दहेज़ प्रथा पर निबंध-Essay on Dowry system in hindi

दहेज़ प्रथा पर निबंध

दहेज़ प्रथा पर निबंध-Essay on Dowry system in hindi

भारतीय समाज को जिन कुप्रथाओं ने अतिशय कुरूप बना दिया है, जिन कुरीतियों ने इसके सुंदर तन को कुष्ट के धब्बों से विरूप कर दिया है, उनमें दहेज-प्रथा का नाम बड़ी आसानी से लिया जा सकता है। कन्यापक्ष की ओर से वरपक्ष को जब तक मुँहमाँगा द्रव्य न दिया जाए, तब तक कन्या के विवाह की बात ही न पक्की हो-यही दहेज-प्रथा है। यह ऐसी घिनौनी पद्धति है कि इसका मूलोच्छेद जितना जल्द हो, उतना ही अच्छा। 

कुछ लोगों का कहना है कि दहेज-प्रथा हमारे देश के लिए नई नहीं है। इसका प्रचलन तो पुरातन काल से चला आ रहा है। यह हमारे गरिमामय स्वर्णिम इतिहास का भव्य स्मारकचिह्न है। दहेज-प्रथा और कुछ नहीं, वरन् माँ-बाप के अपनी बेटी के प्रति प्रेम-प्रदर्शन की समद्ध परिपाटी है। इसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता कि दहेज-प्रथा हमारे देश में वैदिक काल से ही चली आ रही है। यास्क ने अपने निरुक्त में ‘दुहिता’ शब्द की निरुक्ति में बताया है जो अपने पिता से धन दुहती हो, वह दुहिता है।

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अर्थात् पुत्री के पर्याय ‘दुहिता’ शब्द के अर्थ से ज्ञात होता है कि वैदिक काल में भी पिता अपनी पुत्री को विवाह के अवसर पर प्रचुर धन देता था। पार्वती के विवाह पर उनके पिता हिमवान ने दासी, घोड़े, रथ, हाथी, गाएँ, वस्त्र, मणि आदि तरह-तरह की चीजें तथा अन्न और सुवर्ण के बरतन रथों में भरकर दहेज में इतने दिए थे कि उनका वर्णन नहीं हो सकता- 

दासी दास तुरग रथ नागां । धेनु बसन मनि वस्तु विभागा॥

 अन्न कनक भोजन भरि नाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना ।। 

जब विवाह के बाद राजा जनक की पत्रियों की विटाई होने लगी तब उन्होंने अपार संपत्ति दहेज में जनकपुर से भेजी। नख से शिख तक सजे हुए एक लाख घाड़ा आर पचीस हजार रथों के अलावा दस हजार मतवाले हाथी साजे गए, जिन्हें दखकर दिग्गज लज्जित हो जाएँ। स्वर्ण, वस्त्र, मणियाँ गाड़ियों और रथों में भर-भर कर भेजे गए। भैंसों, गायों तथा अन्य चीजों का लेखा-जोखा ही क्या ! 

संपन्न माँ-बाप विवाह के बाद कन्या की विदाई के समय दहेज के रूप में वस्तएँ दिया करते थे। अभाव के दंश में पलते हुए पिता के ऊपर कोई अनिवार्य बंधन नहीं था। जिसके पास अपार या अधिक संपत्ति हो, वह यदि परिणय के पश्चात् अपनी पुत्री को स्वेच्छापूर्वक सामान देता है, तो उससे आज भी किसे विरोध हो सकता है? पहले ऐसा नहीं था कि जब तक शंकर या शंकर के पिता हिमवान से तथा राम या राम के पिता दशरथ जनक से दस-बीस करोड़ रुपये अग्रिम दहेज के रूप में न लेते, तब तक पार्वती और सीता का विवाह ही नहीं होता, बारात ही नहीं सजती। अतः, आज की विकृति से पुराकालीन स्वस्थ स्थिति की तुलना निरर्थक है। 

