भारतीय राजनीति में वंशवाद की राजनीति पर निबंध |Essay on Dynastic Politics in Indian Politics

भारतीय राजनीति में वंशवाद की राजनीति पर निबंध

भारतीय राजनीति में वंशवाद की राजनीति पर निबंध अथवा भारतीय राजनीति और वंशवाद अथवा भारतीय लोकतंत्र और वंशवाद के खतरे 

भारतीय राजनीति में वंशवाद और परिवारवाद की जड़ें गहरी हैं। चाहे देश के राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दल हों अथवा क्षेत्रीय स्तर के राजनीतिक दल, सभी वंशवाद, परिवारवाद और भाई-भतीजावाद की संकीर्ण मनोवृत्तियों से ग्रस्त हैं। इसे विडंबना ही कहेंगे कि लोकतंत्र की दुहाई देने वाले राजनीतिक दलों में खुद आंतरिक लोकतंत्र जैसी कोई चीज नहीं रह गई है। यदि इनमें आंतरिक लोकतंत्र होता, तो वंशवाद को पनपने का मौका ही न मिलता। भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश के लिए वंशवाद की राजनीति को हितकर नहीं माना जा सकता, क्योंकि वंशवाद की राजनीति के कारण जहां प्रतिभावान राजनीतिज्ञों, युवा नेताओं को पनपने का अवसर नहीं मिलता, वहीं इससे तानाशाही प्रवृत्ति का आविर्भाव होता है। 

भारतीय राजनीति में वंशवाद की जड़ें गहरी हैं। यानी यह कहा जा सकता है कि हमारे देश में वंशवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। आज हम गणतंत्र में जी रहे हैं, प्राचीन भारत में राजतंत्र था। राजतंत्र का प्रमुख अवयव वंशवाद ही था। एक ही वंश के अनेक शासकों ने लंबे समय तक राज किया। वंशज ही राजा का उत्तराधिकारी होता था। तब राजनीति ही राज वंश के नाम से जानी जाती थी। जैसे गुप्त वंश, मौर्य वंश, शुंग वंश, चालुक्य वंश आदि। एक राजवंश का पतन होता था, तो दूसरे राजवंश का उदय। इस प्रकार राजनीति पर राजवंशों का वर्चस्व कायम रहता था। 

मध्यकाल में भी घरानों और राजवंशों की राजनीति यथावत बनी रही। दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत जहां गुलाम वंश, खिलजी वंश, तुगलक वंश, सैयद वंश और लोदी वंश का बोलबाला रहा, वहीं मुगल काल में बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब आदि सम्राटों के रूप में पितृ सत्ता कायम रही और वंशवाद का बोलबाला बना रहा। स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति में वंशवाद की व्यापकता कितनी अधिक है।। 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था का सूत्रपात हुआ। लोकतंत्र से अभिप्राय ही उस शासन पद्धति से है, जिसमें सत्ता सामूहिक रूप से लोगों में निहित होती है। यह ‘जनता की सत्ता’ होती है, इसीलिए राजतंत्र और कुलीनतंत्र से भिन्न होती है। भारत में लोकतंत्र की शुरुआत के साथ यह उम्मीद की गई थी कि वंशवाद की राजनीति का पटाक्षेप होगा, किंतु ऐसा हो नही सका। 

आज के गणतंत्र में राजतंत्र की छाप स्तब्धकारी है। राजनीतिक दलों में प्रायः सभी स्तरों पर वंशवाद देखने को मिलता है, फिर चाहे वह | पार्टी अध्यक्ष की नियुक्ति हो, प्रत्याशियों का चयन हो अथवा मंत्रिमण्डल का गठन। स्थिति इतनी विकट है कि शासन-प्रशासन के महत्त्वपूर्ण पदों पर भी चुन-चुन कर नाते-रिश्तेदारों और वंशजों को ही बैठाया , जाता है। 

“भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश के लिए वंशवाद की राजनीति को हितकर नहीं माना जा सकता, क्योंकि वंशवाद की राजनीति के कारण जहां प्रतिभावान राजनीतिज्ञों, युवा नेताओं को पनपने का अवसर नहीं मिलता, वहीं इससे तानाशाही प्रवृत्ति का आविर्भाव होता है।” 

भारत में वंशवाद को पोषित करने की शुरुआत कांग्रेस ने की और देखते-ही-देखते यह रोग अन्य छोटे-बड़े राजनीतिक दलों को भी लग गया। अब वंशवाद के कुछ उदाहरण देखें। भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के देहावसान के बाद कुछ समय के लिए ही लाल बहादुर शास्त्री के हाथ में देश की बागडोर आई। उनका निधन होते ही इंदिरा गांधी ने वंशवाद की राजनीति का पूरा लाभ उठाया और लंबे समय तक सत्ता पर काबिज रहीं। उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बन बैठे, जबकि सर्वविदित है कि वह एक गैरराजनीतिक व्यक्ति थे तथा भारतीय राजनीति से उन्हें कोई सरोकार न था। राजीव गांधी की हत्या के बाद उनकी पत्नी सोनिया गांधी का पार्टी में वर्चस्व कायम रहा। उनके पुत्र राहुल गांधी ‘युवराज’ के रूप में अभिहित किए जाते हैं। यह तो रही एक राष्ट्रीय पार्टी की वंशवादी तस्वीर। अब जरा क्षेत्रीय पार्टियों की तरफ देखें। राजद के नेता लालू प्रसाद यादव को घोटालों का आरोपी होने के कारण गद्दी छोड़नी पड़ी, तो वंशवाद के चलते उनकी पत्नी राबड़ी देवी न सिर्फ पार्टी अध्यक्ष बनीं, बल्कि प्रदेश की मुख्यमंत्री भी बनीं। अब आते हैं समाजवाद की पैरोकारी करने वाली समाजवादी पार्टी पर। यह पार्टी भी पूरे तौर पर वंशवाद की गिरफ्त में है। ऐसे अनेक उदाहरणों से भारतीय राजनीति भरी पड़ी है। गोया राजनीति वंश और परिवारों की जागीर बन कर रह गई है। देश की समूची राजनीति ही वंशवाद से आच्छादित नजर आ रही है, कुछ एक अपवादों को छोड़कर। 

