पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध |Essay on Environmental Pollution

पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध

पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध |Essay on Environmental Pollution in hindi

प्रदूषण वायु, जल एवं स्थल की भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं का वह अवांछनीय परिवर्तन है जो मनुष्य और उसके लिए लाभदायक दूसरे जन्तुओं, पौधों, औद्योगिक संस्थानों तथा दूसरे कच्चे माल इत्यादि को किसी भी रूप में हानि पहुँचाता है.

 प्रदूषण का  प्रकार 

सामान्य दैनिक जीवन में पाँच प्रकार के प्रदूषणों से हमारा सामना होता है, जो इस प्रकार है- 

(1) वायु-प्रदूषण, (2) जल-प्रदूषण, (3) मृदा प्रदूषण, (4) ध्वनि प्रदूषण, (5) रेडियोधर्मी प्रदूषण. वायु-प्रदूषण 

मानव एवं अन्य जीव-जन्तुओं के जीवन के लिए वायु अति आवश्यक है, इसके बिना जीवन की कल्पना करना असम्भव है. प्रत्येक मनुष्य 24 घण्टों में 22 हजार बार श्वांस लेता है तथा 35 पौण्ड वायु अपने फेफड़ों में भरता है. वायुमण्डल में पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की गैसें एक निश्चित मात्रा एवं अनुपात में उपस्थित रहती हैं. जब किसी कारणवश वायु के अवयवों में अवांछित तत्व प्रवेश कर जाते हैं, तो इसका मौलिक सन्तुलन बिगड़ जाता है, जो मानव व अन्य जीव-जन्तुओं के लिए हानिकारक होता है. वायु दूषित होने की प्रक्रिया ‘वायु प्रदूषण’ कहलाती है. 

प्रदूषण का कारक 

(1) प्राकृतिक कारक, (2) मानवीय कारक. 

(1) प्राकृतिक कारक- वायु प्रदूषित होने के प्राकृतिक कारकों में ज्वालामुखी विस्फोट से निकली राख, जंगलों में आग लगना, आँधी तूफान के समय उड़ने वाली धूलकण आदि हैं. दलदल तथा अनूपों के अपघटित पदार्थों से निकली मीथेन गैस और वनों में पौधों से उत्पन्न हाइड्रोजन के यौगिक परागकण आदि प्राकृतिक कारणों से भी वायु प्रदूषण होता है. 

(2) मानवीय कारक-वर्तमान काल में मनुष्यकृत वायु प्रदूषण के अनेक कारक हैं. मानवीय कार्यों की वजह से वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनो-ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन, क्लोरीन, नाइट्रोजन ऑक्साइड, अमोनिया, सीसा, बैरीलियम, आर्सेनिक तथा धूलकण मिल जाते हैं. इसके मुख्य उद्गम स्रोत कल-कारखानों, ताप बिजलीघर, वाहन यातायात, परमाणु संयंत्र, कीटनाशक दवाई, रासायनिक उर्वरक, नाभिकीय विस्फोट, घरेलू ईंधन, धूम्रपान, खनन और ईंधन आदि. 

प्रदूषण का दुष्प्रभाव 

(i) अम्लीय वर्षा (Acid Rain)- वायु प्रदूषण से अम्लीय वर्षा होती है. प्रायः वर्षा जल को आसुत जल की तरह शुद्ध माना गया है, परन्तु अत्यधिक वायु-प्रदूषण वाले क्षेत्रों में जब वर्षा होती है तब उसमें विभिन्न प्रकार की गैसें तथा विषैले पदार्थ घुल जाते हैं यथा सल्फ्यूरिक अम्ल, सल्फर डाइऑक्साइड आदि. उनका उद्गम स्रोत औद्योगिक कल-कारखानों, कोयला एवं खनिज तेल के जलने से यातायात के साधनों एवं मोटर वाहनों से निकले धुआँ आदि हैं. इस तरह की वर्षा को अम्लीय वर्षा कहते हैं. इससे विषैले पदार्थ पृथ्वी पर पौधों में प्रवेश कर जाते हैं. इससे पेड़-पौधे नष्ट होने लगते हैं. 

(ii) औद्योगिक कल-कारखानों से वायु-प्रदूषण- औद्योगिक कल-कारखानों एवं संयंत्रों से निकलने वाली गैसें विभिन्न प्रकार के रोग पैदा करती हैं. आर्सेनिक युक्त खनिजों का प्रयोग करने वाले कारखानों के आस-पास आर्सेनिक युक्त वाष्प, एल्यूमिनियम तथा सुपर फॉस्फेट बनाने वाले कारखानों से क्लोराइड धूम्र तथा पाइराइटों से सल्फर डाइऑक्साइड वायुमण्डल में पहुँचती है. सल्फर डाइऑक्साइड से श्वसनी शोध, श्वसनिका, दमा आदि रोग हो जाते हैं. सीसा से सीसा, विषाक्ता और सिकतामय रोग हो जाते हैं. 

कल-कारखानों, चिमनियों, जीवाश्म ईंधनों के जलने से तथा यातायात के साधनों से निकला धुआँ वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अत्यधिक बढ़ा दी है, जिससे वायु प्रदूषित हो रही है. 

