दूरदर्शन और भारतीय संस्कृति पर निबंध| Essay on Doordarshan and Indian culture

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दूरदर्शन और भारतीय संस्कृति पर निबंध-Essay on Doordarshan and Indian culture

जनसंचार अर्थात् मीडिया के तीन प्रमुख स्रोत हैं-समाचार-पत्र, आकाशवाणी और दूरदर्शन. इन तीनों माध्यमों में ‘दूरदर्शन ही एकमात्र दृश्य माध्यम है, जो जनता के मन मस्तिष्क पर दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ जाता है. 

आज दूरदर्शन जिस तरह कार्यक्रम पेश कर रहा है, उसने हमारे नैतिक मूल्यों, संस्कृति व समृद्धशाली परम्परा को कुचला है. उसका एकमात्र उद्देश्य पैसा कमाना रह गया है. पूँजीवादी और उपभोक्तावादी युग में हम कह सकते हैं कि दूरदर्शन भी व्यवसायी करण से बच नहीं पाया है. 

आज दूरदर्शन से प्रसारित कार्यक्रमों में हिंसा, आतंक, सेक्स, पश्चिमी जीवन शैली को अपनाने की होड, यही सब तो दर्शकों को आज देखने को मिलता है. इस तरह के कार्यक्रमों को उच्च वर्ग से लेकर मध्यम वर्ग तथा निम्न वर्ग सभी काफी मजे लेकर देखते हैं. एक समय था जब दूरदर्शन से रामायण, महाभारत, विश्वामित्र, भारत एक खोज आदि जैसे धारावाहिकों का प्रसारण होता था तो सभी वर्गों के लोग उसे चाव से देखते थे, परन्तु आज हम दूरदर्शन के किसी भी कार्यक्रम के स्तर से इस तरह की उम्मीद नहीं कर सकते जो सम्पूर्ण जनमानस को बाँध सके, भले ही कितने नए-नए चैनल क्यों न आ गए 

नित्य नए-नए चैनलों, केबुल व डिश एंटीना व सेटेलाइट चैनल से बराबरी करने के लिए दूरदर्शन ने भी अपनी सोच बदल दी है. 

एक समय था जब दूरदर्शन से प्रसारित धारावाहिक ‘हम लोग’ व ‘बुनियाद’ जैसे धारावाहिक सुपर हिट रहे थे. ये धारावाहिक आम जनता के लिए थे, जिसमें हर वर्ग के लिए मनोरंजन था, परन्तु आज के धारावाहिकों की स्थिति दूसरी है. आज के धारावाहिक वर्ग विशेष को प्रभावित कर रहे हैं. जिनकी शैली का पूर्णतया पश्चिमीकरण हो चुका है, जो पश्चिम के मानदण्डों को ही श्रेष्ठ मानते हैं. इन धारावाहिकों में समाज की सभी मान्यताओं को खुलेआम चुनौती दी जा रही है. ज्यादातर धारावाहिकों में नकारात्मक चरित्रों की संख्या बढ़ती जा रही है. ‘शान्ति’ धारावाहिक इसका ज्वलन्त उदाहरण है. पहले के धारावाहिकों में एक घोषित खलनायक या खलनायिका होते थे जिनसे कभी भी किसी अच्छे काम की आशा नहीं की जा सकती थी, परन्तु अब धारावाहिकों में नायक खलनायक या नायिका-खलनायिका की दूरी ही समाप्त होती जा रही है. बहुत कम ऐसे चरित्र हैं जो सशक्त हैं. इस बात का अंदाज लगाना कठिन है कि कब धन व सत्ता के लिए दो दोस्त आपस में दुश्मन हो जाएंगे, बाप-बेटा एक-दूसरे के विरुद्ध अदालत में पहुँच जाएंगे या माँ-बेटी पीठ-से-पीठ सटाकर बात करने लगेंगी. इन धारावाहिकों में उभरने वाली नारी भी बहुत हठीली व महत्वाकांक्षी है. 

सबसे चिन्ता का विषय यह है कि इन धारावाहिकों के पात्रों में पश्चाताप के लिए कोई स्थान नहीं है, ‘स्वाभिमान’ धारावाहिक के महेन्द्र तीन औरतों के साथ सम्बन्ध रखते हैं और सीना ताने घूमते हैं. सब काम यहाँ डंके की चोट पर हो रहा है चाहे वह नैतिक दृष्टि से कितना ही गलत क्यों न हो? 