आज ता उच्च वर्ग की बात कौन कहे, साधारण और मध्यम वर्ग भी इस कुप्रथा का शिकार हो रहा है। जिसके घर में कई बेटियाँ हो गईं, समझिए उसका दिवाला निकल गया, उसके यहाँ से लक्ष्मी महारानी शीघ्र ही प्रस्थान करनेवाली हैं तथा उस परिवार को दीनता-दानवी अपनी विकराल दंष्ट्राओं में दबोचनेवाली है। बेटे का बाप बेटे की मनचाही कीमत माँगता है, उसके विवाह के लिए अजीबोगरीब शर्त रखता है। लगता है कि कुँवारे लड़के आदमी नहीं, वरन् बैल हैं और उनके पिता बलाक मटरगस्त सौदागर ।

इन कुँवारे बैलों की मोल-मोलाई खूब होती है। भारतीय प्रशासनिक सेवा प्रतियोगिता में सफल यवकों का सर्वाधिक बाजार-भाव है। ज्यों-ज्यों लड़का कक्षाओं में पहुँचते जाते हैं, उनका भाव तेज होता चलता है। इधर मेडिकल आर इंजीनियरिंग छात्रों का बाजार-भाव बढा है। लड़की का पिता होना आज भीषण आभशाप बन गया है। लड़के का पिता ऐंठे, तो ऐंठे, हमारे पढ़े-लिखे नवयुवक भी अपनी सारी तमन्नाओं की, अपनी सारी इच्छाओं की पूर्ति अपने भावी श्वसुर से ही करा लेना चाहत हैं।

बाप की फरमाइश अलग, तो बेटे की फरमाइश अलग। पता नहीं, कितनी मेहनत के बाद वे कार रेडियोग्राम. फ्रिज, एयरकलर, टेलीविजन, मोटरसाइकिल आदि खराद पाएँगे; क्यों नहीं इस मोटे आसामी से ही वसूल कर लिया जाए। वर को अपनी जीवनसंगिनी वधू की चिंता नहीं है, उसे चाहे लड़की कैसी भी क्यों न मिल जाए, किंतु दहेज जरूर मुँहमाँगा मिलना चाहिए। 

एक ओर कँवारे कल्पनालोक में विचरण करते हैं, उनके पिता तरह-तरह के मनसूब रहते हैं. दसरी ओर कन्याएँ अपने भाग्य को कोसती रहती हैं, उनके पिता दर-दर नोकरें खाते रहते हैं। तरह-तरह के उपहास सहते हैं, धनसंचय की चिंता में घुलत रहते हैं।

बेटी के बाप का जीवन नारकीय हो जाता है; उनकी पेशानी पर असमय वार्धक्य के चिह्न उभर आते हैं, भव्य मुखाकृति पर झुर्रियों के गड्ढे बन जाते हैं। लगता है, इन हास्यकवि विनायक राव को कभी इस दहेज-प्रथा के विष-बुझे तीर का निशाना नहीं होना पड़ा, इसीलिए इन्होंने ऐसा लिख दिया। भला कोई कन्या का भुक्तभोगी पिता ऐसा लिख सकता है? 

अहो सोच कन्या-विवाह का वृथा हृदय नर धरते हैं। 

सर्वशक्तियुक्त ईश कृपानिधि जोड़ी निर्मित करते हैं। 

भावी वर को जन्म प्रथम दे कन्या पीछे रचते हैं । 

‘नायक’ सोच करो मत कोई विधि के अंक न बचते हैं। 

बेटी का जन्म भी उसी रक्त-मांस-हड़ी के तन से हआ है, जिससे अपने प्यार की छाँह तले. पलकों के पाँवडे पर जीवनलता की तरह ‘सका शिक्षा-दीक्षा का समचित प्रबंध करते हैं, उसी मोम की डला. गलाब का कला हरिणी को जब किसी योग्य वर के हाथ पिता सौंपना चाहता है, जब वह उस मधुर ज्योति का वरदान देना चाहता है तब उसके सामने रुपए के तोडे, नोटों के बंडल और सोने की ईंटों की माँग की जाती है।

