सूखा और उससे भारत में बचाव | सूखा आपदा प्रबंधन पर निबंध Essay on Drought Disaster Management

सूखा और उससे भारत में बचाव

सूखा और उससे भारत में बचाव (यूपी पीसीएस मुख्य परीक्षा, 2015) | सूखा आपदा प्रबंधन पर निबंध

पर्यावरण असंतुलन के कारण पैदा हई जलवायु परिवर्तन की समस्या की देन सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएं हैं। ग्रीन हाउस गैसों का प्रभाव, वनों का सफाया, अवैध खनन, क्षमता से अधिक निर्माण कार्य, विभिन्न प्रकार के प्रदूषण तथा विकास की होड़ में प्रकृति की अनदेखी करना जैसे अनेक कारणों ने ऋतु चक्र को तो गड़बड़ाया ही है, प्रकृति की विनाशलीलाओं को भी बढ़ाया है। इसी में से एक सूखा भी है। सूखा एक भयावह समस्या है, जो कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश के किसानों की मुस्कान छीन लेती है। किसानों के चेहरे मुरझा जाते हैं, तो देश की अर्थव्यवस्था पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हमारे देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था है, जिसे सूखा जैसे प्राकृतिक प्रकोप जर्जर बना देते हैं। देश की समद्धि और विकास थम जाता है और खाद्यान्न संकट की स्थिति निर्मित हो जाती है। वस्तुतः सूखा एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जिस पर मानव का कोई नियंत्रण नहीं है। 

सूखा किसी भौगोलिक प्रदेश में उत्पन्न उस असामान्य मौसमी दशा को कहते हैं, जिसमें वर्षा की सम्भावना तो रही हो लेकिन वर्षा नहीं हुई हो। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार सूखा उस दशा को कहते हैं जब किसी भौगोलिक क्षेत्र में सामान्य वर्षा से वास्तविक वर्षा 75 प्रतिशत कम होती है। इस आधार पर सूखा को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है-प्रचण्ड सूखा एवं सामान्य सूखा। जब वर्षा का अभाव सामान्य वर्षा के 50 प्रतिशत से अधिक हो तो उसे प्रचण्ड सूखा कहा जाता है और जब वर्षा का अभाव सामान्य से 25 50 प्रतिशत के बीच होता है तो उसे सामान्य सूखा कहते हैं। इसके अलावा जलवायु की दशाओं, स्थलीय एवं भूमिगत जलस्रोतों में जल की स्थिति तथा इससे प्रभावित कृषि दशाओं तथा सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों की प्रकृति के आधार पर सूखे के कई प्रकार निर्धारित किये गये हैं। मसलन, जिस राज्य में सामान्य से 20% कम वर्षा होती है उसे सूखाग्रस्त घोषित कर दिया जाता है तथा इसे मौसमी सूखा कहते हैं। जब मौसम सम्बंधी सूखा लम्बे समय तक चलता है तो जलीय सूखा (hydrological drought) की स्थिति बन जाती है जिसमें जल संसाधनों की कमी हो जाती है। भारत में कृषि सूखा की स्थिति भयावह है। इसमें भूमि में नमी तथा वर्षा की कमी या अनियमितता के कारण कृषि कार्य प्रभावित होता है तथा उत्पादकता में कमी आती है। जब मृदा में नमी एवं जल की इतनी कमी हो जाती है कि फसल उगाना ही सम्भव नहीं होता तो उसे मृदा जनित सूखा कहते हैं। कृषि सूखा में फसलें तो उगायी जाती हैं लेकिन उनकी अर्थ वृद्धि के लिए वर्षा की मात्रा पर्याप्त नहीं होती है। इसी प्रकार जब पर्यावरण की क्षति के कारण किसी पारिस्थितिकी तंत्र में उत्पादकता में कमी आ जाती है तो इसे परिस्थितिकीय सूखा कहते हैं। 

