रोजगार सृजन के साथ आर्थिक विकास पर निबंध-Essay on economic development with job creation

रोजगार सृजन के साथ आर्थिक विकास पर निबंध

रोजगार सृजन के साथ आर्थिक विकास (Economic Growth with Employment Generation) 

वैश्वीकरण की मुख्यधारा से स्वयं को जोड़ते हुए विश्व की अधिकांश विकासशील तथा अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाएं घरेलू उत्पादक गतिविधियों में लागत को कम करते हुए गुणवत्ता में सुधार लाकर अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में एक मजबूत प्रतिस्पर्धी के रूप में स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील हैं, विगत कुछ वर्षों में कुछ विकासशील देशों ने (जिनमें भारत भी शामिल है) 7-10 प्रतिशत के बीच की आर्थिक विकास दर के स्तर को प्राप्त करके सारे विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया है. लगातार दो दशकों तक तानाशाही पूँजीवाद को झेलते हुए द. कोरिया ने इलेक्ट्रॉनिक्स, हल्के वाहन तथा अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार में विश्व के प्रतिष्ठित ब्राण्डों को कड़ी चुनौती प्रस्तुत की है, तो ‘लौह-आवरण में लिपटा चीन सबसे कम लागत पर उपभोक्ता वस्तुएं विश्व बाजार में उतार कर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों सहित अनेक प्रतिष्ठित घरेलू कम्पनियों की नींद हराम किए हुए हैं. द. कोरिया, सिंगापुर, मलेशिया, इण्डोनेशिया तथा थाइलैण्ड आदि देशों ने ‘अद्भुत अर्थव्यवस्थाओं के रूप में अपनी पहचान बनायी है. भारत, मेक्सिको, ब्राजील, अर्जेन्टीना, श्रीलंका जैसे देश भी इस दौड़ में शामिल हैं, लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों में ये उपलब्धियाँ उस समय धूमिल-सी हो जाती हैं जब देश के करोड़ों लोग बेरोजगारी-निर्धनता कुपोषण-अशिक्षा के मकड़ जाल में फँसे दृष्टिगोचर होते हैं. उस अवस्था में उच्च आर्थिक विकास दर बेमानीसी लगने लगती है. 

सं. रा. अमरीका, जापान, जर्मनी जैसे विकसित देशों के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दबाव में कार्य कर रहे अन्तर्राष्ट्रीय वित्त एवं विकास संस्थान, विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन विगत 10-12 वर्षों से ‘अवरोध विहीन बाजार प्रणाली के विकास हेतु विकासशील एवं अल्पविकसित देशों पर इस बात के लिए भारी दबाव डाल रहे हैं कि वे अपने बाजार शेष विश्व के निर्यातकों के लिए खोल दें. आयातों पर से सभी प्रकार के मात्रात्मक प्रतिबन्ध उठा लिए जाएं. विदेशी निवेशकों को वे समस्त सुविधाएं और रियायतें मुहैया कराई जाएं जो घरेलू निवेशकों को उपलब्ध हैं. विदेशी कम्पनियों सहित घरेलू कम्पनियों को श्रम सन्नियमों के श्रमिकों से सम्बन्धित कल्याणकारी तथा प्रतिबन्धात्मक प्रावधानों से छूट प्रदान की जाए, सरकार सार्वजनिक प्रतिष्ठानों का निजीकरण करे, कृषकों सहित अन्य सभी उत्पादकों को प्रदान की जा रही सब्सिडी समाप्त कर दी जाए, किसी भी उद्योग में बाल श्रमिकों से कार्य न कराया जाए तथा श्रमिकों को उतनी ही मजदूरी का भुगतान किया जाए जितना कि विकसित देशों में कार्यरतु उनके समकक्ष मजदूरों को की जाती है. अनेक विकासशील देशों ने इन दबावों को किसी-न-किसी रूप में स्वीकार कर लिया है. इससे प्रोत्साहित होकर प्रारम्भ किए गए आर्थिक सुधारों और उदारीकरण की नीतियों से विकासशील देशों में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश तथा पोर्टफोलियो निवेश में भारी वृद्धि भी हुई है, जिससे कतिपय देशों की आर्थिक विकास की दर काफी ऊँची रही है, परन्तु इस उच्च विकास से जुड़ी विडम्बना यह है कि इससे रोजगार के अपेक्षित अवसर सृजित नहीं हो पाए हैं. 

