इच्छा मृत्यु पर निबंध Essay on Euthanasia in Hindi

इच्छा मृत्यु पर निबंध

इच्छा मृत्यु पर निबंध Essay on Euthanasia in Hindi भारत में इच्छामृत्यु : स्वरूप एवं सीमा 

“मृत्यु तो छुटकारा है और उसका स्वागत उसी तरह किया जाना चाहिए जैसे किसी मित्र का किया जाता है।” –महात्मागांधी 

ऐसा लगता है कि हम इच्छामृत्यु को वैधता का जामा पहनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। अब तो देश की शीर्ष अदालत ने भी कष्टप्रद जीवन से छुटकारे का रास्ता आसान बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 9 मार्च, 2018 को दिए एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि गरिमा के साथ मौत एक मौलिक अधिकार है। शीर्ष अदालत ने ‘लिविंग विल’ (Living Will) को भी वैध ठहराया और विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि जब तक इस संबंध में संसद कानून नहीं बना देती, तब तक ये दिशा निर्देश लागू रहेंगे। शीर्ष अदालत ने निष्क्रिय अथवा पैसिव (Pas sive) इच्छामृत्यु की अनुमति दी है। हालांकि वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट की ही खंडपीठ ने 42 वर्षों तक कोमा में रहीं अरुणा शानबाग के प्रकरण में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान की थी, किंतु तब इस संबंध में कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान या दिशा-निर्देश न होने के कारण स्थिति स्पष्ट नहीं हुई थी। विषय के परिप्रेक्ष्य में यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि वर्ष 1996 में ‘ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने निर्णय दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त ‘जीवन के अधिकार’ में मृत्युवरण का अधिकार तो शामिल नहीं है, परंतु गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार सम्मिलित है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विधि आयोग द्वारा वर्ष 2006 की अपनी 196वीं रिपोर्ट एवं वर्ष 2012 की 241 वीं रिपोर्ट में इच्छामृत्यु पर कानून बनाने की सिफारिश सरकार से की गई थी। स्पष्ट है कि भारत में इच्छामृत्यु के संदर्भ में पहले भी सकारात्मक माहौल रहा है। 

सुप्रीम कोर्ट ने 9 मार्च, 2018 को दिए एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि गरिमा के साथ मौत एक मौलिक अधिकार है। शीर्ष अदालत ने ‘लिविंग विल’ (Living Will) को भी वैध ठहराया और विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि जब तक इस संबंध में संसद कानून नहीं बना देती, तब तक ये दिशा-निर्देश लागू रहेंगे। 

मार्च 2018 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह स्पष्ट किया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार तब तक बेमानी हैं, जब तक इसमें व्यक्तिगत गरिमा को शामिल न किया जाए। जिस मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, उसकी मौत की प्रक्रिया को आसान बनाना भी गरिमा के साथ जीने के अधिकार में शामिल है। इसमें ‘लिविंग विल’ (Living Will) को भी वैध ठहराया गया। ‘लिविंग विल’ से अभिप्राय उस लिखित दस्तावेज से है, जिसमें मरीज पहले ही यह घोषणा कर सकता है कि यदि वह ठीक न होने की हालात में पहंच जाए य अपनी इच्छा जाहिर करने की स्थिति में न हो, तो उसे कैसा उपचार दिया जाए। इस विल में वह परिवरजनों को जीवन रक्षक प्रणाला (Life Support System) हटाने का अकधकार दे सकता है। 

“रोगी के जीवन को अनावश्यक पीड़ा से बचाने के लिए उसके जीवन को समाप्त कर देने को सुखमृत्यु (Euthanasia) कहा जाता है।” 

