भारत में चुनाव सुधार पर निबंध |Essay on Electoral Reforms in India

भारत में चुनाव सुधार पर निबंध

भारत में चुनाव सुधार पर निबंध: पहलें एवं चुनौतियां अथवा भारत में चुनाव सुधार : जीवंत लोकतंत्र की आवश्यकता अथवा चुनावी प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता अथवा चुनाव और भारतीय लोकतंत्र  

यद्यपि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन फिर भी शुरू से लेकर अब तक की देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अवलोकन करने पर हम पाते हैं कि यह ठीक से कार्य नहीं कर रही है। इसके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। लेकिन यहां भारतीय लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया में कमी जैसे महत्त्वपूर्ण कारण पर प्रकाश डालने की कोशिश की जाएगी। प्रायः प्रत्येक देश में लोकतंत्र एक सफल चुनावी प्रक्रिया के कारण ही सफल हो पाता है। भारत में भी केंद्र स्तर पर अब तक सत्रह बार लोकसभा का गठन हो चुका है तथा राज्यों के स्तर पर भी कई बार चुनाव हुए हैं। भारत में चुनावी प्रक्रिया का इतिहास यह बताता है कि शुरुआती कुछ चुनावों को छोड़कर, संभवतः साठ के दशक से भारतीय राजनीति में आई कई दुष्प्रवृत्तियों की तरह चुनाव के क्षेत्र में भी भ्रष्टाचार की शुरुआत होने लगी थी। प्रथम तीन आम चुनावों में छिटपुट घटनाओं को छोड़कर चुनावी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की खबरें बहुत कम थीं, लेकिन चौथे आम चुनाव से जो चुनौतियां खड़ी हुईं वे भारतीय लोकतंत्र के समक्ष आज तक बनी हुई हैं। जैसे-राजनीति का अपराधीकरण, मतदान में गिरावट, धन बल एवं बाहुबल का प्रयोग, फर्जी मतदान, राजनीतिक दलों द्वारा चंदे की उगाही एवं सबसे बढ़कर जन प्रतिनिधियों के ऊपर से जनता का उठता विश्वास, साथ ही नेता व जनता के बीच बढ़ती दूरी। 

“चौथे आम चुनाव से जो चुनौतियां खड़ी हुईं वे भारतीय लोकतंत्र के समक्ष आज तक बनी हुई हैं। जैसे राजनीति का अपराधीकरण, मतदान में गिरावट, धन बल एवं बाहुबल का प्रयोग, फर्जी मतदान, राजनीतिक दलों द्वारा चंदे की उगाही एवं सबसे बढ़कर जन प्रतिनिधियों के ऊपर से जनता का उठता विश्वास, साथ ही नेता व जनता के बीच बढ़ती दूरी।” 