वैश्वीकरण तथा रोजगार सृजन 

चरमोत्कर्ष की ओर बढ़ रही वैश्वीकरण की प्रक्रिया भारत सहित अनेक विकासशील देशों को नए-नए बाजार उपलब्ध कराएगी तथा इससे आर्थिक विकास में तेजी भी आएगी, लेकिन वैश्वीकरण-उदारीकरण- निजीकरण की नीतियों से रोजगार के यथोचित अवसर भारत में श्रम-बल में हो रही वृद्धि के अनुरूप सृजित होंगे अथवा नहीं यह एक विचारणीय प्रश्न है, विकसित एवं तथाकथित तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्थाओं में बेरोजगारी एक गम्भीर समस्या है. आर्थिक सुधारों तथा उदारीकरण की प्रक्रिया, प्रौद्योगिकी उन्नयन, स्वचालितीकरण, स्थिरीकरण तथा संरचनात्मक समायोजन के कार्यक्रम अल्पविकसित देशों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को निवेश करने के लिए प्रेरित तो कर सकते हैं, इससे आर्थिक विकास की गति तेज भी हो सकती है, परन्तु इससे जो आर्थिक संवृद्धि प्राप्त होती है वह देश को रोजगार विहीन विकास की ओर ले जाती है. 

भारत में रोजगार और आर्थिक विकास 

आर्थिक सुधारों के दौरान आर्थिक विकास का अनुभव बताता है कि भारत में 7 से 8 प्रतिशत वार्षिक की उच्च आर्थिक संवृद्धि दर भी पर्याप्त रोजगार सृजित करने में असफल रही है. वास्तविक धरातल पर अर्थशास्त्रियों एवं नीति-निर्माताओं का यह मॉडल कम से कम भारत में तो असफल हो ही गया है कि आर्थिक विकास की ऊँची दर रोजगार के अधिक अवसर सृजित कर बेरोजगारी को दूर करने में सहायक होता है. एशिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ अस्सी के दशक में 0.28 तथा नब्बे के दशक में 0-31 रोजगार लोचशीलता के साथ रोजगार सृजन सबसे कम रहा है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के 61वें चक्र के सर्वेक्षण के हालिया (जुलाई 2004 से जून 2005) के आँकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2004-05 में देश की रोजगार प्राप्त करने लायक कुल जनसंख्या में से मात्र 42 प्रतिशत जनसंख्या ही काम में लगी हुई है. इस सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण भारत में 56 प्रतिशत तथा शहरी भारत में 63 प्रतिशत लोग बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं. 

सेबी के पूर्व आर्थिक परामर्शदाता एम. वाई. खान का कहना है कि आर्थिक विकास की ऊँची दर तथा ऊँची वैश्विक रैंकिंग के बावजूद भारत में ग्रामीण और अर्द्ध-नगरीय क्षेत्रों में निर्धनों का एक बड़ा वर्ग उच्च प्रौद्योगिकी उपयोग जनित आर्थिक विकास का लाभ लेने से वंचित रहा है. उत्पादन में बढ़ती पूँजी, सघनता एवं औद्योगिक क्षेत्रक की पुनर्संरचना के कारण उच्चतर आर्थिक विकास से भी रोजगार सृजित नहीं हुआ है. जनसंख्या में वृद्धि, विशेष रूप से रोजगार पाने लायक जनसंख्या वर्ग में, से भी बेरोजगारी की स्थिति खराब हुई है.

पंचम आर्थिक गणना 

केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन द्वारा की गई पाँचवीं आर्थिक गणना के आँकड़े 12 जून, 2005 को जारी किए गए. इस गणना के आँकड़ों में 1998 से 2005 के बीच गैर कृषि उद्यमों की संवृद्धि एवं इनमें रोजगार की प्रवृत्तियों के कुछ रोचक तथ्य सामने आए हैं. आँकड़े दर्शाते हैं कि उद्यमों एवं रोजगार की संवृद्धि में तेजी से आने के बावजूद आलोच्य अवधि में बेरोजगारी दर में वृद्धि हुई है और निर्धनता के स्तर में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई है.