टी.वी. पर उन्मुक्तता की आँधी के चलते यौन सम्बन्ध, विवाहेतर सम्बन्ध, समलैंगिकता जैसे विषय भी बाजार में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. पहले इस पर विरोध भी होता था, पर अब धारावाहिकों के माध्यम से खुले आम इस तरह के विषय दर्शकों तक पहुँच रहे हैं, अभी भी भारतीय समाज इसे पूरी तरह से अपनी स्वीकृति नहीं दे सका है. फिर भी जिस गति से उसे इन सब चीजों की घुट्टी पिलाई जा रही है, उस परिप्रेक्ष्य में वह दिन दूर नहीं जब वह ‘सब चलता है’ कहकर आम दर्शक इसे भी स्वीकार कर लेगा. 

कहते हैं छोटा पर्दा जिंदगी का आइना प्रस्तुत करता है. ऐसे में उसके चरित्रों का नकारात्मक होते चले जाना एक गम्भीर संकेत है. सीमा में रहने पर ही हर चीज सही कही जा सकती है, परन्तु अब तो हिंसा, सैक्स, रोमांस, प्रतिशोध जैसी प्रवृत्तियों के खुले आम प्रदर्शन ने अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करना शुरू कर दिया है. प्रबुद्ध वर्ग तो अपने आप को सँभाल ले रहा है, पर इसका सबसे बुरा असर युवा वर्ग पर पड़ रहा है, जो इस तरह की जीवन शैली से बहुत प्रभावित हो रहा है 

‘बुद् बक्सा’ उर्फ दूरदर्शन की पहुँच आज 5 करोड़ परिवारों तक है. इतने बड़े समूह तक दूरदर्शन के कार्यक्रम पहुँच रहे हैं. इससे सबसे ज्यादा युवा वर्ग व बच्चे ही प्रभावित होते हैं, क्योंकि वे मानसिक रूप से अपरिपक्व होते हैं. हाल ही में थम्स अप का एक विज्ञापन देखकर बिना सोचे समझे 6 वर्षीय टिंकू ने छत से छलांग लगा दी थी. यह घटना इस बात पर जोर देती है कि विज्ञापनकर्ताओं ने आचार संहिता का पालन करना जरूरी नहीं समझा. 

इसी तरह दिल्ली की 9 वर्षीय पूजा नायिका की नकल करते हुए आत्महत्या हेतु गले में फंदा डालती है और अनजाने में ही मौत को गले लगा लेती है. इस तरह आज का दूरदर्शन हमारे जीवन में जहर घोल रहा है. बच्चे अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर दिन-रात टी.वी. से चिपके रहते हैं. इससे उनका समय तो बर्बाद होता ही है, लगातार टी.वी. देखते रहने से उनकी आँखों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है. 

क्या वजह है कि मनोहर श्याम जोशी व डॉ. मासूम रजा जैसे अग्रणी साहित्यकार दूरदर्शन पर अपनी भूमिका (संवाद लेखक) के रूप में निभाने गए तब उनकी न केवल उपेक्षा की गई वरन् उन पर हल्केपन के कटाक्ष भी किए गए. मूल प्रश्न यह है कि लोकप्रियता को प्रायः सतहीपन या छिछलेपन का पर्याय माना जाता रहा है. यहीं से हम गलती करना शुरू कर बैठते हैं. 

ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि आखिरकार दूरदर्शन जैसे प्रभावी जनसंचार के माध्यम को जन अभिमुखी एवं प्रगतिकारी कौन बनाएगा? अन्तिम जिज्ञासा यह शेष रहती है कि यदि भारतीय दूरदर्शन पर परोसा गया मनोरंजन घटिया व स्तरहीन होता है, तो क्या हमारे देश के तथाकथित बौद्धिक वर्ग ने सिनेमा सेंसर बोर्ड की तर्ज पर दूरदर्शन सेंसर बोर्ड अलग से बनाने की माँग की है. आज जरूरत है दूरदर्शन सेंसर बोर्ड गठित करने की. तभी दूरदर्शन अपनी सही पहचान को बचा पाएगा. 

