प्राथमिक शिक्षा पर निबंध-Essay on Elementary Education

प्राथमिक शिक्षा पर निबंध

प्राथमिक शिक्षा पर निबंध

वस्तुतः शिक्षा औपचारिक व अनौपचारिक होती है अनौपचारिक शिक्षा घर व समाज तथा आस पास के पर्यावरण से प्राप्त होती है जबकि औपचारिक शिक्षा संस्थाओं के माध्यम से कई स्तरों में प्राप्त की जा सकती है। भारतीय मनीषीयों व बुद्धीजीवियों ने इन दोनों ही विशुद्ध शिक्षा शैलियों को सामान्य रूप से प्राथमिकता दी इसी के चलते भारतीय शिक्षा नीति एक सुदृढ़ और सशक्त वैयक्तिक के आधार का निर्माण बनी अत: भारतीय शिक्षा नीति जो प्रारंभ में मौखिक थी जिसका आधार भाषाओं के माध्यम से कुशल उच्चारण के द्वारा अभिव्यक्तियों को साकार बनाना था, कालांतर में जब लिपि प्राप्त हुई अथवा लिपि का अन्वेषण हुआ तब भारतीय शिक्षा नीति अपनी परिपक्व अवस्था में पहुंच गई। किंतु प्रारंभ से ही विचारकों का मानना था कि शिक्षा नीति के अंतर्गत प्राथमिक शिक्षा वैज्ञानिक हो, उसका आधार स्तम्भ मनोवैज्ञानिक हो जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास हो और ऐसे समृद्ध समाज से संस्कृतिवाद व राष्ट्र का विकास हुआ अत: भारतीय शिक्षा को व्यक्तित्व के निर्माण का आधार मानती है। 

वैदिक शिक्षा पद्धति वस्तुत: उच्चारण पठन पाठन ध्यान, पराभौतिकीय संस्कारों से प्रेरित थी किंतु धीरे-धीरे जब गुरूकुल पद्धति का विकास हुआ, तब अलग-अलग विषय वस्तुओं को प्राथमिकता दी गयी तथा प्राथमिक शिक्षा को भी सरल और सहज बनाकर मनोवैज्ञानिक रूप से समाज का आवश्यक बनाया गया इसके लिए विचारंभ संस्कार प्रारंभ हुआ कालांतर में लिपि ज्ञान के साथ इसे और अधिक विकसित किया। कल्हण की “राजतरंगिणी” में प्राथमिक विद्यालयों का उल्लेख मिलता है। इसके पूर्व ही मनु तथा याज्ञवल्क्य प्राथमिक शिक्षा की आयु निर्धारित करते हैं। भारत में इस्लाम के आगमन के उपरांत मदरसों और मक्तवों द्वारा भी शैक्षणिक पद्धति को प्राथमिक स्तर पर विभाजित किया गया। किंतु इस काल तक भारतीय शिक्षा नीति व प्राथमिक शिक्षा का आधार बिंदु सामाजिक और धार्मिक अधिक था न ही इसे आधुनिक विषयों में विभाजित करके स्वीकारा गया था। भारत की शिक्षा पद्धति वास्तव में आधुनिक काल में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर स्तर पर विभाजित हो गयी। 19वीं शताब्दी में भारतीय शिक्षा नीति पर सर्वप्रथम डंक्कन और जेम्स प्रिंसेप ने दृष्टिपात किया और 

वैदिक शिक्षा को ही तीनों स्तरों के लिए उचित माना। इसी समय लार्ड विलियम बैंटिक ने मैकाले शिक्षा पद्धति के अंतर्गत भारतीय शिक्षा नीति का निर्माण किया। इस काल में राजाराम मोहन राय ने भारतीय शिक्षा पद्धति को पहली बार व्याख्यारित किया। उन्होंने हिंदी, समसामायिक, आधुनिक शिक्षा देने का निवेदन किया। तत्पश्चात Wood Campaign में प्राथमिक शिक्षा के लिए पृथक-पृथक शिक्षाएं और नियम बनाये। 20वीं शताब्दी में गोपाल कृष्ण गोखले ने सबसे पहली बार प्राथमिक शिक्षा को ही वायसराय की बैठक में उठाया। 1911 में मांग की कि भारतीय उत्पादन के लाभ का 2.5% भारतीय शिक्षा प्रबंधन पर निवेश किया जाना चाहिए। 

तब परिषद के एक सदस्य अल्गीन ने इसका विरोध किया था ऐसी स्थिति में गांधीजी ने each one & teach one का नारा वस्तुत: प्राथमिक शिक्षा हेतु ही दिया। अंतत: 1925 में भारतीयों का एक विशेष वर्ग इसका विरोध किया था। वर्धा योजना के समय गाँधी ने प्राथमिक शिक्षा पर जोर दिया व्यक्तिवादी, पूंजीवादी व्यवस्थाओं को सीमित करते हुए प्राथमिक शिक्षा को व्यक्तित्व निर्माण का आधार माना और स्पष्ट किया कि विश्व की कोई भी अवस्था हो अथवा विश्व व राष्ट्र किसी भी अवधारणा से संचालित हो किंतु उसका प्राथमिक शिक्षा का स्तर आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक होना चाहिए जिनमें संस्कार विचार अनुशासन तथा समर्पण की विचारधाराएं समाहित हैं।

