रोजगारपरक शिक्षा पर निबंध |Essay on employment education in Hindi

रोजगारपरक शिक्षा पर निबंध

रोजगारपरक शिक्षा पर निबंध |Essay on employment education

व्यवसाय एक ऐसा शब्द जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में हम सभी के साथ जुड़ा हुआ है. व्यवसाय से आशय वाणिज्य व उद्योग के सम्पूर्ण जटिल क्षेत्र, आधारभूत उद्योगों प्राविधिक व निर्माणी उद्योग तथा सहायक सेवाओं के वृहत्त जाल-वितरण, बैंकिंग, बीमा, यातायात आदि से है. मौसम की भाँति व्यवसाय सदैव हमारे साथ रहता है. यही व्यवसाय देश की अर्थव्यवस्था का प्रारूप तैयार करता है. समाजरूपी शरीर का मेरुदण्ड उसकी अर्थव्यवस्था को ही समझा जाता है. किसी भी समाज की अर्थव्यवस्था उसके व्यावसायिक विकास पर ही निर्भर करती है. एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि उसके अन्तर्गत कार्य करने वाला प्रबन्ध तन्त्र ऐसा हो जोकि एक व्यावसायिक संस्था के मूल उद्देश्य (न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन श्रेष्ठ उत्पादन, कुशल संचालन, ग्राहक संतुष्टि, कर्मचारी विकास, आर्थिक न्याय आदि) को पूरा करने व मानवीय व भौतिक संसाधनों को उचित उपयोग करने हेतु एक कुशल संगठन का निर्माण, प्रबन्ध व निर्देशन करने योग्य हो. व्यवसाय से सम्बन्धित यही तकनीकी, वैज्ञानिक व मनोवैज्ञानिक क्षेत्रों का क्रमबद्ध अध्ययन-व्यावसायिक शिक्षा कहलाता है. 

यह तो सर्वविदित ही है कि आज के इस वैज्ञानिक व प्रतिस्पर्धात्मक युग में विद्यालयों में दी जाने वाली सैद्धान्तिक शिक्षा कितनी उपयोगी सिद्ध हुई है. जो ज्ञान हमारे जीवन का एक अंग नहीं बन सकता, वह निश्चय ही निरर्थक व त्याज्य है. वास्तव में जो ज्ञान स्वानुभावों पर आधारित है, जिसका प्रयोग हम अपने दैनिक जीवन में कर सकें, वही ज्ञान हमारे जीवन का अंग बन सकता हैं, यह एक प्रमाणिक तथ्य है कि विद्यालयों में दी जाने वाली सैद्धान्तिक शिक्षा के आधार पर हम स्वयं को साक्षर तो कह सकते हैं, परन्तु वर्तमान सन्दर्भ में यह शिक्षा रोजगार उपलब्ध कराने में पूर्णतः असफल सिद्ध हुई है. दूसरी ओर व्यावसायिक शिक्षा द्वारा अर्जित ज्ञान स्वानुभवों तथा व्यावहारिक होने के कारण हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बन जाता है. आज यदि एक साधारण ग्रेजुएट डिग्री धारक युवा तथा एक व्यावसायिक डिग्री अथवा डिप्लोमा धारक युवा किसी एक पद हेतु आवेदन प्रस्तुत करता है, तो निश्चय ही व्यावसायिक ज्ञान प्राप्त व्यक्ति को ही प्राथमिकता दी जाएगी. 

वर्तमान समय में व्यवसाय का स्वरूप दिन-प्रतिदिन जटिलतर होता जा रहा है. वर्तमान में व्यवसाय के विभिन्न अंगों में सामंजस्य बनाए रखना स्वयं में एक जटिल कार्य है. इसके लिए बाजार और व्यावसायिक संगठन के सिद्धान्तों का गहन ज्ञान होना आवश्यक है. व्यवसाय से सम्बन्धित अनिवार्य तकनीकियों तथा विभिन्न पक्षों के सम्बन्ध में वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्थित ज्ञान व्यावसायिक शिक्षा ही उपलब्ध कराती है. 

