विकसित और विकासशील देश पर निबंध |Essay on Developed and Developing Nations

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विकसित और विकासशील देश (Developed and Developing Nations) 

आर्थिक सन्दर्भ में विश्व के देशों को सामान्यतः दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-(1) वे देश, जो पूर्णतः आत्मनिर्भर हैं तथा (2) वे देश, जिन्हें विकास सम्बन्धी अपनी आवश्यकताओं के लिए अन्य देशों के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है. प्रथम श्रेणी के देशों में वे समस्त स्थितियाँ एवं साधन उपलब्ध हैं जिनके सहारे वे प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति करने में समर्थ हैं. द्वितीय श्रेणी में देश में या तो अपेक्षित साधन उपलब्ध नहीं हैं अथवा उपलब्ध साधनों का सम्यक उपयोग एवं दोहन करने की परिस्थितियाँ उपलब्ध नहीं हैं.

विकसित देश 

(1) जनसंख्या की समस्या नहीं है, (2) प्राकृतिक साधन प्रभूत मात्रा में उपलब्ध हैं. (3) पूर्ण औद्योगीकरण हो चुका है, (4) तकनीकी ज्ञान उन्नत दशा में है, (5) प्रति व्यक्ति औसत आय सन्तोषजनक है, (6) राष्ट्रीयता की भावना विकसित है, तथा (7) जहाँ के निवासी स्वतन्त्रता का महत्व समझते हैं.

विकासशील देश 

अविकसित या विकासशील देश वे हैं, जहाँ उक्त परिस्थितियाँ उपलब्ध नहीं हैं अर्थात् जो उपनिवेशवाद के शिकार हो रहे हैं, जो औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं, जहाँ बढ़ती हुई जनसंख्या की समस्या है तथा निर्धनता का साम्राज्य है, जहाँ अज्ञान एवं अशिक्षा का साम्राज्य है, जहाँ तकनीकी ज्ञान तथा वैज्ञानिक उन्नति का अभाव है, जहाँ प्राकृतिक साधनों, खनिज, कोयला, तेल आदि की कमी है अथवा उन साधनों के दोहन की पर्याप्त सुविधाएँ प्राप्त नहीं हैं, जहाँ कृषि की स्थिति दयनीय है, जहाँ के निवासियों में राष्ट्रीयता की भावना विकसित नहीं है, जहाँ का विदेशी व्यापार विकसित नहीं है, आदि. 

विकासशील देशों को भी दो उपवर्गों में विभाजित किया जा सकता है

(1) मध्य श्रेणी के अविकसित राष्ट्र और

(2) अल्प विकसित राष्ट्र. ये देश इस प्रकार हैं

(क) विकसित देश 

संयुक्त राज्य अमरीका, ब्रिटेन, रूस, आस्ट्रेलिया, बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, न्यूजीलैण्ड, नार्वे, स्वीडन, स्विट्जरलैण्ड और जापान विकसित देशों में गिने जाते हैं.

(ख) मध्यम श्रेणी के विकासशील देश 

अर्जेन्टीना, ऑस्ट्रिया, चिली, क्यूबा,चेकोस्लोवाकिया, हॉलैण्ड, हंगरी, आयरलैण्ड, इजरायल, इटली, पोलैण्ड, पुर्तगाल, स्पेन, दक्षिणी अफ्रीका, प्यूरटोरिका यूहावे और वेनेजुएला मध्यम श्रेणी के विकासशील देश हैं. 

(ग) अल्प विकसित देश 

अफ्रीका के सभी देश (दक्षिण अफ्रीका संघ को छोड़कर), एशिया के समस्त देश (जापान और कुवैत को छोड़कर), अल्बानिया, बुल्गारिया, ग्रीस, रूमानिया, बोलीविया, ब्राजील, पश्चिमी द्वीपसमूह, कोलम्बिया, कोस्टारिका, डोमिनिकन गणतंत्र इक्वेडोर, साल्वेडोर, ग्वाटेमाला, हैटी, मैक्सिको, निकारागुआ व पेराग्वे (दक्षिण अफ्रीका में) इस वर्ग में आते हैं.

