कन्या भ्रूण हत्या पर निबंध| Essay on Female Foeticide in Hindi

कन्या भ्रूण हत्या पर निबंध  |

कन्या भ्रूण हत्या पर निबंध | Essay on Female Foeticide in Hindi

आज हमारे समाज में कन्याओं के प्रति अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं, जिनकी शुरुआत माँ के गर्भ में आने के साथ ही हो जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा समाज इक्कीसवीं सदी में पहुंचने के बाद भी अपनी पिछड़ी सोच में सुधार नहीं ला पाया है, खासतौर से कन्याओं के प्रति। जब भी कोई महिला गर्भवती होती है तो उसके परिवार में यह चर्चा जरूर होने लगती है कि होने वाली संतान लड़का होगा या लड़की। यही सोच समाज में लिंग अनुपात में एक बड़ा अंतर उत्पन्न करती है। यह सोच केवल शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी पाई जाती है। इसी सोच का नतीजा है बढती हई कन्या भ्रण हत्या की समस्या। सर्वविदित है कि सरकार द्वारा किसी गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहे भ्रूण का लिंग परीक्षण करना या करवाना अपराध घोषित किया गया है। यह कानून भी कन्या भ्रूण हत्या को रोकने पर प्रभावी ढंग से नियंत्रण नहीं रख पा रहा है क्योंकि इसमें परिवार के ही लोग शामिल रहते हैं, जिससे यह अपराध सामने नहीं आ पाता है। कुछ योगदान चिकित्सा विज्ञान की नवीन तकनीकों (जैसे अल्ट्रासाउंड या सोनोग्राफी) का भी है। जो कन्या भ्रूण हत्याओं में सहायक बन रही हैं। क्योंकि जिस मकसद से यह तकनीक विकसित की गई थी उसके बजाय इसका प्रयोग नकारात्मक चीजों के लिए होने लगा। 

“जब तक समाज जागरूक नहीं होगा तब तक कन्या भ्रूण हत्या को पूर्ण रूपेण समाप्त नहीं किया जा सकता।” 

क्या है कन्या भ्रूण हत्या : जब किसी गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहे भ्रूण की सही स्थिति का पता लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड या सोनोग्राफी कराई जाती है तो कभी-कभी महिला के पति या ससुराल पक्ष के लोगों द्वारा यह जानने की प्रबल इच्छा होती है कि गर्भ में पलने वाला भ्रूण लड़का है या लड़की। जबकि लिंग परीक्षण करना अपराध की श्रेणी में आता है फिर भी पैसे का लालच देकर यह पता लगा लिया जाता है कि संतान लड़का होगा या लड़की। जब यह निश्चित हो जाता है कि होने वाली संतान लड़की होगी तो पति या ससुराल पक्ष की ओर से गर्भपात (Abortion) की योजना बना ली जाती है जबकि कोई भी गर्भवती महिला गर्भ में पलने वाली संतान को जन्म देना चाहती है। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके गर्भ में पलने वाली संतान लड़का है या लड़की। फिर भी उसकी भावनाओं को नजरअंदाज करते हुए ससुराल पक्ष द्वारा उसका गर्भपात करा दिया जाता है जिससे एक कन्या को जन्म लेने से पहले ही माँ के गर्भ में मार दिया जाता है, जिसे कन्या भ्रूण हत्या के नाम से जाना जाता है। 

