पर्यावरण और हमारा दायित्व पर निबंध | Essay on Environment and Our Responsibility

पर्यावरण और हमारा दायित्व पर निबंध

पर्यावरण और हमारा दायित्व पर निबंध | Essay on Environment and Our Responsibility

 ‘न दत्ते प्रिय मण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्।’ 

उक्त श्लोक ‘अभिज्ञान शाकुंतलम् का है, जिसके रचयिता महाकवि कालिदास थे। इसका अर्थ यह है कि शकुन्तला फूलों से इतना प्रेम करती थी. कि वह अपने श्रंगार तक के लिए फलों और पत्तियों को नहीं तोडती थी। प्रकृति एवं पर्यावरण से प्रेम और उनके प्रति मानवीय दायित्वों के निर्वहन की यह एक मिसाल हो सकती है। सुखी, शांत एवं आपदा रहित जीवन की यह पहली शर्त है कि हम उस प्रकृति और पर्यावरण को संरक्षित करें, जिसने अपने अनमोल खजानों को खोलकर मानव जीवन को न सिर्फ सुखमय बनाया है, बल्कि उसे खुशरंग भी बनाया है। प्रकृति ने हमें सिर्फ दिया ही है, हमसे कुछ लिया नहीं। उसने हमसे कभी प्रतिदान की अपेक्षा भी नहीं की। दूसरी तरफ हम प्रकृति को कुछ देना तो दूर, उसे संरक्षित तक नहीं रख सके। 

पर्यावरण से हद दर्जे की छेड़-छाड़ का नतीजा हमारे सामने है। न सिर्फ भारत, बल्कि समूचा विश्व आज पर्यावरण असंतुलन की समस्या से जूझ रहा। प्राकृतिक संसाधनों के अधिकाधिक दोहन तथा प्रकृति विरोधी आचरण का ही यह नतीजा है कि आहत प्रकृति ने हम पर पलटवार करना शुरू कर दिया। कुदरत के कहर विविध रूपों में सामने आ रहे हैं। ये हमें चेतावनी भी दे रहे हैं। इसके बावजूद पर्यावरण को बचाने के लिए जो चेतना और सक्रियता हमें दिखानी चाहिए, वह सामने नहीं आ रही है। पर्यावरण के संरक्षण और संतुलन के लिए जो दायित्व हमें निभाने चाहिए, हम निभा नहीं पा रहे 

‘शकुन्तला फूलों से इतना प्रेम करती थी, कि वह अपने शृंगार तक के लिए फूलों और पत्तियों को नहीं तोड़ती थी।” 

पर्यावरण असंतुलन एक वैश्विक समस्या के रूप में सामने आ रहा है। भारत सहित विश्व के अनेक देश उन दुष्प्रभावों से दो-चार हो रहे हैं, जो पर्यावरण असंतुलन की देन है। पर्यावरण असंतुलन का प्रभाव मौसम पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है। मौसम अपने मिजाज बदल रहा है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है, तो ग्लेशियरों के पिघलने से नई तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं। बड़े-बड़े भूखंड आने वाले दिनों में जलमग्न हो सकते हैं। ग्लेशियरों के पिघलने और समुद्र तल बढ़ने से महासागरों के अथाह जल भंडार के वितरण में खिसकाव आने से धरती पर दबाव बढ़ा है। इससे भूकंपीय खिसकाव व धरती में दरार की संभावनाएं बढ़ी हैं। 