(iii) खनन से वायु प्रदूषण- खनन से भारी मात्रा में विभिन्न प्रकार के धूलकण उत्पन्न होते हैं, इसका कारण यह है कि खानों के खनन हेतु विस्फोट कटाई, ड्रिलिंग, मिट्टी-पत्थर हटाने वाली मशीनों के प्रयोग से अत्यधिक मात्रा में धूलकण उत्पन्न होते हैं. खानों में कार्य करने वाले खनिकों को अधिकतर फेफड़ों से सम्बन्धित रोग हो जाते हैं, तो वातावरण में धूलकणों की सान्द्रता, उनके आकार और प्रभाव में रहने के काल पर निर्भर करती है. यदि वायुमण्डल में धूलकणों की सान्द्रता अधिक हो तो और उनका बहुत छोटा हो तथा उनके प्रभाव में रहने की अवधि लम्बी होती हो. मनुष्य कुछ ही वर्षों में फेफड़ों के रोग से ग्रसित हो जाते हैं. 

(iv) जीव-जन्तुओं पर वायु-प्रदूषण- मानव की तरह ही अन्य जीवों का श्वसन तंत्रिका तथा केन्द्रिय तंत्रिका तंत्र भी वायु प्रदूषण से प्रभावित होता है. मधुमक्खी, शलभ तथा विभिन्न प्रकार के कीटभक्षी स्तनपोषी विशेष प्रकार के वायु प्रदूषण की वजह से मृत्यु का शिकार हो जाते हैं. कीट पतंगों की कुछ जातियाँ पर्यावरण प्रदूषण के कारण अनुकूलन हेतु आधारभूत परिवर्तन करते हैं. वायुमण्डल में धुएँ की मात्रा बढ़ जाने पर प्रकाश की ‘पराबैंगनी किरणों’ की मात्रा में कमी आ जाती है, जिससे जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता 

(v) वायु-प्रदूषण से वनस्पतियों पर दुष्प्रभाव-कोयला खनन कार्य से उत्पन्न धूलकण उसके आस-पास के क्षेत्रों में पेड़-पौधों, फसलों और अन्य वनस्पतियों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. यातायात के मुख्य साधन मोटर वाहन और रेलगाड़ियों आदि से निकले धुएँ के साथ ‘इथिलीन गैस’ निकलती है, जो फलों की कार्नेशन पंखुड़ियों को प्रभावित करती है. वायु प्रदूषण से सूर्य किरण की मात्रा में कमी आ जाती है. इससे पौधों में प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया असन्तुलित हो जाती है. 

(vi) वायु-प्रदूषण से ओजोन परत खतरे में- वायुमण्डल की ‘समताप मण्डल’ की ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर पहुँचाने से रोकती है. इन किरणों से जलवायु, कृषि तथा मानव स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है. पराबैंगनी किरणों को वायुमण्डल में मौजूद ओजोन पर अवशोषित कर लेती हैं, परन्तु वैज्ञानिक के मतानुसार जेट विमान से निकले धुएँ तथा फ्रिजों, एयरकण्डीशनरों आदि में प्रयुक्त होने वाली ‘क्लोरो-फ्लोरो कार्बन (सी.एफ.सी.) गैस के प्रयोग और प्रदूषित वायुमण्डल की वजह से विगत 100 वर्षों में ओजोन की परत में 3% से 4% तक की कमी हुई है. इससे पराबैंगनी किरणों के पृथ्वी पर पहुँचने की सम्भावना बढ़ी है.

  प्रदूषण नियन्त्रण के उपाय 

वायु प्रदूषण उत्पन्न करने वाले सभी साधनों को प्रारम्भ में ही रोक दिया जाए. अथवा उन साधनों को नियन्त्रित कर लिया जाए, तो सम्भवतः कुछ सीमा तक वायू प्रदूषण नियन्त्रित किया जा सकता है. इसे नियन्त्रित करने के लिए कुछ प्रमुख उपाय इस प्रकार हैं 

(1) घरों में ऐसे ईंधनों को जलाया जाए, जो धुआँ रहित हो, ईंधन जलाने से पूर्व उसका शोधन किया जाना चाहिए, इससे उत्सर्जित गैसों में प्रदूषकों की मात्रा कम होगी. 

(2) प्राकृतिक गैस का ही उपयोग किया जाना चाहिए. प्राकृतिक गैस के जलने से ‘गन्धक के ऑक्साइड’ बहुत कम उत्सर्जित होते हैं. 

(3) स्वचालित वाहनों में धुएँ को ‘निर्वात नली’ द्वारा छानकर बाहर निकालना चाहिए. 

(4) वाहनों में ‘हाइड्रोकार्बन की मात्रा कम करने के लिए इंजनों की डिजाइन और ट्यूनिंग को सुधारना चाहिए. 

(5) कोयले एवं खनिज तेल से चलने वाले इंजनों के स्थान पर विद्युत चलित इंजनों का प्रयोग करना चाहिए. 

(6) वैज्ञानिकों के अनुसार यदि सम्पूर्ण भू-मण्डल का 33% भाग वन से घिरा हो, तो वायु प्रदूषण से हानि लगभग नहीं होगी. 