कन्या भ्रूण हत्या के कारण : विज्ञान और तकनीक, सामाजिक या पारिवारिक दबाव तथा सामाजिक कुरीतियां मुख्य रूप से कन्या भ्रूण हत्या के लिए जिम्मेदार मानी जा सकती हैं। विज्ञान और तकनीक का विकास सदैव मानव कल्याण के लिए किया गया है जिसमें चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान ने मानव-जीवन की रक्षा के लिए अतुलनीय योगदान दिया है। परंतु जैसा कि हम सभी जानते हैं कि प्रत्येक सिक्के के दो पहलू होते हैं। उसी प्रकार विज्ञान भी कभी-कभी वरदान के साथ अभिशाप बन जाता है। हमारे देश में लिंग अनुपात में होने वाले अंतर के लिए विज्ञान व तकनीक की बड़ी भूमिका है। अल्ट्रासाउंड मशीन की सहायता से गर्भ में पलने वाले भ्रूण की जांच की जाती है जिससे यह पता चलता है कि वह किस स्थिति में है। इस मशीन के उपयोग करने का उद्देश्य यह है कि गर्भ में पलने वाला शिशु किसी विकृति का शिकार न हो रहा हो। यदि जांच में कुछ ऐसा पाया जाता है तो उसे दूर किया जाए। परंतु इस अल्ट्रासाउंड मशीन का उपयोग नकारात्मक रूप में भ्रूण का लिंग परीक्षण करने के लिए होने लगा जो कि कन्या भ्रूण हत्या जैसे घृणित कार्य में सहायक सिद्ध होने लगा। चीन द्वारा एक ऐसी हल्की अल्ट्रासाउंड मशीन निर्मित की गई है जिसे कार में रखकर ही गर्भ में पल रहे भ्रूण का लिंग परीक्षण किया जा सकता है। 

जब यह पता चलता है कि गर्भ में पलने वाला भ्रूण लड़का नहीं. लड़की है तो गर्भवती महिला के पति एवं उसके ससराल पक्ष की महिलाओं द्वारा उस पर यह दबाव डाला जाता है कि वह गर्भपात करवा ले। लेकिन कोई भी गर्भवती महिला गर्भपात कराने के लिए तैयार नहीं होती क्योंकि उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि गर्भ में पलने वाला शिशु लड़की है या लड़का, वह हो सिर्फ उसे जन्म देकर पालना चाहती है। परंतु जब उसे समाज का डर दिखाया जाता है कि उसे जीवन भर बेटी पैदा करने के लिए ताने सुनने पड़ेंगे क्योंकि जिसे लड़का नहीं होता उस महिला को समाज में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। यह सब सुनकर गर्भवती महिला न चाहते हुए भी विवश होकर गर्भपात कराने के लिए समर्पण कर देती है। यह एक विडंबना ही है कि आज भी हमारे समाज में लोगों की सोच लड़के और लड़की के प्रति समान नहीं है। उनका मानना है कि लड़कियों को यदि लड़कों की तरह पढ़ाया-लिखाया जाए, उच्च शिक्षा दिलाई जाए तो भी लड़कियों के विवाह में दान-दहेज के लिए धन का इंतजाम करना पड़ेगा और यदि एक से अधिक लड़की पैदा हो गई तो दहेज के लिए धन इकट्ठा करने में ही सारी जिंदगी निकल जाएगी। समाज में लड़कियों की सुरक्षा न होना भी एक अहम कारण बन गया है। इस प्रकार सामाजिक बुराइयां भी कन्या भ्रूण हत्या में आग में घी का काम कर रही हैं। देश में पितसत्तात्मक व्यवस्था विद्यमान होने के कारण कन्याओं के जन्म के प्रति समाज में सदियों से नकारात्मक सोच बनी हुई है। समाज में अभी भी कुछ संस्कार एवं जिम्मदारियां केवल पुरुषों के लिए ही बनाई गई हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखता है। अशिक्षा, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, राजनीतिक जागरूकता का अभाव आदि भी कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार हैं। 

