चुनाव पर निबंध- Essay on Election

चुनाव पर निबंध-

चुनाव पर निबंध-ESSAY ON ELECTION

भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली में शासन जनता के हाथों में रहता है। यह संभव नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा से शासन हो अथवा शासन में प्रत्येक व्यक्ति की भागीदारी हो। अतः इसके लिए जनप्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया है। जनता अपनी इच्छा से शासन चलाने के लिए अपने अनुकूल व्यक्ति को प्रतिनिधि चुन सकती है। इसमें जनता द्वारा चयनित प्रतिनिधि ही शासन चलाते हैं। इन प्रतिनिधियों का चुनाव जिस प्रक्रिया के द्वारा संपन्न होता है, उस प्रक्रिया को ‘चुनाव’ अथवा ‘निर्वाचन’ कहते हैं। चुनाव प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली की आधार शिला है। 

स्वतंत्र भारत में पांच वर्षों के अंतराल पर एक आम चुनाव का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा मध्यावधि चुनाव और उपचुनाव की भी व्यवस्था है। देश में चुनाव व्यवस्था सुचारु ढंग से चलाने के लिए एक निर्वाचन आयोग का गठन किया गया है, जिसका मुखिया मुख्य निर्वाचन आयुक्त होता है। केंद्रीय निर्वाचन आयोग के अधीनस्थ राज्यों में भी राज्य निर्वाचन आयोग कार्य करता है। चुनाव में 18 वर्ष या उससे ऊपर के सभी वयस्क स्त्री-पुरुषों को मत देने का अधिकार है। लेकिन वे पागल, दिवालिया या अपराधी न हों। 

चुनाव दो प्रकार के होते हैं-एक, प्रत्यक्ष और दूसरा, अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष चुनाव में जनता सीधे अपना मत देकर प्रतिनिधियों का चयन करती है; यथा विधानसभा और लोकसभा के सदस्यों का चुनाव। अप्रत्यक्ष चुनाव में जनता द्वारा चयनित प्रतिनिधि ही भाग लेते हैं; यथा-राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, विधान परिषद एवं राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव। 

चुनाव के लिए सर्वप्रथम चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचना जारी की जाती है। चुनाव में विभिन्न दल अपने-अपने उम्मीदवार खड़ा करते हैं। इसके लिए चुनाव क्षेत्र निर्धारित रहते हैं। संपूर्ण चुनाव क्षेत्र को छोटी-छोटी इकाइयों में बांट दिया जाता है, जिसे ‘बूथ’ अथवा ‘मतदान केंद्र’ कहते हैं। इन्हीं केंद्रों पर लोग मतदान करते हैं। निर्धारित तिथि के एक दिन पूर्व ही चुनाव कर्मचारी बूथ पर पहुंच जाते हैं। उनके पास मतपत्र, मतपेटियां आदि चुनाव संबंधी सामान रहते हैं। प्रत्येक बूथ पर मतदाताओं की संख्या 500 से 1000 तक होती है। 

अब मतदान केंद्रों पर इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन अर्थात ई.वी.एम. का प्रयोग होने के कारण अनेक प्रकार के सामान निरर्थक हो चुके हैं। ई.वी.एम. का प्रयोग अब लगभग संपूर्ण भारत में होने लगा है। प्रत्येक बूथ पर शांति व्यवस्था हेतु पुलिस बल तैनात रहता है। इधर कुछ वर्षों से चुनावों में ‘बूथ-लूट’ का काम होने लगा है। इससे चुनाव प्रक्रिया में बहुत बाधा उत्पन्न होती है तथा पुनर्मतदान कराने की समस्या खड़ी हो जाती है। 

प्रत्येक बूथ पर एक अधिकारी होता है, जिसकी देख-रेख में मतदान कार्य संपन्न होता है। मतदान कार्य प्रातः 7 बजे से सायं 5 बजे तक होता है। इसके बाद ई.वी.एम. या मतपेटियों को सील कर दिया जाता है । मतगणना की निर्धारित तिथि तक मतों की सुरक्षा का भारी इंतजाम किया जाता है। मतगणना में जिस उम्मीदवार को सर्वाधिक मत प्राप्त होता है, उसे विजयी घोषित किया जाता है। उस क्षेत्र के सिविल ए.डी.ओ. या डी.एम. जो रिटेनिंग ऑफिसर होते हैं, उनके द्वारा विजयी उम्मीदवार को लिखित प्रमाण पत्र दिया जाता है। 

भारत में चुनाव एक समस्या है, क्योंकि यहां के अधिकांश लोग अशिक्षित हैं। अशिक्षित लोग चुनाव का महत्व नहीं समझ पाते। जातीयता, सांप्रदायिकता एवं आर्थिक प्रलोभन के चक्कर में फंसकर वे अपने मताधिकार का दुरुपयोग कर बैठते हैं। चुनाव के समय हत्या, बूथ-लूट आदि तो आम बात हो गई है। शक्तिशाली लोग बहुमत प्राप्त करने हेतु बूथों को ही अपने पक्ष में लुटवा देते हैं या रुपये के बल पर गरीब जनता का मत खरीद लेते हैं। अब तो पदलोलुप पदाधिकारी बूथ लुटवाने में सहयोग प्रदान करते हैं। यही नहीं, ये पदाधिकारी मतगणना में भी हेराफेरी करने से बाज नहीं आते। 

इस प्रकार चुनाव का अर्थ समाप्त हो जाता है। इस चुनाव का एक खास दोष यह है कि इसमें मूर्ख और विद्वान का कोई अंतर नहीं रह जाता। इस संदर्भ में किसी शायर का यह कहना बहुत सार्थक लगता है 

जम्हूरियत वह तर्जे हुकूमत है कि जिसमें, 

बंदों को गिना करते हैं, तौला नहीं जाता।

यही कारण है कि आज विधानसभा और लोकसभा में बुद्धिमान के बदले बाहुबली लोग ही ज्यादा जीत कर जाते हैं। लेकिन लोकतंत्र की सफलता के लिए चुनाव का निष्पक्ष होना बहुत जरूरी है। इसके लिए चुनाव को एक पर्व की तरह मानना चाहिए, ताकि अच्छे और जुझारू जन-प्रतिनिधियों का चयन हो सके। वे देश और समाज का कल्याण करने में सक्षम हो सकें। 

वैसे चुनाव आयोग का सदैव यह प्रयास रहता है कि चुनाव निष्पक्ष हों। लेकिन स्थिति यह है कि कोई डाल-डाल, तो कोई पात-पात। जिस प्रकार पर्व में पवित्रता का महत्व है, उसी प्रकार चुनाव में भी पवित्रता की उपयोगिता है। हिंसा, बूथ-लूट, जातिवाद, सांप्रदायिकता तथा आर्थिक भ्रष्टाचार आदि चुनाव की अनियमितताएं हैं। इन्हें दूर करके ही चुनाव को पवित्र और निष्पक्ष बनाया जा सकता है। इसीलिए हरिभाऊ उपाध्याय का यह कथन सही जान पड़ता है, “चुनाव युद्ध नहीं, तीर्थ है, पर्व है।” 

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