सूखा वस्तुतः मानव द्वारा प्रकृति के मूल स्वरूप को परिवर्तित करने का परिणाम है। वनोन्मूलन, भू-जल का अतिदोहन, जल संभरण को महत्व न देना, बड़े-बड़े जलाशयों को पाटकर खेती के काम में लाना इत्यादि कारणों से जल स्रोतों की गुणवत्ता में ह्रास हुआ। फलस्वरूप अनक स्थानों पर सूक्ष्म जलवाय परिवर्तन से मानसन की स्वाभाविक क्रियाशीलता प्रभावित हुई है। इसके अलावा भी कछ कारण महत्त्वपूर्ण ढंग से सूखे के लिए उत्तरदायी हैं। मसलन, जहां मानसन की प्रकृति में बदलाव के फलस्वरूप वर्षा की अनियमितता देखने को मिलती है, वहीं भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में मानसून की अवधि अलग-अलग होना भी सूखे का कारण बनता है। आजकल एलनिनो तथा दक्षिणी दोलन को भी सूखा का एक कारण माना जा रहा है, तो अरब सागरीय जल पर सोमाली की ठण्डी धारा का प्रभाव भी इसका एक कारण है। थार के रगिस्तान में न्यून अवदाब के अभाव से भी सूखे की स्थिति बनती है। तीव्र वनोन्मूलन से बनने वाला मानसून संघनित नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप वर्षा नहीं हो पाती है। पारम्परिक फसल प्रतिरूप में परिवर्तन को भी सूखे का कारण माना जाता है। इसी प्रकार भूजल का तीव्र दोहन तथा साथ ही साथ सतही जल स्रोतों में जल की कमी से जलीय सूखा की स्थिति उत्पन्न होती जा रही है। वर्षा जल का कोई नियोजित प्रबंधन न होने से भी सूखे की स्थिति पैदा हो रही है। 

भारत में समय-समय पर वैसे तो सूखे की काली छाया से अनेक हिस्से प्रभावित होते रहते हैं, किन्तु सूखे का सर्वाधिक प्रभाव उत्तरी-पश्चिमी भाग में स्थित थार के रेगिस्तान में बना रहता है। इसका मूल कारण थार के रेगिस्तान में बालू के कणों की अधिकता से तापीय विलोमता की स्थिति पैदा हो जाती है जिसमें अरावली पर्वत की अवस्थिति भी सहायक होती है। राजस्थान के अलावा अन्य जो राज्य सूखे से प्रभावित हैं वे हैं-महाराष्ट्र, कर्नाटक व आंध्र प्रदेश के वृष्टि छाया प्रदेश जहां वार्षिक वर्षा काफी अनियमित है। इनके अलावा उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर तथा बिहार के पलामू, पुरुलिया और कालाहांडी जिले भी सूखा प्रभावित क्षेत्र माने जाते हैं। 

सूखा एक भयावह प्राकृतिक आपदा है, जिसके व्यापक परिणाम अनेक स्तरों पर देखने को मिलते हैं। इसके सामाजिक व आर्थिक प्रभाव तो सामने आते ही हैं, भौतिक व पर्यावरणीय प्रभाव भी देखने को मिलता है। यह कहना असंगत न होगा कि सूखा विविध स्तरों पर समूचे जीवमंडल को प्रभावित करता है। पहले इसके सामाजिक व आर्थिक प्रभावों पर नजर डालते हैं। सखे के कारण सम्पर्ण आर्थिक तंत्र प्रभावित होता है। क्योंकि देश की अधिकांश जनसंख्या कृषि एवं पशुधन से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी है। अतः सूखा पड़ने से स्वास्थ्य, गरीबी, कुपोषण एवं भुखमरी जैसी समस्याओं में वृद्धि हो जाती है। सामाजिक सुरक्षा में भी कमी आने लगती है। खाद्यान्नों तथा अन्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि से लोगों की क्रयशक्ति में कमी आने लगती है। इसके अलावा लोग स्थायी सम्पत्तियों को बेचने के लिए मजबूर होने लगते हैं जिससे सामाजिक अपराधों में भी वृद्धि होने लगती है। 