निर्वाचन प्रणाली में उक्त समस्याएं थीं, लेकिन इन्हें रोकने या खत्म करने का संस्थानिक, विधिक या संवैधानिक प्रयास काफी देर से हुआ। यहां तक कि प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी चुनाव सुधार जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को नजरअंदाज किया। चुनाव सुधार पर वर्ष 1996 का समय एक मील का पत्थर साबित होता है। इसलिए प्रस्तुत आलेख में चुनाव सुधार को चार भागों में वर्गीकृत कर समझा जा सकता है। प्रथम- वर्ष 1996 के पहले चुनाव सुधार, द्वितीय वर्ष 1998 का चुनाव सुधार, तृतीय- वर्ष 1996 के बाद चुनाव सुधार एवं चतुर्थ- वर्ष 2010 से वर्तमान तक चुनाव सुधार। वर्ष 1996 के पहले चुनाव सुधार की प्रक्रिया बहुत धीमी थी। हालांकि चुनावी प्रक्रिया में तमाम समस्याएं थीं लेकिन उन्हें दूर करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी प्रायः नेताओं में दिखती थी। भारत में संविधान के लागू होते ही समस्त नागरिकों को वयस्क मताधिकार प्रदान कर दिया गया था लेकिन उस समय मतदान करने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष थी, जिसे वर्ष 1989 में 61वें संविधान संशोधन के द्वारा लोकसभा के साथ ही विधानसभाओं के चुनाव में मतदान करने की न्यूनतम उम्र सीमा को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया। इससे देश के अधिकांश युवाओं को अपने नागरिक अधिकार एवं भावनाओं को अभिव्यक्त करने का मौका मिला। यह चुनाव सुधार की प्रक्रिया में पहला महत्त्वपूर्ण कदम था। जनप्रतिनिधि (संशोधन) अधिनियम, 1988 के अनुसार जो पदाधिकारी एवं कर्मचारी चुनावी प्रक्रिया में विविध कार्यों में संलग्न रहेंगे वे उस अवधि के लिए जब तक चुनाव संपन्न न हो जाए तब तक चुनाव आयोग द्वारा प्रतिनियुक्त माने जाएंगे। इसी अधिनियम के द्वारा व्यर्थ में उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए राज्यसभा एवं विधान परिषदों के चुनाव के लिए नामांकन पत्रों पर प्रस्तावकों की संख्या को बढ़ाकर दस कर दिया गया। वर्ष 1989 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में किए गए संशोधन के अनुसार चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के प्रयोग की व्यवस्था की गई। वर्ष 1999 के गोवा विधानसभा में पहली बार ईवीएम का प्रयोग पूरे राज्य में हुआ। वर्ष 1989 में किए गए संशोधन के अनुसार जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में धारा 58ए जोड़कर बूथ पर कब्जा होने की स्थिति में चनाव स्थगित करने या रद्द करने का प्रावधान किया गया। साथ ही ‘बूथ पर कब्जे’ को परिभाषित भी किया गया। इसमें- मतदान केंद्र पर कब्जा कर लेना और अधिकारियों से मतपत्र या वोटिंग मशीन सरेंडर करा लेना, मतदान केंद्र को अपने कब्जे में ले लेना और सिर्फ अपने समर्थकों को वोट डालने की इजाजत देना, किसी भी मतदाता को मतदान केंद्र पर जाने को लेकर धमकाना या रोकना तथा मतगणना केंद्र पर कब्जा करना और मतगणना में बाधा पहुंचाना शामिल है। 

चुनाव प्रक्रिया और चुनाव मशीनरी की जांच के लिए विभिन्न समितियों का गठन किया गया, जिनके सुझावों के आधार पर कानून बनाये गये। जयप्रकाश नारायण द्वारा संपूर्ण क्रांति आंदोलन के समय न्यायमूर्ति तारकुंडे की अध्यक्षता में गठित गैर-सरकारी समिति को छोड़कर अन्य समितियों जैसे दिनेश गोस्वामी समिति (1990 में वी.पी. सिंह सरकार द्वारा), अपराध और राजनीति के बीच सांठगांठ की जांच के लिए वोहरा समिति (1993) एवं चुनाव खर्च सरकार द्वारा वहन करने पर गठित इंद्रजीत गुप्ता समिति का प्रभाव किसी न किसी रूप में जनप्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1996 पर पड़ा। अगस्त, 1996 से यह संशोधित अधिनियम प्रभावी हुआ। इसके जरिए पहली बार उम्मीदवारों के नामों को तीन श्रेणियों क्रमशः मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के उम्मीदवार, पंजीकृत गैरमान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के उम्मीदवार और अन्य (निर्दलीय) उम्मीदवार में विभक्त किया गया। इस अधिनियम में राष्ट्रीय गौरव अपमान निरोधक अधिनियम, 1971 के तहत सजा प्राप्त व्यक्ति पर छह साल तक लोकसभा और राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया। इस अधिनियम के अंतर्गत मतदान खत्म होने की अवधि के 48 घंटे पहले तक मतदान केंद्र के इलाके में किसी दुकान, खाने की जगह, होटल या किसी भी सार्वजनिक या निजी स्थल में किसी तरह के शराब व नशीले पेय बेचने या बांटने पर प्रतिबंध लगाया गया। इसका उल्लंघन करने पर 6 माह की कैद या 2 हजार रुपये जुर्माने या दोनों का प्रावधान किया गया। इसके अतिरिक्त इस अधिनियम के माध्यम से प्रस्तावकों की संख्या में वृद्धि (लोकसभा एवं राज्यसभा के लिए) करते हुए गैर मान्यता प्राप्त दल के उम्मीदवार के लिए दस कर दी गई तथा उम्मीदवार की मृत्यु हो जाने पर चुनाव रद्द नहीं किया जाता, बल्कि यदि उम्मीदवार मान्यता प्राप्त दल का है तो उस दल को सात दिन के भीतर दूसरा उम्मीदवार देने का विकल्प दिया जाता है। इस अधिनियम के जरिए कुछ अन्य प्रावधान भी किए गए जैसे—उपचनाव की समय-सीमा छह महीने अधिकतम तय की गई, मतदान के दिन कर्मचारियों का वैतनिक अवकाश घोषित किया गया, दो से अधिक चुनाव क्षेत्रों से चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया गया, हथियार पर रोक लगाई गई तथा चुनाव प्रचार की अवधि को 20 दिन से घटाकर 14 दिन कर दिया गया। 