– रोजगार संवृद्धि में हालिया वर्षों में मामूली-सी वृद्धि हो गई हो, लेकिन आलोच्य अवधि में औसत रोजगार संवृद्धि अभी भी अस्सी के दशक में प्राप्त 2.84 प्रतिशत की औसत संवृद्धि दर से नीची है. कृषि क्षेत्रक में रोजगार संवृद्धि दोनों ही अवधियों में लगभग एक ही स्तर पर स्थित है. वर्ष 1990-98 में 2.36 प्रतिशत वार्षिक की औसत संवृद्धि दर दर्ज करने वाले गैर कृषि उद्यमों की वर्ष 1998-2005 में औसत वार्षिक संवृद्धि दर 4.8 प्रतिशत के उच्चतर स्तर पर रहने के बावजूद इस क्षेत्रक में बेरोजगारी की औसत वार्षिक दर ऊँची रहना यह दर्शाता है कि गैर-कृषि उद्यमों में श्रम प्रधान तकनीक के स्थान पर पूँजी प्रधान तकनीक को प्राथमिकता प्रदान की जा रही है. इतना ही नहीं देश के कुल 42.12 मिलियन गैर कृषि उद्यमों में से मात्र 1.4 प्रतिशत ही उद्यम ऐसे हैं, जिनमें 10 या इससे अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है. 98.6 प्रतिशत उद्यमों का आकार तो काफी छोटा है.

नीतिगत निहितार्थ 

पाँचवीं आर्थिक गणना तथा राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के 61वें चक्र के आँकड़ों से यह स्पष्ट हो गया है कि आर्थिक सुधारों की बदौलत भारतीय अर्थव्यवस्था ने विगत कुछ वर्षों में 6-8 प्रतिशत की ऊँची वार्षिक संवृद्धि दर भले ही प्राप्त कर ली हो, लेकिन यह उच्च संवृद्धि दर पर्याप्त रोजगार सृजन नहीं कर पायी है. इससे ग्रामीण एवं नगरीय दोनों ही क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ी है. रोजगारविहीन विकास से कृषि क्षेत्र पर निर्भर अतिरिक्त श्रम बल के औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्रक में रोजगार के वैकल्पिक अवसर प्राप्त होने की सम्भावनाएं भी कम हुई हैं. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रच्छन्न बेरोजगारी बढ़ी है, इससे नीति-निर्माताओं तथा सत्तासीन राजनीतिज्ञों के माथे पर चिन्ता की लकीरें स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी हैं. प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की पहल पर योजना आयोग ने ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के लिए समग्र रूप से 9 प्रतिशत की विकास दर का लक्ष्य निर्धारित किया है. जो दसवीं योजना के अन्त में 8 प्रतिशत से प्रारम्भ होकर ग्यारहवीं योजना के अन्तिम वर्ष 2011-12 में 10 प्रतिशत होगा. इसे प्राप्त करने के लिए कृषि विकास दर को 4 प्रतिशत तथा विनिर्माणी क्षेत्रक की विकास दर को 12 प्रतिशत वार्षिक के स्तर पर रखा गया है, 

यदि उच्च आर्थिक विकास के साथ रोजगार की उच्च संवृद्धि दर को प्राप्त करना है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि उद्यमों के विस्तार पर बल देना होगा. इसमें ऐसे उद्यमों को प्रमुखता देनी होगी जो अपना कच्चा माल तथा श्रमबल कृषि क्षेत्र से प्राप्त करें. ग्रामीण क्षेत्रों में संचार, विद्युत्, सड़क परिवहन, बैंकिंग, विपणन जैसे आधारिक अवसंरचना सुविधाओं के विकास के साथ सूक्ष्म साख सुविधाओं का विस्तार रोजगार के अधिक अवसर सृजित कराएगा. रोजगार सृजन एवं निर्धनता निवारण में राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा प्रस्तावित ‘पूरा’ मॉडल भी कारगर सिद्ध हो सकता है.

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