(7) कल कारखानों को मानव आबादी से दूर होना चाहिए तथा उनकी चिमनियों को अधिक ऊँचा करके उनसे निकलने वाले धुएँ को साफ करने के लिए उसमें विशेष फिल्टर यंत्र का प्रयोग करना चाहिए. 

(8) गोबर या कूड़ा-कर्कट को यत्र-तत्र न फेंक कर आबादी से बाहर किसी गड्ढे में डालना चाहिए, जिससे उनसे निकलने वाली दूषित वायु से वायु प्रदूषण कम हो सके. 

(9) पेट्रोल, डीजल आदि से चलने वाले वाहनों का प्रयोग कम करना चाहिए, इससे वायुमण्डल में SO, तथा CO जैसी विषैली गैसों की मात्रा घटेगी. जल-प्रदूषण 

जल सभी जीव-जन्तुओं, मनुष्यों एवं पर्यावरण का एक अनिवार्य घटक है. जीवन की वे सारी प्रक्रियाएँ जिनसे मानव शरीर को ऊर्जा मिलती है, इसके लिए जल अतिआवश्यक होता है. जल में आवश्यकता से अधिक खनिज लवण, कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ और अम्ल, संयंत्रों, कल-कारखानों से निकले हुए अवशिष्ट, मल-मूत्र, जन्तु कूड़ा कर्कट आदि नदियों, झीलों तथा समुद्रों में विसर्जित किए जाने से ये पदार्थ जल के वास्तविक रूप को नष्ट करके उसे प्रदूषित कर देते हैं, जिनका मनुष्य और जीव-जन्तुओं व वनस्पतियों पर घातक कुप्रभाव पड़ता है. इस प्रकार जल का दूषित होना ‘जल-प्रदूषण’ कहलाता है. 

कारक 

जल प्रदूषण के प्रमुख कारक इस प्रकार हैं-

(1) जल मृतजीवी जन्तु, मल मूत्र, कूड़ा कर्कट आदि छोड़ने से जल प्रदूषण उत्पन्न होता 

(2) नदी या तालाबों में नहाने एवं साबुन प्रयोग, कपड़ा साफ करने में डिटरजेंट्स साबुन के प्रयोग से जल प्रदूषित होता है. 

(3) आणविक तथा नाभिकीय ऊर्जा के प्रयोग से रेडियो सक्रिय पदार्थ जल को प्रदूषित कर देते हैं. 

(4) कल कारखानों, संयंत्रों के गन्दे अवशिष्ट उत्पाद के नदियों में जाने के कारण जल प्रदूषित हो जाता है. 

(5) वर्षा के जल के साथ साथ फसलों पर डाले गये रासायनिक खादों एवं कीटनाशक पदार्थ मिट्टी में मिले अन्य हानिकारक पदार्थ भी जलाशयों एवं नदियों में पहुँचते हैं, जिससे जल प्रदूषित हो जाता है. 

(6) महासागरीय यातायात की वजह से समुद्र भी प्रदूषित हो जाता है. महासागर में तेलवाहक जहाज के रिसने से जल प्रदूषण होता है.

दुष्प्रभाव 

जल प्रत्येक जीव-जन्तु एवं वनस्पतियों के लिए एक अनिवार्य घटक है, परन्तु जल प्रदूषित होने की वजह से हर एक के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. जल-प्रदूषण से उत्पन्न प्रमुख दुष्प्रभाव एवं उनके साधन निम्नलिखित हैं 

(1) कृषि कार्य से हुए जल-प्रदूषण का दुष्प्रभाव कृषि में प्रयुक्त रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के व्यवहार से जल प्रदूषित होता है. जिन खेतों में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों को डाला जाता है. वह जल में बहकर नदियों या जलाशयों और झीलों आदि में मिलकर उन्हें भी दूषित कर देता है. 

(2) डेयरी उद्योग से जल-प्रदूषण-डेयरी उद्योग से निकलने वाले अवशिष्ट जल में “लैक्टोस’ प्रोटीन तथा वसा की मात्रा अधिक होती है, यह जल स्रोतों में घुलकर जलीय जीवों की रसायन ऑक्सीजन की मांग बढ़ा देते हैं. इससे जल में सूक्ष्म जीवों की वृद्धि होने में मदद मिलती है. 

(3) कागज उद्योग से जल-प्रदूषण कागज उद्योग में सबसे अधिक जल का प्रयोग होता है तथा वे सभी दूषित भी हो जाते हैं, बहिःसाव में निष्कासित क्लोरोफिनॉल, सल्फाइड, लिग्गीज, डॉक्सीन आदि की मात्रा अधिक रहती है. 

(4) शक्कर उद्योग से जल-प्रदूषण-शक्कर उद्योग से निकले अवशिष्ट शीरा जिसमें भारी मात्रा में शक्कर सुक्रोस आदि होते हैं, जिससे जल का धुंधलापन बढ़ता है तथा रंगीन हो जाता है. 