इच्छामृत्यु पर केन्द्रित इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पूर्व इच्छामृत्यु को पारिभाषिक स्तर पर समझ लेना उचित रहेगा। इच्छामृत्यु को सुखमृत्यु के रूप में अभिहित करते हुए समाजशास्त्रियों ने इसकी परिभाषा इस प्रकार दी है- “रोगी के जीवन को अनावश्यक पीड़ा से बचाने के लिए उसके जीवन को समाप्त कर देने को सुखमृत्यु (Euthanasia) कहा जाता है।” मृत्यु के इस स्वरूप में यदि ‘सुख’ की अवधारणा छिपी हुई है, तो संभवतः इसका कारण मृत्यु में निहित वह स्वच्छंदता एवं मुक्ति है, जो इसे एक डरावना एहसास नहीं, बल्कि एक सुन्दर घटना बनाती है। वस्तुतः इच्छामृत्यु को आंग्ल भाषा में यूथेनेसिया (Euthanasia) कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ ही होता है- ‘अच्छी मौत’ या ‘सहज मौत’। कुछ विद्वानों के अनुसार यूथेनेसिया (Euthanasia) की अवधारणा तो लगभग एक ही है, किन्तु जब किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति स्वयं अपने लिए मृत्यु मांगता है, तो इसे इच्छामृत्यु (Euthanasia) के रूप में अभिहित किया जाता है, जबकि रोगी के तीमारदारों, सगे संबंधियों एवं शुभचिंतकों द्वारा जब उसकी मृत्यु की मांग की जाती है, तो इसे ‘दया-मृत्यु’ (Mercy Killing) के रूप में अभिहित किया जाता है। बहरहाल, दोनों का मकसद एक ही है- कष्टप्रद जीवन से छुटकारा। 

इच्छामृत्यु के विविध स्वरूप हैं। ये हैं- एक्टिव यूथेनेसिया, पैसिव यूथेनेसिया, वालंट्री एक्टिव यूथेनेसिया एवं इनवालंट्री एक्टिव यूथेनेसिया। यहां इनके बारे में भी जान लेना उचित रहेगा। एक्टिव यूथेनेसिया के अंतर्गत असाध्य रोग से ग्रस्त व्यक्ति को कोई औषधि (जैसे- सोडियम पेंथोल जैसी किसी मृत्युकारक ड्रग का इंजक्शन देकर) या जहर देकर चिरनिद्रा में विलीन कर दिया जाता है, जबकि पैसिव यूथेनेसिया के अंतर्गत रोगी को दी जा रही जीवन रक्षक सुविधा (Life Support System) को हटाकर उसे प्रकृति एवं ईश्वर के ऊपर छोड़ दिया जाता है। इसी प्रकार वालंट्री एक्टिव यूथेनेसिया के अंतर्गत रोगी की स्वीकृति के बाद उसे मृत्युकारक औषधियां दी जाती हैं, जबकि इनवालंट्री एक्टिव यूथेनेसिया के अंतर्गत मरीज के मानसिक रूप से असमर्थ होने पर अनैच्छिक रूप से मृत्युकारक औषधियां दी जाती हैं। इच्छामृत्यु का यह स्वरूप प्रायः सभी देशों में अमान्य है। 

एक्टिव यूथेनेसिया के अंतर्गत असाध्य रोग से ग्रस्त व्यक्ति को कोई औषधि (जैसे- सोडियम पेंथोल जैसी किसी मृत्युकारक ड्रग का इंजेक्शन देकर) या जहर देकर चिरनिद्रा में विलीन कर दिया जाता है, जबकि पैसिव यूथेनेसिया के अंतर्गत रोगी को दी जा रही जीवन रक्षक सुविधा (Life Support System) को हटाकर उसे प्रकृति एवं ईश्वर के ऊपर छोड़ दिया जाता है। 

