दहेज़ प्रथा पर निबंध |Essay on Dowry System in Hindi

दहेज़ प्रथा पर निबंध

दहेज़ प्रथा पर निबंध |Essay on Dowry System in Hindi

दहेज प्रथा भारत की एक सामाजिक भयावह कुप्रथाओं में सम्मिलित है। इसके कारण हमारा समाज निरंतर कलंकित, दुखी और उत्पीड़ित हो रहा है। प्राचीन काल में दहेज का अभिप्राय दूसरा था। उस समय यह भेंट या सौगात के रूप में वर पक्ष को बिना मांगे कन्या पक्ष की ओर से दिया जाता था। लेकिन आज दहेज या भेंट की व्याख्या की जाती है-विवाह के समय कन्या पक्ष की ओर से वर पक्ष को मुंहमांगा धन और सामान आदि देना। 

पूर्व काल में भेंट प्रथा थी न कि आज जैसी दहेज प्रथा। हमारे धार्मिक एवं ऐतिहासिक ग्रंथ इसके साक्षी हैं। भगवती पार्वती के विवाह के बाद विदाई के समय उनके पिता हिमवान द्वारा अनेक भेंट दी गई थी, जिसका वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरित मानस’ में इस प्रकार किया है 

दासी दास तुरग रथ नागा। 

धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा॥

इसी प्रकार इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब की पुत्री हजरत फातिमा के विवाह में सभी लोगों की ओर से अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार स्वेच्छा से भेंट दी गई थी, न कि विवाह के पूर्व सशर्त दहेज। 

आधुनिक वर्तमान समय में दहेज का रूप अत्यंत विकृत हो गया है। यह समाज में एक व्यापार का रूप ले चुका है। आज स्थिति यह है कि जिस व्यक्ति के पास धनादि का अभाव है, उसकी पुत्री का विवाह योग्य लड़के से होना मुश्किल हो जाता है। क्योंकि वर का पिता उसकी मनचाही कीमत मांगता है एवं उसके विवाह के लिए कई प्रकार की शर्ते रखता है। 

वर्तमान में तो हर प्रकार के लड़के के लिए अलग-अलग दहेज निश्चित है। अगर लड़का किरानी है तो एक लाख, डॉक्टर या इंजीनियर है तो चार-पांच लाख, आई.ए.एस., पी.सी.एस. या आई.पी.एस. है, तो फिर कहना ही क्या। अब विवाह में लड़की के गुणों को नहीं, उसके पिता द्वारा दिए गए दहेज को देखा जाता है। लड़की का बाप अपनी खेती-बाड़ी या घर-द्वार बेचकर भी दहेज की मोटी रकम पूरी करने की कोशिश करता है- भले ही वह तबाह हो जाए। कुछ ऐसे भी लाचार पिता होते हैं, जिन्हें दहेज के अभाव में अपनी रूपवती एवं गुणवती कन्या को किसी बूढ़े के गले में डालना पड़ता है। बेटी की शादी में होने वाली इन्हीं कठिनाइयों को देखकर महाकवि कालिदास ने ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ में लिखा है, “कन्या का पिता होना ही कष्टकारक है।” 

इतना ही नहीं, विवाह के बाद भी दहेज रूपी राक्षस वधू का पीछा नहीं छोड़ता। लोभी और अकर्मण्य जामाता लोग बार-बार वधू को अपने मायके से धन लाने के लिए प्रताड़ित करते हैं। इससे वधुएं आग लगाकर या जहर खाकर आत्महत्या कर लेती हैं। इस सामाजिक व्यवस्था में जामाता को ‘दशम ग्रह’ माना जाना सही लगता है; यथा- जामाता दशमो ग्रहः। 

अब प्रश्न यह उठता है कि दहेज प्रथा का मूल कारण क्या है? वस्तुतः अशिक्षा ही दहेज प्रथा का मूल कारण है। अतः सभी बच्चे-बच्चियों को पढ़ाना लिखाना होगा। रेडियो, दूरदर्शन, समाचार-पत्रों एवं स्वयं सेवी संगठनों के द्वारा दहेज प्रथा के कुप्रभाव का समाज में प्रचार-प्रसार करना होगा। लेखकों एवं कवियों को भी इस प्रथा के विरुद्ध आग उगलनी होगी। 

दहेज प्रथा को रोकने हेतु सरकार द्वारा कानून बनाया गया था। इस दहेज विरोधी कानून-1985 के अनुसार जो भी दहेज लेगा या देगा, उसे न्यूनतम पांच वर्ष की कैद एवं 5000 रुपये जुर्माने की सजा दी जाएगी। लेकिन यह कानून साकार नहीं हो पा रहा है। इसका कारण यह है कि समाज के शक्तिशाली लोग, नेता एवं बड़े-बड़े पदाधिकारी एक ओर तो खुले मंच पर दहेज प्रथा की भर्त्सना करते हैं, परंतु अधिक दहेज लेकर इस कानून का मजाक उड़ाते हैं। अतः लोगों को चाहिए कि वे जनमत द्वारा ऐसे व्यक्तियों का पर्दाफाश करें। युवक एवं युवतियां भी इस संघर्ष में आगे आएं। इसके अलावा विवाह से पूर्व हर युवक यह संकल्प करे कि ‘दुल्हन ही दहेज है।’

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

9 + sixteen =