ई लर्निंग पर निबंध | ऑनलाइन शिक्षा पर निबंध Essay On Online Education In Hindi

ई लर्निंग पर निबंध

ई लर्निंग पर निबंध | ऑनलाइन शिक्षा पर निबंध Essay On Online Education In Hindi                       ई-लर्निंग : एक अभिनव पद्धति अथवा कक्षा की अप्रासंगिकता (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2001) 

एम.खान अमेरिका में सुखजीवी इंजीनियर थे। उनकी भतीजी जो पास के शहर में रहती थी उनसे विज्ञान के प्रश्नों, विशेषकर गणित के प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़ने में मदद मांगती और ये आनलाइन उत्तर बताते रहते। फिर इसका लाभ और भी लोग उठाने लगे तो यह सिलसिला लोकप्रिय होने लगा। खान प्रभावशाली शिक्षक साबित हो रहे थे। किस्सा कोताह यह कि उन्होंने नौकरी छोड़ दी और उनकी khanacademy.com बेहद लोकप्रिय शिक्षा माध्यम है। उसकी प्रभाविता और लोकप्रियता का यह आलम है कि बिल गेट्स फाउंडेशन ने उसे 50 लाख डालर का अनुदान दिया। छोटे-बड़े अनुदान मानो बरस | रहे हैं। अब खान दूसरे शिक्षकों की भी मदद ले रहे हैं और उनके एक प्रोग्राम को तो स्वयं बिल गेट्स ने इंट्रोड्यूज़ किया है। यह महज एक यथार्थ है ‘आनलाइन एजुकेशन’ का। अब किसी एकलव्य और शंबूक को दंड नहीं दिया जा सकता। ईटन, हैरो से हारवर्ड और एम.आईटी तक में उपलब्ध सर्वोत्कृष्ट शिक्षा अब सबको उपलब्ध है। आनलाइन पाठयक्रम इतना तेजी से बढ़ रहे हैं कि स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के जॉन हैनेसी ने इसे ‘सूनामी’ कहा है। 

“यह पद्धति वैयक्तिक और मानवीय है और शिक्षा का माध्यम और लक्ष्य अगर मानव है तो पद्धति का मानवीय होना आवश्यक है।” 

ई-लर्निंग की पद्धति एक आधुनिकतम शिक्षण पद्धति है जिसका प्रयोग तकनीकी रूप से विकसित देशों में ही किया जा सकता है। ई लर्निंग पद्धति के संचालन के लिए वीडियो कान्फ्रेसिंग, वॉयस रिकॉर्डर व ऐसे एप्लीकेशन की आवश्यकता पडती है जो लिखित या वॉयस मैटर को सुरक्षित कर सके। शिक्षण की यह पद्धति अतिविकसित व विकसित देशों में वर्तमान समय में कारगर साबित हो रही है। अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में शिक्षण की ई-लर्निंग पद्धति एक वैकल्पिक व प्रचलित शिक्षण पद्धति के रूप में फैल रही है। विकसित देश इस पद्धति का प्रयोग श्रम व समय दोनों की बचत के लिए कर रहे हैं। ई-लर्निंग की पद्धति ऐसे शिक्षण पद्धति के विकल्प के रूप में बहुत उपयोगी है जो बच्चों की रचनात्मकता को कापी-किताब व होमवर्क के बोझ से खत्म कर रही है। विकासशील देशों में भी खासकर शहरों में ई-लर्निंग के कुछ अभिनव प्रयोग देखने को मिल रहे हैं। पब्लिक स्कूलों में शिक्षकों की संख्या में खासी कमी करने का एक कारण यह भी है कि स्कूल अब ई-लर्निंग पर जोर दे रहे हैं। लेकिन ई-लर्निंग की पद्धति विकासशील देशों में अभी उतनी कारगर नहीं है। इसके कई कारण हैं, प्रथम यह कि ई-लर्निंग के लिए आवश्यक तकनीकी व पूंजी व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराने में विकासशील देश अक्षम हैं। द्वितीय विकासशील देशों के कुछ चुनिंदा निजी स्कूल ई-लर्निंग की सुविधा उपलब्ध करा सकते हैं परन्तु ज्यादा स्कूल-कालेज ई-लर्निंग उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं हैं। तीसरे, घर पर बैठ के शिक्षा ग्रहण करने की परम्परा विकासशील देश खासकर भारत में नहीं है इसलिए ई-लर्निंग की व्यवस्था कर सकने वाले संपन्न घरों के अभिभावक भी अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं। चतुर्थ ई-लर्निंग की पद्धति के लिए उच्च तकनीकी व पूंजी तथा कुशलता की आवश्यकता होती है जो विकासशील देशों में व्यापक स्तर पर नहीं है। 

विकसित व विकासशील देशों में इस अभिनवतम शिक्षण पद्धति के अलग-अलग स्थितियों के बावजूद इसकी कुछ महत्त्वपूर्ण खूबियां हैं। यह पद्धति उन बच्चों के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी है जो किन्हीं कारणों मुख्यतः शारीरिक अक्षमता के कारण स्कूल जाने में असमर्थ हैं। उनके लिए ई-लर्निंग की व्यवस्था प्राण वायु के समान हो सकती है। ई-लर्निंग की प्रक्रिया में छात्र इंटरनेट के माध्यम से वह समस्त जानकारी प्राप्त कर सकते हैं जिनके लिए उन्हें स्कूलों, कक्षाओं व अध्यापकों के पास जाना होता है। ई-लर्निंग के क्रम में एक बार तैयार किए गए ‘प्रोग्रामिंग मटेरियल’ को कई वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है तथा समय के अनुसार उसमें बदलाव भी किए जा सकते हैं। ई-लर्निंग के द्वारा अयोग्य शिक्षकों की पहचान हो सकगी, बच्चों के पास विकल्प के तौर पर ई-लर्निंग की व्यवस्था लागा, उन्हें अयोग्य शिक्षकों से पढ़ने की आवश्यकता नहीं होगी। 

