निःशस्त्रीकरण पर निबंध ।Essay on disarmament

निःशस्त्रीकरण पर निबंध

निःशस्त्रीकरण पर निबंध ।Essay on disarmament

‘नि:शस्त्रीकरण’ का शाब्दिक अर्थ है-घातक हथियारों पर नियंत्रण रखना और शस्त्रों की बढ़ती संख्या को रोकना। निःशस्त्रीकरण का एक अन्य पहलू यह है कि शस्त्रों के प्रयोग पर नियंत्रण हो। विश्व शांति का मूल उपाय निःशस्त्रीकरण में ही निहित है। आज विश्व शस्त्रों के अंबार के नीचे दमघोंटू परिस्थिति में चीखता दिखाई पड़ रहा है। विज्ञान ने इतने शक्तिशाली अस्त्रों का निर्माण कर दिया है कि विश्व की शांति के लिए खतरा पैदा हो गया है। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक अस्त्रों का वर्णन करते हुए कहा था, “आज के हाइड्रोजन बमों के सम्मुख हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए बम खिलौनों के तुल्य हैं। हम अणु बमों के विनाशक प्रभाव को हिरोशिमा और नागासाकी में देखकर कांप उठते हैं। उनकी स्मृति से मानवता का कलेजा कांप जाता है। जब वे शस्त्र आधुनिक शस्त्रों के सम्मुख खिलौनों के तुल्य हैं, तो बड़े शस्त्र कितने भयंकर होंगे, हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते।” 

वर्तमान समय में तो अधिक भयंकर शस्त्रों का निर्माण हो रहा है। ऐसे में मानव का चिंतित होना नितांत स्वाभाविक है। आज विश्व की समस्या युद्ध और शांति है। युद्ध शस्त्रों से ही लड़े जाएंगे और इन भयानक शस्त्रों का प्रयोग प्राणि जगत को रसातल में पहुंचा देगा। अत: विचारकों एवं शांतिप्रिय विश्व नेताओं का मत है कि मानवता की रक्षा के लिए अस्त्रों का विनाश बहुत आवश्यक है। निःशस्त्रीकरण ही इस अशांति का एकमात्र उपाय प्रतीत हो रहा है। 

द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका देखकर प्रत्येक राष्ट्र चिंतित हो गया था और शांति की स्थापना के लिए सबने सामूहिक प्रयास आरंभ कर दिए। सन 1945 में निःशस्त्रीकरण का प्रश्न बड़े-बड़े राष्ट्रों द्वारा उठाया गया। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति विलियम ने युद्धों की विभीषिका रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ’ की स्थापना की। इसके पश्चात सन 1946 में आणविक शस्त्रों पर नियंत्रण रखने के लिए ‘अणु शक्ति आयोग’ का गठन किया गया। 

सन 1947 में सशस्त्र सेनाओं और हथियारों को घटाने के लिए परंपरागत ‘शस्त्रास्त्र आयोग’ बनाया गया। 11 जनवरी, 1952 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ‘नि:शस्त्रीकरण आयोग’ की स्थापना की। इसके कर्तव्य निम्नलिखित थे –

  • सभी सशस्त्र सेनाओं एवं आणविक हथियारों के नियमन, उनकी सीमा और उन्हें संतुलित करना। 
  • जनसंहार के लिए प्रयुक्त सभी बड़े शस्त्रों को नष्ट करना। 
  •  अणु शक्ति का प्रभावकारी अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षण करने के लिए ऐसे प्रस्ताव तैयार करना। 

इस आयोग के निःशस्त्रीकरण समिति की अनेक बैठकें कई स्थानों पर हो चुकी हैं। इसमें भाग लेने वाले देश अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, रूस, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, रूमानिया तथा बल्गारिया आदि हैं। इन बैठकों से अब तक कोई परिणाम नहीं निकला। शांति के मनीषी निरंतर निःशस्त्रीकरण के लिए प्रयत्नशील रहे हैं। फिर मार्च, 1960 में जेनेवा में लगातार कई बैठकें हुईं, लेकिन सभी निष्फल रहीं। 1988 में रूस के राष्ट्रपति गोर्बाचोव और अमेरिकी राष्ट्रपति रीगन ने निःशस्त्रीकरण के मसौदे पर औपचारिक हस्ताक्षर किए। 

निःशस्त्रीकरण लागू करने हेतु राज्यों के सैनिक बजटों का स्थिरीकरण करने, आधुनिक शस्त्रों का प्रयोग समाप्त करने, युद्ध प्रचार पर प्रतिबंध लगाने, साम्यवादी और पूंजीवादी देशों के बीच अनाक्रमण संधि संपन्न करने, दूसरे देशों के प्रदेशों से फौजें हटाने, परमाणविक अस्त्रों का अधिक प्रसार करने के विरुद्ध कदम उठाने तथा आकस्मिक आक्रमण को रोकने के लिए कार्यवाही संबंधी उपायों को क्रियान्वित करने की नितांत आवश्यकता है। जब तक ईमानदारी एवं सद्भावना से बड़े राष्ट्र निःशस्त्रीकरण का प्रयास नहीं करेंगे, तब तक इसमें सफलता की आशा नहीं की जा सकती। भारत ने सी.टी.बी.टी. पर बहुत दिनों तक हस्ताक्षर नहीं किए थे। इसका कारण यह था कि वह पूर्णतः नि:शस्त्रीकरण का पक्षधर था। पश्चिमी देशों ने दोहरी चाल अपनाई है। एक तरफ वे विश्व शांति सम्मेलन में भाग लेकर ऊंचे आदर्श और विचार रख रहे हैं, दूसरी तरफ अपने परमाणु शक्ति परीक्षण में सतत प्रयत्नशील हैं। इसके प्रत्यक्ष उदाहरण रूस, अमेरिका, चीन, फ्रांस और पाकिस्तान आदि हैं। 

निःशस्त्रीकरण आज की मांग है। इस बात की आवश्यकता है कि उचित निदान द्वारा विश्वजनित मतभेदों को भुलाकर अशांति का माहौल खत्म किया जाए। अतः निःशस्त्रीकरण एक सराहनीय कदम है।

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