वित्तीय समावेशन पर निबंध(Financial Inclusion) | भारत में वित्तीय समावेशन अथवा जन धन योजना 

वित्तीय समावेशन पर निबंध

वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) अथवा भारत में वित्तीय समावेशन अथवा जन धन योजना 

वित्तीय समावेशन (जो कि समावेशी विकास का ही एक अनिवार्य घटक है) का प्रमुख लक्ष्य वित्तीय एवं बैंकिंग सेवाओं तक सभी का वहनीय पहुंच सुनिश्चित करवाना है। वित्तीय समावेशन पर गठित रंगराजन समिति ने इसे इस प्रकार परिभाषित किया है-“यह वह प्रक्रिया होती है, जिसके द्वारा समाज के कमजोर वर्गों और कम आय वाले समूहों को उनके द्वारा दी जा सकने वाली लागत पर, समय पर पर्याप्त मात्रा में उधार देने एवं वित्तीय सेवाएं पहुंचाने की व्यवस्था का जाती है।” रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने वित्तीय समावेशन को इस प्रकार स्पष्ट किया है- “वित्तीय समावेशन से अभिप्राय अल्प आय तथा कमजोर वर्ग के उस बड़े समूह को जो सामान्य रूप से प्रचलित बैंकिंग प्रणाली से लाभ प्राप्त करने में वंचित रह जाता है, को वहनीय लागत पर बैंकिंग सेवाओं एवं बैंकिंग उत्पादों से प्राप्त होने वाले लाभ उपलब्ध कराना है। यह ऐसा वर्ग है, जो जानकारी के अभाव के चलते तथा जटिल एवं लंबी प्रक्रियाओं के कारण बैंकिंग लाभ से प्रभावित नहीं हो पाता है।” इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि वित्तीय समावेशन में औपचारिक वित्तीय प्रणाली के माध्यम से समाज के वंचित लोगों को बचतों, ऋणों, बीमा, भुगतानों एवं मुद्रा के हस्तांतरण की सुविधाएं पहुंचाने की क्रियाएं सम्मिलित हैं। 

सामाजिक बदलाव की अनवरत जारी रहने वाली प्रक्रिया में समाज के बहिष्कृत लोगों को शामिल करना समावेशी विकास का प्रथम चरण है। समावेशन की शर्तों को न्यायोचित बनाना तथा वंचित संवर्गों के लिए समुचित, लगातार चलने वाली और सारवान प्रक्रिया को लक्षित समूह तक मोड़ना इस प्रक्रिया का दूसरा चरण है। यही चरण विकास के मूल आधार भी हैं। इनके द्वारा ही सुस्थिर एवं न्यायमूलक विकास का पथ प्रशस्त होता है, तो विकास को उत्तरोत्तर बल मिलता है। निर्धन एवं दुर्बल व्यक्तियों की आर्थिक कठिनाइयों को झेलने की सामर्थ्य वित्तीय समावेशन से बढ़ती है। 

आजादी के इतने वर्ष बीत जाने के बावजूद भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा वित्तीय सेवाओं के दायरे में नहीं आ पाया है। इस संदर्भ में ग्रामीण भारत की तस्वीर तो बहुत ही धुंधली है। इसमें अधिकतर सीमांत कृषक, कृषि मजदूर, भूमिहीन मजदूर, असंगठित क्षेत्र के स्वरोजगारी, वनोपज पर आश्रित समुदाय, शहरी निर्थन सामाजिक रूप से बहिष्कृत या उपेक्षित समूह, ग्रामीण कारीगर इत्यादि शामिल हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि देश की वर्तमान बैंकिंग प्रणाली वित्तीय समावेशन के लिए निर्धारित लक्षित समूह तक अपनी पहुंच नहीं बना पा रही है। सामान्य बैंकिंग प्रणाली का निष्पादन इस प्रकार से न तो उत्साहवर्धक है और न ही परिणाममूलक। यही कारण है कि आज भी देश का गरीब तबका सूदखोरों, महाजनों एवं निजी वित्तीय संस्थाओं के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाया है। इसमें कोई शक नहीं कि वित्तीय सुधारों और उदारीकरण की नई व्यवस्था के बाद देश में देशी और विदेशी बैंकों की बाढ़ सी आ गयी है। लेकिन इसके बावजूद भी ग्रामीण भारत का अधिकांश हिस्सा इन बैंकों से मिलने वाली सेवाओं से वंचित है। इस स्थिति में बदलाव के लिए हमारी सरकार न सिर्फ फिक्रमंद है, बल्कि वित्तीय समावेशन के लिए ठोस पहले भी की जा रही हैं। 

“यह वह प्रक्रिया होती है, जिसके द्वारा समाज के कमजोर वर्गों और कम आय वाले समूहों को उनके द्वारा दी जा सकने वाली लागत पर, समय पर पर्याप्त मात्रा में उधार देने एवं वित्तीय सेवाएं पहुंचाने की व्यवस्था की जाती है।”