ई-लर्निंग को सुचारु रूप से व्यवहारपरक बनाने के लिए कुछ मूलभूत सुविधाओं व ढांचे की आवश्यकता पड़ेगी। प्राथमिक स्तर की शिक्षा में कम्प्यूटर की शिक्षा को अनिवार्य बनाना तथा सभी प्राथमिक स्कूलों को, चाहे वे निजी हो या सार्वजनिक कम्प्यूटर व इंटरनेट की सुविधाओं से युक्त करना। शुरुआत में स्कूल समय सारणी में ही एक क्लास ई-लर्निंग की रखी जाए जिससे बच्चों की रुचि औपचारिक तरीके की शिक्षण पद्धति के अलावा भी अन्य क्षेत्र में विकसित हो। 

कुल मिलाकर यह पद्धति वैयक्तिक और मानवीय है और शिक्षा का माध्यम और लक्ष्य अगर मानव है तो पद्धति का मानवीय होना आवश्यक है। यह बात इससे भी जुड़ी है कि कुशल से कुशल यंत्र भी मानव का विकल्प नहीं हो सकता। आज भी कंप्यूटर शतरंज के खिलाड़ी आनंद से हार ही जाता है क्योंकि अंतिम गुर तो आदमी के पास ही होता है। दूसरे बढ़ते यंत्रीकरण के दुष्प्रभाव तो उजागर ही होते जा रहे हैं। शिक्षा तो उस तरह का उत्पादन भी नहीं जिसमें उत्पाद समरूप होते हैं—वांछित गुणवत्ता के अनुसार। 

यह तो हुआ एक पक्ष। दूसरा पक्ष यह है कि सभी शिक्षक समान रूप से कुशल और सृजनशील नहीं होते। इसलिए उनका लाभ केवल उनके विद्यार्थियों को मिल पाता है जिन्हें ऐसे कुशल और सृजनशील शिक्षक उपलब्ध होते हैं। आनलाइन शिक्षा उन्हें सबके लिए उपलब्ध करा सकती है। यह अपने में इस प्रणाली के पक्ष में बड़ा तर्क है। 

इसी का पूरक तर्क यह है कि सभी तो हारवर्ड जा नहीं सकते। और न ही तो उसके लिए धन ही जुटा पाना सबके लिए संभव है। जबकि कुछ रुपयों में विश्व के अपने विषयों के सबसे बड़े जानकार और विख्यात शिक्षकों की सीडी हर जगह उपलब्ध हो सकती है। आज तो कस्बों में भी 5 से 10 रुपये घंटे में नेट के इस्तेमाल की सुविधा के साथ ‘साइबर कैफे’ की भरमार है। 

“विवेक द्वारा संचालित ‘आनलाइन एजुकेशन’ वास्तव में शिक्षा के परिमाण और गणवत्ता को अनंत संभावनाओं की ओर ले जा सकता है।” 

इस पद्धति के दो और महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं सशक्तीकरण और जनतंत्रीकरण। आज सशक्तीकरण का समय है। हर व्यक्ति और समुदाय सशक्त होना चाहता है। कोई परंपरा, कोई मर्यादा और कोई मान्यता उसे रोक नहीं सकती। यह पद्धति सभी पूर्वाग्रहों और मूल्यों-मान्यताओं और पूर्वाग्रह को लांघ कर सबको समान रूप से उपलब्ध है।। 

इसीलिए समाज में जनतंत्रीकरण विकसित और प्रसारित करने – के लिए भी यह पद्धति शिक्षा का एक विशिष्ट उपकरण है। इस प्रणाली के मार्ग में धर्म, जाति, लिंग, क्षेत्रीयता, पितृसत्ता, ब्राह्मणवाद | कुछ भी व्यवधान नहीं बन सकता। 

अंत में, अगर हम मानव और यंत्र के अन्तर्संबंध का मर्म | समझ लें तो अतिरेक से बच सकते हैं। पाषाण काल से अब तक हर तरह के यंत्र मानव ने आवश्यकता के अनुसार विकसित किये हैं। यंत्र मनुष्य भी सामान्य शक्ति और मेधा से बहुत अधिक | शक्तिशाली और कुशल हो गए हैं। पर यंत्र का रचयिता और | चालक-रोबोट का भी, मानव ही है। दूसरी ओर प्रागैतिहासिक | मानव बंदर की औलाद ही बना रहता अगर उसने यंत्र न विकसित किए होते। यंत्रों ने मनुष्य की क्षमता और संभावना उजागर की है और उसे महान रचयिता और संचालक बना दिया है। मनुष्य की सर्जकता और विध्वंसकता अनंत होती जा रही है। ऐसे में विवेक ही निर्णायक है। विवेक द्वारा संचालित ‘आनलाइन एजुकेशन’ वास्तव में शिक्षा के परिमाण और गुणवत्ता को अनंत संभावनाओं की ओर ले जा सकता है। 

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