वर्ष 1996 के बाद किए गए चुनाव सुधारों में चुनाव आयोग द्वारा वर्ष 2003 में उम्मीदवारों द्वारा अपने आपराधिक इतिहास, सपत्ति आदि की घोषणा का आदेश दिया गया। चुनाव एवं अन्य संबंधित कानून (संशोधन) अधिनियम, 2003 के द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा लेने की स्वतंत्रता प्रदान की गई। लेकिन 20 हजार से अधिक हर चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को देने की बाध्यता लगाई गई। इसी अधिनियम के तहत किसी मुद्दे को दिखाने या प्रचारित करने या जनता को संबोधित करने के लिए चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों को समान रूप से केबल टेलीविजन नेटवर्क व दूसरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर समय उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया। वर्ष 2010 से लेकर वर्तमान तक किए गए चुनाव सुधारों में प्रथम वर्ष 2009 के जनप्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम (1 फरवरी, 2010 से लागू) के द्वारा ‘एक्जिट पोल’ पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके अतिरिक्त अन्य महत्त्वपूर्ण प्रावधान भी किए गए जैसे—अयोग्य घोषित कराने के लिए मामला दर्ज कराने की समय सीमा तीन महीने निर्धारित की गई, भ्रष्ट तरीके के घेरे में सभी अधिकारियों को शामिल किया गया, उम्मीदवारों द्वारा जमा की जाने वाली जमानत राशि में बढ़ोत्तरी की गई, जिले में एक अपीलीय अधिकारी, विदेशों में रहने वाले भारतीयों को मतदान का अधिकार दिया गया तथा चुनाव में खर्च की अधिकतम सीमा में वृद्धि की गई। उल्लेखनीय है कि चुनाव आयोग ने 17वीं लोकसभा चुनाव यानी 2019 के आम चुनाव में चुनाव सुधार हेतु कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाये। उदाहरणार्थ-पहली बार उम्मीदवारों के चुनाव चिह्न के साथ उम्मीदवार की तस्वीर, उम्मीदवारों द्वारा आय एवं संपत्ति का पूरा ब्यौरा, सरकारी ऐप द्वारा सीधे चुनाव आयोग को शिकायत का विकल्प के अलावा थर्ड जेंडर द्वारा पहली बार मतदान किए जाने की व्यवस्था आदि प्रमुख है। 