(5) चमड़ा उद्योग से जल-प्रदूषण- सतही तथा भूमिगत दोनों प्रकार के जल ‘चमड़ा उद्योग’ से निकले दूषित जल द्वारा प्रदूषित होता है. इससे निकले दूषित जल में 35% से भी अधिक ‘क्लोराइड’ की मात्रा तथा पानी में खारापन, अमोनिया, सल्फाइड टेनिन और क्रोमियम जैसे तत्वों की मात्रा अधिक हो जाती है. मछलियों के लिए इस प्रकार का जल सबसे अधिक हानिप्रद होता है. 

(6) औद्योगिक संयंत्रों से उत्पन्न जल-प्रदूषण का दुष्प्रभाव- कल कारखानों एवं औद्योगिक संयंत्रों के गन्दे अवशिष्ट और बहिःस्राव को नदियों में छोड़ने से जल प्रदूषित हो जाता है. इससे नदियों में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है. प्रदूषित जल से पीलिया, पेचिस और टाइफाइड जैसी बीमारियाँ फैलती हैं, जो मानव को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं.. 

(7) सीवेज सिंचाई प्रणाली से उत्पन्न जल-प्रदूषण का दुष्प्रभाव- शहरी अवशिष्ट से उत्पन्न प्रदूषण की समस्या को कम करने के उद्देश्य से ‘सीवेज सिंचाई प्रणाली’ का प्रारम्भ किया गया तथा प्रमुख शहरों में सीवेज फॉर्म की स्थापना की गई, जिससे सिंचाई के अन्तर्गत क्षेत्रफल भी बढ़ा है, परन्तु सीवेज में फफूंदी, बैक्टीरिया, वाइरस तथा भारी तत्त्व आदि होने से सीवेज फॉर्म पर कार्यरत श्रमिकों को पेट, त्वचा तथा श्वसन आदि से सम्बन्धित रोग हो जाते हैं. 

(8) ताप विद्युत गृह से उत्पन्न जल-प्रदूषण का दुष्प्रभाव–ताप विद्युतगृह से उत्पन्न ऊष्मीय प्रदूषण फैलते हैं. प्रदूषित जल के साथ-साथ यदि जल का तापमान बढ़ जाए, तो जल में घुलनशील ऑक्सीजन कम हो जाती है. तापमान बढ़ने से जल में लवणों की विलेयता बढ़ जाती है. 

(9) लौह अयस्क उद्योग से उत्पन्न जल प्रदूषण का दुष्प्रभाव-‘लौह अयस्क’ बनाने के पश्चात् बचे हुए ‘स्लैग’ को अन्यत्र फेंक दिया जाता है, जो वर्षा के जल में घुलकर अन्य जलों को प्रदूषित कर देता है. 

(10) खनन से जल-प्रदूषण-खानों के खनने के दौरान उत्पन्न धूल कण भी नदियों, झीलों, जलाशयों एवं कुओं के जल को दूषित कर देता है. सबसे अधिक कोयला खनन से जल प्रदूषित होता है. प्रदूषित जल जल स्रोतों तक पहुँचकर उन्हें प्रदूषित कर देता है और बिना शोधन के ये जल मैदान, खेतों में जाकर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं. 

(11) तेल एवं पेट्रोलियम उद्योग से जल-प्रदूषण- कच्चे तेल के उत्पादन, शोधन और वितरण से पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ जल प्रदूषण भी होता है. तेल टैंकरों के दुर्घटनाग्रस्त होने से डीजल रेलवे इंजन कारखानों के टैंकरों की सफाई से निकले तेल युक्त पानी समुद्र में डालने से तेल समुद्र की सतह पर फैल जाता है. इस तेल के पानी में मिल जाने से जलीय जीव-जन्तु की मृत्यु हो जाती है तथा सूर्य किरणें पानी के अन्दर नहीं पहुँच पाती हैं, जिससे जल विषाक्त हो जाता है. 

(12) अम्लीय वर्षा से जल-प्रदूषण- कल-कारखानों, वाहनों आदि से निकले धुओं में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड तथा नाइट्रिक ऑक्साइड गैस वाष्पकणों से रासायनिक प्रतिक्रिया कर जल में घुल जाते हैं और बरसते हैं, इस प्रकार की वर्षा ही ‘अम्लीय वर्षा’ कहलाती है. इसका दुष्प्रभाव जलीय जीव-जन्तुओं पर सबसे अधिक होता है. 

(13) बाँध एवं जलाशय निर्माण से जल-प्रदूषण- छोटी नदियों पर बाँध बनने से कालान्तर में वह मृतप्राय हो जाती है, बाँध में पानी ठहर जाता है, इससे नदी की धारा धीमे पड़ जाती है तथा प्रदूषण से निपटने की शक्ति क्षीण हो जाती है, अतः वहाँ का जल प्रदूषित हो जाता है.

नियन्त्रण के उपाय 

जल प्रदूषण नियन्त्रण करने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं- 

(1) कल कारखानों से निकलने वाले जहरीले अवशिष्ट पदार्थों एवं गर्म जल को मुख्य जल-स्रोतों जैसे- जलाशयों, नदियों या समुद्रों में विसर्जन करने से रोकना चाहिए. 