स्वर्ग की इस अनोखी नारी के लिए नर की बिक्री का शर्मनाक नाटक खेला जाता है। सचमुच, यह दहेज भारतीय समाज के जिस्म पर भयानक कोढ़ है, यह उसके पाक दामन पर कलंक का धब्बा है। यह विवाह के नाम पर घृणित घूस है, कन्यापक्ष के गर्दन पर चलनेवाली छुरी है।

इस दहेज-प्रथा के इतने कुपरिणाम हुए हैं कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं। दहेज के डर से कितनी देवीमूर्तियाँ जन्मग्रहण करते ही नमक चटाकर मार डाली गई हैं। कुछ लड़कियों का अबोध बचपन में ही विवाह कर दिया जाता है। दो-दो, चार-चार महीने को लड़कियों का विवाह तिलक के डर से कर दिया जाता है; क्योंकि अधिक उम्र में तिलक की दर बहत बढ़ जाती है। इस बाल-विवाह का परिणाम होता है कि अनेक लड़कियाँ वैधव्य के दारुण दावानल में तिल-तिलकर जलती रहती हैं। उनकी जिंदगी दीर्घ तृष्णा, दुर्बलता, उपेक्षा और अनवरत अश्रुप्रवाह की करुण कहानी बनकर रह जाती है।

कुछ लोग अधिक दहेज नहीं दे पाने के कारण अपनी कुसुम-सी रूपवती कन्या को किसी बूढ़े खूसट के गले मढ़ देते हैं। बेचारी कन्या की सारी इच्छाएँ अतृप्त रह जाती हैं, उसकी कल्पनाओं का शीशमहल भहराकर गिर जाता है, उसके जीवन के बंदरगाह में भयानक तूफान मच जाता है, उसके जीवन के कमलवन पर सहसा तुषारपात हो जाता है।

अर्थाभाव के कारण कुछ लड़कियों का विवाह नहीं हो पाता। बालविवाह, अनमेल विवाह तथा आजीवन विवाह न होने के कारण भ्रष्टाचार को प्रश्रय मिलता है, स्त्रियों को रूप के बाजार में भटकना पड़ता है, उन्हें अंतर्जलन शांत करने के लिए दुर्वृत्तियों की अंधगलियों में चक्कर मारना पड़ता है। मातृत्व की मर्यादा से शून्य तथा पतिप्रेम से वंचित नारियों के हाहाकार की आग की लपटों से हमारा समाज अब तक क्यों नहीं क्षार-क्षार हो चुका, आश्चर्य होता है! 

प्रेमचंद जैसे कुशल साहित्यकार ने दहेज-प्रथा की अनगिनत बुराइयों की दारुण गाथा अपने उपन्यास ‘कर्मभूमि’ में प्रस्तुत की। शांताराम ने अपनी ‘दहेज’ नामक फिल्म में इसकी बुराइयों का पर्दाफाश किया। सरकार इसके विरुद्ध कानून बनाने पर विवश हुई है। रेडियो, दूरदर्शन, समाचारपत्र और नेताओं के भाषण ने इस कुप्रथा पर आग उगले, किंतु अब तक यह विषवृक्ष जला नहीं, इसका कलंक धुला नहीं, यह दाग मिटा नहीं। जबतक हमारा नवयुवकवर्ग इस प्रथा के विरुद्ध संकल्प नहीं लेता, जबतक वह बिना दहेज के आदर्श विवाह का उदाहरण नहीं प्रस्तुत करता और जबतक सरकार तिलक लेनेवालों को कड़ी-से-कड़ी सजा की कारगर व्यवस्था नहीं करती तबतक यह समाज को खोखला करनेवाली, रक्त चूसनेवाली, अपाहिज करनेवाली प्रथा चलती ही रहेगी। 

अतः, इधर कुछ सरकारों ने दहेज को अवैध घोषित किया है। बिहार-सरकार ने शिक्षकों की आचारसंहिता में घोषित किया है कि दहेज लेनेवाले दंडनीय होंगे। यह दहेज-प्रथा शीघ्र ही समूल नष्ट होगी, ऐसी उम्मीद की जाती है।

 

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