पर्यावरण असंतुलन से जुड़ी सबसे बड़ी और विकराल समस्या ग्लोबल वार्मिंग ही है। यह उस औद्योगिक क्रांति का परिणाम है, जिसकी शुरुआत यूरोप से हुई थी। प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर विकास के नाम पर विनाश की शुरुआत इसी कालखंड में हुई। वर्ष 1861 में पहली बार वैज्ञानिक टिडेल ने ताप के बढ़ने की समस्या पर ध्यान आकृष्ट करते हुए यह बताया कि वायुमंडल में जल, वाष्प तथा कार्बन डाइऑक्साइड तथा लंबे तरंग दैर्ध्य विकिरण को अवशोषित कर लेते हैं, जिससे वातावरण का ताप बढ़ता है। वर्ष 1896 में स्वीडिश वैज्ञानिक आरहेनियस ने यह बताया कि कोयले के दहन से कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जिससे ग्रीन हाउस प्रभाव बढ़ता है तथा इस कारण धरती का ताप बढ़ता है। वर्ष 1924 में अमेरिका के वैज्ञानिक लोटका ने बताया कि औद्योगिक गतिविधियों के कारण आगामी 500 वर्षों में पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा वर्तमान स्तर से दो गुनी हो जाएगी। वर्ष 1967 में विज्ञान जगत ने यह स्पष्ट कर दिया कि धरती का ताप बढ़ने के लिए कार्बन डाईऑक्साइड मुख्य रूप से उत्तरदायी है। आंकड़े बताते हैं कि पिछली सदी के दौरान धरती का औसत तापमान आधा डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ गया है। तापमान वृद्धि की वर्तमान दर के अनुसार वर्ष 2100 तक वैश्विक तापमान विनाशक स्थिति तक बढ़ जाएगा। इस स्थिति के लिए हम ही जिम्मेदार होंगे, क्योंकि हमने पर्यावरण के प्रति अपने दायित्वों को नहीं निभाया। 

“प्रकृति का कोप सारे कोपों से बढ़कर होता है।”

पर्यावरण असंतुलन के कारण ही ओजोन परत के क्षीण होने तथा उसमें छेद होने की समस्या सामने आई है। ओजोन ऑक्सीजन का ही एक रूप है, जिसमें दो की जगह तीन अणु होते हैं। यदि यह परत नष्ट हो जाए या कमजोर पड़ जाए, तो पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह तक पहुंचती हैं, जो न सिर्फ जीव-जंतुओं के लिए, बल्कि वनस्पतियों के लिए भी हानिकारक होती हैं। ओजोन परत के क्षरण के लिए भी मानवीय गतिविधियां ही जिम्मेदार हैं। भौतिक रूप से जीवन को सुखमय बनाने तथा विलासिता के साधन सृजित करने के चक्कर में हमने उन रसायनों का जमकर प्रयोग किया, जो ओजोन परत को क्षति पहंचाते हैं। दभाव सामने दिख रहे हैं, जिनके भविष्य में और बढ़ने की संभावना है। 

पर्यावरण की स्थिति इस हद तक बिगड़ चुकी है कि वह अब और छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। आंकड़े बतात ह कि पिछले दो दशकों में दुनिया भर में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं में चार गुना बढ़त हुई है। यानी कुदरत का कहर बनकर टूटना बढ़ा है। दुनिया के वैज्ञानिक चिंतित हैं तथा भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी विस्फोट तथा भूस्खलन जैसी आपदाओं को भूमंडलीय तापन (Global Warming) से जोड़कर देख रहे हैं तथा इनके बीच के अंतःसंबंधों की पड़ताल के लिए व्यापक शोध की आवश्यकता बता रहे हैं। 

पर्यावरण असंतुलन की वजह से जलवायु परिवर्तन की शुरुआत हो चुकी है। मौसम का चक्र प्रभावित हो रहा है। बेमौसम की बरसात तथा अधिक बर्फबारी इसी का परिणाम है। मौसम भी अतिवादी हो चला है। ठंडे स्थान और अधिक ठंडे हो रहे हैं, जबकि गर्म स्थान और गर्म होते जा रहे हैं। यह सब पर्यावरण के क्षरण से पैदा हए असंतुलन का ही तो परिणाम है। 

बिगड़ता पर्यावरणं कुछ और घातक परिणाम भी दे रहा है। जीवों और पौधों की अनेक प्रजातियां जहां विलुप्त हो चुकी हैं वहीं कुछ विलोपन के मुहाने पर हैं। जैव-विविधता पर प्रतिकल प्रभाव साफ दिख रहा है। चिकित्सा विज्ञान में प्रगति के बावजूद जानलेवा बीमारियां बढ़ रही हैं। पूरा पारिस्थितिकीय तंत्र असंतुलन का शिकार हो गया है। कृषि पैदावार में कमी से खाद्यान्न संकट बढ़ा है। यानी चारों ओर से हम घिरते ही जा रहे हैं। 