मार्च, 2018 के फैसले में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि जब तक संसद इस संबंध में कोई कानून नहीं बना देती है, तब तक ये लागू रहेंगे। संसद भी इस दिशा में प्रयत्नशील दिख रही है। ध्यातव्य है कि कुछ समय पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा इच्छामृत्यु (Eu thanasia) पर विधेयक के प्रारूप को जारी किया जा चुका है, जिससे ध्वनित होता है कि हम देश में इच्छामत्य को वैध बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस विधेयक |The Medical Treat ment of Terminally ill Patients (Protection of patients and Medical Practitioners)Bill] के प्रारूप के अनुसार देश में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति होगी, जिसमें मरणासन्न और लाइलाज हो चुके (Terminally ill) मरीज को दी जा रही जीवन रक्षक सुविधा (Life Support System) को हटाकर उसे प्रकृति और ईश्वर के ऊपर छोड़ दिया जाता है। इस विधेयक में सिर्फ निष्क्रिय, इच्छामृत्यु का पथ प्रशस्त किया गया है, सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) का नहीं। विधेयक के प्रारूप के अनुसार 16 वर्ष से अधिक के सभी असाध्य रोगी इच्छामृत्यु पा सकेंगे। हालांकि इसके लिए मरीज की पूर्व अनुमति अनिवार्य होगी। यदि मरीज पूर्व अनुमति देने में असमर्थ है, तो इस स्थिति में उच्च न्यायालय से अनुमति लेनी होगी। 16 से 18 वर्ष के अवयस्क रोगियों के मामले में अभिभावकों की स्वीकृति आवश्यक होगी। इस विधेयक के प्रारूप में लगभग वैसे ही प्रावधान हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों में इंगित किए गए हैं। 

यदि यह विधेयक निकट भविष्य में कानून बनता है, तो कष्टप्रद एवं दयनीय स्थितियों में चाहने पर मौत मिल जाएगी। ऐसा लगता है कि इस विधेयक का प्रारूप तैयार करते हुए भारत की पौराणिक परंपराओं तथा धर्म और दर्शन में निहित उस सिद्धांत को वरीयता दी गई है, जिसमें यह माना गया है कि प्राण एवं चेतना पर व्यक्ति का अधिकार है, न कि राज्य का। हमारी सनातनी संस्कृति में वानप्रस्थ परंपरा के तहत जहा जंगलों में रहकर तप-जप करते हुए शरीर त्यागने का चलन था, वहीं समाधि का भी प्रचलन था। जैन धर्म में संथारा का उल्लेख मिलता है, जिसके अंतर्गत मोक्ष प्राप्ति हेतु स्वेच्छापूर्वक मृत्युवरण का प्रावधान है। इच्छामृत्यु विधेयक के प्रारूप में सिर्फ निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति कुछ शर्तों के साथ देकर इसे एक स्वीकार्य स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया गया है। यह अच्छी बात है। 

जिन्दगी जब ऐसा बोझ बन जाए कि उसे उठा पाना मुमकिन न हो, तो इस दशा में रोगी के कष्ट को देखते हुए इच्छामृत्यु की अनुमति दिए जाने में बुराई नहीं है, किंतु इस इजाजत की निश्चित सीमाएं भी होनी चाहिए अन्यथा इसके दुरुपयोग की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। इस बात को कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है। आस्ट्रेलिया वह देश है, जहां सबसे पहले वर्ष 1995 में इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता देकर इसे जायज ठहराया गया तथा वर्ष 1996 में वहां इच्छामृत्यु का कानून लागू किया गया। देखते ही देखते वहां इच्छामृत्यु के मामलों की बाढ़ सी आ गई। आए दिन इसके दुरुपयोग के मामले सामने आने लगे, जिन्हें देखते हुए वहां की सरकार को कदम वापस खींचने पड़े। 25 मार्च, 1997 को आस्ट्रेलिया में यह कानून समाप्त कर दिया गया 