किसी भी चीज को जनमानस ही बदल सकता है. जरूरत है इस दिशा में पहल करने की. अगर कोई जानलेवा या खतरनाक विज्ञापन प्रसारित हो रहा है, तो हमें फौरन मीडिया सेन्टर को पत्र लिखकर या सम्पर्क कर उन्हें बताना चाहिए कि आपके विज्ञापन का अमुक अंश खराब लगा. अगर जनमानस चाहे तो एक सार्थक व सही पहल की जा सकती है. स्तरहीन धारावाहिकों के निर्माण का पूरा दायित्व हम पर है और इनका स्तर नीचे न जाए, इसके लिए प्रबुद्ध दर्शकों को ही जागरूक होना होगा. किसी भी देश में जनमत बहुत अर्थ रखता है और जनता का विरोध ही इनकी संख्या को कम कर सकता है या उन्मुकता को नियंत्रित कर सकता है. 

क्या हमने वर्तमान ‘आकाशी सांस्कृतिक आक्रमण’ की कोई पूर्व तैयारी कर रखी है जिसके लिए पश्चिमी जनसंचार नीति के विशेषज्ञों ने अपनी रणनीति बना रखी है, अगर यही स्थिति रही तो 21वीं सदी आते-आते हमारी सांस्कृतिक सोच, सांस्कृतिक प्रदूषण इस कदर बदतर हो जाएगा कि भारत अपनी अस्मिता ही खो देगा. अतः जरूरत है हमें भी जनसंचार नीति के विशेषज्ञों द्वारा अपनी रणनीति तय करने की. 

आज दूरदर्शन के बहुतेरे कार्यक्रम ऐसे हैं कि जिसे पूरा परिवार के एक साथ बैठकर देख नहीं सकता है, तो अब प्रश्न उठता है कि भारतीय संस्कृति जो प्राचीनकाल से पूरे विश्व के लिए अनुकरणीय रही है. वेदों, पुराणों, आध्यात्मिक व सांस्कृतिक रूप से समृद्ध अपने देश की संस्कृति को बचाए रखने के लिए दूरदर्शन को अपने नजरिए में बदलाव लाना होगा. उन्हें पूर्ण व्यावसायिक में बदलाव लाना होगा. ऐसे अच्छे-अच्छे व स्वच्छ कार्यक्रम दिखाए जाएं जिससे जनमानस को सही संदेश मिले, स्वच्छ मनोरंजन हो. प्राचीन भारतीय संस्कृति के बहुतेरे ऐसे पहलू है जिन पर कार्यक्रम बनाया जा सकता है. 

अधिकारियों को चाहिए कि वे ऐसे धारावाहिकों को प्रसारण की अनुमति न दें, जो सामाजिक मूल्यों पर चोट करते हों. अच्छे पटकथा लेखकों को अवसर मिलना चाहिए जो साफ सुथरी पटकथाएं लिखें. विज्ञापनदाताओं एवं प्रायोजकों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनका प्रायोजित धारावाहिक कहीं सामाजिक क्षति तो नहीं कर रहा है. समय रहते यदि हम आवश्यक कदम नहीं उठाते हैं, तो इस आँधी का असर बहत घातक होगा और इसकी कीमत समूचे समाज को पतन की पीड़ा झेलते हुए चुकानी पड़ेगी. 

जरूरत है कि एक प्रभारी सम्प्रेषण व सांस्कृतिक नीति के निर्माण करने की. 

निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है कि हमारे देश के बुद्धिजीवियों को भारतीय दूरदर्शन के समाजशास्त्र को न केवल गहनता से समझना होगा वरन् उन्हें उसकी भूमिका को समाजोपयोगी बनाने की दिशा में भी प्रयत्नशील बनना होगा, यदि हमने समय रहते अपनी प्रभावी राष्ट्रीय सांस्कृतिक नीति का निर्माण व कार्यान्वयन नहीं किया तो अवश्य ही हमारे राष्ट्रीय समाज को तीव्र ‘नैतिक प्रदूषण’, ‘सांस्कृतिक प्रदूषण’ के पतनशील दौर से गुजरना होगा. परिणाम यह निकलेगा कि विश्व समुदाय में भारतवर्ष अपनी सांस्कृतिक पहचान गँवा देगा. आचार्य तुलसी के शब्दों में “दूरदर्शन जीवन में जहर घोल रहा है. माँ के गर्भ में ही बच्चे कुसंस्कारों का शिकार हो रहे हैं.” 

अतः जरूरत है दूरदर्शन ऐसे कार्यक्रम बनाए जो मनोरंजक, ज्ञानवर्धक हों साथ-ही साथ भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत हों, तभी दूरदर्शन की महत्ता सही मायने में निखर कर सामने आएगी. 

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