(2) जिन फसलों पर कीटनाशक दवाओं का प्रयोग किया जाता है उन खेतों से बहने वाले जल को पीने वाले जलाशय व कुओं में जाने से रोकना चाहिए. 

(3) कीटनाशकों के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए. इसके अतिरिक्त जैव उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए जैसे-राइजोबियम, माइकोराजा आदि. 

(4) कूड़ा-कर्कट को जलाशयों, नदियों में न डालकर शहर से बाहर किसी गड्ढे में ढंक देना चाहिए. 

(5) ‘उर्वरक संयंत्रों’ विद्युत संयंत्रों आदि से सल्फर तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करके ‘अम्लीय वर्षा’ को रोका जा सकता है. 

(6) मृत जीव-जन्तुओं को नदियों में प्रवाहित नहीं करना चाहिए तथा चिता की राख भी नदियों में नहीं डालनी चाहिए. 

(7) चमड़ा उद्योग में खाल से बाल निकालने तथा उसे नरम करने की प्रक्रिया में ‘प्रेटियेस एन्जाइम’ का व्यवहार करना चाहिए. 

(8) कपड़ा व अन्य उद्योगों जिसमें रंगों का प्रयोग होता है उसके रंगीन जल में रंगों का शोषण करने के लिए ‘लिग्नीन’ का प्रयोग करना चाहिए, जो कागज के अवशिष्ट जल में पाया जाता है. 

(9) विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री बनाने वाले उद्योगों में सौर ऊर्जा की सहायता से अवशिष्टों का उपचार करना चाहिए. इस अवशिष्ट जल से मछली पालन करना चाहिए. 

(10) सीवर का जल शहर से बाहर शोधन करके नदियों में डालना चाहिए. 

(11) तेल से बने कीचड़ को ‘बायोरेमिडियेशन तकनीक’ द्वारा साफ करना चाहिए. मिट्टी के साथ कीचड़ को मिलाकर उसकी आर्द्रता, तापमान बनाए रखते हुए उनमें यूरिया एवं फास्फेट आदि डालकर उसे खाद्य में बदल देना चाहिए.

मृदा-प्रदूषण 

मृदा में विभिन्न प्रकार के लवण, खनिज तत्व, कार्बनिक पदार्थ, गैसें एवं जल एक निश्चित मात्रा के अनुपात में होते हैं. मृदा में उपर्युक्त पदार्थों की मात्रा एवं अनुपातन में उत्पन्न परिवर्तन ‘मृदा प्रदूषण’ कहलाता है.

कारक 

मृदा या मिट्टी प्रदूषण से भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो जाती है, जिससे कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. 

मृदा प्रदूषण विभिन्न प्रकार के कीटाणुनाशक, शाकनाशक तथा कवकनाशक के छिड़काव द्वारा होता है. ये पदार्थ विलयन के रूप में तैयार कर फसलों पर छिड़की जाती है जिनकी अधिकांश मात्रा भूमि में चली जाती है. वर्षा जल के साथ-साथ ये पदार्थ भूमि के ऊपर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचकर मृदा प्रदूषण करते हैं. ये पदार्थ मानव शरीर में पहुँचकर विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं.

दुष्प्रभाव 

मृदा-प्रदूषण के प्रमुख दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं 

(1) बाँधों एवं जलाशयों के निर्माण से मृदा-प्रदूषण-बाँधों एवं जलाशयों के निर्माण से मृदा-प्रदूषण होता है तथा इनके निर्माण से निम्नलिखित दुष्प्रभाव पड़ता है 

(क) भू-क्षरण एवं भू-स्खलन में वृद्धि- बाँधों के निर्माण से भू-क्षरण एवं भू-स्खलन में वृद्धि होती है. बाँधों के जल ग्रहण क्षेत्र में तीव्र गति से वन-विनाश के कारण भू-क्षरण एवं भू-स्खलन में वृद्धि हो रही है. 

(ख) कृषि भूमि का हास-बाँधों एवं जलाशयों के निर्माण से कृषि भूमि का बहुत बड़ा भू-भाग जल मग्न हो जाता है, जिससे उस क्षेत्र के वन सम्पदा एवं कृषि भूमि ही समाप्त हो जाती है. 

(ग) वन भूमि का ह्रास-बाँधों एवं जलाशयों के निर्मित होने से वन भूमि जलमग्न हो जाती है, जिससे अनेक प्रकार की वन प्रजातियाँ, हजारों वर्ष पुरानी जड़ी बूटी, वन औषधियाँ आदि डूब जाती हैं. 

(2) उर्वरकों के प्रयोग से मृदा-प्रदूषण-उर्वरकों के प्रयोग से जहाँ खाद्यान्न उत्पादन में सराहनीय योगदान होता है वहीं इनके असन्तुलित प्रयोग से कृषि उत्पादन एवं कृषि भूमि पर प्रतिकूल असर पड़ता है. 

(3) सिंचाई साधनों के प्रयोग से मृदा-प्रदूषण- भारत में अनुमानतः 50 लाख हेक्टेयर उपजाऊ भूमि क्षेत्र विभिन्न स्तर की क्षारीयता से प्रभावित है. क्षारीयता के अनेक कारणों में एक प्रमुख कारण सिंचाई साधनों में वृद्धि होना भी है. 