सूखे के पर्यावरणीय प्रभाव भी कम घातक नहीं होते हैं। सूखे के कारण दीर्घकालिक रूप से सर्वाधिक पर्यावरण ही प्रभावित होता है जिसके कारण वन्य जीवों के आवासों का ह्रास तथा जीवों के लिए जल एवं भोजन में कमी होने लगती है। वनस्पति आवरण घटने लगता है तथा पादप प्रजातियाँ विलुप्त होने लगती हैं। भारत में अभी भी लगभग सम्पूर्ण कृषि मानसून पर आधारित है तथा सूखाग्रस्त क्षेत्रों में वर्षा से प्राप्त जल द्वारा ही नमी मिल पाती है जिसके अभाव में कृषि उत्पादकता में कमी, पशुओं के लिए चारागाह भूमि तथा जल की कमी, नियत फसलों की कमी, वनोत्पादन में कमी तथा मत्स्यन में भी कमी आ जाती है। इसके अलावा फसलों में बीमारियाँ तथा जीव-जंतुओं द्वारा फसलों को हानि होने लगती है। सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जमीन के अंदर नमी के समाप्त हो जाने से भूजल स्तर घट जाता है और सतही जल स्रोत भी समाप्त हो जाते हैं। अतः ऐसे क्षेत्रों में वृक्षारोपण में भी समस्या आती है। 

सूखा तथा इसके दुष्प्रभावों से बचने के लिए हमें ‘सूखा प्रबंधन पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करना पड़ेगा। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए तो यह बेहद जरूरी है कि हम सूखा प्रबंधन की एक ठोस प्रणाली विकसित करें, क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था का । दारोमदार काफी कुछ उन्नत कृषि पर रहता है। पर्यावरणीय असंतुलनों के कारण सूखे की विकटता को देखते हुए हमें समानान्तर एक ऐसी व्यवस्था विकसित करनी ही होगी, जिससे मानसून पर हमारी निर्भरता कम हो और हम सूखे से अप्रभावित बने रहें अथवा उस तरह से प्रभावित न हों, जिस तरह से होते आ रहे हैं। देशकाल की जो परिस्थितियां हैं, उनमें हमारे देश के किसान का भविष्य आज भी | मानसन ही निर्धारित करता है। मानसन यदि समय पर आ गया और पर्याप्त वर्षा हो गई, तब तो किसानों के चेहरे खिल उठते हैं और यदि मानसून समय पर न आया अथवा कमजोर आया, तो किसान की किस्मत फूट जाती है। मानसून की अनिश्चितता के कारण भारतीय किसान सदैव असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहता है। हमें इस स्थिति को बदलना होगा और इसके लिए सूखा प्रबंधन की एक ठोस और प्रभावी प्रणाली का विकास करना होगा, ताकि सूखा पड़ने पर उसके दुष्प्रभावों से बचा जा सके। सरकार ने इस दिशा में ध्यान देना तो शुरू किया है, किंतु अभी स्थिति में कोई विशेष बदलाव देखने को नहीं मिल रहा। हमें सखे की त्रासदी से बचने के लिए बहत सचिंतित व नियोजित तरीके से सूखा प्रबंधन की दिशा में प्रभावी कदम उठाने होंगे। यहां क्रमवार सूखा प्रबंधन से जुड़े कुछ बिन्दुओं पर गौर करना समीचीन रहेगा। 

जल संरक्षण-सखे से बचने के लिए हमें जल क महत्त्व का समझना होगा तथा पानी की एक-एक बंद को महजन का प्रयास करना होगा। देश में जल संरक्षण बहुत बुरी हालत में है। हम जल स्रोतों को लगातार तबाह करते जा रहे हैं। विगत दशकों में शहर के बीच में पड़ने वाले ज्यादातर ताल-तालाबों को बेरहमी से भरा गया है। गाँव भी जल संरक्षण की महत्ता को भूलते जा रहे हैं। दशमबहुत कम गाँव हैं, जहां तालाबों की यथोचित देख-रेख होती है। 

वैसे अब वैज्ञानिक वर्षा जल के अधिकाधिक संग्रहण तथा वाध्योत्सर्जन की दर को कम करने में जुटे हैं। इसके लिए विभिन्न प्रकार की जल संग्रहण पद्धतियों तथा वलयाकार खट्ट, खाई एवं मढ़, तश्तरीनुमा थावले, गहरी जुताई के अतिरिक्त बड़ी-बड़ी मेढ़ें बनाकर एवं बल्ब आदि के द्वारा वर्षा जल को अत्यधिक मात्रा में संग्रहित एवं संरक्षित रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। 