शास्त्रों में कहा गया है कि प्रकृति का कोप सारे कोपों से बढ़कर होता है। हमने यदि इस सूत्र वाक्य पर ध्यान दिया होता, तो शायद आपदाओं के रूप में हमें प्रकति का यह कर और विनाशकारी चेहरा न देखना पड़ता। यदि हमने संतुलित विकास को तरजीह दी होती, तो प्रकृति इस तरह कुपित न होती। हमने पर्यावरण की कीमत पर आर्थिक विकास की छलांग तो लगाई मगर अब इसके दुष्परिणामों को झेलने के लिए भी तैयार रहें या समय रहते अपने आचरण में बदलाव लाकर पर्यावरण से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाकर विकास के पथ पर आगे बढ़ें। 

प्रकृति और पर्यावरण के प्रति अगर हम अपने दायित्वों की अनदेखी इसी तरह करते रहे, तो अभी प्रकृति के कोप के रूप में जो खंडप्रलये हमें हिला रही हैं, वे पूर्ण प्रलय का रूप धर हमें निगल लेंगी। यदि अभी भी हम पर्यावरण संतुलन एवं संरक्षण की दिशा में ध्यान देना शुरू कर प्रकृति के जख्मों पर मरहम लगाना शुरू कर दें, तो भावी विनाश से बच सकते हैं। चूंकि यह एक वैश्विक समस्या है, अतएव प्रयास भी वैश्विक स्तर के होने चाहिए। 

हमें सबसे पहले ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए प्रयास करने होंगे। दुख इस बात का है कि इस समस्या से उबरने के लिए वैश्विक मंचों पर बहसें तो खूब होती हैं, किन्तु कोई व्यावहारिक पहल नहीं होती। ये मंच राजनीतिक प्रपंच के अड्डे बन गये हैं। यही कारण है कि कोई कारगर वैश्विक पहल होती नहीं दिख रही है। समाधान के लिए यह सूरत बदलनी होगी। विश्व में ग्रीन हाउस गैसों भारत है। चीन जहां पहले पायदान पर है, वहीं भारत पांच पर इन दशा का विशेष रूप से श्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना होगा तथा कुदरत के कहर से बचाव के लिए अपने दायित्वों का निभाना होगा। इस दिशा में कारगर पहल तथा वृक्षारोपण को बढ़ाया जाए। उत्सर्जन में जो देश आगे हैं, उनकी निगरानी की जाए तथा समय-समय पर इसकी समीक्षा की जाए कि इसमें कितनी गिरावट आई है। ऐसी तकनीक विकसित की जाएं, जिनसे कार्बन का उत्सर्जन कम हो तथा इन्हें अधिक से अधिक अमल में लाने के लिए विश्व के सभी दों को प्रोत्साहित किया जाए। वैश्विक पहल को मजबती देने के लिए विकासशील देशों का यह दायित्व बनता है कि एक संयुक्त राष्ट्र जलवायु कोष का गठन करें, ताकि इस वैश्विक समस्या से निपटने के लिए धन की कमी न आड़े आये। बायो गैस और सौर कर्जा के इस्तमाल को भी बढावा देकर इस समस्या से निपटा जा सकता है। 

पर्यावरण की समस्या से निपटने के लिए हमारा यह दायित्व बनता है कि हम वह आचरण किसी भी कीमत पर न करें, जिससे पर्यावरण का क्षरण या क्षति हो। इसके लिए हमें अपनी जीवनशैली में बदलाव लाना होगा। विलासी और भोगवादी अभिवृत्तियों पर अंकुश लगाना होगा। भौतिक संसाधनों का धड़ल्ले से प्रयोग रोक कर हम काफी हद तक पर्यावरण संतुलन में सहायक बन सकते हैं। विकास और प्रगति की हम उतनी ही दौड़ लगाएं, जितनी की इजाजत प्रकृति हमें दे। अव्वल तो कम से कम प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाए, यदि बहुत आवश्यक हो, तो पर्यावरण को होने वाली क्षति की भरपाई की जाए। 