(4) खनन से मृदा-प्रदूषण-अधिकतर खनन क्षेत्र जंगलों में पाए जाते हैं इसलिए खनन की वजह से भू-वन क्षेत्रफल में कमी आ रही है. साथ ही साथ जंगलों की कमी से पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ता है. 

(5) अम्लीय वर्षा से मृदा-प्रदूषण- अम्लीय वर्षा से सल्फ्यूरिक अम्ल एवं सल्फर डाइ ऑक्साइड आदि होते हैं, जो निश्चित ही मृदा उत्पादकता में ह्रास लाती है. नियन्त्रण के उपाय 

मृदा प्रदूषण नियन्त्रण एवं संरक्षण के लिए निम्नलिखित कार्य किए जा सकते हैं 

(1) वृक्ष वायु को रोकते हैं. ये तेज हवा की गति और शक्ति कम करते हैं तथा ये उसे ऊपर से उर्वर मिट्टी को उड़ा ले जाने से रोकते हैं. 

(2) वृक्षों की जड़ें मिट्टी को अच्छी तरह से पकड़े रहती हैं. इससे तेज वर्षा या बाढ़ उर्वर भूमि को काटकर बहा नहीं पाती है. 

(3) जब वृक्ष सूख जाते हैं तो उनके विभिन्न भाग पत्ते पत्तियाँ आदि सड़-गलकर मिट्टी की ऊपरी परत में मिलकर उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं. 

(4) भूमि कटाव को रोकने के लिए वृक्षारोपण एवं बचे वनों की सुरक्षा की जाए तथा कटाई पर पाबन्दी लगायी जाए. 

(5) सड़कों, नहरों, नदी, पोखर के किनारे वृक्ष लगाये जाएँ. 

(6) मृत जीव-जन्तुओं के शरीर तथा कूड़ा कर्कट को शहर से दूर मिट्टी के अन्दर दबा देना चाहिए. 

(7) कीटनाशक दवाओं का प्रयोग कम करना चाहिए. अनाजों को प्रयोग करने से पहले अच्छी तरह धो लेना चाहिए. 

(8) कृत्रिम उर्वरकों के बदले देशी खाद का प्रयोग करना चाहिए तथा हरी खाद व गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए.

(9) खान से खनिजों को प्राप्त करने के लिए प्रदूषण नियन्त्रण कानून का पालन करना चाहिए.

ध्वनि-प्रदूषण 

वायु, जल और मृदा प्रदूषण की तरह ध्वनि/शोर जो हमारे कानों के लिए कर्णप्रिय नहीं है मानव जीवन के लिए हानिकारक होते हैं, तथा यह वातावरण में प्रदूषण का अंग बन जाते हैं. वातावरण में उत्पन्न विभिन्न प्रकार की ध्वनि जो विभिन्न यन्त्रों के द्वारा उत्पन्न होती है वही ‘ध्वनि प्रदूषण’ कहलाता है. 

ध्वनि प्रदूषण की समस्या भी मानव जीवन को अत्यधिक प्रभावित करती है. विश्व एवं भारत में ऐसे बहुत से महानगर हैं जहाँ ध्वनि 100 डेसीबल से अधिक है. 25 से 65 डेसीबल तक की ध्वनि-शान्त, 66 से 75 डेसीबल तक की ध्वनि को ‘साधारण शोर’ तथा 75 डेसीबल से अधिक को अत्यधिक शोर कहा जाता है. 140 डेसीबल से अधिक की ध्वनि के सम्पर्क में रहने वाले व्यक्ति पागल हो सकते हैं.

कारक 

ध्वनि कारखानों की मशीनों, लाउडस्पीकरों, वायुयान, रेलगाड़ी, मोटर वाहन, जेनरेटर, पेट्रोलियम तेल से चलने वाली अन्य मशीनों, औद्योगिक संयंत्रों, खनन युद्ध आदि से विभिन्न प्रकार की ध्वनि तरंगें निकलती हैं, इनसे निकलने वाली ध्वनि तरंगें वातावरण में ‘ध्वनि प्रदूषण’ का कारण बनती हैं. 

ध्वनि-प्रदूषण के अन्य साधनों में प्रमुख त्योहारों तथा विवाह आदि शुभ अवसरों पर छोड़े जाने वाला पटाखा, मन्दिर, गुरुद्वारा एवं चर्च घण्टियाँ तथा मस्जिदों के लाउडस्पीकरों तथा मनोरंजन के साधन चलचित्र आदि हैं. 

खनन के दौरान किए गए विस्फोटों तथा मशीनों द्वारा की गई कटाई एवं ड्रिलिंग से उत्पन्न शोर ध्वनि प्रदूषण का प्रमुख कारक बनता है. प्रदूषण 

ध्वनि प्रदूषण का जन-जीवन पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख दुष्प्रभाव इस प्रकार हैं 

(1) तीव्र ध्वनि से श्रवण-शक्ति में ह्रास आता है. 