अब भारत में इच्छामृत्यु विधेयक का प्रारूप जारी कर इसे संवैधानिक दर्जा प्रदान करने की दिशा में कदम तो आगे बढ़ाए गए हैं, किंतु ये कदम हमें फूंक-फूंक कर रखने होंगे। भारत में इस भावी कानून के दुरुपयोग की संभावनाएं कमतर नहीं हैं। हमारे देश में जहां बढ़ते भ्रष्टाचार एवं अराजकता के साथ पारिवारिक विघटन एवं बुजुर्गों की उपेक्षा का चलन बढ़ा है, वहीं पारिवारिक हिंसा की घटनाएं भी बढ़ी हैं। हमारे देश में वृद्धजनों की स्थिति पहले से ही अत्यधिक चिंतनीय है। वृद्धों के प्रति उपेक्षा, अनदेखी एवं संवदेनहीनता के मामले हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रहें हैं। भ्रष्ट व्यवस्था ने सारे पैमाने ध्वस्त कर दिए हैं। सगे संबंधियों द्वारा वृद्धों की संपत्ति हड़पने के मामले रोज सामने आ रहे हैं, तो अकेले रहने वाले बुजुर्गों की हत्याएं भी हो रही हैं। इच्छामृत्यु को संवैधानिक दर्जा मिलने की स्थिति में यदि इसे हथियार बनाकर इसका दुरुपयोग किया जाने लगा तो स्थिति अत्यंत भयावह, विकराल और अराजक हो जाएगी। अनेकानेक दुष्परिणाम सामने आएंगे, तो कानून-व्यवस्था के समक्ष नई-नई चुनौतियां भी उत्पन्न होंगी। 

इच्छामृत्यु कानून के दुरुपयोग की गुंजाइश न रहे तथा यह कानून निजी स्वार्थों को साधने का हथियार न बने, इस बात का ध्यान विशेष रूप से इसके कानूनी ढांचे में रखना होगा। हालांकि अभी इच्छामृत्यु विधेयक का जो प्रारूप जारी किया गया है, उसमें ऐसे प्रावधान हैं, जो इसके दुरुपयोग की संभावना को कम करते हैं, किंतु भारत जैसे भ्रष्ट देश में जहां जमीन-जायदाद हथियाने के लिए नए-नए तौर-तरीके ईजाद कर लिए जाते हैं, इस बात की पूरी संभावना है कि कष्टप्रद जीवन से मुक्ति के इस कानून में सेंध लगा कर इसका बेजा इस्तेमाल शुरू कर दिया जाए। ऐसे में भरपूर सावधानी एवं एहतियात आवश्यक है। यानी हमें इच्छामृत्यु को संवैधानिक दर्जा प्रदान करते हुए इसे एक ऐसा सुरक्षा कवच भी प्रदान करना होगा, जो इसके दुरुपयोग को रोकपाने में सक्षम हो। 

वस्तुतः इच्छामृत्यु की कामना में परिस्थितियों का विशेष महत्त्व होता है। पीड़ाप्रद जीवन से छुटकारे की चाह अनेक मरणासन्न रोगियों में देखी जाती है। वैसे भी इच्छामृत्यु की मांग तभी होती है, जब व्यक्ति मरणासन्न अवस्था में आ जाता है और उसके स्वस्थ होने की संभावना बिल्कुल भी नहीं रहती। यानी चिकित्सकीय भाषा में ऐसा व्यक्ति ‘वेजिटेटिव स्टेट’ (Vegetative State) में आ जाता है। ऐसे में वह अपनी स्थिति से हताश होकर मृत्यु की कामना ईश्वर से करने लगता है। कभी-कभी तो वह इतना लाचार हो जाता है कि मृत्यु की कामना करने की स्थिति में भी नहीं रहता और ‘जिन्दा लाश’ बन कर रह जाता है। ऐसे विकट स्थितियों में इच्छामृत्यु को कानून के रूप में मान्यता प्रदान किया जाना अनुचित अथवा अप्रासंगिक नहीं है। वैसे भी कई देशों में इस संबंध में या तो कानून बनाए जा चुके हैं या न्यायिक आदेश जारी किए जा चुके हैं। इस वैश्विक परिदृश्य का उल्लेख सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में किया है। ऐसे में यदि भारत में ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ (Passive Euthanasia) को कानूनी स्तर पर वैधता प्रदान की जाती है, तो यह एक सही कदम होगा। 

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