भारत में ई-गवर्नेंस पर निबंध |Essay on E-Governance in India

भारत में ई-गवर्नेंस पर निबंध

भारत में ई-गवर्नेंस पर निबंध |Essay on E-Governance in India

गवर्नेस वह है जो गवर्नमेंट करती है, (Governance is what a government does) यानी गवर्नेस किसी राज्य, किसी कंपनी या किसी समुदाय को संचालित करने वाले कामों को कहते हैं। इस शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल यूनानी विचारक प्लेटो ने किया था। बाद में ग्रीक भाषा से लातिन और तमाम यूरोपीय भाषाओं में यह शब्द इस्तेमाल होता चला गया। अब तो इंटरनेट के काल में यह करीब-करीब दुनिया की सभी भाषाओं में इस्तेमाल होने लगा है। विश्व बैंक की परिभाषा के अनसार गवर्नेस वह तरीका है जिससे देश के आर्थिक और सामाजिक संसाधनों के विकास के लिए उपयोग किया जाता है। यू.एन.डी.पी. ने अपनी परियोजनाओं के संबंध में परिभाषा को थोड़ा और स्पष्ट कर दिया है; ‘राजनीतिक प्रणाली के वे नियम जो कर्ताओं के बीच टकराहटें दूर करने के लिए बनाए जाते हैं।’ इस परिभाषा में संस्थाओं का ठीक से संचालन और उनकी जनता द्वारा स्वीकृति शामिल किया गया है। 

कुल मिलाकर आज गवर्नेस का निहित अर्थ है स्वीकार्य, शासन-प्रशासन और इसीलिए गवर्नेस को ‘गुड गवर्नेस’ के ही अर्थ में लिया जाता है और इसे जनतांत्रिक कसौटी पर कसा जाता है। इसीलिए प्रशासन को राजनीति से अलग रख कर देखने का चलन है, हालांकि ऐसा आज की राजनीतिक व्यवस्था होने नहीं देती खासतौर से भारत में। अंततः गवर्नेस का मानक है जन-स्वीकृति। वैचारिक स्तर पर भी इसे स्पेन के विचारक ओर्तेगा ई गासेत ने अपनी विख्यात पुस्तक ‘रिवोल्ट ऑफ द मासेज़’ में स्थापना की है कि ‘राज्य के अस्तित्व का सबसे बड़ा आधार उसकी जनता द्वारा स्वीकृति ही है।’ इसी अर्थ में आज गुड गवर्नेस के लिए सिविल सोसायटी की भागीदारी को भी राजनीतिक सत्ता और नौकरशाही के साथ बराबर का भागीदार बनाने की कोशिश है। 

ई-गवर्नेस में विद्यमान संभावनाएं निम्नलिखित हैं। यह सूचना प्रौद्योगिकी के विकास व प्रयोग को प्रोत्साहित करता है। सभी संस्थाओं के बीच पारस्परिक सहयोग प्रदान करता है। इंटरनेट के माध्यम से सूचनाएं व सेवाएं प्रदान की जाती हैं। इसके द्वारा सरकारी सेवाएं नागरिकोन्मुख हो जाती हैं, जिससे नागरिकों में सरकार के प्रति विश्वसनीयता बढ जाती है। ई-गवर्नेस के माध्यम से भ्रष्टाचार की समस्या का समाधान होता है। इसके बावजूद ई-गवर्नेस की समस्याएं व्यापक हैं। सभी लोगों के पास इंटरनेट की सुविधा का न होना, संपर्क करने के पारम्परिक माध्यमों की विश्वसनीयता आम जनता में ज्यादा होना। शैक्षणिक पिछड़ापन व जागरूकता में कमी होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट के प्रयोग के प्रति रुझान बहुत कम है। 

“आज गवर्नेस का निहित अर्थ है स्वीकार्य, शासन-प्रशासन और इसीलिए गवर्नेस को ‘गुड गवर्नेस’ के ही अर्थ में लिया जाता है और इसे जनतांत्रिक कसौटी पर कसा जाता है।” 

बीसवीं सदी के शुरू में भारत के सबसे कुशल प्रशासक वाइसराय लार्ड कर्जन ने दफ्तरों में फाइलों के थिरकते हुए एक मेज से दूसरी मेज तक पहुंचने में काफी वक्त लगाने की बात की थी और इससे प्रशासन में ‘देरी’ की भूमिका चिह्नित की थी। तब से सौ से अधिक वर्षों के दौरान फाइलों और मेजों की संख्या में हजारों गुना वृद्धि हुई है। कहावत है ‘जस्टिस डिलेड इस जस्टिस डिनाइड’ यानी न्याय में देर का मतलब है न्याय से इंकार। यहां उसी न्याय तक सीमित नहीं रहा जा सकता जो न्यायालयों में मिलता है। यह बात उस न्याय पर भी लागू होती है जो किसी भी कार्यालय में हो सकता है और नहीं होता। केवल इसी संदर्भ की बात करें तो ई-गवर्नेस प्रशासन की गति को बढ़ाने में निर्विवाद रूप से सक्षम है। 