हमें प्रकृति की ओर लौटकर ही अपना बचाव करना होगा। कुछ छोटे-छोटे प्रयास कर हम पर्यावरण को बचा सकते हैं। आने-जाने के लिए साइकिल के इस्तेमाल से हम पर्यावरण को बचा सकते हैं। बजाय बाइक, स्कूटर या कार का इस्तेमाल करने के हम साइकिल का प्रयोग करें। यदि कार जरूरी हो तो कुछ लोग पूल कर उसका प्रयोग करें या सार्वजनिक परिवहन के साधनों का प्रयोग करें। जूट बैगों का प्रयोग पॉलिथीन की जगह करें। यह कदम पर्यावरण को बचाने में सहायक होगा। उन पदार्थों के प्रयोग को, जो रीसाइकिल हो सकते हैं, वरीयता देकर भी हम पर्यावरण की मदद कर सकते हैं। बिजली से चलने वाले संसाधनों का कम से कम प्रयोग कर तथा इन उपकरणों को बंद रखकर भी पर्यावरण की क्षति कम की जा सकती है। 

इन छोटे-छोटे उपायों को अपनाने के साथ ही यह भी जरूरी है कि हम वृक्षारोपण पर अधिकाधिक ध्यान दें तथा इसके लिए लोगों को प्रेरित भी करें। सिर्फ वृक्षारोपण को प्रोत्साहित ही न करें, बल्कि वनों की कटान, वृक्षों की कटान का पुरजोर विरोध भी करें। पेड़ों को अपनी संतान की तरह प्यार और परवरिश देकर हमें देश में वृक्ष क्रांति लानी होगी। हर व्यक्ति जीवन में यदि मात्र एक पेड़ लगाने और अपने जीवनकाल में उसकी देखभाल का संकल्प ले, तो सूरत काफी बदल सकती है। हमारे देश में वृक्षों के पोषण और पल्लवन की एक | समृद्ध परंपरा रही है। हमारे यहां वृक्षों को पूजनीय माना जाता है। लोक पर्वो पर वृक्ष पूजन की परंपरा भी है, इसके बावजूद वनाच्छादित क्षेत्र में कमी यह इंगित करती है कि कहीं न कहीं हम उन दायित्वों से | पीछे हटे हैं, जो पर्यावरण के संरक्षण के लिए आवश्यक हैं। संभवतः इसके लिए वह असंतुलित विकास ही जिम्मेदार है, जो प्रकृति की | उपेक्षा और उसका दोहन कर किया गया। 

वस्तुतः विकास के मुद्दे पर अनेक दृष्टिकोण एवं मत देखने में  आते हैं। विकास के अधिक प्रबल सिद्धांत जो कि शीर्ष तल एवं उद्योगन्मखी हैं, आलोचना का शिकार रहे हैं व उनके विकल्प भी सुझाए जाते रहे हैं। अत्यधिक हानिकारक सिद्ध हुए धरती के संसाधन शोषण एवं भारी उद्योगों द्वारा पर्यावरण ह्रास संबंधी बढी जागरूकता के वर्तमान युग में विकास के उपभोक्तावादोन्मुखी दृष्टिकोणों की कड़ी आलोचना हो रही है। अब हमारा दायित्व बनता है कि हम आलोचनाओं तक ही सीमित न रहें, बल्कि अच्छे परिणामों के लिए व्यावहारिक पहल के धरातल पर खड़े होकर प्रकृति और पर्यावरण में ईश्वर का प्रतिरूप देखकर उसकी उपासना करें। संभवतः तभी दूर हो सकेगा प्रकृति का कोप और हम उन प्राकृतिक आपदाओं से बच सकेंगे, जा रह-रह कर हमें झकझोर रही हैं। 

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