पुलिस के कर्तव्य पर निबंध | Essay on Duty of Police

पुलिस के कर्तव्य पर निबंध

पुलिस के कर्तव्य पर निबंध

अप्रतिम वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपलब्धियों के परिवेश में तीव्र गति से हो रहे सामाजिक परिवर्तन ने व्यवस्था संबंधी अनेक चुनौतियां पुलिस-बल के समक्ष प्रस्तुत कर दी हैं। आज का पुलिस-बल नित नई-नई समस्याओं से जूझ रहा है। वह अपने विवेक से हर समस्या पर विजय पाता हुआ लोक-कल्याण में लगा है। इस प्रकार समाज के सुख-दुख से उसके अभीष्ट सरोकार हैं। 

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह आदिकाल से ही समाज में रह रहा है। मनुष्य अपनी आजादी पर कभी अंकुश नहीं चाहता। उसके इसी स्वच्छंद व्यवहार को दृष्टिगत करते हुए एक व्यवस्था का आविर्भाव हुआ, जो मनुष्य द्वारा किए जाने वाले गलत कार्यों पर अंकुश लगाने का कार्य करे। चूंकि यह संसार परिवर्तनशील है, इसीलिए आदिकाल से अब तक हमारे समाज, राष्ट्र तथा राजनीति में बहुत परिवर्तन हुए और लगातार हो रहे हैं। इसके फलस्वरूप इस व्यवस्था का ढांचा बदला और इसका नाम पुलिस पड़ा। पुलिस का उद्देश्य भी समयानुसार विस्तृत हो गया है, लेकिन प्रमुख है-सामाजिक प्रगति एवं न्याय की स्थापना करना। यही व्यवस्था हमें हमारे कर्तव्यों का बोध कराती है। 

‘पुलिस’ समाज में से चुने हुए उन व्यक्तियों का एक समाज है, जो प्रतिज्ञा करता है कि वो समाज में फैली विभिन्न बुराइयों का अंत करेगा तथा अपने सौहार्द्रपूर्ण कार्यों से जनता जनार्दन का विश्वास प्राप्त करेगा। पुलिसकर्मी जन-जीवन से सीधे जुड़ा हुआ एक व्यक्ति है। भारतीय गणतंत्र एवं समाज के बदलते परिवेश में पुलिस के कर्म क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। 

पुलिस को अपने सद्व्यवहार से जनता में यह विश्वास जागृत करने का प्रयास करना चाहिए कि वे हमें जानें, हमसे डरें नहीं और हमें सहयोग दें। इसके लिए उन्हें वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए, क्योंकि वाणी से बढ़कर हमारे चरित्र की निश्चित परिचायिका कोई अन्य चीज नहीं है। साथ ही समाज उन्हें जाने, इसके लिए अपना लक्ष्य सदैव आगे रखना चाहिए। 

पुलिस को अपना व्यवहार हमेशा सौम्य बनाए रखना चाहिए। यदि वे लोगों के जीवन-पथ पर पुष्प नहीं बिखेर सकते, तो कम से कम उस पर मुस्कान तो बिखेर ही सकते हैं। मुस्कान तब बिखरेगी, जब वे अपने दायित्वों का भली-भांति वहन करेंगे। उन्हें अपना सुस्पष्ट उज्ज्वल रूप जनता के समक्ष रखना चाहिए, ताकि वे उनके विरोधी न होकर सहयोगी सिद्ध हों। उन्हें अपनी कथनी और करनी भी एक रखनी होगी। पुलिस जन का यह भी कर्तव्य है कि वह समाज और देश की धड़कन को पहचाने तथा अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए समाज के लोगों का ठीक उसी प्रकार पालन-पोषण करे, जिस प्रकार घर का मुखिया घर-परिवार के सदस्यों का पालन-पोषण करता है। 

समाज में अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए जनता का विश्वास हासिल करना एक आवश्यक अर्हता है। उन्हें गर्व होना चाहिए कि वे पुलिस विभाग में हैं, जिसका कोई सानी नहीं है। यह विभाग विश्व में अपना पहला स्थान रखता है। पुलिस की अपनी एक गौरवशाली परंपरा रही है, जिसका इतिहास साक्षी है। 

पुलिस समाज का मेरुदंड है। यह उतना ही सार्वभौमिक सत्य है, जितना कि सूर्य का पूर्व से उदय होना। सामाजिक व्यवस्था को सुचारु रूप से संपन्न कराने का उत्तरदायित्व पुलिस विभाग का ही है। वह न तो हमारे अधिकार का हनन करे और न ही हम किसी के अधिकार का हनन करें। पुलिस जनता और न्यायमूर्ति के बीच की वो कड़ी है, जो सदैव सत्य को प्रकाश में लाती है। वह कभी भी अपने उत्तरदायित्व से घबराकर विमुख नहीं होती, बल्कि समाज की सेवा करते हुए स्वयं को होम कर देती है। 

जिस प्रकार हमारे शरीर के सुचारुपूर्वक कार्य करने के लिए शरीर में मेरुदंड एक विशेष स्थान रखता है, ठीक उसी प्रकार सामाजिक, न्यायिक एवं राजनैतिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए पुलिस समाज में एक मेरुदंड का कार्य करती है। उपरोक्त दायित्वों का वहन मन, कर्म और वचन द्वारा पुलिस जन करता चला आ रहा है। उन्हें गर्व होना चाहिए कि वे इस समाज में सशक्त रूप से जुड़े हैं। उन्हें समाज में ऐसे रहना चाहिए 

तुलसी संत सुअम्ब तरु, फूलि फटहिं परहेतु।

इतते पे पाहन हते, उतते वे फल देत॥ 

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