रोजगार की स्थिति 

विकसित देशों में रोजगार के साधन एवं अवसर पर्याप्त मात्रा में सदैव उपलब्ध रहते हैं, जबकि विकासशील देशों में बेरोजगरी का बोलबाला रहता है. इन देशों में रोजगार के अवसर उत्पन्न करने के लिए, रोजगार सम्बन्धी कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए सरकारी योजनाएँ बनायी जाती हैं. भारत में पंचवर्षीय योजनाएँ इसी दृष्टि से बनायी गयी हैं. प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के बीस सूत्रीय कार्यक्रम का भी मुख्य लक्ष्य यही था कि देशवासियों को काम मिले और बेरोजगारी कम हो. विकसित देशों की सरकारें भी रोजगार के अवसर बनाती हैं, परन्तु दोनों वर्गों के प्रकार के देशों की सरकारों के सामने इन समस्याओं के रूप भिन्न होते हैं. 

विकासशील देशों में रोजगार के लिए अन्य देशों से लोग नहीं आते हैं और यदि आते भी हैं तो उन्हें रोजगार पाने में काफी समय लग जाता है, जबकि विकसित देशों में विकासशील देशों के निवासी रोजगार की तलाश में प्रायः आते रहते हैं. इन आगन्तुकों में श्रमिक वर्ग के व्यक्ति अधिक होते हैं. हम स्वयं देख सकते हैं कि विकसित देशों में मेहनतकश वर्ग में अधिकांश व्यक्ति विकासशील देशों के निवासी होते हैं. यही कारण है कि अनेक विकसित देशों की सरकारें इच्छा न होते हुए भी रोजगार की तलाश में आने वाले विदेशियों के आगमन को निषिद्ध नहीं कर पाती हैं. विदेशी श्रमिकों की बढ़ती हुई संख्या के कारण विकसित देशों में अब नागरिकता सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न होने लगी हैं.

आय की स्थिति 

सन् 1947 में National Advisory Council ने अमरीका, रूस, जर्मनी तथा फ्रांस की प्रति व्यक्ति औसत आय निकाली, तो वह 1900 रुपए के आस-पास थी. उसी सन्दर्भ में भारत, पाकिस्तान, चीन आदि देशों में वह आधे से भी कम थी. पुनः सन् 1949 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने 60 देशों की राष्ट्रीय आय का सर्वेक्षण कराया. विदित हुआ कि विश्व के लगभग दो-तिहाई देशों की जनसंख्या की आय कुल आय के 1/6 भाग से भी कम थी. कम आय वाले देशों को ही विकासशील देश कहते हैं. आय के सन्दर्भ में विकासशील देश वे हैं जिनमें प्रति व्यक्ति आय-उत्पादन अपेक्षाकृत कम हो, गरीबी की सीमा का स्पर्श करता हो और यदि वहाँ आय उत्पादन कुशलता में वृद्धि हो भी रही है तो उसकी गति अत्यन्त धीमी है. राष्ट्रीय आय के निम्न स्तर के अभिशिप्त व्यक्ति स्वदेश छोड़कर विदेशों में जाकर सेवा करना पसन्द करते हैं. हमारा संकेत बौद्धिक वर्ग के व्यक्तियों-डाक्टरों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, शिक्षकों की ओर है. इस वर्ग के व्यक्तियों को जब विकसित देशों में पुष्कल आय के माध्यम उपलब्ध होते हैं तो वे उनके द्वारा आकर्षित होकर विदेशों में नौकरी करने के लिए अथवा व्यवसाय करने के लिए चले जाते हैं. इस प्रकार विकासशील देश अपने प्रबुद्ध नागरिकों से वंचित होता रहता है अर्थात् उसके सामने Brain Drain की समस्या सदैव बनी रहती है. कौन नहीं जानता है कि हमारे देश के अनेक सुयोग्य वैज्ञानिकों को केवल इस कारण भारत छोड़कर बाहर जाना पड़ा था, क्योंकि उन्हें भारत में पर्याप्त साधन एवं सुविधाएँ प्राप्त नहीं हो सकती थीं. इतना ही नहीं, पर्याप्त सुविधाओं के अभाव में अनेक प्रतिभाएँ कुण्ठित बनी रहती हैं और अपेक्षित विकास के अभाव में उनका व्यक्तिगत जीवन संत्रस्त एवं कुण्ठित बना रहता है तथा राष्ट्र भी उनकी प्रतिभा द्वारा होने वाले लाभ से वंचित रह जाता है. अल्पविकसित अथवा विकासशील देशों में जनसंख्या की वृद्धि, आर्थिक पिछड़ापन तथा बेरोजगारी की समस्याएँ तो स्थायी रूप से रहती ही हैं. इनके अलावा वहाँ आर्थिक विकास के लिए प्रेरणा प्रदान करने वाले वित्तीय साधनों, जैसे—बीमा कम्पनियाँ,बैंकों, मद्रा पूँजी आदि का अभाव रहता है. अल्पविकसित देशों में दोहरी अर्थव्यवस्था कार्य करती है. नगरों में विशिष्टीकृत सेवाएँ सिनेमा आदि रहती हैं. ग्रामीण क्षेत्र में इनका अभाव रहता है. अतः विकासशील देशों को अपना आर्थिक विकास करने के लिए बाह्य और आन्तरिक दोनों ही प्रकार के साधनों को गतिशील बनाने की आवश्यकता है. 

