दुर्गा पूजा पर निबंध | Essay on Durga Puja

दुर्गा पूजा पर निबंध

दुर्गा पूजा पर निबंध | Essay on Durga Puja

मानव-जीवन की पूर्णता के लिए शास्त्रबल के साथ-साथ शस्त्रबल का होना आवश्यक है। शास्त्रबल और शस्त्रबल-दोनों के संयोग से ही हमारा राष्ट्र सुरक्षित रह सकता है। शास्त्रबल के लिए हम सरस्वती की आराधना करते हैं और शस्त्रबल के लिए मां दुर्गा की। दुर्गा पूजा हिंदुओं का एक धार्मिक पर्व है, जिसमें शक्ति प्राप्ति के लिए आदिशक्ति मां दुर्गा की पूजा की जाती है। 

दशहरा, विजया दशमी एवं दुर्गा पूजा आदि इसी पर्व के नाम हैं। इन सभी नामों के पीछे धार्मिक कारण लगभग एक ही है। इन नामों की सार्थकता भगवान श्रीराम की कथा से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि भगवान श्रीराम ने आश्विन शुक्ल दशमी को ही दुष्ट रावण पर विजय पाई थी, इसलिए इस पर्व को विजय दशमी’ कहते हैं। चूंकि इसी दिन दशमुख वाले रावण की हार हुई थी, इसीलिए इस पर्व का दूसरा नाम ‘दशहरा’ है। ऐसी भी कथा है कि राम-रावण युद्ध में रावण का वध श्रीराम के लिए कठिन होता जा रहा था। अतः श्रीराम ने शक्ति की देवी मां दुर्गा की उपासना की। उपासना से प्रसन्न होकर देवी ने श्रीराम को रावण वध का आशीर्वाद दिया। उसके बाद ही श्रीराम दशानन रावण का वध कर सके। इसीलिए इस पर्व का एक नाम ‘दुर्गा पूजा’ भी है। 

इस पर्व के पीछे एक अन्य पौराणिक कथा है। महिषासुर नामक राक्षस एक अत्याचारी राजा था। उसके अत्याचारों से जनता त्रस्त थी। देवता भी उससे भयभीत रहते थे। तब सभी ने मिलकर महाशक्ति की उपासना की। भक्तों की प्रार्थना से प्रसन्न होकर आदिशक्ति दुर्गा प्रकट हुईं। उन्होंने अपनी अनंत शक्ति से महिषासुर, शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ आदि भयंकर राक्षसों का संहार किया। इसके बाद सर्वत्र शांति एवं उल्लास का वातावरण छा गया। मां दुर्गा के प्राकट्य एवं राक्षसों के संहार की स्मृति में दुर्गा पूजा का पर्व मनाया जाता है। 

दुर्गा पूजा का त्योहार आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि को मनाया जाता है। मां दुर्गा की भव्य मूर्तियां महीनों पहले से ही बननी प्रारंभ हो जाती हैं। इन मूर्तियों में मां को सिंह पर सवार दिखाया जाता है। मां का एक पैर महिषासुर के कंधे पर और उनकी बरछी असुर की छाती में धंसी रहती है। मां के दस हाथ होते हैं। सभी हाथ अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित रहते हैं। कहीं-कहीं उनके दाएं भाग में लक्ष्मी और बाएं भाग में सरस्वती विराजती हैं। गणेश और कार्तिकेय भी साथ में रहते हैं। यह शक्ति, ज्ञान और धन के समन्वय का प्रतीक है। ऐसी ही भव्य मूर्ति को पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है, जहां आश्विन प्रतिपदा से लेकर नवमी तक लगातार दुर्गा पाठ होता है। इसे ‘नवाहन पाठ’ भी कहते हैं। लोग पवित्रता के साथ अपने घरों में भी नवाहन पाठ करते हैं। प्रत्येक श्रद्धालु मां की मूर्ति के पास हाथ जोड़कर यह वर मांगता है –

महिषासुर निवर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः। 

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥

अर्थात महिषासुर राक्षस का विनाश करने वाली और भक्तों को सुख देने वाली माता तुम्हें नमस्कार है। तुम हमें रूप दो, विजय दो, यश दो एवं हमारे दुर्गुणों का नाश करो। 

दशमी को खूब चहल-पहल रहती है। पूजा स्थल पर कहीं-कहीं मेले भी लगाए जाते हैं। कुछ शहरों में इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाकर जलाए जाते हैं। यह दृश्य अत्यंत आकर्षक और लोमहर्षक होता है। इसके बाद दूसरे दिन बड़ी धूमधाम से जुलूस निकालकर मां दुर्गा की मूर्ति को किसी तालाब या नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। 

परंतु आजकल जिस ढंग से दुर्गा पूजा का पर्व मनाया जाता है, उससे इस पर्व की पवित्रता एवं महत्ता घट रही है। पूजा के लिए जबरदस्ती चंदे की उगाही होती है। इससे भाई-चारे के संबंध में कटुता आने का भय रहता है। पूजा स्थल पर फिल्मी गीत बजाए जाते हैं। इससे मां के मंत्र का प्रभाव नष्ट हो जाता है एवं ध्वनि प्रदूषण में भी वृद्धि होती है। दुर्गा पूजा का मर्म तो अपने अंदर के काम, क्रोध और मोह का नाश कर आत्मबली बनने से है। रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद का वध काम, क्रोध और मोह के नाश का प्रतीक है। अतएव प्रत्येक श्रद्धालु को दुर्गा पूजा में यही भाव रखना चाहिए।

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