कन्या भ्रूण हत्या रोकने के सरकारी प्रयास : हमारी सरकारें कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए पुलिस, प्रशासन एवं कानून के स्तर के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर जागरूकता लाने का प्रयास कर रही हैं। भ्रूण हत्या पर नियंत्रण करने एवं रोकथाम के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर पर सर्वप्रथम 1974 में सरकार द्वारा ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट’ पारित किया गया। इस एक्ट के तहत गर्भ में पलने वाला शिशु असामान्य है तथा परिवार नियोजन के साधनों के उपयोग के बावजूद गर्भ धारण हो जाए तो बीस सप्ताह (140 दिन) के अंदर गर्भपात करवाना वैध माना जाएगा। अल्ट्रासाउंड एवं अन्य मेडिकल मशीनों द्वारा लिंग परीक्षण को रोकने के लिए 1994 में प्रसव पूर्व परीक्षण तकनीक अधिनियम, 1994′ (PNDT Act, 1994) पारित किया गया। इस अधिनियम के तहत यदि गर्भवती महिला की आयु 35 वर्ष से अधिक हो या कम से कम दो गर्भपात हो चुके हों अथवा उसके या उसके परिवार में शारीरिक या मानसिक विकलांगता की पृष्ठभूमि रही हो तो ऐसी स्थिति में लिंग निर्धारण के लिए मेडिकल परीक्षण कराया जा सकता है। इस अधिनियम के तहत सभी अल्ट्रासाउंड क्लीनिकों का पंजीकरण अनिवार्य किया गया तथा इनके निरीक्षण का प्रावधान भी सुनिश्चित किया गया है। यदि निरीक्षण के दौरान कोई भी क्लीनिक, प्रयोगशाला कर्मी, डॉक्टर या कोई भी व्यक्ति निर्धारित कारणों के बिना कानून का उल्लंघन करेगा उसे 3 वर्ष का कारावास तथा 50 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जाएगा तथा पुनः इस तरह कानून का उल्लंघन करने पर 5 वर्ष का कारावास तथा एक लाख रुपये तक का जुर्माना किया जा सकता है। कन्या भ्रूण हत्या को समाप्त करने के लिए केंद्र एवं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा पिछले एक दशक में कन्याओं को संरक्षण, सुरक्षा एवं विकास सुनिश्चित करने के लिए विशेष योजनाएं और कार्यक्रम आरंभ किए गए हैं। 

लड़के एवं लड़कियों के लिंग अनुपात को संतुलित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने 22 जनवरी, 2015 को ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना का शुभरंभ किया। इस योजना को लागू करने के लिए शुरुआती 100 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया। पहले चरण के तहत इसमें देशभर के 100 जिले तथा दूसरे चरण के अंतर्गत 61 जिलों को शामिल किया गया। ध्यातव्य है कि 7 अगस्त, 2019 को योजना में कल शामिल 161 जिलों में से  10 जिलों को सम्मानित किया गया। इसमें हरियाणा के तीन जिले शामिल रहे। इस योजना का ही प्रताप रहा कि जहां वर्ष 2012 में हरियाणा का लिंगानुपात 832 था वहीं यह आंकड़ा दिसंबर, 2018 तक 924 पहुंच गया। 

कन्या भ्रूण हत्या से देश में होने वाले लिंगानुपात के बढ़ते अंतर से सरकार और समाज दोनों चिंतित हैं। सरकार द्वारा इसे रोकने के लिए भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। सन 1994 में PNDT Act, 1994 (Pre-Natal Diagnostic Technique Act, 1994) पारित किया गया तथा कड़े प्रावधान भी किए गए। परंत जब तक समाज जागरूक नहीं होगा तब तक कन्या भ्रूण हत्या को पर्ण रूपेण समाप्त नहीं किया जा सकता। समाज में व्याप्त पित सत्तात्मक व्यवस्था को लचीला बनाना होगा। कुछ सामाजिक जिम्मेदारियां महिलाओं को भी सौंपनी चाहिए जिससे वे अपनी बात रख सकें। लेकिन कल्या भ्रूण हत्या एक ऐसी सामाजिक बुराई है जिसमें महिला ही महिला की शत्रु साबित हो रही है, जिसे रोकने या समाप्त करने के लिए सिर्फ सरकारी या विधिक प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। जब भी कन्या भ्रूण हत्या का मामला सामने आता है तो उसके पीछे किसी न किसी महिला का ही हाथ होता है। वह चाहे गर्भवती महिला के ससराल पक्ष की हो या गांव समाज की महिला हो। इसके लिए समाज में महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा, अपहरण, दहेज प्रथा, शिक्षा का अभाव जैसी सामाजिक बुराइयां दूर करनी होंगी। कानून और सरकारें अपने तरीके से कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध को रोकने के लिए प्रयासरत हैं लेकिन जब तक गर्भवती महिला अपने विरुद्ध होने वाले अत्याचार का विरोध करके अपनी संतान को जन्म नहीं देगी. चाहे वह लड़का हो या लड़की, तब तक इस समाज से कन्या भणय जैसी बराई को समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए आप है कि गर्भवती महिला का उसके परिवार एवं समाज को पूरा सहयोग मिले। 

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