विकास के मार्ग में कई तत्त्व बाधक बनते हैं. इनमें गृह-युद्ध, आर्थिक असन्तोष, असन्तुलित शिक्षा, मुद्रास्फीति तथा अस्वस्थ जलवायु प्रमुख है. भारत का उदाहरण हमारे सामने है. भारत के सन्दर्भ में एक अन्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कारण भी है और वह है— अन्य राष्ट्रों का ईर्ष्याभाव. भारत के विकास की गति को अनेक राष्ट्र सहन नहीं कर पा रहे हैं. वे विभिन्न एजेन्सियों के माध्यम से भारत के विभिन्न वर्गों में असन्तोष एवं विद्रोह के बीज बोते रहते हैं. इस प्रकार उत्पन्न समस्याएँ हमारी सरकारों के ध्यान बटाये रहती हैं और विकास के मार्ग को संकटापन्न बनाये रखती है. पाकिस्तान और चीन के आक्रमणों के कारण भारत के विकास की गति को भारी धक्के लग चुके हैं. इतना ही नहीं, कश्मीर का प्रश्न उछालकर पाकिस्तान के शासक भारत सरकार के सामने युद्ध का आतंक उपस्थित रखते हैं. भारत-पाक सीमाओं पर पाकिस्तान के सैनिकों द्वारा छुटपुट वारदातों की पुनरावृत्तियाँ भी विकास के सन्दर्भ में राहू-केतू बनी रहती हैं और इस प्रकार देश की विपूल धनराशि, जोकि विकास कार्यों में लगायी जा सकती थी, युद्ध की सामग्री के ऊपर व्यय होती रहती है. 

विकास के उपाय 

वैज्ञानिक प्रगति, औद्योगिक उन्नति तथा यातायात के साधनों की अनेकानेक सुविधाओं आदि के फलस्वरूप विश्व के राष्ट्र एकदम एक-दूसरे के निकट आ गये हैं तथा पारस्परिक सहयोग एक आवश्यकता हो गयी है, साथ ही उसकी सम्भावनाएँ भी बढ़ गयी हैं. ऐसी स्थिति में पारस्परिक सहायता एवं सहयोग की योजनाएँ भी कार्यान्वित होती रहती हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में तथा स्वतन्त्र एवं वैयक्तिक स्तरों पर विकसित देश विकासशील देशों को विकासोन्मुख बनाने में आर्थिक, तकनीकी आदि सहायता प्रदान करते रहते हैं. व्यापार, उद्योग, बेरोजगारी आदि के क्षेत्रों में पारस्परिक सहयोग आज वस्तुतः विश्वस्तरीय आर्थिक नीति एवं परियोजनाओं का एक आवश्यक अंग ही बन गया है. इस सहयोग और सहायता के पीछे राजनीतिक उद्देश्य भी लगे रहते हैं. यही कारण है कि आर्थिक सहायता के अनुपात में आर्थिक विकास नहीं हो पाता है. आर्थिक सहायता यदि शुद्ध मानवीय दृष्टि से प्रदान की जाये और सहायता-सहयोग के साथ राजनीतिक डोरे न लगाए जाएँ तो विश्व का आर्थिक ढाँचा कुछ और ही हो जाये तथा विकसित अथवा विकासशील देशों की प्रगति की गति तीव्र हो जाए. हमें समझ लेना चाहिए कि विश्व समाज की अशान्ति के मूल में आर्थिक विषमता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण है. 