जाहिर है कि इस तरह के प्रशासन की आदत डालने में ही काफी वक्त लग रहा है। अधिकांश मंत्रियों और नौकरशाहों को आज भी कंप्यूटर इस्तेमाल करना नहीं आता। उन्हें प्रायः कर्मचारियों पर निर्भर करना होता है और वे निश्चित ही कंप्यूटर की निहित अर्थवत्ता से परिचित नहीं होते। उनके लिए यह तेज कलम चलाने का ही एक तीव्रतर रूप होता है। बौद्धिक प्रखरता और वक्त के साथ चलना आज की कार्यपालिका में आम बात नहीं है। इसलिए ई-गवर्नेस अधिकांशतः राजधानियों और उससे आगे बढ़कर नगरों तक सीमित है। 

ई-गवर्नेस ही नहीं किसी भी तरह के गवर्नेस में कई तरह के अवयव होते हैं जैसे उससे संबद्ध लोग यानी विभिन्न स्तरों पर आज की शब्दावली में मानवीय संसाधन, नीतियां-निर्णयों को कार्यान्वित करने वाली प्रणालियां-प्रक्रियाएं-जिम्मेदारियां और इन सबको एक साथ समेटने वाली चीज कार्य-संस्कृति (वर्क-कल्चर) और अन्ततः इस सबका परिणाम। और परिणाम का सबसे स्वीकार्य मानदंड उससे बेहतर हो ही नहीं सकता जिसे गांधी जी ने सुझाया था कि कोई भी नीति समाज के सबसे निचले पायदान के व्यक्ति के आसुओं को पोछने में सक्षम है या नहीं। 

इस तरह हम ई-गवर्नेस को दो कसौटियों पर कस कर परख सकते हैं-1. क्या इससे कोई बेहतर वर्क-कल्चर विकसित हो पा रहा है? और 2. क्या उससे सामान्य जन के हित का बेहतर पोषण हो पा रहा है? जाहिर है ये मानक उतने आसान हैं नहीं जितने किसी को लग सकते हैं क्योंकि इन्हें लागू करने के लिए पूरी व्यवस्था का रूपांतरण आवश्यक है। यथास्थिति (Status Quo) का एक निहित अर्थ होता है जो अपने को बनाए रखने के लिए कुछ भी करता है। इसलिए वही रूपांतरण का सबसे बड़ा अवरोधक तत्व होता है। इसके लिए तंत्र ही नहीं तंत्र के चालकों को भी बदलना होगा। इसलिए यह मुद्दा आर्थिक-राजनीतिक ही नहीं सामाजिक-सांस्कृतिक है – सबसे अधिक नैतिक है। 

“ई-गवर्नेस ही नहीं किसी भी तरह के गवर्नेस में कई तरह के अवयव होते हैं, जैसे उससे संबद्ध लोग यानी विभिन्न स्तरों पर आज की शब्दावली में मानवीय संसाधन, नीतियां-निर्णयों को कार्यान्वित करने वाली प्रणालियां-प्रक्रियाएं-जिम्मेदारियां और इन सबको एक साथ समेटने वाली चीज कार्य संस्कृति (वर्क-कल्चर) और अन्ततः इस सबका परिणामा” 

इसको इस तरह समझा जा सकता है कि प्रशासन का प्रश्न मूलतः नैतिक है यानी मुद्दा यह है कि प्रशासन मूलतः प्रशासितों के हित के लिए है और यदि वह नहीं हो रहा है तो और कुछ भी हो रहा हो वह अपने लक्ष्य से च्युत माना जाएगा। 

सरकार का तंत्र देश का सबसे बड़ा और आम जनता से जुड़ा तंत्र है और वहां प्रमाणित होने पर ही कोई बात स्वीकार्य होती है। परंतु छोटे स्तर पर हम उद्योग-व्यवसाय और स्वायत्त संस्थानों में बढ़ते-ई-गवर्नेस के नतीजों पर गौर करें तो परिणाम उत्साह-वर्धक ही नजर आएगा। कंप्यूटर के इस्तेमाल की शुरुआत में यह तर्क दिया गया था कि जनसंख्या बहुल भारत में कंप्यूटर लोगों की बेरोजगारी बढ़ाएगा। पर यह तर्क कंप्यूटर के बढ़ते उपयोग को रोक नहीं पाया है। उसी तरह ई-गवर्नेस के विरुद्ध भी यह तर्क दिया जा सकता है कि इससे रोजगार घटेगा। पर यह तर्क तो विज्ञान-टेक्नोलॉजी के हर आविष्कार के विरुद्ध दिया जाता रहा है और अस्वीकार होता रहा है। 

भारतीय समाज हर स्तर पर हर क्षेत्र में असमान विकास का शिकार होता रहा है। इसीलिए किसी भी गणात्मक विकास के मार्ग में परिमाणात्मक विकास की कमी का तर्क का अवरोध खड़ा करता है। पर जो गुणात्मक विकास समय की अभिव्यक्ति के रूप में आता है उसे टाला जा सकता है, भटकाया जा सकता है पर नकारा नहीं जा सकता। और अंत में, ई-गवर्नेस भारत के आर्थिक-राजनैतिक तंत्र के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया की अनिवार्य मांग के रूप में सामने आया है। इसलिए भारत का पिछड़ापन भी उसे रोक नहीं पाएगा, भले ही उसका समुचित लाभ न उठा पाए। 

गवर्नेस की परिभाषा आशय एवं अर्थ, गवर्नेस की पृष्ठभूमि में ई-गवर्नेस का मूल्यांकन एवं उपयोगिता, ई-गवर्नेस के फायदे 

आधुनिक काल में ई-गवर्नेस के बढ़ते कदम, ई-गवर्नेस के उत्साहवर्धक परिणाम 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

eleven + 4 =