वस्तुतः जल संरक्षण का काम स्थानीय काम है। अत: स्थानीय स्तर पर सूखा प्रबंधन के लिए कुछ अल्पकालिक एवं कछ दीर्घकालिक योजनाएं बनाने की आवश्यकता है। अल्पकालिक योजनाओं में मुख्य मुद्दा मानव एवं पशुधन के लिए पानी, भोजन, स्वास्थ्य एवं आर्थिक गतिविधियां हैं। दीर्घकालिक योजना के लिए जनमानस को सूखे से लड़ने के लिए तैयार करना, जल संरक्षण की विधियों का योजनाबद्ध तरीके से जनभागीदारी के साथ क्रियान्वयन तथा वैकल्पिक कृषि को बढ़ावा देना प्रमुख है।

गैर परम्परागत खेती-सूखा प्रभावित क्षेत्रों में वर्षा की अनियमितता के कारण किसानों में हमेशा अनिश्चितता की स्थिति बनी रहती है। ऐसे क्षेत्रों में गैर परम्परागत फसलों जैसे सोनामुखी, जोजोबा, तुम्बा आदि की खेती के द्वारा किसान न केवल वर्षा की अनियमितता से होने वाले नुकसान से बच सकते हैं बल्कि उन्हें इससे एक अच्छी आमदनी भी मिल जायेगी। 

प्राकृतिक वनस्पतियाँ-रेगिस्तानी क्षेत्रों में पायी जाने वाली प्राकृतिक वनस्पतियां इन क्षेत्रों के लोगों द्वारा वर्षों से उपयोग में लायी जा रही हैं, जैसे खेजड़ी, केर, बेर, फोग, अडूसा, जाल, बारको, बबूल, जंगल जलेबी इत्यादि। इन वनस्पतियों को उगाकर न केवल हरियाली लायी जा सकती है बल्कि सूखे के प्रभाव को भी कम किया जा सकता है। 

नदियों की देखरेख-नदियों को जोड़ने की बात चल रही है, लेकिन उससे भी जरूरी है नदियों की देखरेख। अगर नदियों को सदानीरा रखा जाय तो कमजोर मानसून के दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नदियों की देखरेख होगी तो भूजल स्तर भी ऊपर आयेगा। हमने अपने देश में ही प्रमाणित किया है कि लुप्त नदी को भी जीवित किया जा सकता है, बस वैसे ही प्रयास की जरूरत है। 

नहर निर्माण- विकसित देशों में नहरों और सिंचाई सुविधाओं का जाल बिछा हुआ है, जिसके चलते वहां सालभर खेती होती है, किसानों को आसमान की ओर नहीं देखना पड़ता। भारत में नहरों का निर्माण तो हो रहा है लेकिन बहत धीमी गति से। नहरों के निर्माण में कई वर्ष लग जाते हैं। अतः इसे दूर कर नहरों के निर्माण कार्य को तीव्र करना होगा। 

कृषि निवेश में वृद्धि-अन्य देशों की अपेक्षा भारत में कृषि में सरकारी निवेश घटता जा रहा है। पहले सरकार कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना के आधार पर कार्य करती थी। अब वह धीरे धीरे साहूकार की भूमिका में आती जा रही है। ऋण लेने के लिए तो किसानों को प्रोत्साहित किया जाता है। लेकिन मानसून थोड़ा भी गड़बड़ हुआ कि किसान तबाह हो जाते हैं। अतः सरकार को कृषि में निवेश को बढ़ाना चाहिए। 

उपरोक्त के अलावा सूखे के दौरान तथा बाद में राहत कार्य संचालित करना भी सूखा प्रबंधन के अन्तर्गत ही आता है। सूखाग्रस्त क्षेत्रों में राहत पहुंचाने के लिए सामुदायिक विकास कार्यक्रम, सूखा संभाव्य क्षेत्र कार्यक्रम, मरु विकास कार्यक्रम इत्यादि चलाए जाते हैं। सूखा प्रबंधन की ठोस प्रणाली विकसित कर हम इसके अनेक दुष्प्रभावों से बचते हुए प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सकते हैं। यह शुरुआत हो चुकी है। 

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