राजनीतिक दल यदि वंशवाद से विमुख नहीं होना चाहते हैं, तो इसकी कुछ वजहें हैं। ये दल वंशवाद के फायदों से हाथ नहीं धोना चाहते हैं। वंशवाद की राजनीति का सबसे बड़ा फायदा यह है कि परिवार व वंश विशेष का वर्चस्व राजनीति पर बना रहता है और बिना किसी संघर्ष के ऐसा परिवार या वंश अपनी राजनीतिक हनक को कायम रखता है तथा परम्परागत ढंग से सत्ता का उपभोग करता है। एक पद छोड़ता है, तो दूसरा उस पर बैठ जाता है। वंश का बोलबाला होने के कारण न तो संघर्ष होता है, न ही किसी प्रकार की खींचतान। वंश के आधार पर आसानी से नेतृत्व हस्तांतरित होता रहता है। 

वंशवाद की राजनीति लोकतंत्र के लिए नितांत घातक है। लोकतंत्र में समान अवसरों को वरीयता दी जाती है, किंतु वंशवाद की राजनीति के कारण समान अवसरों की यह अवधारणा दम तोड़ देती है। अनेक अच्छे और उदीयमान नेता वंशवाद की बलि चढ़ जाने के कारण देश की राजनीति में अपना योगदान देने से वंचित रह जाते हैं। वंश या परिवार आधारित राजनीति तानाशाही का पर्याय होती है तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की श्रीवृद्धि में इसकी भूमिका शून्य होती है। वंशवाद की राजनीति से देश का विकास भी अवरुद्ध होता है, क्योंकि महत्त्वपूर्ण पदों पर वंश और परिवार के वे लोग काबिज रहते हैं, जो न तो दक्ष होते हैं और न ही उन्हें काम का कोई अनुभव ही होता है। | इसका प्रतिकूल प्रभाव सामने आना स्वाभाविक है। वंशवाद की | राजनीति का लाभ उठाकर ऐसे लोग बगैर किसी परिश्रम के पद प्राप्त करते हैं, इसलिए अपने पद का कोई मोल या गरिमा नहीं समझते हैं।

लोकतंत्र में वंशानुगत (Hereditary Rule) को अच्छा नहीं माना जाता है। लोकतंत्र तो कर्म की कुशलता के मार्ग को प्रशस्त करता है, जबकि वंशवाद की राजनीति में कर्म का कोई स्थान नहीं है। वंशवाद की राजनीति शक्ति की राजनीति को प्रोत्साहित करती है, न कि सहयोग की राजनीति को। ऐसे में उन लोकतांत्रिक मूल्यों का खंडित होना स्वाभाविक है, जो सहयोग, समन्वय और सार्वजनिकता की राजनीति पर बल देते हैं। 

वंशवाद की राजनीति लोकतंत्र को निगल रही है। यह आकरण | नहीं है कि एक तरफ तो राजनेताओं की लोकप्रियता घट रही है, तो | दूसरी तरफ गणतंत्र की इतनी बड़ी भीड़ में ‘जननायक’ जैसा कोई चेहरा उभर कर सामने नहीं आ रहा है। सच तो यह है कि हमने शासन व्यवस्था में तो लोकतंत्र को अंगीकार कर लिया, किंतु लोकतांत्रिक मूल्यों और मान्यताओं को अंगीकार नहीं कर पाए। यदि किया होता, तो वंशवाद की राजनीति की ओर उन्मुख न होते। इन्हीं वजहों से हम उस सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना भी नहीं कर पाए, जिसे वास्तविक लोकतंत्र की सार्थकता के लिए डॉ. भीमराव अम्बेदकर ने आवश्यक माना था। 

जहां तक भारतीय राजनीति का वंशवाद से उबरने का प्रश्न है, तो राजनीति के स्तर पर तो यह संभव नहीं दिखता, क्योंकि प्रायः हर राजनीतिक दल वंशवादी संस्कृति को अंगीकार कर चुका है। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक हलकों में सन्नाटा पसरा हुआ है। कोई मुंह खोलने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि मुंह खोलने से पहले अपने गिरेबान में झांकना होगा। जनता में बेशक वंशवाद की राजनीति को लेकर चिढ़ बढ़ती जा रही है। ऐसे में इस समस्या को जनता के हवाले करना ही श्रयेस्कर रहेगा। लोकतंत्र में जनता ही ‘जनार्दन’ है। वही इस समस्या का बेहतर समाधान तलाश करेगी। 

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