प्रत्येक देश अन्तर्राष्ट्रीय अथवा विश्व व्यापार को प्रभावित करता है. यह तथ्य सभी स्वीकार करेंगे कि विकसित राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को अधिक प्रभावित करते हैं. वस्तुस्थिति तो यह है कि विश्व व्यापार की कुंजी विकसित देशों के ही हाथों में रहती है. विकसित राष्ट्र अविकसित एवं विकासशील देशों को अपनी मंडियों के रूप में देखते हैं. वे विकासशील देशों से कच्चा माल प्राप्त करते हैं तथा वहाँ पक्का माल भेजते हैं. इसी के साथ 

आर्थिक सहायता, सैन्य सामग्री सहायता आदि के कार्यक्रम भी चलते रहते हैं. फलतः विकसित देश विकासशील देशों को कुछ भी सामग्री दे देते हैं और वहाँ से मनमानी पूँजी बटोरते रहते हैं. भारत विकसित देशों से अरबों रुपये की युद्ध सामग्री खरीदता रहता है, तकनीकी सहायता के नाम पर विदेशी विशेषज्ञों को वेतन के रूप में करोड़ों रुपये देता रहता है. ये तकनीकी विशेषज्ञ जासूसी भी करते रहते हैं और विकासशील देशों की राजनीतिक जड़ों को खोखला करते रहते हैं. जनवरी 1985 में जासूसी काण्ड का भण्डाफोड़ इसका ज्वलन्त उदाहरण है. इस प्रकार विकसित देश अधिकाधिक विकसित होते रहते हैं तथा विकासशील देश अपने विकास के लिए सदैव परमुखापेक्षी बने रहते हैं. 

इसके अलावा विकसित राष्ट्रों की बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हैं जो विकासशील देशों को विकासशील बनाने के नाम पर वहाँ पूँजी लगाती हैं और आर्थिक दोहन करती हैं. इनके द्वारा पूँजी-विनियोग की शर्ते कुछ इस प्रकार की होती हैं कि आर्थिक सहायता एवं पूँजी-विनियोग की आड़ में इन विकासशील देशों का आर्थिक शोषण होता रहता है, हमारी उक्त अवधारणा की पुष्टि हेतु केवल यह निवेदन करना पर्याप्त है कि विकासशीलता के नाम पर पौंड और डॉलर के सन्दर्भ में भारत की मुद्रा ‘रुपये’ का निरन्तर अवमूल्यन होता जा रहा है. 

अधिकतम उत्पादन, बचत एवं पूँजी विनियोग में सन्तुलन, पर्याप्त पूँजी निर्माण एवं प्रति व्यक्ति अधिकतम आय आदि तत्त्वों के दर्पण में विकसित देश का प्रतिबिम्ब देखा जा सकता है. 

विकास के लिए आन्तरिक साधनों पर अधिक निर्भर रहना चाहिए. बाहरी साधनों पर अत्यधिक निर्भरता सम्बन्धित देश की स्थिति को दयनीय बना देती है. औद्योगीकरण वस्ततः विकास की धुरी है, जिसे अर्थतंत्र का मापदण्ड कहा जा सकता है. औद्योगिक विकासशीलता राजनीतिक सम्बन्धों का स्वरूप भी निर्धारित करती है. 

देश के अविकसित रहने से वहाँ के निवासियों की गरीबी अभिशाप बन जाती है और उनका नैतिक स्तर गिर जाता है और देश की उन्नति प्रगति दिवास्वप्न बन जाती है. 

किसी भी देश के सम्यक विकास के लिए यह आवश्यक है कि वहाँ आन्तरिक सन्तोष हो, वहाँ के निवासियों में राष्ट्रीय भावना हो तथा पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध हों. 

इस समय विश्व में कुल मिलाकर 170 राष्ट्र हैं. इनमें लगभग 10 राष्ट्र प्रायः समस्त दृष्टियों से उन्नत और सम्पन्न होने के कारण विकसित देश कहे जाते हैं. ये मुख्यतः उत्तरी अमरीका और उत्तरी यूरोप में स्थित हैं. एशिया व अफ्रीका के अधिकांश देश–जापान को छोड़कर औद्योगिक दृष्टि से अविकसित और अत्यन्त निर्धन हैं. ये देश ऐसी नवीन आर्थिक व्यवस्था लाने के लिए प्रयत्नशील हैं जिससे इनकी विपन्नता का निवारण हो सके.

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