भारतीय स्वतंत्रता के उपरांत भारतीय शिक्षा नीति में प्राथमिक शिक्षा को सुनियोजित करने अथवा उसे योजनाबद्ध रूप में लागू करने का दायित्व मौलाना अबुल कलाम आजाद को दिया गया। जिन्होंने वर्धा योजना में ही संशोधन करके प्राथमिक शिक्षा नीति बनायी जिसके अंतर्गत सरकारी संगठन, गैर सरकारी संगठन, निजी संस्थान, सार्वजनिक संस्थान व्यक्तिगत रूप से अथवा न्यास के द्वारा भारतीय शिक्षा नीति विशेषकर प्राथमिक शिक्षा को उपलब्ध कराया जाना सुनिश्चित हुआ। कालांतर में राधाकृष्णनन् जो ऑक्सफोर्ड पद्धति पर आधारित भारत में प्राथमिक शिक्षा लाने के पक्षधर थे उन्होंने भी गाँधी की वर्धा योजना को अन्तत: स्वीकार लिया। 

कोठारी आयोग ने भी भारत के सम्पूर्ण उत्पादन का तत्कालिक पाँच प्रतिशत प्राथमिक शिक्षा पर निवेश करने का प्रावधान किया। ज्ञातव्य हो भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्व में भी राज्य से यह अपेक्षा की गयी है कि वह प्राथमिक शिक्षा पर निवेश तथा योजनाबद्ध शोध व नवीन प्रारूप लागू करेगी। इसी के चलते कालांतर में 1974 से ही प्राइमरी एजुकेशन रिसर्च सेंटर का निर्माण किया गया। जिसका उद्देश्य बालक व बालिकाओं को उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए छ: वर्ष का आयु से दी जाने वाली मुख्य शिक्षा पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के शोध प्रबंधन को अन्तिम स्तर तक ले जाना था। ज्ञातव्य हो यह संस्थान संयुक्त राष्ट्र संघ से सम्बद्ध हो गया। जिसका शोध निष्कर्ष 1978 में आया जो पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से सम्बंधित था। जिसके अनुसार प्राथमिक शिक्षा के अंतर्गत ही बालक व बालिकाओं के पर्यावरण, उनको दिये जाने वाले भोजन, आहार, विहार तथा संपूर्ण वातावरण ही उनके व्यक्तित्व के निर्माण का एकमात्र कारण है। अत: प्राथमिक शिक्षा के अंतर्गत केंद्र, राज्य, गैर-सरकारी संगठन और विश्व स्तर (संयुक्त राष्ट्र संघ) के समग्र प्रयास से दक्षिण-पूर्व देशों को विशेषकर भारतीय उपमहाद्वीप में पड़ने वाले भारतीय राज्यों की शिक्षा की नीतियों में अमूलचूल परिवर्तन किये गये। 

20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में भारतीय शिक्षा नीति में प्राथमिक शिक्षा के उत्थान को विश्वव्यापी शोध का विषय बनाया गया। अत: यह स्वीकारा गया कि प्राथमिक शिक्षा के लाभार्थी बालक व बालिकाएं राष्ट्र की निधि हैं अत: उनके व्यक्तिगत परिवेश से ऊपर उठते हुए सरकार को उनका दायित्व ले लेना चाहिए। अत: इसी समय कई पृथक योजनाएं प्राथमिक शिक्षा को दी गयी जैसे समाज कल्याण विकास के भीतर ही बाल विकास योजना के अंतर्गत बालक व बालिकाओं को पुस्तके आहार, विहार, भ्रमण की सुविधा, समय-समय पर उनके अभिभावकों से मिलकर उनकी व्यक्तिगत समस्याओं के साथ शिक्षा नीति को सुनियोजित करना इत्यादि प्रारंभ हुआ। कुछ पृथक योजनाओं के अंतर्गत क्षेत्रीय जनसंख्या के आधार पर प्राथमिक विद्यालयों का निर्माण बालक तथा बालिकाओं को उनके स्थान से विद्यालय तक लाना तत्पश्चात उन्हें वापस भेजवाने आदि का दायित्व भी संस्थाएं लेंगी। निजी संस्थानों को भी आवश्यक रूप से आदेश नहीं दिया गया किंतु उन्हें कई ऐसे सरकारी लाभ दिये गये कियदि वे प्रा. शिक्षा के विकास में धन का निवेश करते हैं तो ऐसे में उन्हें कई सुविधाएं प्राप्त होंगी। 

यद्यपि इसे हृदय परिवर्तन के अंतर्गत लाना चाहते थे तथापि भारत सरकार व यूनेस्को के माध्यम से चल रही कई शैक्षणिक नीतियां प्राथमिक शिक्षा को विकसित करने के लिए निजी संस्थाओं को अप्रत्यक्ष लाभ देकर उद्देश्य को प्राप्त करने के पक्ष में है। 

वस्तुत: 21वीं शताब्दी में भी उदारवाद, अतिउदारवाद, वैश्विकरण, भूमंडलीकरण तथा निजीकरण जो पूंजीवाद का विकल्प है तथा व्यक्तिवाद को विकसित करने वाला है ऐसे में कहीं प्राथमिक शिक्षा बाजारवाद अथवा निजी संस्थाओं की व्यक्तिगत लाभ की बलिवेदी पर न चढ़ जाए। दूसरे शब्दों में भौतिकवाद की चरम सीमा कहीं आने वाली पीढ़ी की आवश्यकता को सीमित न कर दे इसलिए सरकार ने शिक्षा को मौलिक अधिकारों में स्थान दिला कर इसे संवैधानिक संरक्षण अधिकार प्रदान कर दिया है। जिससे यह अपेक्षा करी जाती है कि आने वाली लगभग दो दशकों में भारतीय शिक्षा नीति के प्राथमिक शिक्षा जिसका उद्देश्य सर्वस्व व समग्न है वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर लेगी। 

अत: गांधी का वह विचार जो राष्ट्र के निर्माण से प्राथमिक शिक्षा को जोड़ता है वह अपने अंतिम उद्देश्य को प्राप्त कर लेगा।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

3 + 12 =