दीपावली पर निबंध |Essay on diwali

Essay on diwali

दिवाली पर निबंध | Diwali Essay in Hindi 

‘दीपावली’ में ‘दीप’ और ‘अवली’ दो शब्द हैं, जिनका शाब्दिक अर्थ है-दीपों की कतार । सचमुच दीपावली में दीपों को कतारों में सजाकर जलाया जाता है। दीपावली की रात बड़ी होती है। हम रात्रि की कालिमा एवं भयावहता को असंख्य दीप जलाकर दूर भगाते हैं। इस प्रकार दीपावली का लक्ष्यार्थ हुआ अंधकार से प्रकाश की ओर जाना—तमसो मा ज्योतिर्गमय।। 

दीपावली के साथ अनेक धार्मिक, ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक कारण जुड़े हुए हैं। धार्मिक कारणों में श्रीराम से जुड़ी कहानी सबसे अधिक प्रचलित एवं मान्यता प्राप्त है। कहा जाता है कि इसी दिन भगवान श्रीराम लंका विजय के पश्चात अयोध्या लौटे थे। 14 वर्षों के वनवास के बाद श्रीराम के पुनः आगमन की खुशी में अयोध्या वासियों ने घर-घर में दीप जलाकर अपने मन का उल्लास प्रकट किया था। तभी से दीपावली की परंपरा चल पड़ी। गोस्वामी तुलसीदास ने ‘गीतावली’ में अयोध्या की दीपावली का वर्णन करते हुए लिखा है- 

सांझ समय रघुवीर पुरी की शोभा आज बनी। 

ललित दीपमालिका विलोकहि हितकर अवध बनी।

दूसरी प्रचलित कथा महादेव एवं महाकाली से संबंधित है। जनश्रुति है कि असुरों के संहार के पश्चात भी महाकाली का क्रोध शांत नहीं हुआ था। वे जनसंहार करने पर तुल गईं। ऐसा प्रतीत होने लगा कि अब विश्व का विनाश अत्यंत निकट है। तब देवाधिदेव महादेव शंकर काली के आगे लेट गए। मां काली का पांव जैसे ही महादेव के वक्ष पर पड़ा, वे शांत हो गईं। इस प्रकार विश्व का विनाश टला। इसी खुशी में दीपावली की परंपरा चल पड़ी। 

इसी प्रकार दीपावली पर्व से कई अन्य धार्मिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। इन धार्मिक कथाओं के अतिरिक्त अनेक ऐतिहासिक महापुरुषों की घटनाएं भी दीपावली से जुड़ी हैं। स्वामी शंकराचार्य के निर्जीव शरीर में इसी दिन पुनः प्राण का संचार हुआ था। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर एवं आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती का निर्वाण इसी दिन हुआ था। इससे इस तिथि की महत्ता काफी बढ़ गई। स्वामी रामतीर्थ के जीवन के साथ इस पर्व का विशेष संबंध है। उनका जन्म, संन्यास और महानिर्वाण इसी दिन हुआ था, अत: उनके अनुयायी इसे ‘राम दिवस’ के रूप में मनाते हैं। 

दीपावली पर्व के पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं। वर्षा ऋतु के बाद घरों में सीलन उत्पन्न हो जाती है। चारों ओर गंदगी फैल जाती है। स्वास्थ्य के दुश्मन मच्छरों एवं मक्खियों की संख्या भी काफी बढ़ जाती है। वर्षा की समाप्ति एवं दीपावली के आगमन की खुशी में मकानों की लिपाई-पुताई की जाती है। इससे मच्छरों के रहने का स्थान समाप्त हो जाता है। यही नहीं, दीपावली में असंख्य दीपों की ज्वाला में अनगिनत मच्छर एवं कीड़े आदि जल मरते हैं। 

दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है। इसके कुछ दिन पूर्व से ही महिलाएं घरों की सफाई में लग जाती हैं। सुंदर-सुंदर रंगों की पुताई से घर सुशोभित हो उठता है। दीपावली की सुबह से ही बच्चियां घरौंदे सजाने में जुट जाती हैं। बच्चे खिलौने, पटाखों एवं मोमबत्तियों की खरीदारी में व्यस्त नजर आते हैं। हर घर से स्वादिष्ट पकवानों की खुशबू आने लगती है। घर-घर में लक्ष्मी की पूजा होती है। व्यापारी लोग काफी धूमधाम से इस दिन लक्ष्मी पूजन करते हैं। शाम होते ही क्या शहर, क्या गांव-सभी दीपों की रोशनी से जगमगा उठते हैं। सभी में यह प्रतिस्पर्धा रहती है कि मेरा घर ज्यादा जगमग दिखाई पड़े। इसका कारण इस मान्यता से है कि इस दिन लक्ष्मी जी घूम घूमकर यह देखती हैं कि किन घरों में स्वच्छता, रोशनी और भक्ति है। फिर वे वहां निवास कर उस घर को धन-धान्य से पूर्ण कर देती हैं। 

प्रत्येक वस्तु के अच्छे और बुरे पक्ष होते हैं। दीपावली जहां आनंद का पर्व है, वहीं यह दुख का कारण भी बन जाती है। कभी-कभी पटाखों को असावधानी पूर्वक जलाने से आग भी लग जाती है। साथ ही अधिक मात्रा में जलाए जाने पर प्रदूषण फैलता है। दीपावली की ओट में लोग अपना सर्वस्व जुए में लगा देते हैं। यह एक घृणित व्यसन है। दीपावली की रात लोग घरों को खुला छोड़ देते हैं। कभी-कभी परिणाम उल्टा हो जाता है-लक्ष्मी जी रूठ जाती हैं। अतः दीपावली के इस पुनीत अवसर पर हमें सभी प्रकार के अंधविश्वासों और हेय कार्यों का परित्याग करना चाहिए। दीपावली से प्रेरणा लेकर हमें शुभ कार्य करने चाहिए, ताकि अभावों में जी रहे लोगों के लिए खुशी का दीया जल सके। तभी दीपावली का मुख्य उद्देश्य ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ सार्थक होगा।

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