्वानुमान करके उसके बारे में शीघ्र चेतावनी देना है। बाढ़ पूर्वानुमान म पहला चरण वर्षा होने, उसकी गहनता, अवधि और वितरण के बार म भविष्यवाणी करना है। इस प्रयोजन के लिए बारिश की मात्रा के बारे में पूर्वानुमान अनिवार्य होता है। बारिश होने और तत्सम्बंधी निर्माण जलधारा प्रवाह मार्ग और बाढ़ के चरणबद्ध विकास का अध्ययन दूसरा चरण है। तीसरे चरण में बारिश से पूर्व जलस्तर और पिछली वर्षा में किए गए जल संग्रह, बर्फ पिघलने (हिमालयी नदियों के मामले में) से बढ़ने वाले जलस्तर आदि का अध्ययन किया जाता है। उपग्रह आधारित दूरसंवेदन तकनीक से अब हिमाच्छादन और बर्फ पिघलने के बारे में उपयोगी आंकड़े प्राप्त होते हैं। राडार वर्षा की मात्रा के बारे में अनुमान लगाने में मददगार है। बाढ़ पूर्वानुमान किसी नदी और उसकी सहायक नदियों के दैनिक जलस्तर के आधार पर तैयार किया जाता है। इसके लिए सभी निगरानी केंद्रों द्वारा सुबह निर्दिष्ट समय पर जल स्तर का अध्ययन किया जाता है और उसके निष्कर्ष केन्द्रीय जल आयोग के नई दिल्ली मुख्यालय को भेज दिए जाते हैं। जहां से कम्प्यूटरीकृत दैनिक बुलेटिन जारी कर दिया जाता है। राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र के कम्प्यूटर नेटवर्क निकनेट के जरिए पूर्वानुमान सभी जिलों में भी उपलब्ध कराए जाते हैं। 

बाढ़ से निपटने के संरचनागत उपाय वस्तुतः परम्परागत उपाय है। इसके अन्तर्गत जलाशयों बाढ़ तटबन्धों, बांधों में निकासी चैनेलों का निर्माण, भूमि-कटाव निरोधक कार्य, चैनेल सुधार कार्य, बेसिन अवरोधन आदि उपाय किए जाते हैं। सरकार द्वारा अब तक के अनुभवों से पता चलता है कि अकेले संरचनागत उपायों से देश में बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों को हर समय संरक्षण प्रदान नहीं किया जा सकता। बाढ़ की समस्या से कारगर ढंग से निपटने के लिए इन उपायों के साथ गैर-संरचनागत उपाय भी आवश्यक हैं। बाढ़ पूर्वानुमान और अग्रिम चेतावनी बाढ़ का असर कम करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण ‘गैर-संरचनागत’ उपायों में से एक है। गैर-संरचनागत उपायों के अन्तर्गत अन्य उपाय इस प्रकार हैं- 

1. बाढ़ क्षेत्र अंचल बनाना जिनका लक्ष्य समय-समय पर बाढ़ से होने वाली क्षति को नियंत्रित रखने के लिए भूमि के उपयोग को नियमित बनाना है। 

2.बाढ़ की आशंका वाले स्थानों की पहचान और उनका आकलन करना, ताकि बाढ़ के नुकसान की मात्रा और विस्तार पर नियंत्रण के लिए ऐसे क्षेत्रों को विकास के अन्तर्गत लाया जा सके। 

3.बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों के निर्धारण के लिए उपयुक्त पैमाने के साथ मानचित्र तैयार करना, जिनका इस्तेमाल पिछली घटनाओं के आंकड़ों के साथ किया जा सके। 

4.ऐसे मानचित्रों जिनमें विभिन्न स्थानों के जलस्तर से लेकर सर्वोच्च जलस्तर तक के क्षेत्र प्रदर्शित किए गए हों, के प्रदर्शन से लोगों को किसी खास क्षेत्र को रिहायशी या व्यावसायिक उद्देश्य के लिए चुनने से पहले तत्सम्बंधी जोखिम का मूल्यांकन करने में मदद मिलेगी। सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह के मानचित्र लगाने से लोगों को बाढ़ क्षेत्र प्रबंधन की आवश्यकता के बारे में शिक्षित किया जा सकता है। 

उक्त उपायों के अलावा हमें प्रकृति के इस कोप से बचने के लिए पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति संरक्षण की तरफ विशेष रूप से ध्यान देना होगा। उन मानवीय गतिविधियों को रोकना होगा जो प्रकृति का क्षरण कर बाढ़ जैसी विनाश लीलाओं को आमंत्रित करती हैं। बाढ़ जैसी विभीषिकाओं से बचने के लिए हमें यह याद रखना होगा कि प्रकृति भी हमारी रक्षा तभी | करती है, जब हम प्रकृति की रक्षा करते हैं। 

Click here -HINDI NIBANDH FOR UPSC  

वर्तमान विषयों पर हिंदी में निबंध

हिन्दी निबंध 

HINDI ESSSAY

HINDI ESSAY ON 10 LINE

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

seven + two =