(2) तीव्र ध्वनि से नींद नहीं आती है, इससे नाड़ी सम्बन्धी रोग एवं अन्य रोग होने की सम्भावना रहती है. 

(3) जिन कल कारखानों एवं औद्योगिक संयंत्रों आदि में भी अत्यधिक शोर होता है अथवा जहाँ 75 डेसीबल से ऊपर शोर होता है, वहाँ के लोग बहरापन, मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन के शिकार हो जाते हैं. 

(4) तीव्र ध्वनि जन्तुओं के हृदय, मस्तिष्क एवं यकृत को हानि पहुंचाता है. 

(5) अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण से सूक्ष्म जीवाणु नष्ट हो जाते हैं, जिससे मृत अवशेषों के अपघटन में बाधा पहुँचाती है.

नियन्त्रण के उपाय 

ध्वनि प्रदूषण साधनों एवं कारकों को नियन्त्रित करके ध्वनि प्रदूषण में कमी लाई जा सकती है. ध्वनि प्रदूषण नियन्त्रण करने के लिए प्रमुख उपाय इस प्रकार हैं- 

(1) औद्योगिक कल-कारखानों को शहर, गाँवों, आबादी से दूर स्थापित किया जाना चाहिए. 

(2) मोटर वाहनों में तीव्र ध्वनि वाले ‘हॉर्न’ के प्रयोग पर प्रतिबन्ध होना चाहिए. 

(3) तीव्र आवाज उत्पन्न करने वाले आतिशबाजी व पटाखों के निर्माण पर प्रतिबन्ध होना चाहिए. 

(4) आग्नेयशास्त्रों के प्रयोग पर भी कठोर नियम होना चाहिए. 

(5) लाउडस्पीकरों, जो स्थायी रूप से धार्मिक या सार्वजनिक स्थलों पर लगे होते हैं. वहाँ अत्यधिक तीव्र आवाज में बजाने पर रोक लगा देनी चाहिए. 

(6) चुनाव प्रसार आदि अवसरों पर लाउडस्पीकरों के प्रयोग पर पूर्णतः प्रतिबन्ध होना चाहिए. 

(7) खनन कार्य में प्रयुक्त तीव्र आवाज उत्पन्न करने वाली मशीनों के शोर नियन्त्रित करने के लिए ‘पैड’ अथवा ‘साइलेन्सर’ अवश्य लगा होना चाहिए.

रेडियोएक्टिव प्रदूषण 

सभी प्रकार के प्रदूषक तत्त्वों में रेडियोधर्मी प्रदूषक तत्त्व सबसे अधिक हानिकारक होता है. इसका प्रभाव जल, थल एवं वायु तीनों में पड़ता है. रेडियोधर्मी पदार्थों के परमाणु नाभिकों से अल्फा (a), बीटा (B) एवं गामा (१) करणे निकलती हैं. वे किरणे जीवधारियों के गुणसूत्र तथा जीन में परिवर्तन कर सकती हैं. इससे उनके वास्तविक लक्षणों एवं संरचना में परिवर्तन हो जाता है. यह क्षति आनुवंशिक परिवर्तन भी प्रेरित कर सकती है जिस वजह से भावी पीढ़ियों का शारीरिक गठन असामान्य हो सकता है. रेडियोधर्मी पदार्थों की क्रियाशीलता द्वारा हुए प्रदूषण को रेडियोधर्मी-प्रदूषण कहते हैं. कारक 

रेडियोधर्मी-प्रदूषण के प्रमुख कारक एवं साधन निम्नलिखित हैं 

(1) कोबाल्ट, स्ट्रॉन्शियम, थोरियम, कार्बन आदि रेडियोधर्मी प्रदूषण फैलाने वाले मुख्य रेडियोधर्मी पदार्थ हैं. 

(2) रेडियोधर्मी पदार्थ नाभिकीय अस्त्रों के विस्फोटों से सबसे अधिक उत्पन्न होते हैं. इनमें परमाणु बम का सबसे अधिक घातक प्रभाव होता है. 

(3) रेडियोधर्मी धूल एवं रासायनिक धूल. (4) ‘नाभिकीय ऊर्जा केन्द्र’ से रेडियोधर्मी प्रदूषण उत्पन्न करने के प्रमुख कारण हैं. 

(5) यूरेनियम के विखण्डन से आयोडीन, सीजीयम, स्ट्रांशियम, कोबाल्ट आदि लगभग 30 अस्थायी समस्थानिक पैदा होते हैं. समस्थानिक अस्थायी होते हैं. इसलिए अस्थायीत्व प्राप्त करने के लिए इनसे ‘रेडियोधर्मी विकिरण’ निकलती है, जो प्राणियों के शरीर में घातक प्रभाव पैदा करती है.