यह तो स्पष्ट है की आज के समय में व्यावसायिक सफलता का आधार पैतृक योग्यता नहीं रह गई है. प्रतिस्पर्धा और विशिष्टीकरण के इस युग में एक नए व्यवसाय की स्थापना अथवा किसी भी क्षेत्र में एक व्यवसाय का संचालन उतना ही जटिल हो गया है जितना एक नवजात शिशु का लालन पोषण करना. किसी भी क्षेत्र में तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर उस क्षेत्र में सहज ही सफलता प्राप्त की जा सकती है. व्यवसायिक शिक्षा यथार्थ जगत् में व्यक्ति को सफलता के नए सोपान उपलब्ध कराती है. यह व्यक्ति को इस योग्य बनाती है. कि उसमें स्वयं के तथा अपने परिवार के जीवनयापन हेतु आवश्यक व्यावसायिक योग्यता एवं कौशल उत्पन्न हो सके तथा उन्हें प्रयुक्त करने की दृष्टि से सक्षम हो सके. व्यावसायिक शिक्षा उसे इतनी शक्ति देती है, उसमें इतनी ऊर्जा संचारित करती है कि वह जीवन की उन्नति के मार्ग में आने वाली बाधाओं व संघर्षों का सहजता व धैर्यपूर्वक सामना कर सके, 

व्यवसाय में एक व्यक्ति का सम्बन्ध अनेक पक्षों से होता है. कर्मचारी वर्ग, व्याव सायिक संस्था के बाह्य पक्ष, श्रम संघों, सरकारी संगठनों, विभिन्न अन्य व्यक्तियों आदि से उसे अपना सम्पर्क स्थापित करना व मधुर सम्बन्ध बनाए रखने होते हैं. इनसे सम्बन्ध स्थापित करने व इनमें समन्वय स्थापित करने में व्यावसायिक शिक्षा अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है. साथ ही श्रम व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने, उसका नेतृत्व निर्देशन, पथ-प्रदर्शन, पर्यवेक्षण, समन्वय आदि की कला का ज्ञान भी व्यावसायिक शिक्षा ही कराती है. 

इस प्रतिस्पर्धात्मक वैज्ञानिक औद्योगिक युग में प्रतिस्पर्धा का सामना करने तथा आधुनिकतम वैज्ञानिक तथा तकनीकी आविष्कारों का समुचित लाभ उठाने के लिए भी व्यावसायिक शिक्षा अनिवार्य हो जाती है, क्योंकि सही व्यावसायिक सिद्धान्त ही व्यक्ति को इस योग्य बनाते हैं कि हमारे देश में जिन इकाइयों में निम्न उत्पादकता है, साथ ही उत्पादन लागत अधिक है उनमें अकुशल श्रमिकों, पुरानी मशीनों तथा परम्परागत तकनीकों के स्थान पर आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर उत्पादन को उच्चस्तरीय तथा कम लागत का बनाया जाए, जिससे वह अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में टिक सके. व्याव सायिक शिक्षा राष्ट्र में उपलब्ध संसाधनों को विवेकापूर्ण रीति से उपयोग में लाने की योग्यता भी प्रदान करती है. यदि हमारी उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है. प्राकृतिक साधनों का उचित विदोहन हो पाता है तथा हम दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुओं का निर्माण स्वयं करने में सक्षम हैं तो इससे राष्ट्रीय मुद्रा की बचत होता है तथा देश आर्थिक रूप से समृद्ध होता है. साथ ही व्यावसायिक शिक्षा के सिद्धान्तों का प्रभावी ढंग से पालन करके उपभोक्ताओं को कम मूल्य पर उत्तम किस्म की वस्तुएं उपलब्ध करायी जा सकती हैं. 

वास्तव में व्यावसायिक शिक्षा का विकास मानवीय पूर्णता के लिए हुआ है. व्यावसायिक शिक्षा व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकसित होने का अवसर प्रदान करती है. 

 व्यावसायिक शिक्षा व्यक्ति में यह योग्यता उत्पन्न करती है कि प्रयोग व निरीक्षण के आधार पर प्राप्त ज्ञान के द्वारा व्यवसाय के प्रत्येक पक्ष का भली-भाँति संयोजन कर सके. इसके लिए व्यावसायिक शिक्षा के अन्तर्गत विज्ञापन, विक्रय कला, विवेकीकरण, वैज्ञानिक प्रबन्ध आदि विभिन्न सिद्धान्त प्रतिपादित किए गए हैं. ये सिद्धान्त हमें ये बताते हैं कि व्यवसाय में अधिकतम सफलता प्राप्त करने हेतु क्या किया जाए. यही कारण है कि व्यावसायिक शिक्षा को ‘क्रियात्मक सामाजिक विज्ञान’ की संज्ञा भी दी गई है. 