“देश के प्रत्येक नागरिक को जाति, क्षेत्र, धर्म व अन्य ऐसी बहकावे में आने वाली बातों से ऊपर उठकर चुनाव प्रक्रिया में शिरकत करना चाहिए तथा संपूर्ण चुनाव प्रक्रिया को स्वस्थ और सफल बनाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।” 

इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर चुनावों में शुचिता और पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए निर्णय दिए। वर्ष 2001 में ‘लोक प्रहरी’ नामक एनजीओ द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए पटना उच्च न्यायालय और (जुलाई, 2013 को) सर्वोच्च न्यायालय दोनों ने जेल में निरुद्ध व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाई। लेकिन इस निर्णय को पलटने के लिए संसद के दोनों सदनों में जनप्रतिनिधित्व (संशोधन एवं वैधीकरण) विधेयक 2013 पारित किया गया जिसके जरिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62(2) में यह प्रावधान जोड़ा गया कि जेल में निरुद्ध व्यक्ति का नाम निर्वाचक नामावली में बना रहता है। अतः वह निर्वाचित होने योग्य भी बना रहता है तथा वह अपना प्रत्याशी के रूप में नामांकन करा सकता है। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय ने सांसदों और विधायकों के आपराधिक मामले को एक वर्ष की समय सीमा में निपटाने का निर्देश जारी किया। चुनाव सुधारों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय ‘पब्लिक यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज’ (PUCL) की याचिका पर ईवीएम और मतपत्रों पर प्रत्याशियों के नामों के अंत में ‘उपर्युक्त में से कोई नहीं’ (None of the Above-NOTA) का विकल्प उपलब्ध कराने संबंधी है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अंग माना। 

संसद, सर्वोच्च न्यायालय व अन्य न्यायालयों द्वारा समय-समय पर चुनाव सुधार के लिए किए गए ये प्रयास उल्लेखनीय हैं, लेकिन इससे व्यापक स्तर पर परिवर्तन होता दिख नहीं रहा। चुनावों में धांधली, भ्रष्टाचार और अयोग्य एवं आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का निर्वाचित हो जाना आम है। लेकिन इस तथ्य की अनदेखी भी नहीं की जा सकती कि पिछले दस सालों में मीडिया (प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक) का जिस तरह से उभार हुआ है उससे सूचना का प्रसार तेजी से हुआ है तथा लोग जागरूक हुए हैं। साथ ही राजनति में लोगों की रुचि बढ़ने के साथ वे अपनी राय भी देने लगे हैं। सोशल मीडिया ने इस संबंध में एक बेहतर मंच उपलब्ध कराया है। भारतीय लोकतंत्र में ‘चुनावों’ को शुचितापूर्ण एवं पारदर्शी बनाना अति आवश्यक है। इस कार्य में संसद, न्यायालय, मीडिया के अलावा लोगों को व्यक्तिगत एवं सामहिक स्तर पर जागरूक होना पडेगा। इसमें गैरसरकारी संगठनों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। ‘चुनाव सुधार’ वर्तमान जनप्रतिनिधियों को जनता व देश के प्रति जिम्मेदार एवं उत्तरदायी तभी बना सकता है जब उसे मुकम्मल किया जाए। देश के प्रत्येक नागरिक को जाति, क्षेत्र, धर्म व अन्य ऐसी बहकावे में आने वाली बातों से ऊपर उठकर चुनाव । प्रक्रिया में शिरकत करना चाहिए तथा संपूर्ण चुनाव प्रक्रिया को स्वस्थ और सफल बनाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। किसी देश में लोकतंत्र की सफलता इस तथ्य में निहित है कि वहां चुनाव कितने साफ सुथरे व नियमित होते हैं। भविष्य में लोकतंत्र को अस्थिर बनाने व बाधा पहुंचाने वाली प्रवृत्तियां न उत्पन्न हो सकें इसलिए वर्तमान में चुनाव सुधार की आवश्यकता व भविष्य में उसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी। 

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