दुष्प्रभाव 

रेडियोधर्मी प्रदूषण के साधन तथा उनके दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं- 

(1) नाभिकीय ऊर्जा से रेडियोधर्मी-प्रदूषण-‘नाभिकीय ऊर्जा’ के उत्पादन के साथ-साथ अनेक प्रकार के रेडियोधर्मी उत्पाद भी उत्पन्न होते हैं, जो पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं. यदि अत्यधिक मात्रा में इन विकिरणों से मानव शरीर उद्भासित (Expose) हो जाए, तो शरीर की कोशिकाएँ इस सीमा तक नष्ट हो सकती हैं कि उन्हें पुनर्जीवित न किया जा सके. इन हानिकारक एवं विषैले विकिरणों का क्षरण (Leakage) रोकने के लिए रिऐक्टर को चारों ओर से विकिरणों का अवशोषण करने वाले पदार्थों की मोटी परत से ढका जाता है, परन्तु रिऐक्टर की बनावट में कोई त्रुटिहीन बनावट के रिऐक्टर पर प्राकृतिक विपदा से उत्पन्न किसी आघात के फलस्वरूप पर्यावरण में इन विकरणों का विसर्जन हो सकता है. 

 (2) नाभिकीय अस्त्रों के विस्फोट से रेडियोधर्मी-प्रदूषण नाभिकीय अस्त्रों जैसे अणु बम, परमाणु बम तथा हाइड्रोजन बम आदि के विस्फोट से उत्पन्न घातक विकिरणों से हजारों लोगों को मृत्यु की चपेट में पलभर में ले लेता है. साथ ही बचे हुए लोगों को विभिन्न प्रकार से उपापचायी विकार उत्पन्न होते हैं, विक्षत त्वचा (Skin Lesions) कैंसर तथा क्रोमोसोम सम्बन्धी रोग जो आनुवंशिक होते हैं, हो जाता है. इससे जीव एवं गुणसूत्रों में परिवर्तन हो जाता है. 

(3) परमाणु उद्योगों से रेडियोधर्मी-प्रदूषण-परमाणु ऊर्जा केन्द्र से निकले रेडियोधर्मी अवशिष्ट पदार्थ, नाभिकीय परीक्षण, नाभिकीय पदार्थों के उत्पादन, परमाणु विस्फोटों का परीक्षण आदि जल, थल और वायु तीनों को प्रदूषित कर पर्यावरण सन्तुलन बिगाड़ देता है. 

(4) परमाणु अवपात–नाभिकीय विस्फोटों के पश्चात् रेडियोधर्मी तत्व वायुमण्डल में फैल जाते हैं और पृथ्वी के धरातल पर धीरे-धीरे जमा हो जाते हैं, इसे परमाणु अवपात कहते हैं. अवपात तीन प्रकार के होते हैं-(क) स्थानीय अवपात, (ख) क्षोभमण्डलीय अवपात, (ग) समताप मण्डलीय अवपात. 

(5) रेडियोधर्मी-प्रदूषण के अन्य दुष्प्रभाव-

(i) रेडियोधर्मी-प्रदूषण के प्रभाव से गर्भाशय में ही शिशुओं की मृत्यु हो जाती है. 

(ii) समुद्री जल में बमों के विस्फोट से जल प्रदूषित होता है, जिसका प्रभाव जलीय एवं स्थलीय दोनों प्रकार के जीव-जन्तुओं पर पड़ता है. 

(iii) रेडियोधर्मी-प्रदूषण के प्रभाव से मनुष्यों में कैंसर, त्वचा सम्बन्धी एवं अन्य आनुवंशिक रोग हो जाते हैं. 

(iv) ‘नाभिकीय अस्त्रों’ के विस्फोट के प्रभाव के तत्पश्चात् इसके कृषि भूमि पर गिरने से उस भूमि की उर्वरता में कमी आती है तथा भूमि भी प्रदूषित हो जाती है. 

(v) रेडियोधर्मी धूल तथा अन्य रासायनिक धूल का वर्षा के साथ पृथ्वी पर आती है और फिर भोजन श्रृंखला में पहुँच जाती है. 

(vi) नाभिकीय ऊर्जा, आणविक ऊर्जा तथा विस्फोट से जल प्रदूषित होता है.

नियन्त्रण के उपाय 

रेडियोधर्मी प्रदूषण रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं 

(i) विश्व के विभिन्न देश परमाणु बम, हाइड्रोजन बम आदि अस्त्र बना चुके हैं, जिससे पुनः विश्वयुद्ध एवं मानव-जीवन तथा पर्यावरण पर खतरा मँडराने लगा है, इसलिए परमाणु बम व अस्त्रों के प्रयोग और निर्माण पर पूर्णतः प्रतिबन्ध विश्वभर में लगाना अति आवश्यक 

(ii) जल एवं थल में ‘नाभिकीय विस्फोटों’ पर अन्तर्राष्ट्रीय कानून बनाकर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है. 

(iii) ‘नाभिकीय विकिरणों, के हानिकारक प्रभावों से पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए व्यापक सावधानियाँ एवं सुरक्षा के उपाय अपनाने चाहिए. 

(iv) ‘नाभिकीय अवशिष्टों’ को निपटाने (Disposal) के लिए ऐसी प्रविधियाँ अपनाई जाती हैं, जो पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं, फिर भी भविष्य को ध्यान में रखते हुए ‘अवशिष्टों’ को निपटाने के लिए पहले से अधिक सुरक्षित उपाय ढूँढ़ निकालना अपेक्षित है.

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