उपर्युक्त विवेचन से यह तो स्पष्ट है कि वर्तमान समय में औद्योगिक, व्यावसायिक, सामाजिक और साथ ही व्यक्तिगत परिप्रेक्ष्य में व्यावसायिक शिक्षा ने अपना महत्व स्वयं ही स्पष्ट किया है. आज प्रत्येक क्षेत्र में व्यावसायिक शिक्षा का वर्चस्व है. बिजनेस मैनेजमैंट हो या फिर कोर्सस इन कम्प्यूटर एप्लिकेशन, होटल मैनेजमैंट, केंटरिंग या फैशन डिजाइनिंग, टैक्सटाइल, इन्टीरियर डेकोरेशन अथवा अन्य कोई व्यावसायिक शिक्षा का क्षेत्र, प्रत्येक में विद्यार्थियों की रुचि, व्यावसायिक संस्थानों की संख्या और साथ ही छात्र छात्राओं की संख्या में भी बड़ी मात्रा में वृद्धि हुई है. जोकि व्यावसायिक शिक्षा की उपादेयता तथा आज के छात्र व युवा वर्ग में उसकी महत्ता को स्वयं ही स्पष्ट कर देता है. इस समय सरकारी तथा अर्द्धसरकारी स्तर पर अनेक संस्थाएं व्यावसायिक शिक्षा के प्रसार व विकास के महत्वपूर्ण कार्य में लगी हुई हैं. विभिन्न विश्वविद्यालय जैसे पंजाब वि. वि. (चंडीगढ़), कोलकाता वि. वि. (कोलकाता), महर्षि दयानन्द वि.वि. (रोहतक), कुरुक्षेत्र वि. वि. (कुरुक्षेत्र), चौ. चरण सिंह वि. वि. (मेरठ), रुहेलखण्ड वि. वि. (बरेली) साथ ही इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रेड एण्ड मैनेजमैंट (मुरादाबाद), कॉलेज ऑफ बिजनेस स्टडीज (दिल्ली), पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी (जालंधर) आदि के नाम उल्लेखनीय है. जिनमें विभिन्न स्तर पर तथा अत्यन्त उपयोगी व रोजगारपरक व्यावसायिक प्रशिक्षण उपलब्ध है. 

यदि हमारी अपेक्षा राष्ट्र को विकसित, सर्वसमृद्ध एवं आत्मनिर्भर बनाना है, तो उसके लिए एक अनिवार्य वांछनीयता भी है और वह है-व्यावसायिक शिक्षा का पर्याप्त विकास, प्रचार व प्रसार, परन्तु हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली राष्ट्र की इन आवश्यकताओं व उद्देश्यों को पूर्ण करने में सक्षम नहीं है, क्योंकि यह छात्रों के बौद्धिक विकास पर बल नहीं देती. वर्तमान शिक्षा विद्यार्थी को व्यवहारिक ज्ञान नहीं कराती. 

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि शिक्षा व रोजगार के क्षेत्र में भारत जैसे पिछड़े हुए देश के लिए व्यावसायिक शिक्षा अत्यन्त महत्वपूर्ण है, आज के प्रगतिशील युग में व्यापार, वाणिज्य व उद्योग की समृद्धि व वैज्ञानिक प्रगति हेतु व्यावसायिक शिक्षा का उचित विकास किया जाए, तभी हमारा युवा वर्ग देश के विकास में सकारात्मक योगदान प्रदान कर सकता है. 

हम आशा करते हैं कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र (औद्योगिक, सामाजिक, आर्थिक व व्यक्तिगत) में व्यावसायिक शिक्षा की उपयोगिता को देखते हुए शीघ्र ही हमारी नई शिक्षा प्रणाली में व्यावसायिक शिक्षा को एक अनिवार्य विषय के रूप में सम्मिलित कर लिया जाएगा. 

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