भारत में वर्ष 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण जिन उद्देश्यों से किया गया था, उनमें से एक वित्तीय समावेशन को प्रोत्साहन प्रदान करना भी था। 1970 के दशक में वंचितों, गरीबों और ग्रामीण क्षेत्र के छोटे निवेशकों को ध्यान में रखकर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गयी। इन ग्रामीण बैंकों के लिए प्राथमिकता क्षेत्र पहले से ही तय कर दिए गए। इन्हें उन लोगों को कर्ज देने का कार्य सौंपा गया जिनके पास प्रत्याभूति के लिए कुछ नहीं था। ऋण के साथ अनुदान की भी व्यवस्था सरकार द्वारा की गयी। इसी क्रम में बांग्लादेश के मोहम्मद यूनुस (नोबल पुरस्कार विजेता) द्वारा शुरू की गयी माइक्रो क्रेडिट व्यवस्था में, जिसमें महिला समूहों को ऋण दिया जाता था, से प्रेरित होकर भारत में शुरू की गयी स्वयं सहायता समूह (SHG) योजना ने देश की तमाम ग्रामीण महिलाओं को न केवल स्वरोजगार हेत प्रेरित किया बल्कि उन्हें स्थानीय बैंक से जोड़ने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। केंद्र सरकार द्वारा इस क्रम में ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि की स्थापना की गयी है। इसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र में उधार देने में वाणिज्यिक बैंकों की कमी को पूरा करना है। 

वित्तीय समावेशन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा सार्थक पहल करते हए करेंसी मैटर्स और ‘डेक मैटर्स नाम से कॉमिक बुक का प्रकाशन शुरू किया गया है। राजू और मनी ट्री’ नामक एक कॉमिक बुक का भी प्रकाशन किया गया है। स्कूली बच्चों को वित्तीय साक्षर बनाने के लिए पोस्टर, पुस्तिकाओं, वीडियो फिल्मों, प्रदर्शनी जैसे माध्यमों का सहारा लिया जा रहा है। 

“वित्तीय समावेशन की पहले यह विश्वास पैदा कर रही हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की विकासशीलता का लाभ समाज के निर्धनतम व्यक्ति तक पहुंचेगा और वह आर्थिक विकास में भागीदार बन कर विकास की मुख्य धारा में शामिल होगा।” 

वित्तीय समावेशन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से जहां वर्ष 2011 में शुरू किए गए ‘स्वाभिमान’ कार्यक्रम के हमें सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए, वहीं अगस्त, 2014 में शुरू की गई ‘प्रधानमंत्री जन धन योजना’ को वित्तीय समावेशन के देशव्यापी वृहद अभियान के रूप में अभिहित किया गया है। प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत ‘शून्य शेष’ (Zero Balance) से खाता खोला जा सकता है तथा खाता धारक को ‘रुपे (Ru Pay) डेबिट कार्ड के साथ बीमा कवर प्रदान किया जाता है। इस योजना के तहत सूक्ष्म बीमा सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ ‘बैंक मित्र’ के माध्यम से ‘स्वावलंबन’ जैसी असंगठित क्षेत्र की पेंशन योजनाओं के लाभ भी प्रदान किए जाएंगे। प्रधानमंत्री जन धन योजना की सफलता का पता इसी से चलता है कि इस योजना के शुरू होने से फरवरी, 2019 तक खातों की संख्या लगभग 34.26 करोड़ तक पहुंच गई। यह भी एक नेक पहल है कि देश में संचालित की जा रही विभिन्न योजनाओं के द्वारा भी वित्तीय समावेशन के लिए नए अवसर सृजित किए गए हैं। मसलन, मनरेगा (ध्यातव्य है कि 2 फरवरी, 2016 को मनरेगा के 10 वर्ष पूरे हो चुके हैं) के तहत श्रमिकों की मजदूरी की राशि को बैंकों या डाकघरों में जमा करने की सुविधा प्रदान का गई। एलपीजी हेतु प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण योजना ‘पहल’ के तहत एलपाना सिलेंडर पर सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी सीधे उपभोक्ताआ क बैंक खातों में हस्तांतरित किए जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। 

भारत में वित्तीय समावेशीकरण की प्रक्रिया जारी है। इसे और गति एवं लय प्रदान करने के लिए निम्न सुझाव उपयोगी साबित हो सकते हैं –

वित्तीय साक्षरता को बढ़ाया जाए। इसके लिए साक्षरता और जागरूकता हेतु कार्यक्रम चलाया जाए।

बैंकों को दलालों, बिचौलियों के चंगुल से मुक्त किया जाए।

ग्रामीण क्षेत्र के अधिकतम निवासियों को किसान क्रेडिट कार्ड, स्वयं सहायता समूह, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी कार्यक्रम तथा अन्य विकास योजनाओं से जोड़ा जाए।

आधारभूत आवश्यक वस्तुओं तक सभी की पहुंच को सुनिश्चित किया जाए।

शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले सभी लोगों के लिए रोजगार के अवसरों की वृद्धि की जाए

शिक्षा स्वास्थ्य, आवास तथा खाद्य सुरक्षा पर अधिक सार्वजनिक व्यय किया जाए। 

आधारभूत बैंकिंग से सभी को परिचित कराया जाए। इसके लिए व्यापक कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता है।

बैंकों द्वारा लिंकेज कार्यक्रम शुरू किया जाए तथा प्रत्येक गांव के सभी वयस्कों को बैंक से जोड़ा जाए।

वित्तीय समावेशन की पहले यह विश्वास पैदा कर रही हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की विकासशीलता का लाभ समाज के निर्धनतम व्यक्ति तक पहुंचेगा और वह आर्थिक विकास में भागीदार बन कर विकास की मुख्य धारा में शामिल होगा। इससे भारतीय लोकतंत्र की श्रीवृद्धि भी होगी। 

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